Religious

नवरात्रि के बीच राख हुआ ‘वधकोट’ का शक्तिपीठ, मां भगवती मंदिर में लगी भीषण आग

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में नवरात्रि के छठे दिन शक्तिपीठ मानी जाने वाली मां भगवती का ऐतिहासिक मंदिर आग में जलकर खाक हो गया। मंदिर के अंदर रखी मां की प्रतिमा और पूरा पूजा पंडाल पूरी तरह जल गया, जिससे पूरे क्षेत्र में शोक और मायूसी का माहौल है।

बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील से करीब 50 किलोमीटर दूर उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित बदियाकोट गांव में हुए इस Badiyakot Temple Fire हादसे ने नवरात्रि के पावन पर्व के बीच पूरे क्षेत्र को गमगीन कर दिया है। सीमांत बदियाकोट गांव के प्रसिद्ध मां भगवती मंदिर में शुक्रवार सुबह अचानक भीषण आग लग गई, जिसने चंद मिनटों में मंदिर के पूरे परिसर को अपनी चपेट में ले लिया।

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लकड़ी के ढांचे ने आग को भड़काने में अहम भूमिका निभाई

मंदिर का मुख्य ढांचा और परिसर पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला के तहत मुख्य रूप से लकड़ी और पत्थरों से बना था। लकड़ी की संरचना होने के कारण आग ने तेजी से विकराल रूप ले लिया और पूरे परिसर को अपनी चपेट में ले लिया। मंदिर अपनी बेहद सुंदर, बारीक और मनमोहक काष्ठ नक्काशी के लिए जाना जाता था, जो कत्यूर-कुमाऊं घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अनमोल प्रतीक मानी जाती थी। इस अग्निकांड से क्षेत्र की स्थापत्य और सांस्कृतिक धरोहर को भारी नुकसान पहुंचा है।

मां की प्रतिमा और पूरा पंडाल आग की भेंट चढ़ गया

इस भयावह घटना में मंदिर के अंदर रखी मां भगवती की प्रतिमा, मुख्य भवन और पूरा पूजा पंडाल जलकर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। नवरात्रि के छठे दिन हुए इस हादसे की खबर मिलते ही क्षेत्र के श्रद्धालु मंदिर परिसर की तरफ दौड़ पड़े, लेकिन आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ खास बचाया नहीं जा सका। स्थानीय लोगों का रो-रोकर बुरा हाल है, क्योंकि यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पूरे दानपुर घाटी की आस्था का केंद्र रहा है।

आग लगने की वजह अभी आधिकारिक तौर पर साफ नहीं हुई है

स्थानीय स्तर पर कयास लगाए जा रहे हैं कि पूजा-अर्चना के दौरान दीये में लंबी बाती लगाकर उसे गलत स्थान पर रख देने से लकड़ी ने आग पकड़ ली होगी। स्थानीय निवासी आन सिंह के अनुसार, मंदिर में बिजली की व्यवस्था भी थी, इसलिए दीपक से आग फैलने या फिर बिजली के शॉर्ट सर्किट होने, दोनों ही आशंकाएं जताई जा रही हैं। हालांकि प्रशासन और स्थानीय लोगों के मुताबिक अभी आग लगने के सटीक और वास्तविक कारणों का आधिकारिक तौर पर पता नहीं चल पाया है, और इन दोनों वजहों को महज आशंका के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

SDM ने कहा जांच जारी है, फायर और पुलिस टीम मौके पर मौजूद

SDM अनिल चन्याल ने बताया कि आग के कारणों की जांच की जा रही है और फायर व पुलिस टीम मौके पर मौजूद है। दूरस्थ और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला यह क्षेत्र होने के कारण यहां फायर ब्रिगेड की स्थायी सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिस वजह से आग पर समय रहते काबू पाना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की टीम मौके पर पहुंचकर नुकसान का आकलन कर रही है।

पूर्व ब्लॉक प्रमुख ने उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई

कपकोट के पूर्व ब्लॉक प्रमुख गोविंद सिंह दानू और ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से इस अग्निकांड के कारणों की उच्चस्तरीय जांच कराने और नुकसान का सटीक आकलन कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि सदियों पुरानी इस धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को हुए नुकसान की भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन कम से कम यह जरूर पता चलना चाहिए कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही या तकनीकी खराबी कैसे हुई।

