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Shikhar Agarwal APO: डोटासरा-गहलोत का भजनलाल सरकार पर हमला, 40 विला डील पर मांगी CBI-ED जांच

डोटासरा ने कहा कि मुख्यमंत्री मगरमच्छ ढूंढ रहे थे, तो अब मुख्यमंत्री को मगरमच्छ मिलने शुरू हो गए होंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कांग्रेस पर आरोप लगा रही थी, लेकिन दौलतपुरा में पहाड़ पर जो रिजॉर्ट काटा जा रहा था, उसकी नीलामी को आखिरी डेडलाइन से दो घंटे पहले किसके इशारे पर और क्यों रोका गया

राजस्थान की सियासत में वरिष्ठ IAS अफसर शिखर अग्रवाल के IAS APO किए जाने के बाद भूचाल आ गया है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस पूरे मामले में राज्य सरकार पर तीखा तंज कसते हुए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं और ईडी-सीबीआई से जांच करवाने की चुनौती दे डाली है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस मामले में सीधे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से जवाबदेही मांगी है।

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डोटासरा ने सरकार पर कसा तंज, बताया भ्रष्टाचार का भंडाफोड़

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि बीजेपी सरकार का पाप का घड़ा भर चुका है और अब फूट रहा है। उन्होंने कहा, “अभी तो उसमें से सुराग निकल रहे हैं। पहले सुधांश पंत को हटाया गया, फिर शिखर अग्रवाल को यहां से हटाया गया, फिर डीजीपी बनने की कहानी शुरू हुई। एक-दूसरे की ओर से शह-मात का खेल चल रहा है।” उन्होंने दावा किया कि सरकार में बैठे नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार का धीरे-धीरे भंडाफोड़ हो रहा है, और यह सिर्फ इसकी शुरुआत है, पहली कड़ी है।

“मुख्यमंत्री मगरमच्छ ढूंढ रहे थे, मिलने शुरू हो गए होंगे” – डोटासरा का तंज

डोटासरा ने कहा कि मुख्यमंत्री मगरमच्छ ढूंढ रहे थे, तो अब मुख्यमंत्री को मगरमच्छ मिलने शुरू हो गए होंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कांग्रेस पर आरोप लगा रही थी, लेकिन दौलतपुरा में पहाड़ पर जो रिजॉर्ट काटा जा रहा था, उसकी नीलामी को आखिरी डेडलाइन से दो घंटे पहले किसके इशारे पर और क्यों रोका गया, यह बड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि सरकार में बैठे लोगों ने कितना बड़ा खेल करने का षड्यंत्र रचा है, यह भी सामने आना चाहिए।

ED-CBI से जांच कराने की दी चुनौती, उठाया सवाल

डोटासरा ने कहा कि जो अफसर मुख्यमंत्री कार्यालय में मुख्यमंत्री के सबसे नजदीक था, वह कोई छोटा पद नहीं होता। उनके मुताबिक ऐसे अफसर के जितने भी फैसले होते हैं, वे सीएम के फैसले ही माने जाते हैं, और जो भी रियायत कंपनी को दी गई है, वह सीएम की अध्यक्षता वाली कमेटी ने दी है, इसलिए सीएम को खुद भी इसकी जांच करनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया, “ये ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई क्या कांग्रेस को डराने-धमकाने के लिए बनी है या भ्रष्टाचार रोकने के लिए? अगर भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी है तो इस मामले में भी जांच करवाएं।”

“किस अफसर से किसको निपटाना, यह भाजपा का ही खेल” – डोटासरा

डोटासरा ने आरोप लगाया कि किस अफसर से किसको निपटाना है और कागज कहां से लाना है, यह तय भाजपा ही कर रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी खुद ही अपना भेद खोलने में लगी है, और अगर इन अफसरों के साथ आगे कुछ हुआ, तो वे किस-किस के साथ क्या-क्या खेल करेंगे, यह भी देखने वाली बात होगी।

