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डूबते सूरज की किरणें जब छूती हैं मां के चरण, कोल्हापुर के इस मंदिर का रहस्य जानें

महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित Kolhapur Mahalakshmi Mandir में देवी की प्रतिमा पश्चिममुखी है, और साल में दो बार डूबते सूरज की किरणें सीधे गर्भगृह में प्रवेश कर देवी के चरणों से लेकर पूरी प्रतिमा तक को रोशन करती हैं। इसी अद्भुत नजारे को किरणोत्सव कहा जाता है।

देशभर के शक्तिपीठों में शुमार Kolhapur Mahalakshmi Mandir अपनी इस अनोखी वास्तुकला के साथ-साथ नवरात्रि की अनूठी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। मंदिर की बनावट इस तरह की गई है कि साल में दो बार सूर्यास्त के समय सूरज की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुंचती हैं, और यह प्रकाश पहले देवी के पैरों पर, फिर कमर पर और अंत में पूरी प्रतिमा पर पड़ता है। हजारों श्रद्धालु हर साल इस किरणोत्सव को देखने के लिए मंदिर पहुंचते हैं।

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इस साल भी नवरात्रि में निभाई जा रही हैं मंदिर की सदियों पुरानी परंपराएं

शारदीय नवरात्रि 2026 के घटस्थापना से दशहरे तक चलने वाले इस पर्व के दौरान कोल्हापुर के इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ में भी रोज अलग-अलग अनुष्ठान और परंपराएं निभाई जा रही हैं, जो सदियों से बिना किसी बदलाव के चली आ रही हैं। यही वजह है कि देशभर से श्रद्धालु और शोधकर्ता दोनों इस मंदिर की वास्तुकला, मूर्तियों और परंपराओं को समझने के लिए यहां पहुंचते हैं।

काले पत्थर की मूल प्रतिमा के चार हाथों में हैं खास प्रतीक

मंदिर के गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की करीब तीन फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। देवी के चार हाथों में म्हालुंग नाम का बड़ा नींबू जैसा फल, गदा, ढाल और पानपात्र है। मूर्ति के पीछे पत्थर का शेर बना हुआ है, जो देवी का वाहन माना जाता है। देवी के मुकुट पर शिवलिंग विराजमान है, जिसके चारों ओर योनि का चिह्न और ऊपर की तरफ नाग का फन बना है। देवी के इस स्वरूप का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है। गर्भगृह के दोनों ओर महाकाली और महासरस्वती के अलग-अलग मंदिर हैं, जबकि परिसर में मातुलिंग महादेव का भी एक पूजा स्थान मौजूद है।

Kolhapur Mahalakshmi Mandir

पालकी में निकलने वाली उत्सव प्रतिमा तीन धातुओं से बनी है

 

मंदिर से बाहर पालकी यात्रा के लिए मूल प्रतिमा की जगह एक अलग उत्सव प्रतिमा का इस्तेमाल होता है, जो 12 इंच ऊंची और 4 इंच चौड़ी है। इसमें देवी सिंह पर सवार दिखाई गई हैं। इस प्रतिमा का मुख्य हिस्सा तांबे का, चेहरा चांदी का और हथियार पीतल के बने हैं, और इसकी पीछे की चौकी भी पीतल की है। खास बात यह है कि इन सभी हिस्सों को बिना किसी वेल्डिंग के आपस में जोड़ा गया है। देवी के पीछे नाग की आकृति बनी है, और यह परंपरा छत्रपति संभाजी द्वितीय के समय से चली आ रही है, जो करीब 250 साल पुरानी मानी जाती है। इस उत्सव प्रतिमा का अपना अलग सिंहासन है और इसकी पूजा में स्नान व कुमकुम अर्चन होता है, जिसे सिर्फ मंदिर के पुजारी ही संभालते हैं।

हर रात पालकी यात्रा निकलती है, पंचमी पर सखी से मिलने जाती हैं देवी

नवरात्रि के दौरान मंदिर में हर रात देवी की पालकी यात्रा निकाली जाती है, जिसमें श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। मंदिर में सुबह देवी का मुखमार्जन होता है, जबकि रात को दूध और शक्कर का भोग लगाकर शयन सेवा दी जाती है। लेकिन नवरात्रि की पंचमी तिथि पर यह नियमित क्रम थोड़ा बदल जाता है, जब देवी की पालकी टेंबलाई पहाड़ी पर स्थित त्र्यंबोली देवी मंदिर की तरफ रुख करती है, क्योंकि परंपरा में त्र्यंबोली को महालक्ष्मी की सखी माना जाता है।

Kolhapur Mahalakshmi Mandir

कोल्हासुर वध की कथा से जुड़ी है त्र्यंबोली यात्रा की परंपरा

कथा के अनुसार, कोल्हासुर के वध के बाद उसके वंशज कामाक्ष ने देवताओं को संकट में डाल दिया था। तब त्र्यंबोली ने कामाक्ष का अंत कर देवताओं को इस संकट से मुक्ति दिलाई। लेकिन विजय के उत्सव में देवता त्र्यंबोली का सम्मान करना भूल गए, जिससे नाराज होकर वे पहाड़ी पर चली गईं। उन्हें मनाने के लिए महालक्ष्मी स्वयं हर साल नवरात्रि की पंचमी पर वहां जाती हैं, और इसी परंपरा के तहत आज भी हर साल महालक्ष्मी की पालकी त्र्यंबोली मंदिर पहुंचती है, जहां दोनों देवियों के मिलन की विशेष पूजा होती है।

