Kanhaiya Lal Murder Case: हाईकोर्ट ने बरकरार रखे आतंकी आरोप
करीब साढ़े तीन साल पहले हुई इस दिल दहला देने वाली वारदात का ट्रायल अब आगे बढ़ेगा, और आरोपियों को कड़े आतंकवाद-रोधी कानून का सामना करना पड़ेगा। हाईकोर्ट के इस फैसले को कानूनी जानकार एक महत्वपूर्ण नजीर के तौर पर देख रहे हैं

उदयपुर के बहुचर्चित कन्हैयालाल हत्याकांड में Kanhaiya Lal Murder Case के सभी 8 आरोपियों पर अब आतंकवाद की धाराओं में ही मुकदमा चलेगा। राजस्थान हाईकोर्ट ने इन सभी आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के चार्ज फ्रेम करने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने मोहम्मद रियाज अत्तारी, मोहम्मद गौस सहित अन्य आरोपियों की याचिकाओं पर यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत ‘मिनी-ट्रायल’ नहीं चला सकती। एनआईए की विशेष अदालत ने 12 जनवरी 2024 और 13 फरवरी 2024 को आरोपियों के खिलाफ UAPA, IPC और आर्म्स एक्ट के तहत आरोप तय किए थे, जिन्हें हाईकोर्ट ने अब बरकरार रखा है।
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि करीब साढ़े तीन साल पहले हुई इस दिल दहला देने वाली वारदात का ट्रायल अब आगे बढ़ेगा, और आरोपियों को कड़े आतंकवाद-रोधी कानून का सामना करना पड़ेगा। हाईकोर्ट के इस फैसले को कानूनी जानकार एक महत्वपूर्ण नजीर के तौर पर देख रहे हैं, क्योंकि इसमें चार्ज-फ्रेमिंग स्टेज पर अदालत की भूमिका को लेकर स्पष्ट सिद्धांत तय किया गया है।
आरोप तय करने के स्टेज पर कोर्ट नहीं चला सकता ‘मिनी-ट्रायल’
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस स्टेज पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए सबूतों से आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस बनता है या नहीं। अगर आरोपियों के खिलाफ ‘गंभीर संदेह’ मौजूद है, तो कोर्ट का आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करना पूरी तरह से सही है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चार्ज-फ्रेमिंग के दौरान गहन साक्ष्य-परीक्षण या गवाहों की विश्वसनीयता जांचने का काम अदालत का नहीं है, यह सब ट्रायल के दौरान ही तय होगा। इस टिप्पणी को निचली अदालतों के लिए भी एक दिशा-निर्देश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आरोप तय करने की प्रक्रिया में देरी न हो और गंभीर अपराधों के मामलों में ट्रायल जल्द शुरू हो सके। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की स्पष्टता से आतंकवाद जैसे संवेदनशील मामलों में निचली अदालतों को फैसला लेने में आसानी होगी।
आरोपियों की दलील: किसी आतंकी संगठन से संबंध नहीं
आरोपियों की ओर से एडवोकेट मोहम्मद सलीम, एडवोकेट सैयत सआदत अली और अन्य वकीलों ने कोर्ट को बताया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत या सामग्री मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी कभी किसी गैरकानूनी या आतंकवादी संगठन के सदस्य रहे हैं, या उन्होंने किसी ऐसे संगठन के इशारे पर काम किया है। बचाव पक्ष का कहना था कि यह पूरा मामला कथित तौर पर नूपुर शर्मा की ओर से की गई टिप्पणियों को कन्हैया लाल की ओर से सोशल मीडिया पर शेयर करने के बाद पैदा हुए विवाद से जुड़ा है।
वकीलों की दलील थी कि मृतक के इस कृत्य से भले ही आरोपी आक्रोशित हुए हों, लेकिन यह कृत्य अपने आप में इतना बड़ा आधार नहीं है कि आरोपियों पर UAPA जैसा कड़ा कानून थोप दिया जाए। आरोपियों के वकीलों ने यह भी दावा किया कि पुलिस की ओर से बरामद किए गए वीडियो में ऐसा कोई शब्द, अभिव्यक्ति अथवा सबूत नहीं है, जिसे सार्वजनिक शांति भंग करने, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और क्षेत्र की सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाला माना जाए।
एनआईए का पक्ष: सिर्फ सोशल मीडिया मैसेज तक सीमित नहीं है मामला
मामले में एनआईए के वकीलों ने दलील दी कि UAPA की धाराओं के तहत आपराधिक साजिश का दायरा बेहद बड़ा है। इसमें केवल आतंकवादी कृत्य को अंजाम देना ही शामिल नहीं है, बल्कि उसके लिए की गई साजिश, प्रयास, उकसाना, सलाह देना, सहायता करना और घटना की तैयारी करना भी अपराध के दायरे में आता है।
