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जमीन खरीदने से पहले एक बार जरूर जांचें ये नंबर, हर राज्य में इसका नाम और पोर्टल अलग

Land Buying Tips: जमीन खरीदने या बेचने से पहले खसरा, सर्वे या प्लॉट नंबर की जांच करना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि यही नंबर मालिकाना हक, रकबा और सीमा जैसी हर जरूरी जानकारी तय करता है। हर राज्य में इसका नाम अलग है, इसलिए खरीदारी से पहले सही पोर्टल और सही शब्दावली जानना उतना ही जरूरी है जितना दस्तावेज जांचना।

जमीन से जुड़ा हर सौदा आखिर में एक नंबर पर टिका होता है, जिसे ज्यादातर उत्तर भारत में खसरा नंबर और बाकी राज्यों में सर्वे या प्लॉट नंबर कहा जाता है। Land Buying Tips की बात करें तो सबसे पहली और सबसे जरूरी सलाह यही है कि किसी भी जमीन का सौदा फाइनल करने से पहले उसका यह पहचान नंबर जरूर जांच लें, क्योंकि इसी नंबर से जमीन का पूरा रेवेन्यू रिकॉर्ड जुड़ा होता है। यह नंबर न सिर्फ जमीन की पहचान करता है, बल्कि मालिक का नाम, रकबा और सीमा जैसी जानकारी भी सामने लाता है।

हर जमीन के टुकड़े को मिलता है एक अलग पहचान नंबर

राजस्व विभाग गांव या इलाके में मौजूद हर जमीन के टुकड़े को एक यूनीक नंबर देता है, जिससे वह जमीन बाकी सभी प्लॉट से अलग पहचानी जा सके। इसे ही खसरा नंबर, सर्वे नंबर या प्लॉट नंबर कहा जाता है, और यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे किसी इंसान के लिए आधार नंबर या पैन नंबर काम करता है। बिना इस नंबर के किसी भी जमीन का न तो सरकारी रिकॉर्ड में सत्यापन हो सकता है, न ही उसकी खरीद-फरोख्त, रजिस्ट्री या बंटवारे की प्रक्रिया पूरी हो सकती है।

यही वजह है कि चाहे खेती की जमीन हो या शहर का कोई प्लॉट, हर जमीन के दस्तावेज में यह नंबर सबसे पहले दर्ज किया जाता है। जमीन खरीदने वाला कोई भी व्यक्ति अगर इस नंबर के बिना सौदा करता है, तो आगे चलकर मालिकाना हक साबित करना या विवाद की स्थिति में अपना दावा मजबूत करना मुश्किल हो सकता है।

यह नंबर मालिक का नाम, रकबा और सीमा तक की जानकारी देता है

खसरा या सर्वे नंबर डालकर सरकारी पोर्टल पर जमीन के मालिक का नाम, उसका सही रकबा यानी कुल क्षेत्रफल, और जमीन की सीमाएं दिखाने वाला नक्शा देखा जा सकता है। इसके अलावा यह नंबर यह भी बताता है कि जमीन किस श्रेणी में आती है, यानी वह खेती की जमीन है, आवासीय प्लॉट है या सरकारी-सामुदायिक भूमि है, और क्या उसका किसी हिस्से में बंटवारा या उप-विभाजन हुआ है।

इसी नंबर के आधार पर जमाबंदी, यानी रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RoR) की नकल भी निकाली जाती है, जिसमें मालिक, खातेदार और जमीन से जुड़े अधिकारों का पूरा ब्योरा दर्ज होता है। अगर जमीन के मालिकाना हक में कोई बदलाव हुआ है, जैसे बिक्री, विरासत या बंटवारे के बाद नाम बदला है, तो म्यूटेशन यानी नामांतरण की प्रक्रिया भी इसी खसरा या सर्वे नंबर के जरिए रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज की जाती है।

इसलिए किसी भी जमीन की पूरी कुंडली समझने के लिए यह एक नंबर ही काफी होता है, बशर्ते उसे सही पोर्टल पर सही तरीके से जांचा जाए।

हर राज्य में इस नंबर का नाम अलग, जानें पूरी लिस्ट

Land Buying Tips में सबसे ज्यादा उलझन इसी बात से होती है कि एक ही तरह के रेवेन्यू नंबर को देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और गोवा में इसे सर्वे नंबर कहा जाता है, जबकि महाराष्ट्र में इसे सर्वे नंबर या गाट नंबर के नाम से जाना जाता है। गुजरात में इसे सर्वे नंबर या ब्लॉक नंबर कहते हैं।

मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली और उत्तराखंड में इसे खसरा नंबर कहा जाता है, तो उत्तर प्रदेश में इसे गाटा या खसरा नंबर के नाम से जाना जाता है। बिहार और झारखंड में इसे खेसरा या प्लॉट नंबर कहते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल और असम में इसे दाग या प्लॉट नंबर के नाम से जाना जाता है। ओडिशा में इसे सीधे प्लॉट नंबर कहा जाता है, और पंजाब-हरियाणा में इसे खसरा या खेवट नंबर के नाम से जाना जाता है।

इतने नामों के बीच सबसे जरूरी बात यह समझना है कि चाहे नाम कुछ भी हो, काम इन सभी नंबरों का एक ही है, यानी जमीन की यूनीक पहचान और उससे जुड़ा पूरा रेवेन्यू रिकॉर्ड मुहैया कराना।

