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Vijayadashami 2026: रावण दहन के साथ क्यों होती है शमी वृक्ष की पूजा, जानें पौराणिक महत्‍व

Vijayadashami इस बार 20 अक्टूबर को मनाई जा रही है। शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन विजयादशमी यानी दशहरा पर्व मनाया जाता है, और रावण दहन के साथ ही इस दिन शमी के पेड़ और उसके पत्तों के पूजन व वितरण का भी खास धार्मिक महत्व माना जाता है।

Vijayadashami पर रावण दहन के अलावा शमी वृक्ष की पूजा और उसके पत्तों को बांटने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। पंडित जगदीश शर्मा के मुताबिक, शमी वृक्ष का पूजन सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि इसके पीछे पौराणिक मान्यता और प्राकृतिक संकेतों से जुड़ी गहरी आस्था है। आखिर विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष के पूजन और पत्तों को बांटने का प्रचलन क्यों है, इसे विस्तार से समझते हैं।

शमी वृक्ष आने वाले संकट का पहले से दे देता है संकेत

विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा करने के पीछे एक तात्पर्य यह भी माना जाता है कि यह वृक्ष आने वाले संकट का पहले से संकेत दे देता है। शमी वृक्ष की पूजा से जुड़ी एक और मान्यता प्रचलित है, जिसके अनुसार जिस साल शमी वृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है, उस साल सूखे की स्थिति बनने की आशंका रहती है।

महाभारत युद्ध में पांडवों ने शमी वृक्ष पर छुपाए थे अपने हथियार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियार शमी के वृक्ष पर ही छुपाए थे। बाद में उन्हीं हथियारों की मदद से पांडवों ने कौरवों को हराकर विजय हासिल की थी। एक मान्यता यह भी है कि कवि कालिदास को शमी के वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। शारदीय नवरात्रि की यह अवधि दुर्गा मां के अलग-अलग रूपों की आराधना से जुड़ी है, और इसी दौरान आने वाली संधि पूजा में चंड-मुंड वध की कथा भी बुराई पर अच्छाई की इसी जीत का प्रतीक मानी जाती है।

कौत्स की गुरु दक्षिणा के लिए राजा रघु ने स्वर्गलोक पर हमले का किया था विचार

विजयादशमी से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि वरतंतु के शिष्य कौत्स ने शिक्षा पूरी होने पर गुरु दक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की मांग रखी थी। गुरु दक्षिणा देने के लिए कौत्स महाराज रघु के पास पहुंचे, लेकिन कुछ दिन पहले ही महायज्ञ करवाने की वजह से राजा का खजाना खाली हो चुका था। कौत्स को तीन दिन का समय देकर राजा रघु धन जुटाने के उपाय खोजने लगे, और स्वर्गलोक पर आक्रमण करने तक का विचार कर लिया।

कुबेर ने शमी वृक्ष के जरिए रघु के राज्य में कराई थी स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा

राजा रघु के स्वर्गलोक पर आक्रमण के विचार से देवराज इंद्र घबरा गए, और उन्होंने कोषाध्यक्ष कुबेर को रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश दिया। इंद्र के आदेश पर कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा दी। मान्यता है कि जिस तिथि को यह स्वर्ण वर्षा हुई थी, वह तिथि विजयादशमी ही थी, और राजा रघु ने शमी वृक्ष से प्राप्त यही स्वर्ण मुद्राएं कौत्स को गुरु दक्षिणा के रूप में सौंप दीं। इसी घटना के बाद से विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा की परंपरा शुरू हुई मानी जाती है।

शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन मनाई जाती है विजयादशमी

शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन विजयादशमी यानी दशहरा पर्व मनाया जाता है, और इसी दिन रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। घटस्थापना से दशहरे तक की शारदीय नवरात्रि 2026 की पूरी तारीखों में भी विजयादशमी का यह दिन सबसे अहम माना जाता है। रावण दहन के बाद देशभर के अलग-अलग राज्यों और इलाकों में शमी वृक्ष पूजन से जुड़ी मान्यताओं को भी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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