सुधांश पंत की चर्चा छेड़ते हुए बोले- दो साल सरकार चलाने वाला चुप नहीं बैठेगा

पूर्व मुख्य सचिव सुधांश पंत को लेकर डोटासरा ने कहा कि जिसने दो साल सरकार चलाई हो, वह ऐसे ही चुप नहीं बैठेगा। उनके मुताबिक राजनीति में नेता एक-दूसरे पर भाले फेंकते हैं तो अफसर बच जाते हैं, लेकिन जब अफसर ही एक-दूसरे पर भाले फेंकने लगें, तो सरकार भी निपटेगी और आगे यह सिलसिला भी नहीं रुकेगा। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक अफसर की बात नहीं, बल्कि पूरी सरकार की कार्यशैली को उजागर करने वाला मामला है।

यह ब्यूरोक्रेट्स की नहीं, भ्रष्टाचार की लड़ाई है – डोटासरा का दावा

डोटासरा ने कहा कि जिस अफसर को यहां से हटाया गया, वह भी सीनियर आईएएस है और मुख्य सचिव रह चुका है, उसे हटाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। उनके मुताबिक वह भी अपने साथ मुख्यमंत्री कार्यालय का एक विकेट लेकर गया था। डोटासरा ने साफ कहा कि यह जो आपसी लड़ाई है, वह केवल ब्यूरोक्रेसी की आपसी लड़ाई नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की लड़ाई है, और इसमें ऊपर से नीचे तक सारे लोग इसमें आकंठ डूबे हुए हैं।

आगे राजनेताओं के भी मामले आएंगे सामने, किया दावा

डोटासरा ने कहा कि ऊपर के एक और दो नंबर की लड़ाई में जो-जो पात्र बने हुए हैं, उन्हें निपटाने और उनकी बातें बाहर निकालने का जो खेल शुरू हुआ है, वह रुकने वाला नहीं है। उनके मुताबिक अभी तो सिर्फ ब्यूरोक्रेट्स की बातें सामने आ रही हैं, आगे चलकर राजनेताओं के भी मामले सामने आने लगेंगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस सरकार में बैठे लोगों ने जो भ्रष्टाचार किया है, वैसा देश के इतिहास में किसी राज्य में पहले कभी नहीं हुआ।

33 साल की नौकरी में पहली बार एपीओ हुए शिखर अग्रवाल

सीनियर आईएएस शिखर अग्रवाल को बुधवार देर रात एपीओ कर दिया गया, जो सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है। पहली बार उन पर इस तरह की गाज गिरी है, इससे पहले अपनी 33 साल की नौकरी में उन्हें कभी एपीओ नहीं किया गया था। कार्मिक विभाग ने आदेश में हालांकि प्रशासनिक कारण ही लिखा है।

असली वजह बनी ढाई साल में एक ही कंपनी से 40 विला-कॉटेज की खरीद

सूत्रों के मुताबिक असली वजह वह खुलासा है, जिसमें शिखर अग्रवाल के परिवार की ओर से ढाई साल में एक ही कंपनी से 40 विला और कॉटेज खरीदने की बात सामने आई थी। जब कोई अधिकारी उद्योग, निवेश और रीको जैसे पदों पर बैठा हो, और उसी दौरान उसके परिवार की इतनी बड़ी प्रॉपर्टी डील हो जाए, तो यह सिर्फ निजी लेन-देन नहीं रह जाता। अधिकारी का काम जनता का हित देखना होता है, और अगर वही अधिकारी अपने और अपने परिवार के फायदे की तरफ कदम बढ़ाए, तो सवाल उठना लाजिमी माना जा रहा है।

