राजस्थान

Sanwaliya Seth के नाम से शुरू होती है धनतेरस पर नई बही

धनतेरस पर मेवाड़ के बाजारों में गल्ला, कपड़ा, खाद-बीज और आभूषण कारोबारी नए बही-खाते शुरू करते हैं। कई व्यापारी पहली प्रविष्टि में श्री सांवलिया सेठ का नाम लिखते हैं। मान्यता है कि सालभर के कारोबार में होने वाले लाभ का एक हिस्सा मंदिर में अर्पित किया जाता है।

राजस्थान सहित पूरे देश में Dhanteras यानी धनतेरस का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। वहीं चित्तौड़गढ़ के सांवलिया सेठ में भी धनतेरस को मनाने की एक अनोखा चलन है। मेवाड़-मालवा के अफीम और मार्बल बेल्ट में व्यापार की अपनी अलग परंपरा है। आधुनिक टैली और डिजिटल लेजर के दौर में भी यहां धनतेरस पर बही-खाते बदलने की रस्म में सबसे पहले श्री सांवलिया सेठ का नाम दर्ज होता है।

गांवों के दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारियों तक, अनेक व्यापारी नई लाल पोथी की शुरुआत सेठजी के नाम से करते हैं। यह परंपरा कारोबार में आस्था और विश्वास के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। धनतेरस पर मेवाड़ के बाजारों में गल्ला, कपड़ा, खाद-बीज और आभूषण कारोबारी नए बही-खाते शुरू करते हैं। कई व्यापारी पहली प्रविष्टि में श्री सांवलिया सेठ का नाम लिखते हैं। मान्यता है कि सालभर के कारोबार में होने वाले लाभ का एक हिस्सा मंदिर में अर्पित किया जाएगा।

यह कोई औपचारिक कारोबारी समझौता नहीं, बल्कि आस्था और व्यक्तिगत संकल्प से जुड़ी परंपरा है। मेवाड़-मालवा अंचल का यह कारोबारी क्षेत्र वर्षों से अफीम की खेती और मार्बल व्यापार के लिए जाना जाता है, और यहां के व्यापारिक समुदाय ने अपने रोजमर्रा के कामकाज में धार्मिक आस्था को इतनी गहराई से जोड़ रखा है कि यह परंपरा अब उनकी सांस्कृतिक पहचान का ही हिस्सा बन चुकी है।

हर साल धनतेरस के मौके पर यह रस्म नए सिरे से दोहराई जाती है, और नए कारोबारी भी इसी परंपरा को अपनाते हुए अपनी दुकान की शुरुआत सांवलिया सेठ के नाम से करते हैं।

लाल पोथी की परंपरा: भगवान को साक्षी मानकर शुरू होता है हिसाब-किताब

पारंपरिक रूप से व्यवसायी अपनी दुकानों के बही-खातों, जिन्हें ‘लाल पोथी’ कहा जाता है, की शुरुआत भगवान को साक्षी मानकर या उनका हिस्सा तय करके करते हैं। यह लाल रंग की पोथी सिर्फ एक कागज की किताब नहीं, बल्कि सालभर के कारोबार का धार्मिक दस्तावेज मानी जाती है।

लाल रंग को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसलिए खाता-बही के लिए भी परंपरागत रूप से इसी रंग की पोथी चुनी जाती है, जिस पर पहले पन्ने पर स्वास्तिक और शुभ-लाभ जैसे मांगलिक चिन्ह भी बनाए जाते हैं। कारोबारी परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा चली आ रही है, और नई पीढ़ी के व्यापारी भी बुजुर्गों से मिली इस रीत को उतनी ही श्रद्धा से निभा रहे हैं।

कई पुराने व्यापारी बताते हैं कि उनके दादा-परदादा के समय से ही यह परंपरा चली आ रही है, और परिवार की हर पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने का जिम्मा संभालती रही है, जिससे यह रस्म सिर्फ धार्मिक कर्मकांड न रहकर पारिवारिक विरासत का भी रूप ले चुकी है।

हाल ही में सांवलिया सेठ के भंडार से तीसरे राउंड तक 20.63 करोड़ रुपए की भारी राशि निकलने की खबर भी सामने आई थी, जो दिखाती है कि इस मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं और कारोबारियों की आस्था किस कदर गहरी है। सिर्फ धनतेरस ही नहीं, बल्कि सालभर अलग-अलग मौकों पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु सांवलिया सेठ के दर्शन के लिए मंडफिया पहुंचते हैं, और उनमें बड़ी संख्या व्यापारी वर्ग की भी होती है, जो अपने कारोबार में सफलता की कामना लेकर यहां आते हैं।

Sanwaliya Seth | कई व्यापारी पहली प्रविष्टि में श्री सांवलिया सेठ का नाम लिखते हैं।

धनतेरस की शाम ‘जीरो बैलेंस’ का अनोखा नियम, कोई कर्ज नहीं

इस अंचल में धनतेरस नए बही-खाते शुरू करने के साथ पुराने हिसाब-किताब निपटाने का भी अवसर है। व्यापारियों का मानना है कि सांवलिया सेठ की नई बही में कोई पुराना कर्ज न रहे, इसलिए कोशिश होती है कि नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत पुराने बकाये चुकाकर करें। उनके लिए नई लाल पोथी केवल लेखा-जोखा रखने का माध्यम नहीं, बल्कि नए संकल्प और शुभ शुरुआत का प्रतीक भी है।

