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Strategic Oil Reserve के लिए ONGC को क्यों सौंपी गई नई जिम्मेदारी

नया अंडरग्राउंड इमरजेंसी तेल भंडार कर्नाटक के मंगलुरु में बनाया जाएगा। इस परियोजना पर कुल करीब 15,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें 1.28 लाख बैरल तेल रखा जा सकेगा।

Strategic Oil Reserve पर केंद्र सरकार का नया फैसला सीधे ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद आए तेल संकट ने सरकार को यह संकेत दिया कि मौजूदा भंडारण क्षमता पर्याप्त नहीं है, इसलिए अब मंगलुरु में नया आपातकालीन तेल भंडार बनाने की जिम्मेदारी ONGC को दी गई है।

ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा फैसला

कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आने पर किसी देश की पहली चिंता कीमतें नहीं, उपलब्धता होती है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने नया इमरजेंसी ऑयल रिजर्व बनाने का निर्णय लिया है। अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान पैदा हुए तेल संकट ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में झटके का असर सीधे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। इस पृष्ठभूमि में नया Strategic Oil Reserve केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की नई परत के रूप में देखा जाना चाहिए।

सरकार ने यह जिम्मेदारी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन, यानी ONGC को सौंपी है। अब तक देश के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार प्रोजेक्ट पूरी तरह सरकारी फंडिंग से चलते रहे हैं और उनका प्रबंधन इंडियन स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड, यानी ISPRL करता है। इस बार ONGC की सीधी भागीदारी यह संकेत देती है कि सरकार ऊर्जा सुरक्षा के ढांचे को नए तरीके से विस्तार देना चाहती है।

Strategic Oil Reserve का नया प्रोजेक्ट

नया अंडरग्राउंड इमरजेंसी तेल भंडार कर्नाटक के मंगलुरु में बनाया जाएगा। इस परियोजना पर कुल करीब 15,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें 1.28 लाख बैरल तेल रखा जा सकेगा। यह संख्या पहली नजर में सीमित लग सकती है, लेकिन रणनीतिक भंडारण का महत्व रोजमर्रा की खपत से अलग तरीके से समझना होता है। यह स्टॉक नियमित सप्लाई के लिए नहीं, बल्कि असाधारण परिस्थितियों के लिए रखा जाता है।

यहीं Strategic Oil Reserve का वास्तविक अर्थ सामने आता है। यह कोई वाणिज्यिक गोदाम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा-स्तर के ऊर्जा प्रबंधन का उपकरण है। युद्ध, समुद्री मार्ग अवरोध, भूराजनीतिक संकट या अचानक आयात व्यवधान की स्थिति में ऐसे रिजर्व ही शुरुआती दिनों का दबाव संभालते हैं।

मौजूदा क्षमता का जरूरी आंकड़ा

अभी भारत की कुल रणनीतिक क्रूड स्टोरेज क्षमता करीब 3.9 करोड़ बैरल है। इस क्षमता का इस्तेमाल सामान्य दिनों में नहीं किया जाता। यह स्टॉक उस समय के लिए है जब अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित हो जाए या बाजार में गंभीर संकट पैदा हो। भारत रोजाना लगभग 50 लाख बैरल तेल खपत करता है। इस हिसाब से मौजूदा रणनीतिक भंडारण देश की जरूरतें करीब 8 से 9 दिन तक पूरी कर सकता है।

Strategic Oil Reserve

यहां असली बात यह है कि भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए 8-9 दिन का बैकअप बहुत लंबा नहीं माना जाता। तेल आयात रुकने या बुरी तरह प्रभावित होने की स्थिति में हर अतिरिक्त दिन महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए नया Strategic Oil Reserve समय खरीदने वाला उपाय है। इसका मतलब यह है कि सरकार संकट की स्थिति में तत्काल दबाव कम करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा परत तैयार कर रही है।

