काउंटर टिकट पर भी मिलेगा रेल यात्रा बीमा, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 27 अक्टूबर से लागू होगी नई व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्य यात्री ज्यादातर स्टेशन काउंटर से ही टिकट लेते हैं, इसलिए उन्हें बीमा सुविधा से वंचित रखना उचित नहीं है। अब 27 अक्टूबर 2026 से स्टेशन काउंटर की हर टिकट पर भी ऑनलाइन टिकट की तरह बीमा का ऑप्शन देना अनिवार्य कर दिया गया है। मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को तय की गई है।

काउंटर से रेल रिजर्वेशन कराने पर भी अब यात्री Railway Counter Ticket Insurance ले सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को यह आदेश दिया है, जो 27 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह फैसला सुनाया। अभी सिर्फ ऑनलाइन टिकट बुक कराने वालों को ही बीमा मिलता था, लेकिन अब ऑफलाइन टिकट पर भी यह सुविधा ऑनलाइन टिकट की तरह ऑप्शनल रहेगी।
ओडिशा रेल हादसे के बाद दायर याचिका से शुरू हुआ पूरा मामला
जून 2023 में ओडिशा के बालासोर में हुए भीषण ट्रेन हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इसमें मांग की गई थी कि ट्रेन हादसों को रोकने वाला सेफ्टी सिस्टम जल्द से जल्द सभी ट्रेनों में लगाया जाए और हादसों की जांच के लिए एक स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों को भी इस सुनवाई में शामिल कर लिया, जिनमें स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज बनाना, पटरियों के आसपास जाली लगाना और खिड़की से टिकट लेने वाले यात्रियों को बीमा न मिलने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
यही वजह है कि तीन साल से चल रहे इस मामले में अब काउंटर टिकट पर इंश्योरेंस का मुद्दा भी जुड़ गया है, और कोर्ट ने इसे यात्री सुरक्षा के दायरे का ही एक जरूरी हिस्सा माना है।
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काउंटर से टिकट लेने वाले आम यात्रियों को मिलेगा सीधा फायदा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्य यात्री ज्यादातर स्टेशन काउंटर से ही टिकट लेते हैं, इसलिए उन्हें बीमा सुविधा से वंचित रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे को इस सुविधा का इंतजाम करने के लिए काफी समय दिया गया था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ। इसी वजह से अब 27 अक्टूबर 2026 से स्टेशन काउंटर की हर टिकट पर भी ऑनलाइन टिकट की तरह बीमा का ऑप्शन देना अनिवार्य कर दिया गया है। मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को तय की गई है।
कोर्ट के इस आदेश का सीधा असर उन करोड़ों यात्रियों पर पड़ेगा जो इंटरनेट या ऐप के बजाय आज भी स्टेशन की खिड़की से टिकट लेना पसंद करते हैं, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले यात्री। अब तक यही तबका इस सुरक्षा कवच से बाहर था।
दरअसल देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसकी इंटरनेट या स्मार्टफोन तक पहुंच सीमित है, या जो तकनीकी वजहों से ऑनलाइन टिकट बुकिंग में सहज नहीं है। ऐसे यात्री अक्सर आरक्षण काउंटर पर लाइन में लगकर टिकट लेते हैं, लेकिन सिर्फ बुकिंग के तरीके की वजह से उन्हें अब तक इंश्योरेंस जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित रखा जाता रहा। कोर्ट ने इसी डिजिटल खाई को रेखांकित करते हुए कहा कि टिकट बुक कराने का माध्यम अलग होने से यात्रियों के सुरक्षा अधिकार में कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
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दुर्घटना, मौत या अंग खोने पर मिलेगा बीमा कवर
रेलवे ट्रैवल इंश्योरेंस के तहत ट्रेन के पटरी से उतरने, दो ट्रेनों की टक्कर, आतंकी हमले या किसी अन्य अप्रिय घटना में यात्री की मौत होने, अंग खोने या गंभीर चोट लगने पर बीमा का पैसा मिलता है। वहीं अगर कोई यात्री खुदकुशी की कोशिश करता है, खुद को नुकसान पहुंचाता है या मानसिक संतुलन ठीक न होने के कारण हादसे का शिकार होता है, तो ऐसी स्थिति में कोई मुआवजा या बीमा कवर नहीं मिलता।
