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पितृ पक्ष 10 अक्टूबर तक: मान्यता- पितरों की कृपा से बनी रहती है खुशहाली, जानें धूप-ध्यान का सही समय

Pitru Paksha 2026 आज आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि से शुरू हो गया है और यह 10 अक्टूबर तक चलेगा। मान्यता है कि इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और धूप-ध्यान करने से पितर देव प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

Pitru Paksha 2026 की शुरुआत आज आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि से हो गई है, जो 10 अक्टूबर तक चलेगा। पितृ पक्ष में परिवार के मृत सदस्यों को पितर देव माना जाता है और उनके लिए श्राद्ध-तर्पण किया जाता है। आज उन पितरों का श्राद्ध किया जाएगा, जिनकी मृत्यु प्रतिपदा तिथि पर हुई थी।

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श्राद्ध-तर्पण और दान-पुण्य से मिलती है पितरों को तृप्ति

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध-तर्पण और दान-पुण्य खासतौर पर करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, धन, जूते-चप्पल, छाता, ऊनी वस्त्र, खाना और पलंग जैसी चीजें दान की जा सकती हैं। मान्यता है कि इस शुभ काम से भी पितरों को तृप्ति मिलती है और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति आती है।

कुटुंब के मृत सदस्यों के नाम पर किया गया दान सिर्फ धार्मिक परंपरा भर नहीं, बल्कि समाज के जरूरतमंद वर्ग की मदद का भी एक जरिया माना जाता है। यही वजह है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों में मंदिरों, गौशालाओं और सामाजिक संस्थाओं में दान का काम बड़े स्तर पर देखा जाता है।

कुतुप काल में करना चाहिए धूप-ध्यान

शास्त्रों के अनुसार सुबह और शाम का समय देवी-देवताओं की पूजा के लिए शुभ माना गया है, जबकि पितरों के लिए धर्म-कर्म करने का सबसे अच्छा समय दोपहर के आसपास का रहता है। इस समय को कुतुप काल कहा जाता है। कुतुप काल में ही पितरों के लिए धूप-ध्यान, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करना शुभ माना जाता है।

पंचांग की गणना के हिसाब से दिन को पांच बराबर हिस्सों में बांटा जाता है, और कुतुप काल दिन का आठवां मुहूर्त होता है, जो आमतौर पर दोपहर के आसपास पड़ता है। इसकी अवधि करीब 45 मिनट की मानी जाती है, हालांकि शहर के हिसाब से सूर्योदय-सूर्यास्त और तिथि की गणना अलग होने से यह समय थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग से समय जरूर देख लेना चाहिए।

रौहिण और अपराह्न काल का भी है खास महत्व

कुतुप काल के बाद रौहिण काल आता है, जो भी करीब 45 मिनट तक रहता है। मान्यता है कि श्राद्ध कर्म कुतुप काल में शुरू करके रौहिण काल तक जारी रखा जा सकता है। इसके बाद अपराह्न काल आता है, जिसे दिन के पांच हिस्सों में चौथा हिस्सा माना गया है और शास्त्रों में इसे खासतौर पर पितरों के लिए ही तय किया गया माना जाता है।

ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध की तिथि सूर्योदय के आधार पर नहीं, बल्कि अपराह्न काल में जो तिथि रहती है, उसी के आधार पर तय होती है। इसलिए पंडित और आचार्य तर्पण व पिंडदान का काम कुतुप और रौहिण काल में शुरू कर अपराह्न काल के भीतर पूरा करने की सलाह देते हैं।

धूप-ध्यान के लिए जरूरी सामग्री

धूप-ध्यान के लिए गाय के गोबर से बने कंडे, धूप देने के लिए हवन कुंड या कोई बर्तन, घी, काले तिल, चावल, गुड़, कर्पूर, जल से भरा तांबे का लोटा, फूल और बैठने के लिए आसन जैसी चीजें इस्तेमाल की जाती हैं। अगर ये सभी चीजें उपलब्ध न हों, तो जल, तिल, कंडे के अंगारे और गुड़-घी से भी श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करके धूप-ध्यान किया जा सकता है।

बहुत से घरों में खीर-पुड़ी बनाकर भी धूप दी जाती है, क्योंकि इसे पितरों का प्रिय भोजन माना जाता है। धूप देते समय पितरों का नाम लेकर उनका स्मरण करना और श्रद्धा के साथ मन में उनके प्रति आभार व्यक्त करना भी परंपरा में जरूरी बताया गया है।