तीन दिन की अतिरिक्त राहत

सरकार के अनुमान के अनुसार, 1.28 लाख बैरल क्षमता वाला नया रणनीतिक तेल भंडार बन जाने के बाद कुल क्षमता में लगभग 33% की बढ़ोतरी होगी। व्यवहारिक रूप से इसका मतलब है कि मौजूदा 8-9 दिन के मुकाबले देश के पास लगभग 11 दिन का तेल सुरक्षा कवच उपलब्ध होगा। ऊर्जा क्षेत्र में तीन अतिरिक्त दिन मामूली नहीं होते। समुद्री आपूर्ति, बीमा, लोडिंग, रूट बदलाव और वैकल्पिक खरीद के बीच यही समय निर्णायक साबित हो सकता है।

यही इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक असर है। Strategic Oil Reserve का विस्तार तेल कीमतों को तुरंत कम नहीं करता, लेकिन यह संकट के समय घबराहट, बाजार दबाव और आपूर्ति अनिश्चितता को सीमित करने में मदद करता है। एक आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए यह आर्थिक स्थिरता का भी हिस्सा है।

पेट्रोलियम रिजर्व की दो परतें

पेट्रोलियम रिजर्व को broadly दो हिस्सों में समझा जाता है। पहला है रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, जिसे सरकार इमरजेंसी के लिए रखती है। इसे पेट्रोलियम की तिजोरी की तरह समझा जा सकता है। इसका उपयोग सामान्य कारोबार के लिए नहीं होता। युद्ध, तेल संकट, समुद्री मार्ग बाधा या सप्लाई शॉक जैसी स्थितियों में ही इस स्टॉक का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में मंगलुरु, पादुर और विशाखापट्टनम में ऐसे रणनीतिक भंडार पहले से मौजूद हैं, जहां जमीन के नीचे बड़े गुफानुमा ढांचों में तेल रखा जाता है।

दूसरी परत है व्यावसायिक पेट्रोलियम भंडार। यह तेल कंपनियां अपने नियमित संचालन के लिए रखती हैं, ताकि पेट्रोल पंपों और वितरण नेटवर्क में सप्लाई बनी रहे। इंडियन ऑयल जैसी कंपनियां ऐसा स्टॉक रखती हैं। यह आमतौर पर जमीन के ऊपर बड़े टैंकों में रखा जाता है। यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि Strategic Oil Reserve और commercial stock का उद्देश्य अलग-अलग है। एक राष्ट्रीय सुरक्षा उपकरण है, दूसरा आपूर्ति प्रबंधन का रोजमर्रा का ढांचा।

ONGC की नई भूमिका

इस प्रोजेक्ट की लागत को दो हिस्सों में बांटा गया है। ONGC भूमिगत गुफा के निर्माण पर लगभग 5,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसके अलावा इस सुविधा में कच्चा तेल भरने के लिए, मौजूदा बाजार कीमतों और विनिमय दर के आधार पर, लगभग 10,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ सकती है। यानी कुल अनुमानित लागत 15,000 करोड़ रुपये बैठती है।

यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक ऐसे प्रोजेक्ट पूरी तरह सरकारी फंडिंग से तैयार किए जाते रहे हैं। पहली बार ONGC इतने बड़े निवेश के साथ सीधे रणनीतिक भंडारण निर्माण में उतर रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि ऊर्जा सुरक्षा का ढांचा अब केवल प्रशासनिक परियोजना नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनियों की दीर्घकालिक भूमिका से भी जोड़ा जा रहा है।

Strategic Oil Reserve

निवेश मॉडल की खुली चुनौती

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ONGC इस बड़े निवेश की वसूली किस मॉडल से करेगी। यह सवाल परियोजना के आर्थिक पक्ष को महत्वपूर्ण बनाता है। अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि यह सुविधा केवल इमरजेंसी रिजर्व के रूप में काम करेगी या राजस्व बढ़ाने के लिए इसमें कुछ वाणिज्यिक गतिविधियां भी जोड़ी जाएंगी। यही इस योजना का अगला नीति-स्तर का प्रश्न है।

