8वीं पास कारोबारी ने मशीनों से बदली भुजिया इंडस्ट्री, ऐसे खड़ा हुआ बीकाजी एम्पायर Read it later

Bikaji Founder शिवरतन अग्रवाल की कहानी सिर्फ एक कारोबारी के निधन की खबर नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जिसने 8वीं तक की पढ़ाई के बाद भुजिया को हाथों के हुनर से मशीनों के दौर में पहुंचाकर एक स्थानीय कारोबार को राष्ट्रीय और फिर वैश्विक ब्रांड में बदल दिया।

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8वीं तक पढ़े शिवरतन अग्रवाल ने बनाया बीकाजी को देश-दुनिया का बड़ा नाम

बीकाजी के सीएमडी शिवरतन अग्रवाल का गुरुवार सुबह चेन्नई में हार्ट अटैक से निधन हो गया। वे 74 साल के थे। उनके निधन की खबर के साथ सिर्फ एक उद्योगपति को नहीं, बल्कि बीकानेर की कारोबारी पहचान के एक बड़े चेहरे को याद किया जा रहा है। बीकानेर में उन्हें उनके औपचारिक नाम से कम और ‘फन्ना बाबू’ के नाम से ज्यादा जाना जाता था। उनका व्यक्तित्व मस्तमौला था, दोस्ती निभाने वाला था, और कारोबार को लेकर उनकी सोच बहुत आगे की थी।

शिवरतन अग्रवाल ने 1986 में ‘शिवदीप प्रोडक्ट्स’ के नाम से अपनी कंपनी की शुरुआत की थी। बाद में 1993 में उन्होंने ‘बीकाजी’ ब्रांड लॉन्च किया, जो आगे चलकर देश के सबसे बड़े स्नैक ब्रांड्स में शामिल हो गया। 25 साल से ज्यादा कारोबारी अनुभव के दम पर उन्होंने इस कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज राजस्थान से शुरू हुआ यही कारोबार 13,430 करोड़ रुपये मार्केट कैप वाली बीकाजी फूड्स के रूप में खड़ा है। कंपनी भुजिया, नमकीन, पैकेज्ड मिठाइयां, पापड़ और कई तरह के स्नैक्स बनाती है, और बाजार में पेप्सिको जैसे बड़े ब्रांड्स को भी कड़ी टक्कर देती है।

शिवरतन अग्रवाल की सबसे बड़ी पहचान यही रही कि उन्होंने बहुत सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद एक ऐसा ब्रांड खड़ा किया, जो आज देश-विदेश में पहचाना जाता है। 8वीं तक पढ़ाई करने वाले इस कारोबारी ने सिर्फ भुजिया नहीं बेची, बल्कि भुजिया बेचने का तरीका बदल दिया। जहां एक दौर में यह उत्पाद हाथ से बनने वाला स्थानीय स्वाद था, वहीं शिवरतन ने उसे मशीनों, आधुनिक पैकेजिंग और लंबी शेल्फ लाइफ के सहारे बड़े पैमाने के कारोबार में बदल दिया।

बीकानेर में ‘फन्ना बाबू’ नाम से थी अलग पहचान

Bikaji Founder शिवरतन अग्रवाल के करीबी रामकुमार पुरोहित बताते हैं कि बीकानेर शहर के परकोटे में अगर किसी से शिवरतन अग्रवाल का नाम पूछा जाए तो हो सकता है कुछ लोग तुरंत न पहचानें, लेकिन ‘फन्ना बाबू’ नाम लेते ही लोग उन्हें पूरे अपनत्व के साथ याद करेंगे। यही उनकी असली पहचान थी।

वे कारोबार में जितने तेज थे, निजी जीवन में उतने ही मिलनसार माने जाते थे। दोस्तों के साथ होली की मस्ती हो, शहर में गोठ करनी हो या बैठकी का माहौल बनाना हो, वे सबसे आगे रहते थे। यही कारण था कि उनका दायरा सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं था। लोग उन्हें उद्योगपति के साथ-साथ अपनेपन वाले इंसान के रूप में भी याद करते हैं।