एनआईए के मुताबिक इसके लिए आतंकवादी कृत्य का पूरी तरह पूरा होना भी जरूरी नहीं है। जांच एजेंसी ने कोर्ट से कहा कि इस मामले को केवल सोशल मीडिया मैसेज तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आरोपियों की ओर से दी गई धमकी, घटना के बाद उनका आचरण, उनके पास से बरामद वीडियो और जांच में एकत्र सबूत सामूहिक रूप से बड़ी साजिश की ओर इशारा करते हैं।
एनआईए ने यह भी स्पष्ट किया कि इन सबकी गहन जांच ट्रायल के दौरान ही हो सकती है, और चार्ज की स्टेज पर इसका फैसला नहीं किया जा सकता। एजेंसी ने कोर्ट में यह भी कहा कि आरोपियों का यह कहना कि वे किसी संगठन के औपचारिक सदस्य नहीं हैं, उन्हें आरोपों से मुक्त नहीं करता है, क्योंकि कानून में साजिश और सहायता जैसे व्यापक पहलू भी शामिल हैं।
हाईकोर्ट का फैसला: आतंकवाद की धाराओं में ही चलेगा मुकदमा
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसलों को सही ठहराते हुए कहा कि केस में मौजूद वीडियो, धमकियों और आरोपियों के बीच संबंधों की जांच ट्रायल के दौरान ही संभव है, इसे इस शुरुआती चरण में खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी के साथ ही यह साफ हो गया कि सभी आरोपियों पर आतंकवाद की धाराओं में ही मुकदमा चलेगा।
जयपुर की स्पेशल कोर्ट में पेश चार्जशीट में एनआईए टीम ने कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें रियाज और गौस भी शामिल हैं। चार्जशीट में साफ लिखा गया है कि आरोपियों ने एक आतंकी मॉड्यूल के रूप में काम कर बदला लेने की साजिश रची थी। जांच एजेंसी के मुताबिक आरोपी कट्टरपंथी थे और भारत समेत दुनिया भर में आने वाले आपत्तिजनक ऑडियो, वीडियो व मैसेज से प्रेरित थे। चार्जशीट में यह भी दर्ज है कि आरोपियों ने पूरे देश में खौफनाक तरीके से वारदात को अंजाम देने के लिए चाकू और हथियारों की व्यवस्था पहले से कर रखी थी।
28 जून 2022: दिनदहाड़े दुकान में घुसकर हुई थी बेरहम हत्या
चार्जशीट के मुताबिक आरोपियों के मन में कन्हैयालाल की फेसबुक पोस्ट को लेकर गहरा आक्रोश था। कट्टरपंथी सोच के चलते पूरे भारत में आतंक फैलाने के मकसद से आरोपियों ने हत्या का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया था। जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने भारत के लोगों के बीच इस्लाम के प्रति लिखने पर डरने और आतंक फैलाने के इरादे से एक और धमकी भरा वीडियो भी शूट किया था।
दरअसल इस केस में सबसे पहले उदयपुर के धानमंडी थाने में FIR दर्ज की गई थी, जिसके बाद उसी दिन एनआईए ने इस केस को री-रजिस्टर्ड कर अपनी जांच शुरू की थी। घटना के बाद एनआईए कोर्ट में पेशी के दौरान वकीलों ने आरोपियों की जमकर पिटाई भी की थी, जिसका वीडियो उस वक्त खूब वायरल हुआ था।
आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 120बी, 449, 302, 307, 324, 153(ए), 153(बी), 295(ए), यूए(पी) अधिनियम की धारा 16, 18 और 20 के तहत चार्जशीट दर्ज की गई है। यही नहीं, आर्म्स एक्ट की धारा 4/25(1बी) भी आरोपियों पर लगाई गई थी। बता दें कि 28 जून 2022 को दिनदहाड़े दुकान में घुसकर आरोपियों ने कन्हैयालाल की बेरहमी से गर्दन काट दी थी, जिस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और उदयपुर समेत कई शहरों में तनाव फैल गया था।
हाईकोर्ट का यह फैसला क्यों है महत्वपूर्ण
कानूनी जानकारों का मानना है कि राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला आतंकवाद से जुड़े मामलों में चार्ज-फ्रेमिंग स्टेज पर कोर्ट की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए प्रथम दृष्टया साक्ष्य ही चार्ज तय करने के लिए पर्याप्त होते हैं, और गहन परीक्षण ट्रायल का विषय है। इस फैसले के बाद अब मामले का ट्रायल एनआईए की विशेष अदालत में आगे बढ़ेगा, जहां अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों अपने-अपने साक्ष्य और गवाह पेश करेंगे।
पीड़ित परिवार और कन्हैयालाल के परिजनों के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से वे इस मामले में तेज सुनवाई और सख्त कार्रवाई की मांग करते रहे हैं। वहीं कानूनी हलकों में इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि हाईकोर्ट के इस रुख से देशभर में चल रहे इसी तरह के अन्य UAPA मामलों में भी निचली अदालतों को स्पष्ट दिशा मिलेगी।
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