जयपुर का वर्ल्ड हेरिटेज टैग खतरे में, दुनिया में पहले भी 4 जगहों से छिन चुका दर्जा, हाईकोर्ट ने पूछा- संरक्षण पर क्या किया?
राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर की वॉलसिटी यानी चारदीवारी के यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज दर्जे पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण नहीं रुका तो दुनिया में अब तक 4 जगहों से छिना जा चुका यह दर्जा जयपुर से भी छिन सकता है। कोर्ट ने JDA और नगर निगम से दो सप्ताह में सर्वे रिपोर्ट मांगी है।

Jaipur World Heritage Status को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लिया है। जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर ने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि वॉलसिटी में अवैध निर्माण और अतिक्रमण समय रहते नहीं रोका गया तो जयपुर दुनिया की पांचवीं ऐसी साइट बन सकती है, जिससे यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा छीन लिया जाए।
कोर्ट ने क्यों जताई इतनी गंभीर चिंता
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी ने साल 2025 में चारदीवारी में ऐतिहासिक इमारतों को गिराए जाने और हेरिटेज संरक्षण के नियमों के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई थी। इससे पहले 2023 में भी यूनेस्को इस बारे में चेता चुका है, लेकिन उसके बाद भी सरकार की ओर से प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने साफ कहा कि दिसंबर 2026 से पहले प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जयपुर से यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा छिन सकता है।
अवैध निर्माण और अतिक्रमण से बढ़ा गंभीर खतरा
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वॉलसिटी के कोर और बफर जोन में अवैध निर्माण, अनाधिकृत बदलाव और बड़ी संख्या में अतिक्रमण होने से गंभीर खतरा पैदा हो गया है। ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए बनाए गए हेरिटेज कंजर्वेशन एंड प्रोटेक्शन रेगुलेशन-2020 के नियमों की पालना किए बिना ही इमारतों में बदलाव किए गए और कई इमारतों को गिरा दिया गया।
कोर्ट ने नगर निगम और जेडीए अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि एजेंसियां कानून और नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करने में विफल रही हैं, और विभागों के बीच समन्वय की कमी को व्यवस्थागत उदासीनता और लापरवाही बताया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि पारंपरिक हवेलियां धीरे-धीरे गायब हो रही हैं और उनकी जगह ऐसे आधुनिक निर्माण ले रहे हैं, जो आसपास की ऐतिहासिक वास्तुकला से मेल ही नहीं खाते।
क्या होते हैं कोर और बफर जोन, क्यों हैं इतने अहम
किसी भी वर्ल्ड हेरिटेज साइट को कोर जोन और बफर जोन में बांटा जाता है। कोर जोन वह मुख्य क्षेत्र होता है, जहां ऐतिहासिक इमारतें और मूल विरासत मौजूद है, जबकि बफर जोन इसके चारों तरफ का वह इलाका है जो कोर जोन की सुरक्षा और उसकी मूल पहचान बनाए रखने के लिए तय किया जाता है। यूनेस्को के नियमों के मुताबिक दोनों ही जोन में निर्माण और बदलाव को लेकर सख्त शर्तें लागू होती हैं, ताकि आसपास का विकास मूल धरोहर की पहचान को नुकसान न पहुंचाए।
जयपुर की वॉलसिटी में हेरिटेज कंजर्वेशन एंड प्रोटेक्शन रेगुलेशन-2020 के तहत इन्हीं जोन में निर्माण के नियम तय किए गए थे, जिनमें इमारत की ऊंचाई, रंग, डिजाइन और सामग्री तक को लेकर शर्तें रखी गई थीं। लेकिन कोर्ट के मुताबिक इन नियमों का पालन किए बिना ही बड़े पैमाने पर बदलाव और तोड़फोड़ होती रही, जिससे यूनेस्को के मानकों का उल्लंघन हुआ।
दुनिया में अब तक 4 धरोहरों से छिन चुका है वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा
