राजस्थान

राजस्थान में बिना पार्षद बने भी मेयर-चेयरमैन बनने का रास्ता खुला, 13 जगह गैर पार्षदों की दावेदारी

यह व्यवस्था 2019 में लागू हुए हाइब्रिड फॉर्मूले से जुड़ी है। कांग्रेस सरकार के समय राजस्थान नगर पालिका निर्वाचन नियम 1994 में बदलाव कर गैर पार्षदों को भी निकाय प्रमुख बनने का रास्ता दिया गया था। उस समय सचिन पायलट ने इस फैसले का विरोध किया था। भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए सवाल उठाए थे, लेकिन सरकार में आने के बाद यह प्रावधान अब भी बरकरार है।

राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव के बाद मेयर, सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष पद की दौड़ शुरू हो चुकी है। इस बार चर्चा केवल जीते हुए पार्षदों की नहीं है। राज्य के नियमों के तहत कोई मतदाता पार्षद बने बिना भी निकाय प्रमुख का चुनाव लड़ सकता है। प्रदेश में 13 जगह ऐसे दावेदार सामने आए हैं, जो पार्षद नहीं हैं, फिर भी मेयर, चेयरमैन या पालिकाध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं।

Rajasthan Mayor Election में यह व्यवस्था 2019 में लागू हुए हाइब्रिड फॉर्मूले से जुड़ी है। कांग्रेस सरकार के समय राजस्थान नगर पालिका निर्वाचन नियम 1994 में बदलाव कर गैर पार्षदों को भी निकाय प्रमुख बनने का रास्ता दिया गया था। उस समय सचिन पायलट ने इस फैसले का विरोध किया था। भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए सवाल उठाए थे, लेकिन सरकार में आने के बाद यह प्रावधान अब भी बरकरार है।

हाइब्रिड फॉर्मूले से बदला नियम

राजस्थान में पहले मेयर, सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव केवल चुने हुए पार्षद ही लड़ सकते थे। यानी निकाय प्रमुख बनने के लिए पहले वार्ड से जीतना जरूरी था।

2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने नियमों में बदलाव किया। इसके बाद ऐसा प्रावधान लागू हुआ कि कोई मतदाता, पार्षद बने बिना भी निकाय प्रमुख पद का चुनाव लड़ सकता है। इस व्यवस्था को राजनीतिक भाषा में हाइब्रिड फॉर्मूला कहा गया।

इसका असर अब मौजूदा निकाय चुनावों में भी दिख रहा है। 13 जगह ऐसे प्रत्याशी निकाय प्रमुख बनने की दावेदारी कर रहे हैं, जो पार्षद के रूप में चुनाव जीतकर नहीं आए हैं।

हारे नेता भी दौड़ में

हाइब्रिड फॉर्मूले के कारण वे नेता भी मेयर, चेयरमैन या पालिकाध्यक्ष पद की दौड़ में आ सकते हैं, जो पार्षद का चुनाव नहीं लड़े या चुनाव हार गए।

इससे निकाय प्रमुख चुनाव की राजनीति बदल जाती है। पार्षदों की संख्या और दलों की सीटों के साथ-साथ अब बाहरी दावेदारों की भूमिका भी अहम हो सकती है।

राजनीतिक दलों के लिए यह व्यवस्था रणनीतिक विकल्प देती है। अगर किसी दल का मजबूत चेहरा वार्ड चुनाव नहीं जीता या चुनाव मैदान में नहीं उतरा, तब भी वह निकाय प्रमुख पद के लिए नाम आगे कर सकता है।

Rajasthan Mayor Election

सचिन पायलट ने किया था विरोध

2019 में जब यह प्रावधान लागू हुआ, उस समय अशोक गहलोत सरकार थी। सचिन पायलट तब डिप्टी सीएम और ग्रामीण विकास, पंचायतीराज व पीडब्ल्यूडी मंत्री थे।

सचिन पायलट ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया था। उनका कहना था कि गैर पार्षदों को निकाय प्रमुख बनाने का प्रावधान लागू करने से पहले कैबिनेट में चर्चा नहीं की गई। उन्होंने इसे बैकडोर एंट्री को बढ़ावा देने वाला फैसला बताया था।

पायलट समर्थक कई नेताओं ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। विरोध के बावजूद गहलोत सरकार ने प्रावधान वापस नहीं लिया। अब वही नियम मौजूदा चुनावी प्रक्रिया में लागू है।

भाजपा ने सवाल उठाए, नियम बरकरार

जब यह नियम कांग्रेस सरकार के समय लागू हुआ था, तब भाजपा विपक्ष में थी। भाजपा ने उस समय इस प्रावधान पर सवाल उठाए थे।

अब राज्य में भाजपा सरकार है, लेकिन यह व्यवस्था अब भी बरकरार है। मौजूदा सरकार ने शहरी निकाय और पंचायतीराज चुनावों में दो से ज्यादा बच्चों वाला प्रावधान हटा दिया है। पहले दो से ज्यादा बच्चों वाले व्यक्ति पार्षद और निकाय प्रमुख का चुनाव नहीं लड़ सकते थे।

हाइब्रिड फॉर्मूले को लेकर राजनीतिक बहस इसलिए जारी है, क्योंकि यह सीधे स्थानीय लोकतंत्र और निर्वाचित प्रतिनिधित्व से जुड़ा मुद्दा है। समर्थक इसे योग्य चेहरों को मौका देने वाला प्रावधान मानते हैं, जबकि विरोध करने वाले इसे पार्षदों की भूमिका कम करने वाला मानते रहे हैं।

कौन नहीं लड़ सकता चुनाव

राजस्थान नगर पालिका निर्वाचन नियमों के तहत हर व्यक्ति निकाय प्रमुख पद का चुनाव नहीं लड़ सकता। कुछ जनप्रतिनिधियों को इस चुनाव से बाहर रखा गया है।

सांसद, विधायक, जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच, वार्ड पंच, जिला परिषद सदस्य और पंचायत समिति सदस्य शहरी निकाय प्रमुखों का चुनाव नहीं लड़ सकते।

मेयर, सभापति या नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए नामांकन फॉर्म के साथ जमानत राशि भी जमा करनी होती है। तीनों पदों के लिए अलग-अलग जमानत राशि तय है।

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बोर्ड गठन की राजनीति पर असर

इस प्रावधान का सबसे ज्यादा असर बोर्ड गठन की रणनीति पर पड़ता है। निकाय चुनाव में पार्षदों की जीत के बाद दल अपने मेयर, सभापति या अध्यक्ष चेहरे को तय करते हैं।

अगर कोई मजबूत राजनीतिक चेहरा पार्षद नहीं है, तब भी पार्टी उसे निकाय प्रमुख पद के लिए आगे कर सकती है। इससे कई जगह पार्षदों की अंदरूनी दावेदारी और पार्टी नेतृत्व की पसंद के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है।

आम मतदाता के लिए इस नियम का मतलब साफ है। उसने जिसे वार्ड पार्षद चुना है, वही जरूरी नहीं कि शहर का प्रमुख बने। नियमों के तहत कोई गैर पार्षद भी पार्षदों के समर्थन से मेयर, सभापति या पालिकाध्यक्ष बन सकता है।

राजस्थान के निकाय चुनाव में अब नजर केवल नतीजों पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी है कि किन शहरों में दल हाइब्रिड फॉर्मूले के तहत गैर पार्षद चेहरों को आगे बढ़ाते हैं।

 

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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