कल से गांवों में लगेगी आचार संहिता, तबादलों पर रोक; पंचायत चुनाव की तारीख का इंतजार खत्म
राजस्थान में पंचायतीराज चुनावों के कार्यक्रम का ऐलान शनिवार को होने जा रहा है। चार चरणों में वोटिंग हो सकती है, 1.69 लाख जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे और घोषणा के साथ ही गांवों में आचार संहिता लागू होकर तबादलों पर रोक लग जाएगी।

Rajasthan Panchayat Election 2026 के कार्यक्रम का ऐलान 3 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे होने जा रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग ने जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है, जिसमें सरपंच, वार्ड पंच, पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के चुनाव की तारीखें बताई जाएंगी। घोषणा होते ही ग्रामीण इलाकों में आचार संहिता लागू हो जाएगी, जिससे नई योजनाओं के ऐलान और सरकारी तबादलों पर तुरंत रोक लग जाएगी।
राज्य निर्वाचन आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस कल दोपहर 3 बजे
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायतीराज चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा के लिए 3 अक्टूबर दोपहर 3 बजे की प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है। आयोग अधिकारियों के मुताबिक यह प्रेसवार्ता जयपुर स्थित पंचायतीराज सभागार में होगी, जहां नामांकन से मतगणना तक की पूरी समयसीमा सामने आएगी।
शहरी निकाय चुनाव सितंबर में पूरे होने के बाद यह राजस्थान का अगला बड़ा चुनावी कार्यक्रम है। ग्रामीण इलाकों की राजनीति में पंचायतीराज चुनावों को लेकर कई दिनों से इंतजार बना हुआ था, जो अब शनिवार को खत्म होने जा रहा है।
राज्य निर्वाचन आयोग ही प्रदेश में नगर निकाय और पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संवैधानिक संस्था है। निकाय चुनावों में आयोग पहले ही ईवीएम और बैलेट पेपर, दोनों तरह की व्यवस्था संभाल चुका है, इसलिए पंचायत चुनावों के लिए भी ज्यादातर इंतजाम पहले से तैयार माने जा रहे हैं।
चार चरणों में हो सकता है मतदान, सरपंच बैलेट से तो बाकी ईवीएम से
अनुमान है कि पूरे प्रदेश में चुनाव चार फेज में कराए जा सकते हैं। सरपंच और वार्ड पंचों का चुनाव बैलेट पेपर से होगा, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों का चुनाव ईवीएम से कराया जाएगा। यानी एक ही पंचायत में दो अलग-अलग तरीकों से वोटिंग होगी, जो मतदाताओं के लिए थोड़ा अलग अनुभव होगा।
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प्रदेश इतना बड़ा होने और गांवों की संख्या ज्यादा होने की वजह से एक ही दिन में सभी जगह मतदान कराना मुश्किल होता है। इसलिए हर बार की तरह इस बार भी चरणबद्ध तरीके से वोटिंग कराई जाएगी, ताकि प्रशासन और सुरक्षा बलों को हर फेज के बीच पुलिस व्यवस्था दोबारा तैयार करने का समय मिल सके।
1.69 लाख नए पंचायतीराज जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे
इन चुनावों में कुल 1.69 लाख नए पंचायतीराज जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे। इसमें 1403 जिला परिषद सदस्य और 8245 पंचायत समिति सदस्य शामिल हैं। ये सदस्य मिलकर प्रदेश के 41 जिला प्रमुख और 457 पंचायत समितियों में प्रधान चुनेंगे।
इसके अलावा 14,403 ग्राम पंचायतों में सरपंच और उपसरपंच का चुनाव होगा, साथ ही 1.30 लाख वार्ड पंचों के पदों पर भी वोटिंग कराई जाएगी। इतनी बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव होने की वजह से यह प्रदेश के सबसे बड़े स्थानीय चुनावों में शामिल है।
महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण, जिला प्रमुख से वार्ड पंच तक हिस्सेदारी
पंचायतीराज चुनावों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है। इसके तहत प्रदेश के 41 जिला प्रमुखों में से 20 जिलों में महिला जिला प्रमुख चुनी जाएंगी। बीकानेर संभाग के सभी जिलों में जिला प्रमुख की कुर्सी महिलाओं के पास ही रहेगी।
457 पंचायत समितियों में से 221 में महिलाएं प्रधान बनेंगी, जिनमें जयपुर और जोधपुर में 11-11 महिला प्रधान शामिल हैं। वहीं 14,403 ग्राम पंचायतों में से 7200 में महिला सरपंच चुनी जाएंगी और 1.30 लाख वार्ड पंच पदों में से करीब 65 हजार सीटें महिलाओं के खाते में जाएंगी।
पंचायतीराज संस्थाओं में सीटों का आरक्षण हर चुनाव में तय फॉर्मूले के आधार पर घूमता रहता है, यानी जो सीट पिछली बार महिला या किसी खास वर्ग के लिए आरक्षित थी, वह अगली बार सामान्य वर्ग में भी जा सकती है। इसी वजह से हर पंचायत चुनाव से पहले आरक्षण की नई सूची का इंतजार प्रत्याशियों को खासतौर पर रहता है, क्योंकि इसी पर उनकी दावेदारी टिकी होती है।
