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खाने-पीने के सामान महंगे, जून में थोक महंगाई 44 महीने के ऊंचे स्तर पर

अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो उत्पादक बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इससे आम लोगों को रोजमर्रा के सामान महंगे मिल सकते हैं।

Wholesale Inflation जून में बढ़कर 9.87% पर पहुंच गई है, जो 44 महीने का सबसे ऊंचा स्तर है। खाने-पीने की चीजों और रोजाना जरूरत के सामान के दाम बढ़ने से महंगाई का दबाव तेज हुआ है। रिटेल महंगाई भी लगातार छठे महीने बढ़कर 4.38% दर्ज की गई है।

Table of Contents

जून में महंगाई का बड़ा झटका

जून में थोक महंगाई दर यानी WPI बढ़कर 9.87% पर पहुंच गई। मई में यह 9.68% थी। यह 44 महीने में थोक महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई 10.70% तक पहुंची थी।

कॉमर्स मिनिस्ट्री ने 14 जुलाई को जून महीने के थोक महंगाई आंकड़े जारी किए। आंकड़ों से साफ है कि खाने-पीने की चीजों और रोजाना जरूरत के सामान ने महंगाई को ऊपर धकेला है।

आम परिवारों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि थोक बाजार में दाम बढ़ने का असर कुछ समय बाद खुदरा बाजार तक पहुंचता है। यानी आने वाले दिनों में कई जरूरी चीजों की कीमतों पर दबाव दिख सकता है।

Wholesale Inflation ने बढ़ाई चिंता

Wholesale Inflation में तेजी सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। इसका सीधा असर उत्पादन, कारोबार और उपभोक्ताओं पर पड़ता है। जब थोक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो कंपनियों और व्यापारियों की लागत बढ़ जाती है।

अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो उत्पादक बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इससे आम लोगों को रोजमर्रा के सामान महंगे मिल सकते हैं।

इस बार महंगाई बढ़ने की बड़ी वजह प्राइमरी आर्टिकल्स और फूड इंडेक्स में तेजी रही। रोजाना इस्तेमाल की चीजों के दाम बढ़े हैं। खाने-पीने के सामानों की महंगाई भी ऊपर गई है।

रोजाना जरूरत का सामान महंगा

प्राइमरी आर्टिकल्स यानी रोजाना जरूरत वाले सामानों की महंगाई जून में 7.00% पर पहुंच गई। मई में यह 4.99% थी। यह तेजी बताती है कि बुनियादी सामानों के दामों में मजबूत बढ़ोतरी हुई है।

प्राइमरी आर्टिकल्स में वे सामान शामिल होते हैं, जिनका इस्तेमाल सीधे या उत्पादन की शुरुआती प्रक्रिया में होता है। इनमें फूड आर्टिकल्स, नॉन-फूड आर्टिकल्स, मिनरल्स और क्रूड पेट्रोलियम जैसी श्रेणियां आती हैं।

फूड आर्टिकल्स में अनाज और सब्जियां जैसे सामान शामिल होते हैं। नॉन-फूड आर्टिकल्स में ऑयल सीड्स आते हैं। इन वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी से थोक महंगाई पर तेज असर पड़ता है।

फूड इंडेक्स भी ऊपर पहुंचा

खाने-पीने की चीजों की महंगाई जून में 6.14% पर पहुंच गई। मई में यह 4.49% थी। फूड इंडेक्स में आई यह तेजी आम लोगों की रसोई पर दबाव बढ़ा सकती है।

खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने पर इसका असर सबसे पहले घरों के मासिक बजट पर दिखता है। सब्जियां, अनाज, आलू, अदरक और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से आम उपभोक्ता की जेब पर सीधा असर पड़ता है।

रिटेल महंगाई में भी खाने-पीने की चीजों की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए फूड इंडेक्स का बढ़ना सिर्फ थोक बाजार की चिंता नहीं है। यह खुदरा बाजार के लिए भी संकेत देता है।