Pitru Paksha 2026

श्राद्ध और तर्पण में क्या है अंतर

अक्सर श्राद्ध और तर्पण को एक ही मान लिया जाता है, जबकि दोनों अलग-अलग कर्म हैं। श्राद्ध में पितरों के निमित्त विधि-विधान से पूजा, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है, जबकि तर्पण में सिर्फ जल, तिल और कुश की मदद से पितरों को जल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि जो परिवार पूरे विधि-विधान से श्राद्ध नहीं कर पाते, वे रोज या पितृ पक्ष में तर्पण करके भी पितरों का स्मरण कर सकते हैं। इसी वजह से तर्पण को श्राद्ध का सरल और आसान विकल्प भी कहा जाता है।

परिवार में परंपरा से कौन करता है श्राद्ध कर्म

परंपरागत रूप से घर के सबसे बड़े पुत्र या परिवार के मुख्य सदस्य को श्राद्ध कर्म करने का दायित्व दिया जाता है, हालांकि आज कई परिवारों में यह जिम्मेदारी सुविधा और उपलब्धता के आधार पर बंट भी जाती है। जिन परिवारों में पंडित बुलाकर विधि-विधान से श्राद्ध किया जाता है, वहां आचार्य ही तिथि, मुहूर्त और पूरी प्रक्रिया बताते हैं। वहीं कई घरों में सामूहिक रूप से परिवार के सभी सदस्य मिलकर सुबह धूप-ध्यान की सामग्री तैयार करते हैं और घर के बड़े इसे संपन्न कराते हैं।

दान की चीजों का प्रतीकात्मक महत्व

पितृ पक्ष में किए जाने वाले दान का हर सामान अपने पीछे एक मान्यता रखता है। वस्त्र-दान को पितरों को वस्त्र पहुंचाने का प्रतीक माना जाता है, जबकि छाता और जूते-चप्पल का दान इस विश्वास से जुड़ा है कि पितरों की आत्मा को यात्रा में कष्ट न हो।

तिल और जल को पवित्रता और शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है, तो गुड़ व घी को पितरों तक मिठास और तृप्ति पहुंचाने का माध्यम बताया गया है। इसी तरह अन्न और भोजन का दान सीधे तौर पर भूखे को भोजन कराने की परंपरा से जुड़ा है, जिसे हिंदू मान्यताओं में सबसे बड़ा पुण्य कार्य माना गया है।

16 दिन के इस पर्व में हर तिथि का अपना महत्व

पितृ पक्ष कुल 16 दिनों का होता है, जिसमें हर दिन एक खास तिथि के पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है। जिस पितर की मृत्यु जिस तिथि पर हुई थी, परिवार के लोग उसी तिथि पर उनके नाम का श्राद्ध करते हैं। जिन्हें अपने पूर्वज की मृत्यु-तिथि ठीक से याद नहीं होती, वे आमतौर पर अमावस्या के दिन या फिर पितृ पक्ष की अंतिम तिथि सर्वपित्री अमावस्या पर श्राद्ध कर लेते हैं, ताकि किसी भी पितर की उपेक्षा न हो।

पितृ पक्ष से जुड़े ऐसे ही रीति-रिवाजों और धूप-ध्यान व तर्पण के आसान उपायों के बारे में पहले भी विस्तार से बताया जा चुका है, जिनका पालन आज भी ज्यादातर घरों में किया जाता है।

पितृ दोष से जुड़ी मान्यता और सावधानियां

ज्योतिष मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि अगर किसी परिवार में पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण ठीक से नहीं किया जाता, तो कुंडली में पितृ दोष बन सकता है, जिसका असर परिवार के सुख-शांति और तरक्की पर पड़ने की बात कही जाती है।

यह पूरी तरह आस्था और परंपरा से जुड़ी मान्यता है, विज्ञान से इसकी पुष्टि नहीं होती। इसी मान्यता के चलते ज्यादातर परिवार पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध-तर्पण को टालते नहीं हैं और इसे नियमित रूप से करने की कोशिश करते हैं।

पितृ पक्ष में मांस-मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज करने की सलाह भी परंपरा में दी जाती है। साथ ही इस दौरान नए वस्त्र, गृह प्रवेश, विवाह जैसे मांगलिक कार्य टाल दिए जाते हैं, क्योंकि यह पक्ष शोक और पितरों के स्मरण का समय माना जाता है, उत्सव का नहीं।

