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Welcome To The Jungle Review: 5 वजहें, क्यों यह फिल्म हंसाती भी है और खींचती भी है

फिल्म को उसी मूड में देखा जाए, जिस मूड में इसे बनाया गया है। अगर दर्शक लॉजिक ढूंढने बैठ जाएगा, तो कई जगह फिल्म हाथ से निकल जाएगी। अगर वह केवल हंसने के लिए बैठा है, तो फिल्म काफी कुछ दे जाती है।

Welcome To The Jungle Review सीधा यही कहता है कि यह फिल्म लॉजिक से ज्यादा हंसी पर चलती है। अक्षय कुमार, रवीना टंडन, सुनील शेट्टी और परेश रावल से सजी यह कॉमेडी कई जगह बिखरती है, लेकिन मनोरंजन का स्तर लगातार बनाए रखती है।

फिल्म का सीधा मूड

‘वेलकम टू द जंगल’ ऐसी फिल्म है, जो शुरुआत में ही अपना इरादा साफ कर देती है। यह तर्क से नहीं, तमाशे से चलती है। यहां हर कुछ मिनट में नया चेहरा आता है, नई गड़बड़ी होती है और नई कॉमेडी शुरू हो जाती है। फिल्म खुद को बहुत गंभीर नहीं लेती। यही इसकी ताकत भी है।

Welcome To The Jungle Review का सबसे साफ निष्कर्ष यही है कि फिल्म को उसी मूड में देखा जाए, जिस मूड में इसे बनाया गया है। अगर दर्शक लॉजिक ढूंढने बैठ जाएगा, तो कई जगह फिल्म हाथ से निकल जाएगी। अगर वह केवल हंसने के लिए बैठा है, तो फिल्म काफी कुछ दे जाती है।

यह बात फिल्म के पहले हिस्से से ही समझ में आने लगती है।

कहानी का बड़ा सेटअप

फिल्म की कहानी बड़े कारोबारी सिन्हा से शुरू होती है। उसे पता चलता है कि सरकार बदलने के बाद उसका काला धन जांच एजेंसियों के रडार पर आ सकता है। उसका निजी सचिव दुबे उसे सलाह देता है कि यह पैसा एक फ्लॉप फिल्म बनाने में लगा दिया जाए। वजह सीधी है। फिल्म निर्माण ऐसा रास्ता बन सकता है, जहां यह पैसा खपाया जा सके।

यहीं से फिल्म की मुख्य कॉमिक मशीन चालू होती है। दो नाकाम निर्देशक देव और दास, फ्लॉप अभिनेता राजीव, कमजोर नजर वाला छायाकार और कई अजीबोगरीब किरदार एक साथ आते हैं। यह टोली फिल्म बनाने निकलती है, लेकिन मामला सिर्फ फिल्म बनाने तक नहीं रुकता।

यहीं से ‘वेलकम टू द जंगल’ अपनी असली दुनिया बनाना शुरू करती है।

जुगाड़ वाला प्लॉट

कहानी का दूसरा बड़ा मोड़ तब आता है, जब सिन्हा के घर पर छापा पड़ जाता है। उसकी अवैध संपत्ति जब्त हो जाती है। अब उसके पास आखिरी उम्मीद उसी फिल्म पर बचती है। वह दुबे को आदेश देता है कि बिना अतिरिक्त बजट के एक ही दिन में फिल्म पूरी करनी होगी।

यही फिल्म का जुगाड़ वाला हिस्सा है। टीम बॉर्डर से लगे आजादगंज गांव पहुंचती है। यहां कहानी पूरी तरह नए ट्रैक पर चली जाती है। गांव वाले इस फिल्मी टोली को भारतीय सेना समझ लेते हैं, क्योंकि वे आतंकी सरगना जतारा के अत्याचार से परेशान हैं।

यहां से फिल्म सिर्फ बेतुकी कॉमेडी नहीं रहती। इसमें हल्का भावनात्मक मोड़ भी आता है। हालांकि फिल्म इस हिस्से में भी अपने मूल रंग से बाहर नहीं जाती। कॉमेडी जारी रहती है।

Welcome To The Jungle Review का कहानी वाला फैसला

कहानी बहुत मजबूत नहीं है। यह साफ बात है। फिल्म में कई जगह घटनाएं सिर्फ अगला मजाक खड़ा करने के लिए होती हैं। कई दृश्य ऐसे हैं, जहां पटकथा तर्क के बजाय शोर और हरकतों से काम चलाती है। लेकिन यह भी सच है कि फिल्म अपनी कहानी को बहुत गंभीर सामाजिक ड्रामा की तरह बेचने की कोशिश नहीं करती।