फ्यूल और पावर में राहत

जून के आंकड़ों में एक राहत फ्यूल और पावर से जुड़ी दिखी। फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर 30.33% से घटकर 27.41% हो गई। हालांकि यह दर अब भी ऊंचे स्तर पर है।

फ्यूल और पावर का असर परिवहन, उत्पादन और सप्लाई चेन पर पड़ता है। ईंधन महंगा होने पर माल ढुलाई की लागत बढ़ती है। इसका असर कई तरह के उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी से चल रहा तनाव कम नहीं होता है, तो ईंधन और संबंधित वस्तुओं की कीमतों पर आगे भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में महंगाई को नियंत्रित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर स्थिर रहा

मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई में जून में कोई बदलाव नहीं हुआ। यह 7.48% पर स्थिर रही। यह श्रेणी WPI में सबसे बड़ा हिस्सा रखती है, इसलिए इसका स्थिर रहना महत्वपूर्ण है।

मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स में फैक्ट्री से जुड़े सामान शामिल होते हैं। इनमें मेटल, केमिकल, प्लास्टिक और रबर जैसे उत्पादों की बड़ी भूमिका होती है।

थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का वेटेज सबसे ज्यादा होता है। इसलिए इस श्रेणी में तेज बदलाव कुल WPI पर बड़ा असर डाल सकता है।

Wholesale Inflation मापने का तरीका

Wholesale Inflation को होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी WPI से मापा जाता है। इसका मतलब उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है।

भारत में महंगाई मुख्य रूप से दो तरह से मापी जाती है। पहली रिटेल महंगाई और दूसरी थोक महंगाई। रिटेल महंगाई को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI कहा जाता है। यह आम ग्राहकों की तरफ से चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है।

WPI और CPI दोनों का असर अर्थव्यवस्था को समझने में अहम होता है। WPI उत्पादन और थोक स्तर की कीमतों का संकेत देता है। CPI आम उपभोक्ता की जेब पर असर दिखाता है।

WPI में किसका कितना वजन

थोक महंगाई मापने में अलग-अलग श्रेणियों को अलग-अलग वेटेज दिया जाता है। मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार इसमें मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का हिस्सा 63.75% बताया गया है।

प्राइमरी आर्टिकल्स जैसे फूड की हिस्सेदारी 22.62% है। फ्यूल एंड पावर की हिस्सेदारी 13.15% है। वहीं WPI के चार हिस्सों में प्राइमरी आर्टिकल का वेटेज 22.62%, फ्यूल एंड पावर का 13.15% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज 64.23% बताया गया है।

प्राइमरी आर्टिकल्स के चार हिस्से होते हैं। इनमें फूड आर्टिकल्स, नॉन-फूड आर्टिकल्स, मिनरल्स और क्रूड पेट्रोलियम शामिल हैं।

रिटेल महंगाई भी बढ़ी

थोक महंगाई के साथ रिटेल महंगाई भी लगातार बढ़ रही है। जून में रिटेल महंगाई 4.38% पर पहुंच गई। मई में यह 3.93% थी। जनवरी में रिटेल महंगाई 2.74% थी।

यह लगातार छठा महीना है जब रिटेल महंगाई बढ़ी है। आलू, अदरक और खाने-पीने की अन्य चीजों के दाम बढ़ने से खुदरा महंगाई पर दबाव बना है।

रिटेल महंगाई आम लोगों के लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है, क्योंकि यह सीधे उपभोक्ता की खरीदारी से जुड़ी होती है। घर का राशन, रसोई का खर्च, किराया, ईंधन और अन्य सेवाएं इसमें असर डालती हैं।

CPI में फूड की बड़ी भूमिका

रिटेल महंगाई यानी CPI में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86% है। हाउसिंग की हिस्सेदारी 10.07% है। इसके अलावा फ्यूल सहित कई अन्य आइटम्स भी CPI में शामिल होते हैं।

