UNESCO ने सिंधु घाटी के पांच विशाल नगरों में एक गुजरात के Dholavira को​ विश्व धरोहर की सूची में शामिल तो किया, लेकिन ये रहस्य अबतक नहीं सुलझा, आर्कियोलोजिस्ट दुनिया का साइनबोर्ड मानते हैं इसे

 

धोलावीरा

हड़प्पा युग के शहर Dholavira को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने  हाल ही वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में शामिल किया है। यह गुजरात के कच्छ के रण महाद्वीप में एक खादिर पर 100 हेक्टेयर भूमि में फैला हुआ है। 

सिंधु घाटी सभ्यता के पांच प्रमुख शहरों में से एक Dholavira भुज से 250 किमी दूर है। यह यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में जगह बनाने वाला गुजरात का चौथा और भारत में 40वां स्थान है। आपको बता दें कि इसे पुरातत्वविद् जगतपति जोशी ने 1968 में डिस्कवर किया था। 

पुरातत्वविद् रवींद्र सिंह बिष्ट के मेंटनेंस में 1990 और 2005 के बीच इस स्थल की खुदाई की गई तो पता चला कि Dholavira अपने पतन से 1,500 साल पहले 3000 ईसा पूर्व और 1800 ईसा पूर्व के बीच 1,200 वर्षों के लिए एक कॉमर्स और मैन्यूफे​क्चरिंग का केंद्र रहा था। 

इस ऐतिहासिक स्थल के अवशेष धोलावीरा के उत्थान और पतन की कहानी बयां करते हैं।

10 बड़े जिप्सम पत्थर भी मिले हैं, जिनका रहस्य आज तक सुलझ नहीं पाया

10 बड़े जिप्सम पत्थर भी मिले हैं, जिनका रहस्य आज तक सुलझ नहीं पाया

Dholavira की खुदाई में कई वस्तुएं मिली हैं। गुजरात पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर आप जाएंगे तो देखेंगे कि टेराकोटा, मोतियों, सोने और तांबे के आभूषणों, मुहरों, हुक, छोटी जानवरों की मूर्तियां, औजार, कलश और कुछ महत्वपूर्ण बर्तन मिले हैं। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को यहां से बड़े करीने से रखे गए 10 बड़े जिप्सम पत्थर भी मिले हैं, जिनका रहस्य आज तक सुलझ नहीं पाया है कि यह प्रतीक है या कुछ लिखा है। कुछ पुरातत्वविद इसे प्रारंभिक दुनिया का साइन बोर्ड मानते हैं।

धोलावीरा, सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख शहर

मोहनजोदड़ो, गंगवेरीवाला और हड़प्पा सिंधु घाटी सभ्यता के तीन स्थल हैं जो अब पाकिस्तान में है, जबकि Dholavira भारत का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और हरियाणा में राखीगढ़ी के बाद पांचवीं सबसे बड़ी सभ्यता है। 47 हेक्टेयर में फैला धोलावीरा शहर एक चौकोर आकार में स्थित था, जिसके दो सिरे निकलते थे – मानसर और दक्षिण में मनहर। शहर को तीन क्षेत्रों में डिवाइड किया गया था – ऊपरी किलेबंदी और मध्य और निचले हिस्से में शहर की बसावट थी। निचले शहरों में घर चूना पत्थर के बने होते थे।

 

क्यों धोलावीरा भारत के अन्य ऐतिहासिक स्थानों से अलग है

Dholavira की एक महान विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से खुला मैदान है और कभी भी किसी भी तरह से कब्जा नहीं किया गया है। इस लिहाज से यह भारत का एक दुर्लभ ऐतिहासिक स्थान है। 

इस स्थल की खोज के बाद ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने यहां एक संग्रहालय बनाया था। वर्तमान में धोलावीरा के नाम से बसे गांव की आबादी दो हजार है। 

यह आबादी प्राचीन शहर के फॉसिल पार्क के पास बसी है जहां लकड़ी के जीवाश्म जमा किए जाते थे।

प्राचीनकाल में बेहतरीन वाटर सिस्टम की मिसाल

जल संरक्षण और नाली की जबरदस्त व्यवस्था थी, जो प्राचीन विश्व की कुशल कारीगरी का नमूना है। शहर बाहर से मजबूत था और अंदर दो बड़े स्थल थे, एक त्योहारों के दौरान उत्सव के लिए और दूसरा बाजार की सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाता था। 

इनमें नौ अनोखे आकार के प्रवेश द्वार थे। Dholavira निवासियों के दफन स्थल भी एक अनोखे आकार के थे। यहां अंत्येष्टि स्थलों में मानव अवशेषों का कोई सबूत नहीं मिला है, लेकिन यहां निश्चित रूप से कीमती पत्थर पाए गए हैं।

उत्पादों के लेन देन का मुख्य व्यापार

उत्पादों के लेन देन का मुख्य व्यापार

ऐसा माना जाता है कि धोलावीरा के लोगों का मुख्य व्यापार आयात-निर्यात ही था। व्यापारी आज के राजस्थान, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात से तांबा अयस्क लाकर अपने उत्पाद बनाकर उनका निर्यात करते थे। यहां बड़े स्तर पर गोले और अर्द्ध कीमती पत्थरों के आभूषणों का व्यापार भी होता था। 

पुरातत्वविद रवींद्र सिंह बिष्ट के अनुसार मेसोपेटिया के शाही मकबरों में भी Dholavira की कारीगरी पाई गईं हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों के बीच व्यापार चलता रहा होगा।

उस दौरान शायद हड़प्पा के लोग व्यापार के लिए समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करते थे। जब मेसोपोटियन सभ्यता नष्ट हो गई, तो हड़प्पा के व्यापारियों को एक बड़ा आर्थिक झटका लगा क्योंकि उनका व्यापार कमजोर हो गया था।

जबकि मेसोपोटामिया उनका बड़ा बाजार था जिसने नष्ट होने पर उनके खनन, निर्माण, विपणन और निर्यात व्यवसाय को बुरी तरह प्रभावित किया।

सरस्वती नदी का विलुप्त होना और भयंकर सूखा 

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार धोलावीरा ने 2000 ईसा पूर्व से जलवायु परिवर्तन और सरस्वती सहित कुछ अन्य नदियों के सूखने के कारण गंभीर सूखे का अनुभव को झेला। 

अकाल की स्थिति में धोलावीरा के निवासी गंगा घाटी की ओर पलायन करने लगे और दक्षिणी गुजरात और महाराष्ट्र तक पहुँच गए। उस समय कच्छ का रण पानी से भरा हुआ था 

और वहां नावें चलती थीं, लेकिन बाद में समुद्र धीरे-धीरे सूखने लगा और रण में कीचड़ का पहाड़ उठने लगा।

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