6.16 करोड़ में खरीद, सालाना 1.80 करोड़ में वापस लीज – जानें पूरा गणित

दस्तावेजों के मुताबिक 40 विला और कॉटेज करीब 6 करोड़ 16 लाख रुपए में खरीदे गए, और इन्हें सालाना करीब 1 करोड़ 80 लाख रुपए में उसी कंपनी को वापस लीज पर दे दिया गया, जिससे इन्हें खरीदा गया था। यानी हर साल करीब 30 फीसदी रिटर्न का यह गणित आसानी से किसी को भी आसानी से हजम नहीं हो रहा। इसी बीच यह भी सामने आया कि जिस रिसॉर्ट वाली कंपनी से यह डील हुई, उसे विला खरीदने के आसपास सरकार की ओर से निवेश प्रोत्साहन योजना में रियायतें भी मिलीं, जिसने हितों के टकराव का सवाल और गहरा कर दिया।

निवेश प्रोत्साहन योजना की रियायत और डील के समय पर उठे सवाल

परिवार ने एक ही कंपनी से संपत्तियां खरीदीं और फिर उन्हें उसी कंपनी को लीज पर दे दिया। जिस कंपनी से यह डील हुई, उसे निवेश प्रोत्साहन योजना का लाभ भी मिला। यह अपने आप में किसी गलत काम का सबूत नहीं है, लेकिन निजी सौदे और सरकारी फैसलों के बीच संभावित संबंध का शक जरूर पैदा करता है। कॉटेज और विला की कीमतें बाजार के हिसाब से थीं या नहीं, लीज की शर्तें कैसे तय हुईं, और संपत्ति की रजिस्ट्री तथा कंपनी को मिलने वाले निवेश प्रोत्साहन लाभ के समय में इतनी निकटता क्यों है, इन सवालों के जवाब मिलना अभी बाकी है।

पति-पत्नी दोनों बड़े पद पर, पर सवाल बरकरार

शिखर अग्रवाल और उनकी पत्नी दोनों देश की सबसे बड़ी सरकारी सेवाओं में हैं, और उनकी तनख्वाह भी अच्छी होती है, जिससे वे प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं। शिखर अग्रवाल की ओर से यह भी कहा गया है कि यह खरीद पूरी तरह कानूनी है और इसकी जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न तथा अचल संपत्ति विवरण यानी IPR में दी गई है। हालांकि इस खरीद की लागत और उससे मिलने वाले रिटर्न ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

राजस्थान के सबसे ताकतवर अफसरों में शुमार रहे हैं शिखर अग्रवाल

1993 बैच के सीनियर आईएएस शिखर अग्रवाल राजस्थान के सबसे ताकतवर अफसरों में गिने जाते रहे हैं। सरकार चाहे किसी की भी रही हो, ज्यादातर समय बड़े विभागों का जिम्मा उन्हीं के पास रहा। वे मौजूदा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के एसीएस भी रह चुके हैं। ऐसे में सरकार ने जांच से पहले ही यह साफ कर दिया कि वह अपनी छवि पर कोई आंच नहीं आने देगी। उनकी पत्नी आईपीएस हैं, लेकिन सीधे तौर पर जवाबदेही वाला पद शिखर अग्रवाल के पास होने के चलते कार्रवाई उन्हीं पर हुई।

पहले भी विवादों में रहे हैं शिखर अग्रवाल, 2016 का मामला भी जुड़ा

शिखर अग्रवाल का यह विवाद नया नहीं है। साल 2016 में जब वे जयपुर विकास प्राधिकरण यानी जेडीए के कमिश्नर थे, तब राजमहल पैलेस होटल के बाहर अतिक्रमण हटाने को लेकर भी विवाद हुआ था। बाद में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के एसीएस रहते हुए तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत से उनकी तनातनी की खबरें भी सामने आई थीं। माना जाता है कि इसी तनातनी के चलते शिखर अग्रवाल की मुख्यमंत्री कार्यालय से और सुधांश पंत की राजस्थान से विदाई हुई थी।