खरीद-बिक्री से लोन तक, कई जरूरी कामों में आता है यह नंबर

जमीन खरीदने-बेचने के अलावा इस नंबर का इस्तेमाल कई और जरूरी कामों में भी होता है। मालिकाना हक साबित करने या पुराने दस्तावेजों का सत्यापन करने के लिए, सरकारी नक्शे पर जमीन की सही लोकेशन जांचने के लिए, और होम लोन या प्रॉपर्टी लोन के लिए आवेदन करते समय भी बैंक इस नंबर के आधार पर जमीन की प्रामाणिकता जांचते हैं।

रजिस्ट्री के दस्तावेज तैयार करने, म्यूटेशन यानी मालिकाना हक में बदलाव दर्ज कराने, सीमा विवाद सुलझाने और किसी भी नए डेवलपमेंट प्रोजेक्ट या लेआउट का रेवेन्यू रिकॉर्ड में सत्यापन कराने के लिए भी यही नंबर आधार बनता है। यही वजह है कि प्रॉपर्टी एजेंट, बैंक और रजिस्ट्रार दफ्तर तीनों ही किसी भी सौदे से पहले इस नंबर की मांग सबसे पहले करते हैं।

राज्यवार ऑनलाइन पोर्टल पर घर बैठे चेक करें जमीन का रिकॉर्ड

अब ज्यादातर राज्यों में यह रिकॉर्ड ऑनलाइन पोर्टल पर भी उपलब्ध है, जिससे खरीदार घर बैठे ही जमीन का पूरा ब्योरा देख सकते हैं। तेलंगाना में हाल ही में लॉन्च हुए भू भारती पोर्टल पर, आंध्र प्रदेश में मीभूमि पोर्टल पर, और कर्नाटक में भूमि पोर्टल पर यह जानकारी मिलती है। महाराष्ट्र में महाभूलेख पोर्टल, उत्तर प्रदेश में यूपी भूलेख पोर्टल, राजस्थान में अपना खाता पोर्टल, और ओडिशा में भूलेख ओडिशा पोर्टल पर यह सुविधा दी गई है।

इसके अलावा गुजरात में एनीआरओआर (AnyROR) पोर्टल पर और तमिलनाडु में ई-सर्विसेज पोर्टल पर भी जमीन का रेवेन्यू रिकॉर्ड ऑनलाइन देखा जा सकता है। इन सभी पोर्टल पर आम तौर पर जिला, तहसील या मंडल, और गांव चुनकर खसरा या सर्वे नंबर डालने पर जमीन का ब्योरा, मालिक का नाम और नक्शा सामने आ जाता है। हालांकि हर राज्य के पोर्टल की बनावट और भाषा अलग हो सकती है, इसलिए पहली बार इस्तेमाल करते समय संबंधित तहसील कार्यालय से भी एक बार जानकारी जरूर ले लेनी चाहिए।

सिर्फ नंबर जांचना काफी नहीं, ये दस्तावेज भी जरूर देखें

Land Buying Tips में सबसे बड़ी गलती यही होती है कि लोग सिर्फ खसरा या सर्वे नंबर देखकर संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि अकेले इस नंबर की जांच काफी नहीं है। जमाबंदी या रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RoR) की ताजा नकल निकालकर यह देखना जरूरी है कि मौजूदा मालिक का नाम रिकॉर्ड में सही तरीके से दर्ज है या नहीं। इसके साथ ही सरकारी नक्शे पर जमीन की सीमाएं जांचना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि कई बार कागजों पर दर्ज रकबा और जमीन पर मौजूद वास्तविक सीमा में फर्क पाया जाता है।

प्रॉपर्टी से जुड़े कानूनी दस्तावेजों की जांच करते समय बिक्री पत्र (सेल डीड) और उससे पहले के मालिकों के दस्तावेजों की पूरी चेन जरूर देखनी चाहिए, ताकि मालिकाना हक में कोई कानूनी खामी न रह जाए। इसके अलावा रजिस्ट्री दफ्तर के रिकॉर्ड में जमीन पर किसी तरह का बकाया लोन, बंधक या कानूनी दावा तो दर्ज नहीं है, यह जांचना भी बेहद जरूरी है।

जमीन की सरकारी दर और बाजार दर में अंतर समझने के साथ-साथ मौके पर जाकर जमीन का भौतिक सत्यापन करना, यानी नक्शे और जमीन पर मौजूद हकीकत का मिलान करना भी नहीं छोड़ना चाहिए।

इसके अलावा जमीन पर किसी तरह का उप-विभाजन या म्यूटेशन का मामला लंबित तो नहीं है, जमीन के इस्तेमाल पर कोई सरकारी प्रतिबंध तो नहीं है, और कहीं वह जमीन किसी सरकारी अधिग्रहण या विकास योजना के दायरे में तो नहीं आती, यह सब भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।

चूंकि जमीन से जुड़े ज्यादातर दस्तावेज कानूनी भाषा में होते हैं और राज्य के हिसाब से नियम भी बदलते रहते हैं, इसलिए बड़ा सौदा करने से पहले स्थानीय राजस्व अधिकारी या प्रॉपर्टी वकील से एक बार सलाह लेना हमेशा बेहतर रहता है।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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