नुकसान की गंभीरता के हिसाब से ही बीमा की रकम तय होती है। मौत होने या पूरी तरह विकलांग होने की स्थिति में अधिकतम 10 लाख रुपए तक का कवर मिलता है, जबकि घायल होने पर इलाज का खर्च दिया जाता है। यह इंश्योरेंस फर्स्ट एसी, सेकेंड एसी, थर्ड एसी, स्लीपर और चेयर कार जैसी सभी श्रेणियों के कंफर्म और आरएसी यानी रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन टिकट पर मिलता है। हाल ही में हुए एक और बदलाव के बाद बच्चों के हाफ टिकट पर यह ऑप्शनल पॉलिसी अब उपलब्ध नहीं है, सिर्फ फुल टिकट पर ही इसका लाभ लिया जा सकता है।
क्लेम के लिए चार महीने के भीतर करना होगा आवेदन
ट्रेन दुर्घटना की तारीख से चार महीने के भीतर यात्री इंश्योरेंस क्लेम के लिए आवेदन कर सकते हैं। घायल व्यक्ति, उसका नॉमिनी या कानूनी उत्तराधिकारी यह क्लेम दाखिल कर सकता है। इसके लिए संबंधित इंश्योरेंस कंपनी के ऑफिस में एप्लिकेशन देनी होती है, साथ ही जरूरी दस्तावेज भी जमा करने पड़ते हैं। बिना रिजर्वेशन यानी जनरल टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों को फिलहाल यह ट्रैवल इंश्योरेंस सुविधा नहीं मिलती, ऐसे यात्रियों को हादसे की स्थिति में सिर्फ सरकार की ओर से दिए जाने वाले सामान्य मुआवजे का ही हक मिलता है।
रिजर्वेशन टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों के मुकाबले जनरल टिकट वालों के लिए बीमा सुविधा का न होना एक बड़ा अंतर बना हुआ है, और आने वाले समय में इस पर भी सुनवाई के दौरान सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि कोर्ट पहले ही सभी यात्रियों को एक समान सुरक्षा देने के पक्ष में टिप्पणी कर चुका है।
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2016 में शुरू हुई थी यह वैकल्पिक बीमा योजना
यात्रियों की सुविधा के लिए रेलवे की ओर से यात्री वैकल्पिक ट्रैवल इंश्योरेंस योजना सितंबर 2016 में शुरू की गई थी। उस समय प्रति यात्री बीमा प्रीमियम 92 पैसे था, जिसका भुगतान खुद सरकार करती थी। बाद में अगस्त 2018 में यह प्रीमियम घटाकर 42 पैसे प्रति यात्री कर दिया गया, और इसके बाद इसे और घटाकर 35 पैसे कर दिया गया था। अब हाल ही में हुए बदलाव के बाद रेलवे ने इस प्रीमियम को बढ़ाकर 45 पैसे कर दिया है, और यह राशि अब टिकट बुक कराते समय यात्रियों को खुद ही चुकानी पड़ती है।
गौरतलब है कि तत्काल टिकट बुकिंग में OTP वेरिफिकेशन जैसे हालिया बदलावों की तरह ही रेलवे समय-समय पर टिकट बुकिंग प्रक्रिया से जुड़े नियमों में बदलाव करता रहा है, लेकिन काउंटर टिकट पर इंश्योरेंस जैसी बुनियादी सुविधा को लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया था। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद उम्मीद है कि यह असमानता जल्द खत्म होगी।
शुरुआत में यह योजना इतनी कम कीमत में इतना बड़ा कवर देने की वजह से काफी लोकप्रिय हुई थी, और इसे अक्सर देश की सबसे सस्ती बीमा योजनाओं में गिना जाता रहा है। हालांकि समय के साथ प्रीमियम घटाने-बढ़ाने के पीछे दावों की संख्या और बीमा कंपनियों के साथ हुए अनुबंध जैसी वजहें रही हैं, लेकिन मूल मकसद हमेशा यही रहा कि यात्रियों को न्यूनतम खर्च पर अधिकतम सुरक्षा कवर मिल सके।
रेलवे बोर्ड पर सीधी जिम्मेदारी, अगली सुनवाई में पेश होना अनिवार्य
कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर यह आदेश तय समय पर लागू नहीं हुआ, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी रेलवे बोर्ड की होगी। अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को होगी, जिसमें रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और सदस्यों को खुद मौजूद रहने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने यात्री सुरक्षा से जुड़े बजट के इस्तेमाल को लेकर भी नाराजगी जताई थी, और कहा था कि सुरक्षा संबंधी मदों के लिए तय बजट का पूरा इस्तेमाल अब तक नहीं हो पाया है।
अगली सुनवाई में यह भी साफ होगा कि रेलवे ने काउंटर टिकट पर इंश्योरेंस की व्यवस्था को किस तरह लागू किया है, और यात्रियों की पहचान सत्यापित करने के लिए किस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
रेलवे ने पहले यह चिंता जताई थी कि काउंटर पर सही और सत्यापित यात्री जानकारी जुटाना मुश्किल है, जिससे क्लेम के दौरान दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक मुश्किलें यात्री सुरक्षा से इनकार करने का आधार नहीं बन सकतीं।
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