IPR में सूचना देने के बावजूद पद से हटाए जाने पर उठा सवाल

अचल संपत्ति विवरण यानी IPR भरना अधिकारियों के लिए अनिवार्य है। शिखर अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने पूरी जानकारी दी है, और पत्नी के IPR में जो अंतर दिख रहा है, वह अटैचमेंट की गलती से हुआ है। हालांकि इस पूरे प्रकरण से जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। अधिकारी, राजनेता या सरकार, ये सभी जनता के टैक्स के पैसे के ट्रस्टी होते हैं, और तकनीकी खामी या अधूरा खुलासा भी इस भरोसे को कमजोर करता है, जिसकी सच्चाई जांच से ही साफ हो पाएगी।

विपक्ष की चुप्पी और शिखर अग्रवाल की कार्यक्षमता पर भी उठे सवाल

शिखर अग्रवाल किसी भी सरकार में अच्छे पदों पर रहे हैं, और यह खरीद-फरोख्त दोनों ही सरकारों के समय हुई बताई जा रही है। कई विवादों के बावजूद उनकी काम करने की क्षमता की तारीफ होती रही है, और विरोध करने वाले भी मानते हैं कि उनका फाइल निपटान बहुत तेज रहा है। यही वजह मानी जा रही है कि इतने बड़े मामले के बावजूद विपक्ष की ओर से भी सीधी और तीखी प्रतिक्रिया धीरे-धीरे ही सामने आ रही है।

सरकार की देर रात की कार्रवाई का क्या है संदेश

सरकार की देर रात हुई इस कार्रवाई से यह संकेत मिलता है कि अब ऐसे मामलों में चुप्पी नहीं चलेगी। भजनलाल सरकार का स्पष्ट संदेश है कि वह जीरो टॉलरेंस नीति अपनाएगी, लेकिन असली जवाबदेही तभी पूरी होगी, जब जांच पूरी हो और सच्चाई सामने आए। लोकतंत्र में बड़ा पद नैतिकता से मुक्ति नहीं देता, बल्कि जिम्मेदारी और बढ़ा देता है।

पूर्व सीएम गहलोत ने भी मांगी CBI-ED जांच, CM पर उठाए सवाल

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी एसीएस शिखर अग्रवाल के इस मामले में सीबीआई और ईडी जांच की मांग उठाते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। गहलोत ने कहा, “शिखर अग्रवाल के नाम के अनुसार ही काम हुआ है, शिखर की तरह उन्होंने काम किया है। 40 विला एक साथ लेने की खबर आई, वह चौंकाने वाली है। मुख्यमंत्री को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मुख्यमंत्री को लगभग 3 साल हो जाएंगे, और इन 3 साल में सबसे बड़ा घोटाला सामने आया तो यही आया है।”

“मुख्यमंत्री को खुद आगे आना चाहिए” – गहलोत का आरोप

गहलोत ने कहा कि मुख्यमंत्री को खुद आगे आना चाहिए, क्योंकि उन पर भी आरोप लग रहे हैं और सीएमओ पर भी आरोप लग रहे हैं। उनके मुताबिक सिर्फ एपीओ करने से काम नहीं चलने वाला, क्योंकि आईएएस अफसरों की कंट्रोलिंग अथॉरिटी केंद्र सरकार होती है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वह सीबीआई और ईडी को जांच सौंपे, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। गहलोत ने यह भी दावा किया कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में ही उस कंपनी को छूट दी गई थी, जिसने शिखर अग्रवाल को विला बेचे थे, और उनके मुताबिक यह ऐसे आरोप हैं जिन्हें कोई झुठला नहीं सकता।