10 अक्टूबर को सर्वपित्री अमावस्या पर होगा समापन

पितृ पक्ष 10 अक्टूबर को सर्वपित्री अमावस्या के दिन समाप्त होगा, जिसे पितृ पक्ष की सबसे महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो या तिथि याद न हो। इसके अगले दिन से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है, इसलिए पितृ पक्ष का समापन नवरात्रि की तैयारियों से भी जुड़ा माना जाता है।

पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और धूप-ध्यान का महत्व

वाराणसी के ज्योतिषाचार्य पं. पुरुषोत्तम मिश्र के अनुसार, शास्त्रों में मनुष्य पर तीन तरह के ऋण बताए गए हैं— देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन ऋणों से मुक्ति के लिए पूजा, दान-पुण्य और पितरों से जुड़े धर्म-कर्म का विधान बताया गया है।

  • देव ऋण — भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करने से देव ऋण से मुक्ति मिलती है। नियमित पूजा और भक्ति को इस ऋण से जुड़े कर्तव्य के रूप में देखा जाता है।
  • ऋषि ऋण — साधु-संतों की सेवा, दान-पुण्य, सत्संग और उनके उपदेशों को जीवन में अपनाने से ऋषि ऋण उतरता है। पितृ पक्ष में संतों की संगति करना और धर्म-ज्ञान सुनना शुभ माना जाता है।
  • पितृ ऋण — पितरों के लिए श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और धूप-ध्यान करने से पितृ ऋण उतरता है। पितृ पक्ष के अलावा साल की 12 अमावस्या तिथियों पर भी पितरों के लिए धर्म-कर्म करने की परंपरा है। परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्म शांति के लिए ये कर्म किए जाते हैं।

मान्यता- पितृ पक्ष में घर आते हैं पितर

मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितर अपने वंशजों के घर आते हैं। इस समय श्रद्धा से किए गए श्राद्ध, तर्पण और धूप-ध्यान से वे तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देकर पितृ लोक लौटते हैं।

  • माना जाता है कि जो परिवार पितरों के लिए ये कर्म करते हैं, उनके पितर प्रसन्न होते हैं।
  • जो लोग पितृ पक्ष में श्राद्ध या तर्पण नहीं करते, उनके पितर अतृप्त रह सकते हैं।
  • धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों की अतृप्ति परिवार के जीवन में बाधाओं और परेशानियों का कारण बन सकती है।

कौन किसके लिए श्राद्ध कर सकता है?

  • पुत्र न हो तो कौन करे श्राद्ध — अगर किसी मृत व्यक्ति का पुत्र नहीं है, तो उसका भाई, भतीजा, माता के कुल के लोग, मामा, ममेरा भाई या शिष्य श्राद्ध कर सकते हैं। इन रिश्तेदारों में कोई न हो, तो कुल पुरोहित या गुरु भी श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।
  • माता-पिता का श्राद्ध — पिता या माता के लिए पुत्र-पुत्री श्राद्ध, पिंडदान और जल तर्पण कर सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति की संतान नहीं है, तो उसकी पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न हो, तो सगा भाई यह कर्म कर सकता है।
  • मृत महिला का श्राद्ध — किसी मृत महिला के लिए उसका पति या पुत्र श्राद्ध कर सकता है। परिवार की परंपरा के अनुसार अन्य योग्य परिजन भी यह कर्म कर सकते हैं।
  • कुंवारी कन्या का श्राद्ध — माता-पिता अपनी अविवाहित दिवंगत बेटी का श्राद्ध कर सकते हैं।
  • विवाहित बेटी का श्राद्ध — अगर विवाहित मृत बेटी के ससुराल पक्ष में श्राद्ध करने वाला कोई न हो, तो उसका पिता या मायके पक्ष के लोग उसका श्राद्ध कर सकते हैं।
  • नाना-नातिन और बेटी की संतान — बेटी की मृत संतान के लिए नाना श्राद्ध कर सकते हैं। मृत नाना के लिए नातिन श्राद्ध कर सकती है।
  • दामाद और ससुर का श्राद्ध — मृत दामाद के लिए ससुर श्राद्ध कर सकता है। मृत ससुर के लिए दामाद भी श्राद्ध कर सकता है।
  • सास का श्राद्ध — बहू अपनी मृत सास के लिए श्राद्ध कर्म कर सकती है।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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