Lalu Family Rift Sanjay Yadav: बिहार चुनाव हार के बाद लालू परिवार में बड़ी उथल‑पुथल Read it later

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Lalu Family Rift Sanjay Yadav की चर्चा जोर पकड़ रही है। Rohini Acharya ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वे राजनीति छोड़ रही हैं और अपने परिवार से नाता तोड़ रही हैं। उन्होंने दो नाम लिए — Sanjay Yadav और Rameez — जिन पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने पार्टी की रणनीति और परिवार के भीतर निर्णय‑प्रक्रिया को अपने हाथ में ले रखा था।

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रोहिणी का ने कहा,— “सवाल पूछोगे तो गाली, चप्पल से मारा जाएगा”

रोहिणी ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: “मैं राजनीति छोड़ रही हूँ और अपने परिवार से नाता तोड़ रही हूँ। संजय और रमीज़ ने मुझसे यही करने को कहा था और मैं सारा दोष अपने ऊपर ले रही हूँ।” उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने पार्टी हारने के कारणों पर सवाल उठाए, तो उन्हें गाली‑चप्पल से धमकाया गया, अपमानित किया गया और घर से निकालने की धमकी दी गई।

कौन हैं संजय यादव — तेजस्वी के करीबी सलाहकार

संजय यादव राज्यसभा सांसद और Tejashwi Yadav के रणनीतिक सहायक माने जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2025 के बिहार चुनाव में टिकट वितरण, सोशल‑मीडिया रणनीति और गठबंधन संवाद जैसे महत्वपूर्ण फैसले उन्होंने लिए थे। अब इस हार की जिम्मेदारी लेकर परिवार के कुछ सदस्य उनसे नाराज दिख रहे हैं।

संजय यादव: आईटी प्रोफेशनल से बने RJD की रणनीति के मास्टरमाइंड Sanjay Yadav की कहानी सिर्फ एक राजनीतिक सलाहकार बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक IT इंजीनियर से बिहार की राजनीति के सबसे ताकतवर रणनीतिकार बनने की दिलचस्प यात्रा है। हरियाणा के गांव से निकला रणनीतिकार हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नंगल सिरोही गांव से आने वाले संजय यादव ने Computer Science में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनकी कुल संपत्ति करीब 2.18 करोड़ रुपए है। वे कभी एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में काम करते थे, लेकिन 2013 में सबकुछ छोड़कर पटना चले आए। क्रिकेट मैदान से शुरू हुई तेजस्वी से दोस्ती संजय और तेजस्वी यादव की मुलाकात साल 2012 के आसपास दिल्ली के एक cricket ground पर हुई थी। तब तेजस्वी क्रिकेट खेलते थे और राजनीति में सक्रिय नहीं थे। लेकिन 2013 में जब लालू यादव जेल गए तो तेजस्वी पटना लौटे और राजनीति की ABCD सीखनी शुरू की। उसी दौरान उन्होंने अपने दोस्त संजय को भी बुला लिया। किताबों और भाषणों से तेजस्वी को सिखाया राजनीतिक हुनर सीनियर पत्रकार संतोष सिंह ने अपनी किताब ‘जेपी टू बीजेपी: बिहार आफ्टर लालू एंड नीतीश’ में लिखा है कि संजय ने तेजस्वी को समाजवादी विचारधारा की किताबें पढ़ने को प्रेरित किया। उन्होंने तेजस्वी को अटल बिहारी वाजपेयी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, मायावती, कांशीराम और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे नेताओं के भाषण दिखाए ताकि वे effective political communication सीख सकें। आरजेडी में डिजिटल बदलाव लाने वाले शख्स पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रियदर्शी रंजन के मुताबिक, बिहार आकर संजय ने शुरू में यहां की राजनीति को नजदीक से समझा। उन्होंने election data analysis, सोशल मीडिया रणनीति और डिजिटल बदलाव के जरिए आरजेडी की छवि को युवाओं में लोकप्रिय बनाया। पार्टी के चुनाव अभियान में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उन्हीं के नेतृत्व में बढ़ा। अब तेजस्वी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार आज संजय यादव सिर्फ सलाहकार नहीं हैं, बल्कि तेजस्वी यादव के सबसे करीबी रणनीतिकार हैं। पार्टी की रणनीति से लेकर डिजिटल प्रचार तक, हर मोर्चे पर उनका असर दिखता है। यही वजह है कि अब लालू परिवार में उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर असंतोष की आवाजें भी तेज़ होती जा रही हैं।

