शनिवार को पड़ रही सर्व पितृ अमावस्या, इस दुर्लभ संयोग में करें ये श्राद्ध और शनि पूजन के उपाय
Sarv Pitru Amavasya 2026 इस बार शनिवार, 10 अक्टूबर को है, इसलिए यह शनिश्चरी अमावस्या भी है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक पितृ मोक्ष अमावस्या और शनिवार के इस दुर्लभ संयोग में किए गए श्राद्ध, दान और शनि पूजन से अक्षय पुण्य मिलने की मान्यता है।

आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर इस बार Sarv Pitru Amavasya 2026 मनाई जाएगी, और इसी दिन पितृ पक्ष भी समाप्त हो जाएगा। वाराणसी के ज्योतिषाचार्य पं. पुरुषोत्तम शर्मा के मुताबिक जब पितृ मोक्ष अमावस्या शनिवार को पड़ती है, तो इसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है, और इस दिन पितरों की तृप्ति के साथ-साथ शनि ग्रह की अनुकूलता के उपाय भी किए जा सकते हैं।
शनिवार और सर्व पितृ अमावस्या का संयोग इस बार क्यों खास
पं. पुरुषोत्तम शर्मा के अनुसार, पितृ मोक्ष अमावस्या अपने आप में पितरों के स्मरण और तृप्ति के लिहाज से साल की सबसे महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। जब यह तिथि शनिवार को आती है, तो इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि शनिवार को शनि देव, हनुमान जी और पीपल पूजन का भी विशेष धार्मिक महत्व होता है।
मान्यता है कि ऐसे दुर्लभ संयोग में किए गए धर्म-कर्म का फल सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना अधिक मिलता है। यही वजह है कि इस साल की सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा जा रहा है, और कई लोग पहले से ही श्राद्ध व दान-पुण्य की तैयारी में जुट गए हैं।
पंचांग के हिसाब से अमावस्या तिथि हर महीने आती है, लेकिन पितृ मोक्ष अमावस्या और शनिवार का मेल हर साल नहीं बनता। जिन लोगों की कुंडली में शनि कमजोर स्थिति में है, या जो शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या से गुजर रहे हैं, उनके लिए यह तिथि विशेष रूप से फलदायी मानी जा रही है, क्योंकि इस दिन पितृ कर्म और शनि पूजन, दोनों का लाभ एक साथ मिलने की मान्यता है।
सिर्फ श्राद्ध ही नहीं, सेवा और दान भी है इस दिन जरूरी
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक इस दिन सिर्फ विधि-विधान से श्राद्ध करना ही काफी नहीं है, बल्कि सेवा और दान-पुण्य करना भी उतना ही जरूरी माना गया है। छोटे बच्चों को भोजन कराना, जरूरतमंद लोगों की सहायता करना और रोगियों को दवाएं दान करना जैसे कार्य इस दिन बेहद शुभ माने जाते हैं।
दान-पुण्य के साथ-साथ गाय, कुत्ते और कौए को भोजन कराने की परंपरा भी पितृ कर्म से सीधे जुड़ी है। कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए श्राद्ध का भोजन सबसे पहले कौए को ही दिखाया जाता है। इसके अलावा श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को बाहरी और आंतरिक, दोनों तरह की शुद्धता बनाए रखने की सलाह दी जाती है। इस दौरान क्रोध से बचना चाहिए और घर में शांति व संयम बनाए रखना चाहिए, ताकि पितरों को किसी तरह का कष्ट न हो।
ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक पितृ पक्ष के दौरान नए वस्त्र, वाहन या गहनों की खरीदारी, गृह प्रवेश और विवाह जैसे मांगलिक कार्य टालने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह पूरा पखवाड़ा पितरों के स्मरण और शोक का समय माना जाता है, उत्सव का नहीं। मांस-मदिरा के सेवन से भी इस दौरान परहेज करने को कहा जाता है, और सर्व पितृ अमावस्या के दिन तो इन सभी नियमों का पालन और भी सख्ती से करने की सलाह दी जाती है।
शनि की अनुकूलता के लिए कलश स्थापना और पीपल पूजन का महत्व
शनिश्चरी अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद एक कलश में काला तिल, जौ, कच्चा दूध और जल भरकर घर के मंदिर में स्थापित करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद दीपक जलाकर कम से कम 108 बार ‘ॐ शं शनैश्चराय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए।