भाइयों से अलग रास्ता चुना, फिर बीकाजी को नई पहचान दी

शिवरतन अग्रवाल ने 1986 में अपने तीन भाइयों से अलग होकर अपना रास्ता चुना। शिवकिसन अग्रवाल, मनोहर लाल अग्रवाल और मधु अग्रवाल ने हल्दीराम नाम से भुजिया का ब्रांड स्थापित किया था। वहीं शिवरतन ने अपने हिस्से की नई शुरुआत ‘शिवदीप फूड्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ के नाम से की। बाद में 1993 में इसका नाम बदलकर ‘बीकाजी’ कर दिया गया, जो बीकानेर शहर के संस्थापक राव बीका के नाम से प्रेरित था।

यहीं से उनकी अलग कारोबारी पहचान बननी शुरू हुई। उस वक्त बहुत से लोगों ने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी फैक्ट्री लगाकर भुजिया आखिर कहां बेची जाएगी। लेकिन शिवरतन अग्रवाल ने जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चुना, वही आगे चलकर उनके ब्रांड की सबसे बड़ी ताकत बना।

8वीं पास कारोबारी ने भुजिया इंडस्ट्री का तरीका बदल दिया

Bikaji Founder शिवरतन अग्रवाल की सोच परंपरा से जुड़ी जरूर थी, लेकिन वे पुराने तरीके से चिपककर रहने वाले कारोबारी नहीं थे। उस दौर में भुजिया बड़े पैमाने पर हाथ से बनाई जाती थी। यह स्थानीय स्तर पर सफल मॉडल था, लेकिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विस्तार के लिए पर्याप्त नहीं था।

यहीं शिवरतन ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने मशीनों के इस्तेमाल की शुरुआत की। इसके लिए वे विदेशों तक गए और फिर भारत में पहली ऑटोमेटेड भुजिया फैक्ट्री स्थापित की। यह कदम केवल तकनीक अपनाने भर का नहीं था, बल्कि पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदलने वाला था।

उन्होंने यह समझ लिया था कि अगर बीकानेर की भुजिया को देश और दुनिया तक पहुंचाना है तो सिर्फ स्वाद काफी नहीं होगा। उत्पादन तेज होना चाहिए, गुणवत्ता स्थिर होनी चाहिए, और पैकेजिंग ऐसी होनी चाहिए कि प्रोडक्ट ज्यादा समय तक सुरक्षित रहे। इसी सोच ने बीकाजी को स्थानीय से राष्ट्रीय और फिर वैश्विक ब्रांड की दिशा दी।

पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ ने खोले विदेशों के दरवाजे

किसी भी खाद्य उत्पाद को देश से बाहर भेजने के लिए सिर्फ उसका स्वाद नहीं, उसकी स्थिरता भी महत्वपूर्ण होती है। शिवरतन अग्रवाल ने इस बात को बहुत पहले समझ लिया था। उन्होंने आधुनिक पैकेजिंग पर जोर दिया और उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने का काम किया।

यह कदम निर्णायक साबित हुआ। इससे बीकाजी के उत्पाद लंबी दूरी की सप्लाई चेन में टिकने लगे। भारत के अलग-अलग राज्यों से आगे बढ़कर बीकाजी ने विदेशों में भी जगह बनानी शुरू कर दी। आज यह बात सामान्य लग सकती है, लेकिन उस दौर में भुजिया जैसे पारंपरिक उत्पाद को वैश्विक बाजार के लिए तैयार करना बहुत बड़ी सोच की मांग करता था।

यही वजह है कि 8वीं तक पढ़े शिवरतन अग्रवाल को सिर्फ एक सफल व्यापारी नहीं, बल्कि फूड प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग की दिशा समझने वाला दूरदर्शी उद्यमी भी माना जाता है।