संजय यादव: आईटी प्रोफेशनल से बने RJD की रणनीति के मास्टरमाइंड

Sanjay Yadav की कहानी सिर्फ एक राजनीतिक सलाहकार बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक IT इंजीनियर से बिहार की राजनीति के सबसे ताकतवर रणनीतिकार बनने की दिलचस्प यात्रा है।

हरियाणा के गांव से निकला रणनीतिकार

हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नंगल सिरोही गांव से आने वाले संजय यादव ने Computer Science में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनकी कुल संपत्ति करीब 2.18 करोड़ रुपए है। वे कभी एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में काम करते थे, लेकिन 2013 में सबकुछ छोड़कर पटना चले आए।

क्रिकेट मैदान से शुरू हुई तेजस्वी से दोस्ती

संजय और तेजस्वी यादव की मुलाकात साल 2012 के आसपास दिल्ली के एक cricket ground पर हुई थी। तब तेजस्वी क्रिकेट खेलते थे और राजनीति में सक्रिय नहीं थे। लेकिन 2013 में जब लालू यादव जेल गए तो तेजस्वी पटना लौटे और राजनीति की ABCD सीखनी शुरू की। उसी दौरान उन्होंने अपने दोस्त संजय को भी बुला लिया।

किताबों और भाषणों से तेजस्वी को सिखाया राजनीतिक हुनर

सीनियर पत्रकार संतोष सिंह ने अपनी किताब ‘जेपी टू बीजेपी: बिहार आफ्टर लालू एंड नीतीश’ में लिखा है कि संजय ने तेजस्वी को समाजवादी विचारधारा की किताबें पढ़ने को प्रेरित किया। उन्होंने तेजस्वी को अटल बिहारी वाजपेयी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, मायावती, कांशीराम और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे नेताओं के भाषण दिखाए ताकि वे effective political communication सीख सकें।

आरजेडी में डिजिटल बदलाव लाने वाले शख्स

पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रियदर्शी रंजन के मुताबिक, बिहार आकर संजय ने शुरू में यहां की राजनीति को नजदीक से समझा। उन्होंने election data analysis, सोशल मीडिया रणनीति और डिजिटल बदलाव के जरिए आरजेडी की छवि को युवाओं में लोकप्रिय बनाया। पार्टी के चुनाव अभियान में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उन्हीं के नेतृत्व में बढ़ा।

अब तेजस्वी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार

आज संजय यादव सिर्फ सलाहकार नहीं हैं, बल्कि तेजस्वी यादव के सबसे करीबी रणनीतिकार हैं। पार्टी की रणनीति से लेकर डिजिटल प्रचार तक, हर मोर्चे पर उनका असर दिखता है। यही वजह है कि अब लालू परिवार में उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर असंतोष की आवाजें भी तेज़ होती जा रही हैं।

तेज प्रताप से लेकर रोहिणी तक – टूटे रिश्ते का सिलसिला

इस साल 25 मई को Tej Pratap Yadav को पार्टी और परिवार से छह वर्ष के लिए बाहर किया गया था। उन्होंने भी संजय यादव को “जयचंद” कहकर आरोपित किया था कि उन्होंने RJD को खोखला किया। अब रोहिणी ने भी खुलकर कहा है कि उनका कोई परिवार नहीं है, प्रश्न पूछना हो तो तेजस्वी और संजय से पूछिए।

RJD को 2020 की 75 सीटों से घटकर सिर्फ 25 सीटें मिलीं

2020 में RJD ने 75 सीटें जीती थीं, लेकिन 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को मात्र 25 सीटें हासिल हुई हैं। यह हार रणनीतिक त्रुटियों, गठबंधन टूटने और आंतरिक कलह का परिणाम मानी जा रही है। नतीजों के बाद पार्टी व परिवार दोनों में सवाल उठने लगे हैं कि असली नेतृत्व किसका है।