मंत्र जाप के बाद इस जल को किसी पीपल के वृक्ष में अर्पित किया जाता है, और इसी तिथि की शाम को पीपल के पास घी का दीपक जलाने की भी परंपरा है।
शनिवार को पीपल के वृक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दिन पीपल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों का वास रहता है, और उनकी कृपा से पितरों को बैकुंठ की प्राप्ति हो सकती है।
इसी मान्यता के चलते कई लोग इस दिन पीपल के पेड़ की परिक्रमा भी करते हैं और वहां जल व दूध अर्पित करने के साथ-साथ कच्चा सूत भी बांधते हैं, ताकि घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहे।
यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान किए जाने वाले सात जरूरी कामों के साथ इस साल पीपल पूजन को भी खास तरजीह दी जा रही है, क्योंकि पितृ मोक्ष अमावस्या और शनिवार दोनों एक साथ पड़ रहे हैं।
शनि मंदिर में अभिषेक और हनुमान पूजा से मिलेगी राहत
शनिवार के दिन किसी शनि मंदिर जाकर शनि देव का सरसों के तेल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही शनि देव को काले तिल, काली उड़द और काला वस्त्र अर्पित करने की भी परंपरा है। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इन उपायों से शनि से जुड़ी बाधाएं कम होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है।
मान्यता है कि शनिवार को हनुमान जी की पूजा करने से कुंडली में शनि से जुड़े दोषों का असर भी कम होता है। इसलिए इस दिन हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने की सलाह दी जाती है। पहले भी शनिश्चरी अमावस्या के ऐसे ही उपायों के बारे में बताया जा चुका है, जो आज भी कई घरों में परंपरा के तौर पर अपनाए जाते हैं।
ज्योतिषाचार्यों का यह भी कहना है कि शनि देव से जुड़े उपाय करते समय मन में किसी तरह का भय रखने की जरूरत नहीं है, बल्कि श्रद्धा और नियमित आचरण पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। शनि देव को न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है, इसलिए ईमानदारी और सही आचरण बनाए रखना ही सबसे बड़ा उपाय माना गया है, पूजा-पाठ तो सिर्फ इसमें सहायक भूमिका निभाते हैं।
पितृ पक्ष का आखिरी दिन, जानें श्राद्ध की सामग्री और सही विधि
Sarv Pitru Amavasya 2026 के साथ ही इस साल का पितृ पक्ष पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इस तिथि पर ज्ञात और अज्ञात, यानी जिन पितरों की मृत्यु-तिथि याद नहीं है उनके लिए भी श्राद्ध करने की परंपरा है।
इसके अलावा जिन लोगों का इस साल किसी वजह से श्राद्ध करना छूट गया हो, वे भी इसी तिथि पर उसकी भरपाई कर सकते हैं। दोपहर करीब 12 बजे का समय पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है, क्योंकि शास्त्रों में इसी समय यानी कुतुप काल को पितृ कर्मों के लिए सबसे शुभ बताया गया है।
श्राद्ध के लिए गाय के गोबर से बने कंडे, धूप देने के लिए हवन कुंड या कोई बर्तन, घी, काले तिल, चावल, गुड़, कर्पूर, जल से भरा तांबे का लोटा, फूल और बैठने के लिए आसन जैसी चीजें जरूरी होती हैं। अगर ये सभी चीजें जुटाना संभव न हो, तो सिर्फ जल, तिल, कंडे के अंगारे और गुड़-घी से भी श्रद्धापूर्वक पितरों का
स्मरण करके धूप-ध्यान किया जा सकता है। चाहें तो खीर-पूड़ी बनाकर भी पितरों को धूप दी जा सकती है, क्योंकि इसे भी पितरों का प्रिय भोजन माना जाता है।
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Sarv Pitru Amavasya 2026 के अगले दिन से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाएगी, इसलिए इस तिथि को शोक और स्मरण के पखवाड़े से उत्सव के मौसम की ओर बदलाव का भी प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि कई परिवार इस दिन श्राद्ध और तर्पण पूरा करने के साथ-साथ घर की साफ-सफाई और नवरात्रि की तैयारियां भी शुरू कर देते हैं, ताकि पितरों को विदा करने के बाद मां दुर्गा के स्वागत की तैयारी पूरी हो सके।
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