1994 से शुरू हुआ विदेशों का सफर, अब 30 से ज्यादा देशों तक पहुंच

बीकाजी का अंतरराष्ट्रीय सफर साल 1994 में संयुक्त अरब अमीरात से शुरू हुआ। इसके बाद 1996 में ऑस्ट्रेलिया में भी निर्यात शुरू हो गया। धीरे-धीरे दूसरे देशों से मांग आने लगी और ब्रांड का दायरा बढ़ता गया।

आज बीकाजी फूड्स 30 से ज्यादा देशों तक पहुंच चुका है। गल्फ देशों में बीकानेरी भुजिया की खास मांग बताई जाती है। इसके अलावा अमेरिका, जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, रूस, नेपाल, न्यूजीलैंड, कनाडा, कतर, यूनाइटेड अरब अमीरात, बहरीन और नॉर्वे जैसे बाजारों तक भी यह पहुंच बना चुका है।

एक समय जिन लोगों ने पूछा था कि इतनी बड़ी फैक्ट्री लगाकर भुजिया कहां बेचोगे, उनके सवाल का जवाब अब दुनिया के कई देशों में मौजूद बीकाजी के पैकेट दे रहे हैं।

दोस्तों के लिए शोरूम बिना शर्त छोड़ देना भी उनकी अलग पहचान थी

Bikaji Founder शिवरतन अग्रवाल का कारोबार केवल मुनाफे के हिसाब से नहीं चलता था, इसमें रिश्तों की जगह भी बहुत बड़ी थी। बीकानेर में वे अपने शोरूम खुद के स्तर पर चलाने में सक्षम थे, लेकिन उन्होंने यह अवसर अपने दोस्तों और परिचितों को दिया।

नत्थूसर गेट, जस्सूसर गेट, जयपुर रोड, जयनारायण व्यास कॉलोनी और यहां तक कि श्रीगंगानगर जैसे इलाकों में भी उन्होंने शोरूम देने के लिए सख्त शर्तें नहीं रखीं। कई शोरूम बिना किसी औपचारिकता के दोस्तों और पहचान वालों को चलाने के लिए सौंप दिए गए।

यह बात बताती है कि उनके लिए कारोबार सिर्फ विस्तार का विषय नहीं था, भरोसे का भी था। यही कारण है कि उनके निधन के बाद लोग उन्हें सिर्फ बीकाजी के मालिक के रूप में नहीं, बल्कि दोस्ती निभाने वाले बड़े दिल वाले व्यक्ति के रूप में याद कर रहे हैं।

Bikaji Founder

आज 250 से ज्यादा उत्पाद, 8 लाख दुकानदार और देशभर में आउटलेट्स

बीकाजी आज सिर्फ भुजिया तक सीमित ब्रांड नहीं है। कंपनी 250 से ज्यादा उत्पाद बनाती है। इनमें नमकीन के साथ मिठाई, चिप्स, पापड़ और बेकरी आइटम भी शामिल हैं।

आज करीब 8 लाख दुकानदार बीकाजी भुजिया बेच रहे हैं। कंपनी के आउटलेट्स की संख्या लगातार बढ़ती गई। इन आउटलेट्स की डिजाइन तक खुद बीकाजी ग्रुप तैयार करता है। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में इसके कई आउटलेट्स हैं। नई दिल्ली, मुंबई और जयपुर में इनकी संख्या सबसे ज्यादा बताई जाती है। कई इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स, खासकर हैदराबाद जैसे एयरपोर्ट पर भी बीकाजी के आउटलेट्स मौजूद हैं।

यानी बीकानेर से निकला यह ब्रांड अब सिर्फ क्षेत्रीय पहचान नहीं, राष्ट्रीय बाजार की स्थायी मौजूदगी बन चुका है। इसके पीछे जो विजन था, उसका केंद्र शिवरतन अग्रवाल ही थे।

