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The Hindu में AI से हुई 2.2 करोड़ वोटर रिकॉर्ड की पड़ताल, डेटा जर्नलिज्म को मिली नई रफ्तार

अंग्रेजी अखबार The Hindu ने अपनी डेटा जर्नलिज्म में ChatGPT, Gemini और Claude जैसे AI टूल्स को गहराई से शामिल किया है। 2.2 करोड़ वोटर रिकॉर्ड की पड़ताल से लेकर चेन्नई की हीट स्ट्रेस स्टडी तक, कई बड़ी रिपोर्ट्स अब AI की मदद से तेजी से तैयार हो रही हैं।

मीडिया इंडस्ट्री पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था WAN-IFRA की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अंग्रेजी अखबार The Hindu ने अपनी डेटा जर्नलिज्म टीम में AI Data Journalism को गहराई से शामिल किया है। अखबार के डिप्टी नेशनल एडिटर और सीनियर एसोसिएट एडिटर श्रीनिवासन रामणी ने बताया कि ChatGPT, Gemini और Claude जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल अब उनकी टीम के रोजमर्रा के काम का हिस्सा बन चुके हैं, हालांकि फैसले और एडिटोरियल जजमेंट पूरी तरह पत्रकारों के हाथ में ही रहता है।

WAN-IFRA यानी वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पब्लिशर्स दुनियाभर के न्यूज पब्लिशर्स और मीडिया संस्थानों का प्रमुख वैश्विक संगठन है, जो मीडिया इंडस्ट्री में तकनीक, बिजनेस मॉडल और पत्रकारिता से जुड़े रुझानों पर लगातार रिपोर्टिंग और रिसर्च करता है। इसी संगठन की एक हालिया रिपोर्ट में The Hindu के डेटा जर्नलिज्म वर्कफ्लो को विस्तार से कवर किया गया है।

डेटा जर्नलिज्म क्या होती है

डेटा जर्नलिज्म पत्रकारिता का वह तरीका है, जिसमें बड़ी मात्रा में मौजूद सरकारी या सार्वजनिक डेटा, जैसे वोटर लिस्ट, सरकारी रिकॉर्ड, सर्वे या आंकड़े, का विश्लेषण करके कोई खबर या इन्वेस्टिगेशन तैयार की जाती है। इसमें अक्सर बड़ी स्प्रेडशीट, कोडिंग और चार्ट-मैप बनाने जैसा तकनीकी काम शामिल होता है, जिसे पहले पूरा करने में डेटा एक्सपर्ट्स और डेवलपर्स की अलग टीम चाहिए होती थी।

क्या है पूरा मामला

रिपोर्ट के मुताबिक, The Hindu की टीम अब बड़े पैमाने के डेटा को प्रोसेस करने, कोड लिखने और इंटरैक्टिव मैप बनाने के लिए AI टूल्स का इस्तेमाल कर रही है। इसमें ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन यानी OCR के जरिए स्कैन की गई इमेज-बेस्ड PDF फाइलों से डेटा निकालना, नेचुरल लैंग्वेज में सवाल पूछकर SQL क्वेरी बनवाना, और JavaScript, HTML, D3 जैसी कोडिंग भाषाओं में AI की मदद से कोड तैयार करवाना शामिल है।

श्रीनिवासन रामणी ने इसे एक उदाहरण से समझाया, उनके मुताबिक “AI एक बहुत काबिल इंटर्न जैसा है। आप उसे बताते हैं कि क्या करना है, वह वह काम कर देता है, लेकिन कंट्रोल पूरी तरह आपके हाथ में ही रहता है।”

2.2 करोड़ वोटर रिकॉर्ड की पड़ताल से सामने आईं गड़बड़ियां

The Hindu की टीम ने बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) से जुड़े करीब 2.2 करोड़ वोटर रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जो 2,48,000 से ज्यादा इमेज-बेस्ड PDF फाइलों में बिखरे हुए थे। AI टूल्स की मदद से इतने बड़े डेटा को प्रोसेस करना संभव हो सका, जिसे मैन्युअली करने में बहुत ज्यादा समय लगता।

इस पड़ताल में लिंग के आधार पर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने में असमानता और मृत बताए गए वोटरों से जुड़े असामान्य पैटर्न सामने आए। इस रिपोर्टिंग के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरा वोटर रिकॉर्ड डेटा सार्वजनिक करने का आदेश दिया, और बिहार में इससे जुड़ी गड़बड़ियों में सुधार भी किया गया।

रामणी ने साफ किया कि यह विश्लेषण पूरी तरह पत्रकारों की समझ पर आधारित था, उनके शब्दों में “ये नतीजे AI ने नहीं निकाले थे। हाइपोथिसिस हमारा था, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ भी हमारा था। AI ने सिर्फ बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेस करने में मदद की।”

बिना कोड लिखे बने चुनावी इंटरैक्टिव मैप

The Hindu की टीम ने 2019 और 2024, दोनों लोकसभा चुनावों के लिए इंटरैक्टिव मैप बनाए, जिन्हें क्षेत्र, राज्य और ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण के आधार पर फिल्टर किया जा सकता है। खास बात यह रही कि ये मैप बिना मैन्युअली कोड लिखे, सिर्फ AI प्रॉम्प्ट्स के जरिए महज दो हफ्तों में तैयार किए गए।