यही वजह है कि खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने पर रिटेल महंगाई तेजी से ऊपर जाती है। जब आलू, अदरक, सब्जियां और अनाज महंगे होते हैं, तो आम परिवार का खर्च तुरंत बढ़ता है।

रिटेल महंगाई का लगातार छह महीने बढ़ना नीति निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।

आम आदमी पर WPI का असर

थोक महंगाई का असर आम आदमी पर तुरंत नहीं, लेकिन धीरे-धीरे दिखता है। जब थोक कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो उत्पादक और व्यापारी अपनी लागत बढ़ने की बात कहते हैं।

इसके बाद वे कीमतें बढ़ाकर यह बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। इससे बाजार में सामान महंगे हो सकते हैं। खासकर वे उत्पाद जिनमें मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर या ईंधन लागत का बड़ा हिस्सा होता है।

लंबे समय तक ऊंची WPI उत्पादक सेक्टर पर भी असर डालती है। कारोबार की लागत बढ़ती है। मार्जिन पर दबाव आता है। अंत में यह उपभोक्ता कीमतों तक पहुंच सकता है।

Wholesale Inflation

सरकार के पास सीमित विकल्प

सरकार WPI को सीधे नियंत्रित नहीं कर सकती। इसके लिए उसके पास टैक्स और शुल्क जैसे कुछ साधन होते हैं। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की थी।

हालांकि टैक्स कटौती की भी सीमा होती है। सरकार हर बार और हर उत्पाद पर बड़े पैमाने पर टैक्स कम नहीं कर सकती। इससे राजस्व पर असर पड़ता है।

इसलिए महंगाई नियंत्रण में सप्लाई, अंतरराष्ट्रीय कीमतें, ईंधन लागत, उत्पादन लागत और मांग जैसे कई कारक मिलकर भूमिका निभाते हैं।

घरों के बजट पर दबाव

जून के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई का दबाव अब थोक और खुदरा दोनों स्तरों पर दिख रहा है। रोजाना की जरूरत का सामान महंगा हुआ है। फूड इंडेक्स बढ़ा है। रिटेल महंगाई भी ऊपर गई है।

इसका सबसे बड़ा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा खाने-पीने और जरूरी खर्चों पर जाता है। जब यही चीजें महंगी होती हैं, तो बचत कम होती है।

यदि आने वाले महीनों में खाद्य कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो घरेलू बजट पर दबाव और बढ़ सकता है।

आगे कीमतों पर नजर

अब नजर आने वाले महीनों के महंगाई आंकड़ों पर रहेगी। अगर खाद्य वस्तुओं और प्राइमरी आर्टिकल्स की कीमतों में नरमी आती है, तो WPI और CPI पर दबाव कम हो सकता है।

ईंधन और अंतरराष्ट्रीय तनाव से जुड़े संकेत भी अहम रहेंगे। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अगर जारी रहा, तो कीमतों पर नया दबाव बन सकता है।

फिलहाल जून के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि महंगाई का असर केवल थोक बाजार तक सीमित नहीं है। यह धीरे-धीरे घरों के बजट और आम लोगों की खरीद क्षमता से भी जुड़ रहा है।

  1. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जून में थोक महंगाई कितनी रही?

जून में थोक महंगाई दर 9.87% रही। मई में यह 9.68% थी।

जून की WPI महंगाई कितने महीने में सबसे ज्यादा है?

जून की थोक महंगाई 44 महीने में सबसे ज्यादा है। इससे पहले सितंबर 2022 में यह 10.70% रही थी।

रिटेल महंगाई जून में कितनी रही?

जून में रिटेल महंगाई 4.38% रही। मई में यह 3.93% और जनवरी में 2.74% थी।

फूड इंडेक्स की महंगाई कितनी हुई?

फूड इंडेक्स की महंगाई 4.49% से बढ़कर 6.14% पर पहुंच गई।

फ्यूल और पावर की महंगाई घटी या बढ़ी?

फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर 30.33% से घटकर 27.41% हो गई।

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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