अगर Strategic Oil Reserve पूरी तरह आपात भंडार के रूप में रखा जाता है, तो उसकी आर्थिक वापसी प्रत्यक्ष नहीं, सुरक्षा-आधारित होगी। अगर उसमें वाणिज्यिक उपयोग की गुंजाइश रखी जाती है, तो उसका मॉडल अलग होगा। यही वजह है कि यह परियोजना केवल निर्माण लागत का मामला नहीं, बल्कि ऊर्जा नीति और सार्वजनिक निवेश ढांचे का भी मामला बनती है।

मंगलुरु का रणनीतिक महत्व

मंगलुरु को इस परियोजना के लिए चुनना भी साधारण निर्णय नहीं है। तटीय लोकेशन और मौजूदा ऊर्जा अवसंरचना के कारण यह क्षेत्र पहले से रणनीतिक महत्व रखता है। अंडरग्राउंड स्टोरेज गुफाओं का उपयोग लंबे समय तक सुरक्षित भंडारण के लिए किया जाता है, क्योंकि वे सतह पर बने टैंकों की तुलना में अधिक संरक्षित माने जाते हैं। इस प्रकार का निर्माण महंगा जरूर होता है, लेकिन इसका उद्देश्य सामान्य स्टोरेज से अलग होता है।

यहीं Strategic Oil Reserve की बुनियादी सोच समझ में आती है। यह सुविधा केवल तेल रखने की जगह नहीं, बल्कि उस तेल को सुरक्षित, नियंत्रित और संकट-उपयोग योग्य स्वरूप में रखने की व्यवस्था है। इसलिए निर्माण लागत का बड़ा हिस्सा भूमिगत ढांचे पर जाता है।

युद्ध और आपूर्ति संकट का सबक

अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान तेल बाजार में जो तनाव पैदा हुआ, उसने आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरी फिर सामने रख दी। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा वैश्विक बाजार से जुटाता है। ऐसे में आपूर्ति शृंखला में अचानक रुकावट, समुद्री तनाव, या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल केवल व्यापारिक समस्या नहीं रहती, वह राष्ट्रीय नीति का विषय बन जाती है।

इसी संदर्भ में नया Strategic Oil Reserve एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि तैयारी के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार ने यह संकेत दिया है कि ऊर्जा संकट को अब केवल अल्पकालिक आयात व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा। अतिरिक्त भंडारण क्षमता संकट के शुरुआती झटके को absorb करने का साधन बनेगी।

राष्ट्रीय स्तर पर व्यावहारिक असर

व्यावहारिक रूप से देखें तो इस तरह का तेल भंडार आम उपभोक्ता को रोजाना दिखाई नहीं देता। पेट्रोल पंप पर कीमत में इसका असर तुरंत नहीं दिखता। फिर भी इसका महत्व गहरा है। अगर किसी अंतरराष्ट्रीय संकट में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो सरकार के पास बाजार को स्थिर रखने, रिफाइनरियों को चालू रखने और आयात के वैकल्पिक रास्ते खोजने के लिए कुछ अतिरिक्त समय होता है। यही समय कई बार व्यापक आर्थिक अस्थिरता को सीमित करता है।

इसका मतलब यह है कि Strategic Oil Reserve का असली उपयोग संकट के दौरान दिखाई देता है, जब देश को यह तय करना होता है कि आयात झटका आने के बावजूद ऊर्जा आपूर्ति को कितनी देर तक सामान्य रखा जा सकता है। यही कारण है कि ऐसे प्रोजेक्ट का महत्व केवल बैरल संख्या से नहीं, उससे मिलने वाले रणनीतिक समय से मापा जाता है।