कद्दू फोड़ने की रस्म एक छोटी कन्या से कराई जाती है

त्र्यंबोली मंदिर में दोनों देवियों के मिलन की पूजा के बाद कुष्मांड भेदन की रस्म निभाई जाती है। कुष्मांड यानी कद्दू को राक्षस का प्रतीक मानकर फोड़ा जाता है, और यह रस्म खासतौर पर किसी छोटी कन्या से ही कराई जाती है। यह परंपरा राक्षस वध की प्रतीकात्मक पुनरावृत्ति मानी जाती है, जो देवी की विजय का स्मरण कराती है और नवरात्रि की धार्मिक मान्यताओं में इस दिन को खास बना देती है।

अष्टमी की रात देवी शयन नहीं करतीं, आधी रात को होता है हवन

महाअष्टमी के दिन देवी को महिषासुर का वध करने वाले रूप में सजाया जाता है। रात करीब 9 बजे देवी नगर-भ्रमण पर निकलती हैं, ताकि लोगों को दर्शन दे सकें। मान्यता है कि कोल्हासुर के वध के बाद देवी ने नगरवासियों को निर्भय रहने का भरोसा दिया था, और इसी की याद में हर साल अष्टमी पर देवी शहरवासियों को दर्शन देने निकलती हैं। इस यात्रा के दौरान भवानी मंडप के मंदिर में तुलजा भवानी और महालक्ष्मी के मिलन की रस्म भी होती है। यात्रा से लौटने के बाद देवी की विशेष पूजा की जाती है, लेकिन इस रात रोज होने वाली शेजारती यानी शयन आरती नहीं होती, क्योंकि इस तिथि पर देवी शयन नहीं करती हैं। इसके बाद आधी रात से हवन शुरू हो जाता है, और अगले दिन सुबह की नियमित काकड़ आरती भी नहीं होती।

Kolhapur Mahalakshmi Mandir

महानवमी पर सुबह 3 बजे शुरू होता है सप्तशती पाठ और आहुतियां

महानवमी के दिन सुबह करीब 3 बजे सप्तशती पाठ के साथ तिल, चावल और घी की आहुतियां शुरू की जाती हैं, जिनमें कद्दू की प्रतीकात्मक बलि भी दी जाती है। इसके बाद अंतिम पूर्णाहुति और तोप की सलामी के साथ नवरात्रि के इस विशेष अनुष्ठान का समापन होता है। इस दिन मंदिर में पारंपरिक शस्त्रों की पूजा भी की जाती है, जो नवरात्रि की शक्ति-आराधना परंपरा का एक अहम हिस्सा मानी जाती है।

14वीं-15वीं सदी में हमलों के डर से हटाई गई थी मूल प्रतिमा

इतिहास के मुताबिक, 14वीं-15वीं शताब्दी में मंदिर पर हुए हमलों के दौरान पुजारियों ने महालक्ष्मी की मूल प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए मंदिर से हटा दिया था और इसे कपिलतीर्थ इलाके में एक पुजारी के घर छिपा दिया गया था। कई पीढ़ियों तक यह प्रतिमा वहीं सुरक्षित रही, जब तक नरहर भट सावगांवकर ने छत्रपति संभाजी द्वितीय को इसके बारे में जानकारी नहीं दी। स्थानीय मान्यता है कि सावगांवकर को सपने में स्वयं देवी ने अपनी मूर्ति के बारे में बताया था।

भारत में सूर्य और प्रतिमा के मेल से जुड़े और भी अद्भुत मंदिर हैं

किरणोत्सव जैसी खगोलीय घटना अकेले कोल्हापुर के इस मंदिर तक सीमित नहीं है। अयोध्या के राम मंदिर में भी हर साल रामनवमी पर सूर्य तिलक की परंपरा देखने को मिलती है, जिसमें ठीक दोपहर के समय सूर्य की किरणें वास्तुकला के जरिए सीधे रामलला के मस्तक पर पड़ती हैं। इसी तरह उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी साल में सिर्फ एक बार, नाग पंचमी के दिन ही 11वीं सदी की नाग प्रतिमा के दर्शन खुलते हैं। ऐसे मंदिर दिखाते हैं कि भारत में प्राचीन वास्तुकला और खगोलीय गणना को किस बारीकी से धार्मिक परंपराओं में पिरोया गया था।

1715 के दशहरे पर हुई थी प्रतिमा की दोबारा स्थापना

जानकारी मिलने के बाद छत्रपति संभाजी द्वितीय ने सरदार सिदोजी हिंदुराव घोरपड़े को आदेश दिया कि प्रतिमा को वापस मंदिर में स्थापित कराया जाए। इसके बाद 26 सितंबर 1715 को दशहरे के शुभ दिन प्रतिमा की दोबारा स्थापना की गई। इस ऐतिहासिक पुनर्स्थापना के बाद छत्रपति ने मंदिर की नियमित पूजा और विभिन्न उत्सवों के आयोजन के लिए जमीन भी दान में दी, जिससे मंदिर की परंपराएं निर्बाध रूप से आज तक चली आ रही हैं।

कुल मिलाकर, कोल्हापुर का यह महालक्ष्मी मंदिर सिर्फ अपनी अद्भुत किरणोत्सव परंपरा के लिए ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं के अनूठे संगम के लिए भी देशभर में विशेष स्थान रखता है। नवरात्रि के दौरान यहां निभाई जाने वाली हर रस्म, चाहे वह पालकी यात्रा हो, त्र्यंबोली मिलन हो या अष्टमी-नवमी के विशेष अनुष्ठान, श्रद्धालुओं की आस्था को एक अलग ही गहराई से जोड़ती है।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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