यूनेस्को अब तक दुनियाभर की 4 साइट्स से वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा वापस ले चुका है। ओमान के अरेबियन ओरिक्स सैंक्चुअरी से 2007 में यह दर्जा छीना गया था, क्योंकि सरकार ने तेल खोजे जाने के बाद अभयारण्य का दायरा 90% तक घटा दिया था, जिससे वहां वन्यजीवों की संख्या बेहद कम रह गई थी। जर्मनी की ड्रेसडेन एल्ब वैली से 2009 में एक पुल के निर्माण की वजह से यह दर्जा छिन गया, क्योंकि इससे पूरी घाटी दो हिस्सों में बंट रही थी।
जॉर्जिया के बगराती कैथेड्रल से 2017 में बड़े पुनर्निर्माण कार्य की वजह से दर्जा छीना गया, क्योंकि इससे इमारत की मूल पहचान को नुकसान पहुंचा था। वहीं ब्रिटेन के लिवरपूल मैरीटाइम मर्केंटाइल सिटी से 2021 में यह दर्जा छिना, जब वहां स्टेडियम और वॉटरफ्रंट रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स से शहर के ऐतिहासिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुंचने की बात सामने आई थी। इन चारों उदाहरणों से साफ है कि अनियंत्रित निर्माण और बदलाव किसी भी धरोहर स्थल के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकते हैं।
2019 में मिला था जयपुर को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा
जयपुर की वॉलसिटी को यूनेस्को ने जुलाई 2019 में वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया था। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 में वैदिक नगर नियोजन सिद्धांतों पर आधारित ग्रिड पैटर्न में इस शहर को बसाया था, जिसे भारत के पहले सुनियोजित शहरों में गिना जाता है। हवामहल, सिटी पैलेस जैसी जीवंत विरासत के साथ-साथ पारंपरिक हवेलियां, बाजार, प्रवेश द्वार और मंदिर इस शहर की खास पहचान हैं। लेकिन बीते कुछ दशकों में यहां की करीब 1200 पुरानी हवेलियों में से अब सिर्फ लगभग 800 ही बची हैं, बाकी या तो गिरा दी गईं या उनकी जगह नए निर्माण हो गए।
यूनेस्को ने कालूपुरा रेलवे परिसर के पुनर्विकास, दाणापीठ फायर स्टेशन के पुनर्निर्माण, जयपुर मेट्रो के विस्तार और अस्पताल-कॉलेज जैसे बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स को लेकर भी चिंता जताई है। यूनेस्को का कहना है कि इस तरह के हर बड़े निर्माण से पहले हेरिटेज इम्पैक्ट असेसमेंट और संरक्षण मानकों का सख्ती से पालन जरूरी है।
जेडीए-नगर निगम से दो सप्ताह में मांगी सर्वे रिपोर्ट
कोर्ट ने वॉलसिटी में हो रहे अवैध निर्माण और अतिक्रमण का सर्वे करवाकर दो सप्ताह के भीतर जेडीए और नगर निगम को रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। बीते साल भी जयपुर हेरिटेज नगर निगम से जुड़े मामलों में प्रशासनिक गड़बड़ियां सामने आती रही हैं, जिससे वॉलसिटी क्षेत्र में निगरानी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
इसके साथ ही कोर्ट ने मुख्य सचिव, प्रमुख शासन सचिव (यूडीएच), निदेशक (स्वायत्त शासन विभाग), निदेशक (पुरातत्व विभाग), एसीएस (पर्यटन विभाग) और देवस्थान विभाग के सचिव सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से 4 सप्ताह के भीतर 11 बिंदुओं पर शपथ पत्र मांगा है। अदालत ने मामले में कोर्ट की सहायता के लिए एडवोकेट संदीप पाठक, एडवोकेट युवराज सामंत, एडवोकेट मधुसूदन सिंह राजपुरोहित और एडवोकेट अनिरुद्ध माथुर को न्यायमित्र नियुक्त किया है।
![]()
विश्व धरोहर होने का जयपुर को क्या फायदा मिलता है
वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा किसी भी शहर के लिए सिर्फ सम्मान की बात नहीं, बल्कि इससे पर्यटन, संरक्षण फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय पहचान भी जुड़ी होती है। जयपुर की तरह ही भारत के गुजरात स्थित विश्व धरोहर स्थल धोलावीरा को भी इसी तरह की मान्यता मिली हुई है, जो देश की प्राचीन सभ्यता की पहचान को दुनियाभर में पहुंचाने में मदद करती है। अगर जयपुर से यह दर्जा छिन जाता है, तो इसका सीधा असर शहर की अंतरराष्ट्रीय छवि, पर्यटन उद्योग और यहां मिलने वाली संरक्षण संबंधी सुविधाओं पर पड़ सकता है।