निशुम्भ दैत्य के वध की कथा से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, निशुम्भ एक शक्तिशाली दैत्य था, जो अपने भाई शुम्भ के साथ मिलकर देवताओं पर अत्याचार करता था। दोनों भाइयों ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था, जिसके बाद देवताओं को स्वर्ग से वंचित होना पड़ा और वे अपनी रक्षा के लिए मां आदिशक्ति की शरण में पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना पर मां भगवती ने दैत्यों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने और धर्म की स्थापना के लिए युद्ध किया, और देवी महात्म्य की कथा के अनुसार मां दुर्गा ने इस युद्ध में निशुम्भ और उसके भाई शुम्भ का वध किया था।

निशुम्भ वध की मान्यता से ही पड़ा वधकोट से बदियाकोट नाम

मान्यता है कि मां भगवती ने इसी स्थान पर दैत्य निशुम्भ का वध किया था, जिस वजह से इस क्षेत्र को पहले ‘वधकोट’ कहा जाता था, जो कालांतर में बदलकर बदियाकोट नाम से प्रचलित हो गया। यही वजह है कि यह मंदिर सिर्फ स्थापत्य कला के लिए नहीं, बल्कि अपने पौराणिक महत्व के लिए भी कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

हर कुछ साल में यहां लगते हैं बड़े धार्मिक मेले और यात्राएं

दानपुर घाटी के इस मंदिर में हर 8 साल में ‘घर आंठियों’, हर 12 साल में ‘नंदकुंड उपजात यात्रा’ और पारंपरिक ‘सल्पाती मेले’ का आयोजन होता है, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसी वजह से यह मंदिर सिर्फ 134 परिवारों वाले बदियाकोट गांव (जनसंख्या- 322 पुरुष, 315 महिलाएं) के लिए नहीं, बल्कि आसपास के पूरे इलाके के लिए भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से बेहद अहम स्थल रहा है। नवरात्रि के दौरान हुए इस हादसे ने इसलिए इतनी बड़ी तादाद में लोगों को भावनात्मक रूप से झकझोर दिया है।

दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में आग से निपटना बड़ी चुनौती बना हुआ है

बदियाकोट जैसे ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में, जहां पक्की सड़क और फायर ब्रिगेड जैसी बुनियादी सुविधाएं अब भी नहीं पहुंची हैं, किसी भी तरह की आग या आपदा पर काबू पाना बेहद मुश्किल होता है। इससे पहले भी उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में माता यात्रा के दौरान दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं ने दिखाया है कि ऐसे क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्य में कितना वक्त और मुश्किलें आती हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के कई ऐतिहासिक प्रसिद्ध मंदिरों से जुड़े मामलों में भी प्रशासनिक सतर्कता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, जो इस घटना के बाद एक बार फिर चर्चा में आ सकते हैं।

पहाड़ी इलाकों में लकड़ी के पुराने मंदिरों में आग लगने की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं

यह पहली बार नहीं है जब हिमालयी इलाके का कोई प्राचीन लकड़ी का मंदिर आग की भेंट चढ़ा हो। इससे पहले उत्तराखंड के रामनगर स्थित प्रसिद्ध गर्जिया देवी मंदिर परिसर में भी आग लगने से वहां की दुकानें जलकर खाक हो गई थीं, जबकि हिमाचल प्रदेश के थियोग में करीब 500 साल पुराना एक ऐतिहासिक मंदिर भी आग की भेंट चढ़ चुका है। ऐसी घटनाएं यह साफ दिखाती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी और पारंपरिक निर्माण शैली से बने प्राचीन मंदिरों के लिए आग का खतरा लगातार बना हुआ है, खासकर तब जब वहां अग्निशमन जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद ही नहीं होतीं।

नवरात्रि के बीच हादसे ने भक्तों की श्रद्धा को गहरी चोट दी

इस साल की शारदीय नवरात्रि के छठे दिन, जब देशभर में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना चल रही है, ठीक उसी दौरान इस ऐतिहासिक शक्तिपीठ में हुए इस हादसे ने भक्तों की श्रद्धा को गहरी चोट पहुंचाई है। कई स्थानीय लोगों ने बताया कि यह मंदिर पीढ़ियों से उनकी आस्था और पहचान का हिस्सा रहा है, और इसकी सदियों पुरानी नक्काशी और प्रतिमा को इस तरह आग में खोना बेहद पीड़ादायक अनुभव है।

प्रशासन ने स्थानीय लोगों को भरोसा दिलाया है कि नुकसान का सही आकलन कर आगे की कार्रवाई की जाएगी, लेकिन गांव वालों की सबसे बड़ी मांग यही है कि आग लगने के असली कारणों का जल्द और पारदर्शी तरीके से पता लगाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी अनमोल सांस्कृतिक और धार्मिक विरासतों को बचाया जा सके। फिलहाल पूरे बदियाकोट गांव और आसपास के इलाके में नवरात्रि के पावन पर्व पर मिले इस सदमे से उबरने में वक्त लगेगा।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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