आईजी को उदयपुर की प्राइम पोस्टिंग देने पर भी उठाए सवाल

गहलोत ने एक पुराने प्रकरण का जिक्र करते हुए दावा किया कि एक बार खबर आई थी कि सीएमओ के एक आईजी, शिखर अग्रवाल और मुख्यमंत्री व उनके परिवार के लोगों के बीच आपस में छीना-झपटी हो गई थी, किसी ने थप्पड़ लगाने तक की बात कही थी। उनके मुताबिक इसके बावजूद उस आईजी को बाद में उदयपुर भेजकर प्राइम पोस्टिंग दी गई। गहलोत ने कहा कि अगर उन्हें वाकई सजा देनी होती, तो ऐसी प्राइम पोस्टिंग नहीं दी जाती, बल्कि यह पोस्टिंग इस शर्त पर दी गई लगती है कि वे मुख्यमंत्री के सामने हुई घटना पर चुप्पी साधे रखें।

उदयपुर विकास प्राधिकरण को बताया करप्शन का बड़ा अड्डा

गहलोत ने आगे दावा किया कि अगर उस समय आईजी को सजा देनी होती तो उन्हें उदयपुर नहीं भेजा जाता, क्योंकि उदयपुर भ्रष्टाचार के मामले में जयपुर से पीछे नहीं है। उनके मुताबिक उदयपुर विकास प्राधिकरण करप्शन का बहुत बड़ा अड्डा माना जाता है, जहां जिसे भी भेजा जाए, वह इस खेल में उलझ ही जाता है। गहलोत ने दावा किया कि शिखर अग्रवाल जब वहां कलेक्टर थे, तभी से यह सिलसिला शुरू हुआ था, और यह पूरा खेल अब सबके सामने है।

आगे क्या होना चाहिए, जानें अहम सुझाव

विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी अफसरों के निजी संपत्ति विवरणों पर करीबी नजर रखी जानी चाहिए। IPR सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है, सीनियर अफसरों के संपत्ति विवरण में कोई भी खामी या अधूरा खुलासा जनता का भरोसा घटाता है। जब कोई अफसर आर्थिक पोर्टफोलियो संभाल रहा हो, तो उसके और उसके परिवार के निवेश को लेकर सख्त नियम होने चाहिए, क्योंकि निजी संपत्ति और सरकारी फायदे का इस तरह का संयोग बार-बार भरोसे का संकट पैदा करता है।

पद की गरिमा तभी बनी रहती है जब अधिकारी हर तरह के संदेह से ऊपर उठे, और इसके लिए पारदर्शी जांच, संपत्ति विवरण में सुधार तथा हितों के टकराव को लेकर साफ नियमों की जरूरत बताई जा रही है। इससे पहले भी राजस्थान में एसीबी की कार्रवाई में बड़े पदों पर बैठे परिजनों से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं, जो दिखाते हैं कि सत्ता के करीबी रिश्तों और संपत्ति के लेन-देन पर निगरानी कितनी जरूरी है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप थमने के आसार नहीं, आगे भी गरमाएगी सियासत

राजस्थान की सियासत में भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला पहले भी कई बार देखने को मिल चुका है, लेकिन शिखर अग्रवाल के मामले ने इसे एक बार फिर तेज कर दिया है। डोटासरा और गहलोत दोनों की तरफ से लगातार दबाव बनाए जाने के बीच अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पूरे प्रकरण की जांच किस एजेंसी से कराती है, और क्या आने वाले दिनों में इस मामले में और भी नाम सामने आते हैं।

फिलहाल पूरा मामला जांच और राजनीतिक बयानबाजी के बीच उलझा हुआ है, और अंतिम सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकेगी।

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सांवरिया सेठ सिंह

सांवरिया सेठ सिंह पत्रकारिता के क्षेत्र में 14 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ ThumbsUp Bharat से जुड़े हैं। देश के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और डिजिटल न्यूज पोर्टल पर अपनी सेवाएं देने के बाद वे इस मंच का हिस्सा बने हैं। बिजनेस, देश-प्रदेश, धर्म और टेक्नोलॉजी समाचारों की गहरी समझ रखने वाले सांवरिया सेठ सिंह का अनुभव ThumbsUp Bharat की संपादकीय टीम को और सशक्त बनाता है।

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