डिजिटल दौर में भी यह परंपरा मेवाड़ के कारोबार में सांवलिया सेठ के प्रति आस्था की मौजूदगी बताती है। कई पुराने व्यापारी तो यह भी मानते हैं कि जिस दिन बही में कर्ज की कोई प्रविष्टि नहीं होती, उस साल कारोबार में बरकत बनी रहती है, और यही सोच हर साल धनतेरस से पहले पुराने हिसाब चुकता करने की होड़ को जन्म देती है। कुछ व्यापारी तो दीपावली से कई दिन पहले ही अपने ग्राहकों और सहयोगियों से संपर्क कर पुराने लेन-देन निपटाने में जुट जाते हैं, ताकि नई बही बिल्कुल साफ-सुथरी शुरुआत के साथ खुल सके।

मंडफिया की पांचों बैंक शाखाओं में सेठजी के नाम है ‘खाता नंबर-01’

चित्तौड़गढ़ के सांवलियाजी मंदिर मंडल के अध्यक्ष हजारीदास वैष्णव के अनुसार, मंडफिया में पांच बैंक हैं, एसबीआइ, बीओबी, बैंक ऑफ बड़ौदा (ग्रामीण), इंडियन बैंक व पंजाब नेशनल बैंक। पांचों बैंक शाखाओं में खाता नंबर-01 सांवलिया सेठ के नाम से है। भंडार और चढ़ावे की राशि इन बैंकों में जमा होती है। व्यापारियों की लाल पोथी से लेकर बैंक खातों तक सेठ के प्रति आस्था की झलक दिखाई देती है।

मंडफिया की पांचों बैंक शाखाओं में सेठजी के नाम है 'खाता नंबर-01 | Sanwaliya Seth

किसी भी बैंक शाखा में सबसे पहला खाता किसी व्यक्ति के बजाय आराध्य देव के नाम होना यह दर्शाता है कि मंडफिया और आसपास के पूरे कारोबारी तंत्र में धार्मिक आस्था किस तरह बैंकिंग व्यवस्था तक में शामिल कर ली गई है। मंदिर मंडल के अनुसार इन खातों में जमा होने वाली राशि का इस्तेमाल मंदिर परिसर के रखरखाव, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और विभिन्न धार्मिक-सामाजिक सेवा कार्यों में किया जाता है, जिससे चढ़ावे की यह परंपरा सीधे तौर पर स्थानीय विकास से भी जुड़ जाती है।

गल्ला, कपड़ा, खाद-बीज और आभूषण कारोबारियों की सदियों पुरानी आस्था

मेवाड़ के बाजारों में गल्ला मंडी से लेकर कपड़ा बाजार, खाद-बीज की दुकानों और आभूषण कारोबार तक, हर तरह का व्यापारी धनतेरस पर इसी परंपरा का पालन करता है। गांव-कस्बों की छोटी दुकानों से लेकर शहर के बड़े शोरूम तक, नई लाल पोथी में सबसे पहले सांवलिया सेठ का नाम दर्ज करना एक सामाजिक रीत बन चुका है, जिसे कोई भी व्यापारी तोड़ना नहीं चाहता। बाजार में यह भी आम धारणा है कि जो व्यापारी इस परंपरा का पालन नहीं करता, उसके कारोबार में बरकत की कमी रह सकती है, और यही मान्यता हर पीढ़ी को इस रीत से जोड़े रखती है।

यह सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि कारोबारी समुदाय को आपस में जोड़ने वाली एक साझा सांस्कृतिक पहचान भी बन गई है, जो पीढ़ियों से मेवाड़-मालवा के व्यापारिक समाज को एकजुट रखती आई है। अलग-अलग जाति और समुदाय के व्यापारी भी इस परंपरा में समान रूप से शामिल होते हैं, जिससे धनतेरस के मौके पर पूरा कारोबारी तबका एक समान आस्था के धागे में बंधता नजर आता है।

डिजिटल टैली के दौर में भी कायम है सांवलिया सेठ के प्रति भरोसा

आज के दौर में अधिकांश कारोबारी अपना हिसाब-किताब कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और डिजिटल टैली के जरिए रखते हैं, जहां एक क्लिक में पूरे साल का लेखा-जोखा तैयार हो जाता है। इसके बावजूद मेवाड़-मालवा के व्यापारी धनतेरस पर परंपरागत लाल पोथी बनाना और उसमें सांवलिया सेठ का नाम दर्ज करना नहीं भूलते। यह दिखाता है कि तकनीक चाहे जितनी भी आधुनिक हो जाए, कारोबार में आस्था और परंपरा की जड़ें उतनी ही गहरी बनी रहती हैं।

व्यापारियों के लिए यह रस्म न सिर्फ धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाने का भी एक जरिया है, जिसे वे हर साल धनतेरस पर पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। युवा पीढ़ी के कई व्यापारी भले ही कारोबार पूरी तरह डिजिटल तरीकों से चला रहे हों, लेकिन धनतेरस पर लाल पोथी में सांवलिया सेठ का नाम लिखने की इस परंपरा को वे भी उतनी ही आस्था के साथ निभाते हैं, जितनी उनके पूर्वज निभाते आए हैं, जिससे यह परंपरा आने वाले वर्षों में भी इसी तरह कायम रहने की उम्मीद जताई जा रही है।

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सांवरिया सेठ सिंह

सांवरिया सेठ सिंह पत्रकारिता के क्षेत्र में 14 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ ThumbsUp Bharat से जुड़े हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और डिजिटल न्यूज पोर्टल पर अपनी सेवाएं देने के बाद वे इस मंच का हिस्सा बने हैं। बिजनेस, देश-प्रदेश, धर्म और टेक्नोलॉजी समाचारों की गहरी समझ रखने वाले सांवरिया सेठ सिंह का अनुभव ThumbsUp Bharat की संपादकीय टीम को और सशक्त बनाता है।

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