आगे की नीति पर निगाह

अब इस परियोजना का अगला महत्वपूर्ण चरण इसका वित्तीय और परिचालन मॉडल होगा। ONGC निर्माण और तेल भरने पर बड़ी राशि लगाएगी, लेकिन निवेश की वापसी, परिचालन नियंत्रण और उपयोग की प्रकृति पर अभी स्पष्टता बाकी है। यह तय करेगा कि नया रिजर्व केवल सुरक्षा तंत्र रहेगा या सुरक्षा के साथ सीमित आर्थिक उपयोग वाला मॉडल बनेगा।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा अब केवल आयात अनुबंधों का मामला नहीं रही। यह भंडारण, आपूर्ति विविधीकरण, रणनीतिक योजना और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका का संयुक्त ढांचा बन चुकी है। मंगलुरु में प्रस्तावित नया Strategic Oil Reserve इसी व्यापक बदलाव का संकेत है। आने वाले वर्षों में ऊर्जा नीति का मूल्यांकन केवल तेल खरीद से नहीं, ऐसे ही भंडारण ढांचों की क्षमता से भी किया जाएगा।

FAQs

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: सरकार नया इमरजेंसी ऑयल रिजर्व क्यों बना रही है?
उत्तर: अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान हुए तेल संकट ने यह दिखाया कि मौजूदा रणनीतिक भंडारण क्षमता को बढ़ाने की जरूरत है। इसी कारण नया इमरजेंसी रिजर्व बनाने का निर्णय लिया गया है।

प्रश्न 2: नया रणनीतिक तेल भंडार कहां बनाया जाएगा?
उत्तर: नया अंडरग्राउंड इमरजेंसी तेल भंडार कर्नाटक के मंगलुरु में बनाया जाएगा। यह भूमिगत संरचना के रूप में विकसित होगा।

प्रश्न 3: इस परियोजना पर कितना खर्च आने का अनुमान है?
उत्तर: पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 15,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें निर्माण और तेल भरने की लागत दोनों शामिल हैं।

प्रश्न 4: ONGC की इस परियोजना में क्या भूमिका होगी?
उत्तर: ONGC इस नए रिजर्व का निर्माण कराएगी। भूमिगत गुफा निर्माण पर लगभग 5,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी और तेल भरने के लिए अतिरिक्त निवेश भी करेगी।

प्रश्न 5: नया Strategic Oil Reserve कितनी क्षमता का होगा?
उत्तर: इस नई सुविधा में 1.28 लाख बैरल तेल रखा जा सकेगा। यह देश की कुल रणनीतिक भंडारण क्षमता को बढ़ाएगा।

प्रश्न 6: अभी भारत के पास कुल कितना रणनीतिक तेल भंडार है?
उत्तर: वर्तमान में भारत की कुल रणनीतिक क्रूड स्टोरेज क्षमता लगभग 3.9 करोड़ बैरल है, जिसका उपयोग आपात स्थिति में किया जाता है।

प्रश्न 7: भारत का मौजूदा रणनीतिक तेल भंडार कितने दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है?**
उत्तर: भारत रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल खपत करता है। इस हिसाब से मौजूदा रणनीतिक भंडारण लगभग 8-9 दिन की जरूरत पूरी कर सकता है।

प्रश्न 8: नया रिजर्व बनने के बाद कितना अतिरिक्त लाभ होगा?
उत्तर: सरकार के आकलन के अनुसार, नई सुविधा शुरू होने के बाद कुल क्षमता में करीब 33% का इजाफा होगा और आपातकालीन तेल सुरक्षा लगभग 11 दिन तक पहुंच सकती है।

प्रश्न 9: रणनीतिक और व्यावसायिक पेट्रोलियम भंडार में क्या फर्क है?
उत्तर: रणनीतिक भंडार सरकार इमरजेंसी के लिए रखती है और उसका उपयोग सामान्य दिनों में नहीं होता। व्यावसायिक भंडार तेल कंपनियां नियमित सप्लाई बनाए रखने के लिए रखती हैं।

प्रश्न 10: क्या यह तय हो चुका है कि नया भंडार सिर्फ इमरजेंसी के लिए होगा?
उत्तर: अभी यह स्पष्ट नहीं है। यह तय होना बाकी है कि यह सुविधा केवल आपातकालीन रिजर्व के रूप में काम करेगी या इसमें कुछ वाणिज्यिक गतिविधियां भी शामिल की जाएंगी।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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