दर्जा छिनने से पहले ‘खतरे की सूची’ में डाला जा सकता है नाम
यूनेस्को किसी साइट का दर्जा सीधे नहीं छीनता, बल्कि इससे पहले आमतौर पर उसे ‘वर्ल्ड हेरिटेज इन डेंजर’ यानी खतरे की सूची में डाला जाता है। इस सूची में डाले जाने के बाद संबंधित देश और प्रशासन को सुधार के लिए तय समय दिया जाता है। अगर तय समय में जरूरी कदम नहीं उठाए जाते, तभी अंतिम फैसले के तौर पर दर्जा वापस लिया जाता है, जैसा लिवरपूल और ड्रेसडेन के मामलों में हुआ। जयपुर के मामले में भी दिसंबर 2026 तक ठोस रिपोर्ट न मिलने पर 2027 के सत्र में यह सवाल उठ सकता है कि वॉलसिटी को पहले खतरे की सूची में डाला जाए या नहीं।
गलियों में टूटती पुरानी हवेलियां
परकोटे की तंग गलियों में अंदर जाने पर विरासत संरक्षण से जुड़ी चिंता साफ दिखाई देती है। कई इलाकों में पुरानी हवेलियों और ऐतिहासिक ढांचों को तोड़ने का काम चल रहा है।
- स्थानीय लोगों ने कैमरे पर बात करने से परहेज किया, लेकिन उन्होंने बताया कि कई जगह पुराने भवनों की जगह नए कमर्शियल निर्माण शुरू हो गए हैं।
- कुछ इमारतों का बड़ा हिस्सा हटाया जा चुका है।
- कई जगहों पर पारंपरिक ढांचे की जगह आधुनिक निर्माण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
- इससे वॉल सिटी की मूल बनावट और ऐतिहासिक पहचान पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
यूनेस्को की मुख्य चिंता: ऐतिहासिक ढांचों का नुकसान
यूनेस्को की रिपोर्ट में सबसे गंभीर चिंता परकोटे के भीतर ऐतिहासिक भवनों के ध्वस्तीकरण और उनकी जगह नई व्यावसायिक इमारतें बनने को लेकर जताई गई है।
- रिपोर्ट में थर्ड-पार्टी रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा गया है कि वॉल सिटी के अंदर कई ऐतिहासिक इमारतों को हटाए जाने की जानकारी सामने आई है।
- यूनेस्को ने इस मुद्दे पर 14 नवंबर 2023 को भारत सरकार से विस्तृत जवाब मांगा था।
- रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में अब तक पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
- यूनेस्को ने चेताया है कि ऐसे बदलाव जारी रहे तो जयपुर वॉल सिटी की ऐतिहासिक अखंडता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
हेरिटेज संरक्षण सेल की कार्यप्रणाली पर सवाल
रिपोर्ट में जयपुर के हेरिटेज संरक्षण सेल की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यूनेस्को ने विशेषज्ञों की स्थायी नियुक्ति न होने को बड़ी कमी माना है।
- सेल में संरक्षण आर्किटेक्ट, टाउन प्लानर और ट्रांसपोर्ट स्पेशलिस्ट जैसे पद शामिल हैं।
- रिपोर्ट के अनुसार, इन पदों पर स्थायी नियुक्तियां नहीं हैं।
- विशेषज्ञों को जरूरत पड़ने पर ही बुलाया जाता है।
- इसी वजह से ऐतिहासिक इमारतों की सूची, संरक्षण रिपोर्ट, पुनर्स्थापन योजनाएं और विरासत भवनों के रियूज प्रोजेक्ट जैसे काम प्रभावित हुए हैं।
- यूनेस्को ने राज्य सरकार से पूछा है कि स्थायी नियुक्तियों के प्रस्ताव की मौजूदा स्थिति क्या है।
- साथ ही यह भी पूछा गया है कि स्थायी व्यवस्था बनने तक अस्थायी रूप से कौनसी प्रणाली अपनाई जा रही है।
विकास परियोजनाओं पर उठे गंभीर सवाल
राज्य सरकार की 2024 की रिपोर्ट में कई विकास और संरक्षण परियोजनाओं का उल्लेख है, लेकिन यूनेस्को ने इनके हेरिटेज इम्पैक्ट एसेसमेंट को लेकर स्पष्टता की कमी बताई है।
- रिपोर्ट के अनुसार, कई परियोजनाओं में HIA यानी हेरिटेज इम्पैक्ट एसेसमेंट की जानकारी साफ तरीके से नहीं दी गई।
- कुछ मामलों में HIA काम शुरू होने के बाद तैयार किया गया।
- नियमों के अनुसार, किसी भी विरासत क्षेत्र से जुड़ी परियोजना शुरू करने से पहले HIA होना चाहिए।
- जिन परियोजनाओं पर सवाल उठे हैं, उनमें किशनपोल कॉलेज पुनर्विकास, पंडित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल विस्तार, बावड़ियों का संरक्षण, जयपुर मेट्रो विस्तार और जलेब चौक पुनर्विकास शामिल हैं।