राजनीतिक और पारिवारिक दोनों मोर्चों पर उठी बेचैनी

रोहिणी के बाद परिवार के कई सदस्यों ने सोशल‑मीडिया पर अपने रिश्तों की दूरी दिखानी शुरू कर दी है। उन्होंने पहले अपने भाई, फिर परिवार के अन्य सदस्यों को अन‑फॉलो किया। राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि यह कलह सिर्फ परिवार‑व्यक्तिगत नहीं, बल्कि RJD के अंदरूनी शक्ति‑संगठन में बदलाव की दस्तक है।

आगे क्या? RJD की राजनीति में नया समीकरण

विश्लेषकों का कहना है कि लालू परिवार में खुला विद्रोह RJD के आने वाले समय को चुनौतीपूर्ण बनाएगा। अगर संजय और रमीज़ का प्रभाव कायम रहता है, तो परिवार‑संगठन के भीतर अशांति बनी रहेगी। दूसरी ओर, तेजस्वी को अब परिवार के साथ-साथ संगठन को भी नियंत्रित करना होगा, वरना गठबंधन टूटने का असर फिर कभी रूप ले सकता है।

संजय यादव के तेजस्वी की फ्रंट सीट पर बैठने से विवाद तेज

Lalu Family Rift Sanjay Yadav

लालू परिवार में जारी तनाव की शुरुआत उस पोस्ट से मानी जा रही है, जो 18 सितंबर को रोहिणी आचार्य ने अपने फेसबुक अकाउंट पर शेयर किया था। यह पोस्ट RJD समर्थक Alok Kumar का था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि तेजस्वी यादव की गाड़ी या यात्रा के दौरान front seat पर हमेशा लालू प्रसाद या तेजस्वी ही दिखते थे, लेकिन अब उनकी जगह किसी और—यानी Sanjay Yadav—का बैठना “अस्वीकार्य” है।

पोस्ट के साथ संलग्न फोटो में Bihar Adhikar Yatra की बस की दाईं ओर की फ्रंट सीट पर संजय यादव बैठे दिखे। पोस्ट में लिखा था कि कुछ लोग जिस “द्वितीय श्रेणी” के व्यक्ति में “रणनीतिकार-सलाहकार” देखते हैं, यह सभी की पसंद नहीं है।

रोहिणी ने पोस्ट तो बिना कमेंट शेयर किया, लेकिन विवाद बढ़ गया

हालांकि रोहिणी ने पोस्ट शेयर करते समय कुछ लिखा नहीं, मगर इसका राजनीतिक संकेत साफ समझा गया। इसके बाद मीडिया में यह चर्चा तेज हो गई कि परिवार के भीतर असंतोष गहरा रहा है और पार्टी संचालन पर सवाल हैं।

परिवार को अनफॉलो करने से मिली फूट की खबरों को और हवा

अगले ही दिन, 19 सितंबर को रोहिणी आचार्य ने अपने X (Twitter) अकाउंट से RJD, लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी सहित परिवार के सभी सदस्यों को unfollow कर दिया। इसके बाद “Lalu Family Rift” और “Sanjay Yadav” को लेकर विवाद और भी गहरा गया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसे बड़े पारिवारिक मतभेद का संकेत माना गया।

आखिर राजद में किसकी चलेगी? संगठन या सलाहकार?

राजद (RJD) के अंदर मचे राजनीतिक घमासान के बीच बड़ा सवाल उठ रहा है कि पार्टी का संचालन संविधान और पदाधिकारियों से होगा या फिर रणनीतिक सलाहकारों के इशारे पर? पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद Lalu Prasad Yadav हैं, प्रदेश अध्यक्ष और संगठनात्मक ढांचा भी मौजूद है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संजय यादव को किसी पदाधिकारी को resignation मांगने का अधिकार है?

रोहिणी को तेज प्रताप का समर्थन महंगा पड़ा?

राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या रोहिणी आचार्य द्वारा अपने बड़े भाई Tej Pratap Yadav को चुनाव में जीतने का आशीर्वाद देना ही पार्टी विरोधी गतिविधि समझा गया? क्या Mahua सीट पर समीकरण बिगाड़ने का आरोप लगाकर उनसे इस्तीफा मांगा गया?

क्या मौखिक तौर पर दिया गया इस्तीफे का फरमान?

मीडिया और पार्टी सूत्रों की मानें तो रोहिणी पर इस्तीफा देने का जो दबाव बना, वह मौखिक रूप से संजय यादव या रमीज के माध्यम से आया। इस दबाव के चलते ही रोहिणी ने राजनीति छोड़ने और परिवार से नाता तोड़ने का ऐलान किया।

संवेदनशील छवि और पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा में

राजनीतिक हलकों में Rohini Acharya को संवेदनशील और प्रतिक्रियावादी माना जाता रहा है। इससे पहले भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तीखे सोशल मीडिया पोस्ट कर चुकी हैं। अब सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी उनकी सक्रियता को नियंत्रण में रखना चाहती है?

संजय यादव की बढ़ती ताकत से परिवार में बढ़ी नाराजगी

राजद (RJD) में इस वक्त जिस मुद्दे ने अंदरूनी भूचाल ला दिया है, वह है Sanjay Yadav की बढ़ती राजनीतिक पकड़। कहा जा रहा है कि Lalu Prasad Yadav ने जैसे ही Tejashwi Yadav को पार्टी संचालन में फ्री हैंड दिया, वैसे ही संजय यादव का असर हर स्तर पर दिखने लगा।

हर फैसले में संजय की भूमिका

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि तेजस्वी यादव की चुनावी रणनीति से लेकर मीडिया में बयान, सोशल मीडिया की गतिविधियां और यहां तक कि किससे मिलना है, किसे दूर रखना है—ये सब कुछ संजय यादव तय करते हैं। यानी पार्टी में अब एक तरह से ‘अनदेखा पावर सेंटर’ तैयार हो गया है।

रोहिणी और तेज प्रताप दोनों असहमति जता चुके

Rohini Acharya ने हाल ही में किए गए पोस्ट और बयानों में सीधे संजय यादव का नाम लिए बिना उनके प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, तेज प्रताप यादव पहले ही खुलकर विरोध जता चुके हैं। वे संजय यादव को ‘जयचंद’ कहकर संबोधित करते हैं, जो दर्शाता है कि परिवार के भीतर उनका विरोध कितना गहरा है।

परिवार बनाम सलाहकार की लड़ाई

तेजस्वी के करीबी माने जाने वाले संजय यादव की मौजूदगी और भूमिका से अब सवाल उठने लगे हैं कि RJD में अब फैसले पार्टी के परंपरागत ढांचे से लिए जा रहे हैं या सलाहकारों की मंडली से? यही अंतर्विरोध अब परिवार में फूट और पार्टी में असंतोष का बड़ा कारण बनता जा रहा है।

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1 Comment

  1. मुलताई में कुछ बैंक, कुछ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना पार्किंग के संचालित हो रहे हैं, तथा कुछ लोगों ने पार्किंग के लिए जगह बहुत कम दी है। जो वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त नहीं है। इससे ग्राहको को वाहन खड़े करने में बहुत परेशानी होती है। आखिर बिना पार्किंग के बैंक कैसे संचालित हो रहे हैं। ये तो नियमों का उल्लघंन हो रहा है। सड़क किनारे वाहन खड़े करने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। कई बार दुर्घटना तक हो जाती है। सरकारी जमीन पर वाहन खड़े हो रहे हैं । जबकि जिस भवन मे बैंक संचालित होती है उसकी स्वयं की पार्किंग होना जरूरी है। मुलताई में संचालित सभी बैंकों की पार्किंग व्यवस्था की जांच होना चाहिए।
    कुछ बेसमेंट बिना अनुमति के बने हैं। कुछ व्यावसायिक भवनों के नक्शे बिना पार्किंग दिए पास हुए हैं। कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का अतिक्रमण कर लिया है। जांच होना चाहिए।
    नाम – रवि खवसे
    शहर – मुलताई
    जिला – बैतूल
    राज्य – मध्यप्रदेश