Bikaji Founder, Shiv Ratan Agarwal

फोर्ब्स सूची तक पहुंचे, लेकिन बीकानेर में ‘फन्ना बाबू’ ही रहे

साल 2024 में शिवरतन अग्रवाल को फोर्ब्स की वर्ल्ड बिलेनियर सूची में शामिल किया गया था। इस सूची में वे टॉप-25 भारतीयों में शामिल थे और 14वें स्थान पर थे। यह उपलब्धि उनके कारोबारी साम्राज्य के पैमाने को दिखाती है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी वैश्विक पहचान के बावजूद बीकानेर में वे ‘फन्ना बाबू’ ही बने रहे। यही दोहरी पहचान उन्हें अलग बनाती है—एक ओर वैश्विक सूची में जगह बनाने वाला उद्योगपति, दूसरी ओर अपने शहर में दोस्तों का हमसफर और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ व्यक्ति।

उनके निधन के बाद फैक्ट्री में प्रोडक्शन और सप्लाई रोकी गई

शिवरतन अग्रवाल के निधन के बाद बीकानेर के करणी और बीछवाल इंडस्ट्रियल एरिया में बनी फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन अस्थायी रूप से रोक दिया गया है। सप्लाई भी फिलहाल रोक दी गई है।

करणी की फैक्ट्री में रोजाना 800 टन का प्रोडक्शन होता है। इसमें 150 टन से ज्यादा भुजिया का उत्पादन शामिल है। बाकी हिस्से में मिठाई, चिप्स, पापड़ और बेकरी आइटम तैयार किए जाते हैं।

यह प्रोडक्शन ठहरना सिर्फ एक कारोबारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस शख्सियत को श्रद्धांजलि जैसा भी देखा जा रहा है, जिसने इस साम्राज्य की बुनियाद रखी थी। इतने बड़े पैमाने की इकाई का कुछ समय के लिए थम जाना खुद इस बात का संकेत है कि कंपनी और उससे जुड़े लोग इस क्षति को कितना बड़ा मान रहे हैं।

बीकाजी एम्पायर सिर्फ कारोबार नहीं, विजन की कहानी है

शिवरतन अग्रवाल की कहानी का सबसे बड़ा सार यही है कि सीमित औपचारिक शिक्षा किसी बड़े कारोबारी विजन की राह नहीं रोकती। 8वीं तक पढ़े इस व्यक्ति ने यह समझ लिया था कि स्वाद को ब्रांड में बदलना है, ब्रांड को बाजार में बदलना है, और बाजार को दुनिया तक ले जाना है।

उन्होंने उत्पादन बढ़ाया, मशीनें लगाईं, पैकेजिंग बदली, वितरण फैलाया, आउटलेट्स खड़े किए, अंतरराष्ट्रीय बाजार खोले और लोगों को साथ लेकर चले। यह सब केवल पूंजी से नहीं होता, इसके लिए सोच, जोखिम लेने की क्षमता और बाजार की धड़कन समझने की जरूरत होती है।

शिवरतन अग्रवाल का निधन बीकानेर, राजस्थान और भारतीय खाद्य उद्योग के लिए बड़ी क्षति है। लेकिन उनकी विरासत सिर्फ शोक की खबर नहीं, प्रेरणा की कहानी भी है। 8वीं तक पढ़े एक कारोबारी ने दिखाया कि अगर नजर दूर तक हो तो भुजिया जैसा पारंपरिक उत्पाद भी वैश्विक ब्रांड बन सकता है।

‘फन्ना बाबू’ के नाम से पहचाने जाने वाले शिवरतन अग्रवाल ने बीकाजी को केवल एक कंपनी नहीं, एक एम्पायर बनाया। मशीनों से लेकर पैकेजिंग तक, शोरूम से लेकर विदेशों तक, और दोस्ती से लेकर व्यवसाय तक—हर स्तर पर उन्होंने अलग छाप छोड़ी। आज उनके जाने के बाद बीकाजी का नाम जितना बड़ा दिखता है, उतना ही बड़ा उस सोच का कद भी दिखता है जिसने इसे खड़ा किया था।

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