- पार्किंग परियोजनाओं में अनाज मंडी कार पार्किंग और चौगान स्टेडियम मल्टी लेवल पार्किंग का भी उल्लेख किया गया है।
यूनेस्को ने मांगे दस्तावेज और रोडमैप
यूनेस्को ने भारत सरकार और राज्य सरकार से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और अपडेट मांगे हैं। इन जानकारियों के आधार पर आगे की समीक्षा की जाएगी।
- साइट मैनेजमेंट प्लान को अंतिम रूप देकर जमा कराने को कहा गया है।
- परकोटे की ऐतिहासिक इमारतों की विस्तृत सूची और दस्तावेज मांगे गए हैं।
- हेरिटेज इम्पैक्ट एसेसमेंट से जुड़ी कार्रवाई की जानकारी मांगी गई है।
- वॉल सिटी में चल रहे और प्रस्तावित कार्यों का पूरा ब्यौरा देने को कहा गया है।
- हेरिटेज संरक्षण सेल की नई संरचना का रोडमैप तैयार करने को कहा गया है।
- जानकारी विश्व धरोहर केंद्र को भेजे जाने के बाद विशेषज्ञ संस्थाएं इसकी समीक्षा करेंगी।
- समीक्षा के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
पहले भी हट चुके हैं वर्ल्ड हेरिटेज टैग
दुनिया में ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, जहां किसी शहर या क्षेत्र से वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा वापस लिया गया।
- 2009 में Dresden Elbe Valley से वर्ल्ड हेरिटेज टैग हटाया गया था।
- 2021 में Liverpool Maritime Mercantile City से भी यह दर्जा वापस लिया गया।
- विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसी वर्ल्ड हेरिटेज साइट पर दूसरा चरण शुरू होता है, तो यह उस शहर के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर स्थिति मानी जाती है।
- जयपुर के मामले में भी रिपोर्ट को इसी संदर्भ में गंभीरता से देखा जा रहा है।
टैग पर खतरा बढ़ा तो असर बड़ा होगा
अगर जयपुर के वर्ल्ड हेरिटेज दर्जे पर खतरा बढ़ता है, तो इसका असर केवल विरासत संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा। शहर की छवि, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान पर असर — जयपुर राजस्थान और भारत की प्रमुख वैश्विक ब्रांड पहचान है। वर्ल्ड हेरिटेज दर्जे पर सवाल उठना विरासत संरक्षण की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े कर सकता है।
- पर्यटन उद्योग को झटका — विदेशी पर्यटक अक्सर वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स को प्राथमिकता देते हैं। दर्जे पर खतरा बढ़ने से पर्यटन की धारणा प्रभावित हो सकती है।
- स्थानीय कारोबार पर असर — होटल, टूर गाइड, हस्तशिल्प बाजार, बाजारों के छोटे व्यापारी और पर्यटन से जुड़े कामगारों पर इसका असर पड़ सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग में कमी — विरासत संरक्षण से जुड़ी रिसर्च, तकनीकी सहयोग और फंडिंग के अवसर कम हो सकते हैं।
- शहर की साख पर दबाव — वर्ल्ड हेरिटेज शहर होने के कारण जयपुर से संरक्षण के उच्च मानकों की अपेक्षा रहती है। इन मानकों पर सवाल उठना शहर की साख के लिए चुनौती बन सकता है।
आगे क्या
अब जेडीए और नगर निगम को दो सप्ताह में सर्वे रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी, जबकि बाकी अधिकारियों को 4 सप्ताह में शपथ पत्र दाखिल करना होगा। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी दिसंबर 2026 तक जयपुर से संरक्षण को लेकर ठोस रिपोर्ट मांग रही है, जिसकी समीक्षा 2027 में होने वाले सत्र में की जाएगी। तब तक प्रशासन के पास वॉलसिटी में अवैध निर्माण और अतिक्रमण रोकने के लिए ठोस कदम उठाने का सीमित समय ही बचा है।
ये भी पढ़ें :
जयपुर नगर निगम में BJP बोर्ड, पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल की हार से बदली मेयर पद की गणित
Like and follow us on :
Telegram | Facebook | Instagram | Twitter | Pinterest | Linkedin