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चार जिलों में सरपंच के सभी पद सिर्फ एसटी वर्ग के लिए आरक्षित
सरपंच पद के लिए एसटी वर्ग को 3058, एससी वर्ग को 2493 और ओबीसी वर्ग को 1961 सीटें आरक्षित की गई हैं। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सलूंबर और प्रतापगढ़ ऐसे चार जिले हैं, जहां सरपंच के सभी 1253 पद सिर्फ एसटी वर्ग के लिए आरक्षित रहेंगे। इन्हीं चार जिलों में पंचायत समिति प्रधान का पद भी केवल एसटी वर्ग से ही भरा जाएगा।
वार्ड पंचों के 1.30 लाख पदों में से 21,962 सीटें एससी वर्ग, 19,117 सीटें एसटी वर्ग और करीब 15 हजार सीटें ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित रखी गई हैं।
घोषणा के साथ ही लागू होगी आचार संहिता, तबादलों पर लगेगी रोक
आयोग के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही ग्रामीण इलाकों में आचार संहिता लागू हो जाएगी, जो करीब दो महीने तक लागू रह सकती है। इस दौरान सरकारी तबादलों पर पाबंदी रहेगी और नई योजनाओं के ऐलान, शिलान्यास व लोकार्पण जैसे कार्यक्रमों पर भी रोक लग जाएगी।
हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों के दौरान भी इसी तरह की आचार संहिता लागू रही थी, जिसका असर प्रशासनिक कामकाज पर कई हफ्तों तक दिखा था।
आचार संहिता का सीधा असर उन सरकारी कर्मचारियों पर भी पड़ेगा, जिनके तबादलों की फाइलें अभी विभागों में पेंडिंग हैं, क्योंकि चुनाव खत्म होने तक नए सिरे से तबादला आदेश जारी नहीं हो सकेंगे। इसी तरह ग्राम पंचायत स्तर पर जिन निर्माण कार्यों या योजनाओं का शिलान्यास-लोकार्पण होना बाकी था, वे भी आचार संहिता हटने तक टल जाएंगे।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए पंचायत चुनाव बड़ी सियासी चुनौती
पंचायतीराज चुनाव सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए गांवों में सियासी परसेप्शन बनाने और बिगाड़ने वाले साबित होंगे। सत्ताधारी बीजेपी के सामने कांग्रेस से ज्यादा वार्ड जीतने की चुनौती रहेगी, क्योंकि गांवों में परंपरागत रूप से कांग्रेस को बढ़त मिलती रही है।
हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों में बीजेपी ने कई शहरों में बोर्ड बनाया था, जैसे जयपुर नगर निगम में पार्टी ने 78 और कांग्रेस ने 50 सीटें जीती थीं। शहरी इलाकों में मिली इस बढ़त को बीजेपी अब गांवों में भी दोहराने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस के लिए पंचायत चुनाव अपनी परंपरागत पकड़ बचाने का मौका होंगे।
नगर निकाय चुनावों की तरह ही बीजेपी ने इस बार भी माइक्रो मैनेजमेंट की रणनीति पर भरोसा जताया है। विधानसभा चुनावों जैसी इस रणनीति की असली परीक्षा अब पंचायतीराज चुनावों में होगी।
प्रधान-जिला प्रमुख चुनने में जोड़तोड़ की गुंजाइश, दलबदल कानून लागू नहीं
जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में असली परसेप्शन इस बात से बनेगा कि कौन सी पार्टी ज्यादा वार्ड जीतती है, क्योंकि जिला परिषद सदस्य मिलकर जिला प्रमुख और पंचायत समिति सदस्य मिलकर प्रधान का चुनाव करते हैं।
निकाय चुनावों की तरह पंचायतीराज चुनावों में भी दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता। इसी वजह से प्रधान और जिला प्रमुख की कुर्सी तय करने में सियासी जोड़-तोड़ की पूरी गुंजाइश रहती है, और जिस पार्टी के ज्यादा सदस्य जीतते हैं, जनमत का रुझान भी उसी तरफ माना जाता है।
मतदाताओं और प्रत्याशियों को इन बातों का रखना होगा ध्यान
आचार संहिता लागू होते ही प्रत्याशियों के लिए सरकारी वाहन, सरकारी बंगले और सरकारी विज्ञापनों के इस्तेमाल पर रोक लग जाती है। नए वोटर कार्ड बनवाने या नाम जोड़ने-हटवाने का काम भी इस दौरान तय प्रक्रिया के तहत ही हो पाएगा, इसलिए जिन ग्रामीणों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं, उन्हें नामांकन से पहले अपनी पंचायत में इसकी जांच करा लेनी चाहिए।
सरपंच और वार्ड पंच पद के प्रत्याशियों को बैलेट पेपर पर अपने नाम के आगे चुनाव चिन्ह याद रखना होगा, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के लिए ईवीएम पर बटन दबाने से पहले उम्मीदवार और चुनाव चिन्ह दोनों मिलाकर देखने की सलाह दी जाती है, ताकि किसी तरह की गलती न हो।
नवंबर के पहले हफ्ते तक पूरी हो सकती है चुनाव प्रक्रिया
शनिवार की घोषणा के बाद नामांकन, प्रचार और मतदान का पूरा कार्यक्रम सामने आएगा। अनुमान है कि पूरी चुनाव प्रक्रिया नवंबर के पहले हफ्ते तक पूरी हो सकती है, हालांकि अंतिम तारीखें राज्य निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।
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