रामणी ने बताया, “मैंने खुद एक लाइन भी कोड नहीं लिखी। पूरा एप्लीकेशन ChatGPT, Gemini और Claude में प्रॉम्प्ट्स के जरिए दो हफ्तों में बनाया गया।” उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारिता में डेडलाइन बेहद अहम होती है, और अब सिर्फ तकनीकी मदद के इंतजार में डेडलाइन बढ़ानी नहीं पड़ती।

चेन्नई की हीट स्ट्रेस स्टडी: ₹15-20 हजार में तैयार हुए सेंसर

The Hindu की टीम ने चेन्नई में गर्मी से मजदूरों पर पड़ने वाले असर को समझने के लिए एक खास स्टडी की। इसके लिए सस्ते Arduino-बेस्ड सेंसर बनाए गए, जिनकी कुल लागत करीब ₹15,000 से ₹20,000 के बीच रही। AI की मदद से इन डिवाइसेज को डिजाइन करने में तकनीकी सहायता मिली।

इन सेंसर से चार मजदूरों के 24 घंटे के हीट एक्सपोजर को ट्रैक किया गया, जिसमें हीट इंडेक्स 69 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता देखा गया। इस रिपोर्टिंग के बाद तमिलनाडु सरकार ने मजदूरों के लिए हीट मैनेजमेंट प्लान का ऐलान किया। यह उदाहरण दिखाता है कि महंगे उपकरणों और बड़े बजट के बिना भी AI की मदद से जमीनी स्तर की पत्रकारिता को मजबूत बनाया जा सकता है, खासकर जलवायु और सेहत से जुड़ी रिपोर्टिंग में, जहां असली आंकड़े जुटाना अक्सर सबसे मुश्किल हिस्सा होता है।

AI इस्तेमाल में क्या सावधानी बरती जा रही है

रामणी के मुताबिक, डेटा एक्सट्रैक्शन और कोड जनरेशन जैसे स्ट्रक्चर्ड कामों में AI के गलत जवाब देने (हैलुसिनेशन) का खतरा कम रहता है, क्योंकि इनके नतीजों को सीधे टेस्ट किया जा सकता है। लेकिन एडिटोरियल नतीजे निकालने के लिए AI पर निर्भर रहने के खिलाफ उन्होंने साफ चेतावनी दी।

उनका कहना है, “आपको यह तय करने के लिए इंसानी समझ चाहिए कि किस चीज को बेहतर बनाना है।” उनके मुताबिक, अब डेटा-आधारित रिपोर्टिंग प्रिंट और डिजिटल, दोनों ऑपरेशन में शामिल हो चुकी है, न कि किसी अलग स्पेशलिस्ट यूनिट तक सीमित।

सीधी भाषा में समझें तो AI हैलुसिनेशन का मतलब है जब कोई AI टूल गलत या मनगढ़ंत जानकारी को सही जानकारी की तरह पेश कर दे। डेटा एक्सट्रैक्शन या कोड जनरेशन जैसे कामों में यह गलती आसानी से पकड़ में आ जाती है, क्योंकि नतीजों को सीधे असली डेटा से मिलाकर जांचा जा सकता है। लेकिन अगर AI से सीधे कोई निष्कर्ष या राय मांगी जाए, तो गलती पकड़ में आना उतना आसान नहीं होता, इसलिए The Hindu की टीम इस हिस्से को पूरी तरह इंसानी फैसले पर ही छोड़ती है।

भारतीय पत्रकारिता में AI का बढ़ता इस्तेमाल

पिछले कुछ सालों में Google Gemini जैसे AI मॉडल भारत में तेजी से लोकप्रिय हुए हैं, और अब मीडिया संस्थान भी इन्हें रिपोर्टिंग वर्कफ्लो का हिस्सा बना रहे हैं। हालांकि सरकारी संस्थानों में AI टूल्स को लेकर सतर्कता भी बरती जा रही है, जैसा वित्त मंत्रालय द्वारा कुछ AI टूल्स पर लगाई गई पाबंदी में देखा जा चुका है।

The Hindu का यह अनुभव दिखाता है कि सही सावधानियों के साथ AI का इस्तेमाल बड़े डेटा-आधारित इन्वेस्टिगेशन को तेज और सुलभ बना सकता है, बशर्ते फैसले और संदर्भ पूरी तरह इंसानी समझ पर आधारित रहें। रामणी के मुताबिक, अब डेटा-ड्रिवन रिपोर्टिंग किसी अलग टीम का काम नहीं रह गई, बल्कि प्रिंट और डिजिटल दोनों तरह की रिपोर्टिंग में इसका इस्तेमाल आम हो चुका है।

आगे क्या

The Hindu के इस मॉडल को भारत के अन्य न्यूज़रूम भी करीब से देख रहे हैं, खासकर उन जगहों पर जहां डेटा-हेवी इन्वेस्टिगेशन के लिए तकनीकी टीम सीमित है। छोटे और मझोले न्यूज़रूम के लिए भी यह उदाहरण उम्मीद जगाता है, क्योंकि पहले जिन इन्वेस्टिगेशन के लिए बड़ी टेक टीम और हफ्तों का समय चाहिए होता था, अब वही काम एक छोटी टीम कुछ दिनों में AI टूल्स की मदद से कर सकती है।

आने वाले समय में डेटा जर्नलिज्म में AI टूल्स का इस्तेमाल और बढ़ने की उम्मीद है, हालांकि इंडस्ट्री में यह चर्चा भी बनी रहेगी कि रिपोर्टिंग की सटीकता, तथ्यों की पुष्टि और एडिटोरियल जिम्मेदारी को कैसे बनाए रखा जाए। पूरी रिपोर्ट WAN-IFRA की वेबसाइट पर पढ़ी जा सकती है।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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