Welcome To The Jungle Review के लिहाज से यह जरूरी बिंदु है। फिल्म की कहानी का उद्देश्य सटीक यथार्थ नहीं, लगातार हलचल पैदा करना है। कई दर्शक इसी वजह से इसे पसंद करेंगे। कई दर्शकों को इसी वजह से दिक्कत भी होगी।

फिल्म के क्लाइमैक्स में यह बात और साफ हो जाती है। टीम गांव वालों को जतारा से कैसे बचाती है, यही अंतिम हिस्से का आधार है। यहां तर्क और पीछे छूट जाता है। लेकिन फिल्म चाहती भी यही है कि दर्शक उस समय बस मजे ले।

अक्षय कुमार सबसे बड़ा प्लस

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष अक्षय कुमार हैं। वह अपने पुराने कॉमिक अंदाज में लौटे दिखते हैं। उनके चेहरे का नियंत्रण, संवादों की रफ्तार, खुद पर तंज करने की शैली और हल्की बेवकूफी वाला स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को उठाता है।

अक्षय की कॉमिक टाइमिंग इस फिल्म की रीढ़ है। कई दृश्य ऐसे हैं, जहां संवाद सामान्य हैं, लेकिन उनकी डिलीवरी उन्हें मजेदार बना देती है। कुछ जगह उन्होंने खुद अपनी स्टार छवि का मजाक उड़ाया है। वही दृश्य सबसे ज्यादा असर छोड़ते हैं।

Welcome To The Jungle Review में अगर एक अभिनेता को सबसे ज्यादा क्रेडिट दिया जाए, तो वह अक्षय कुमार ही होंगे। फिल्म की भीड़ में भी वह केंद्र में बने रहते हैं।

रवीना-अक्षय की जोड़ी का असर

फिल्म का सबसे भावनात्मक और यादगार आकर्षण रवीना टंडन और अक्षय कुमार की जोड़ी है। रवीना का स्क्रीन टाइम बहुत लंबा नहीं है, लेकिन जितना है, उतना असरदार है। वह आते ही दर्शक का ध्यान खींच लेती हैं।

सालों बाद दोनों को साथ देखना कई दर्शकों के लिए फिल्म का सबसे बड़ा बोनस बन सकता है। उनकी केमिस्ट्री में पुरानी स्क्रीन यादों की चमक दिखती है। फिल्म इस भावनात्मक जुड़ाव का फायदा उठाती भी है।

सीधी बात यह है कि रवीना की मौजूदगी फिल्म को सिर्फ ग्लैमर नहीं देती। वह उसे एक खास नॉस्टैल्जिक ऊर्जा भी देती हैं। यही वजह है कि उनका हिस्सा फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाता है।

सपोर्टिंग स्टारकास्ट का खेल

फिल्म में कलाकारों की संख्या बहुत ज्यादा है। सुनील शेट्टी, परेश रावल, जैकी श्रॉफ, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, श्रेयस तलपड़े, फरीदा जलाल, किरण कुमार, अरशद वारसी, दिशा पाटनी और जैकलीन फर्नांडिस जैसे नाम फिल्म को लगातार भरा हुआ रखते हैं।

सुनील शेट्टी अपने पुराने अंदाज में अच्छे लगते हैं। उनके कुछ दृश्य ‘आवारा पागल दीवाना’ वाली ऊर्जा की याद दिलाते हैं। परेश रावल का अनुभव छोटे दृश्य को भी कॉमिक बना देता है। जॉनी लीवर कई जगह अपने पुराने स्कूल की कॉमेडी से असर छोड़ते हैं।

जैकी श्रॉफ खलनायक के रूप में ध्यान खींचते हैं। दिशा पाटनी और जैकलीन फर्नांडिस फिल्म में ग्लैमर बढ़ाती हैं। कुल मिलाकर इतनी बड़ी स्टारकास्ट के बावजूद फिल्म हर कलाकार को कुछ न कुछ करने का मौका देती है।

भीड़भाड़ में भी संतुलन

इतने बड़े कलाकार समूह के साथ सबसे बड़ा खतरा यही रहता है कि फिल्म बिखर जाए। कई बार ऐसा होता भी है, लेकिन निर्देशक अहमद खान की एक कामयाबी यह है कि उन्होंने लगभग हर किरदार को एक जगह देने की कोशिश की है। कोई एकदम गायब नहीं लगता। कई छोटे कलाकार भी अपने छोटे हिस्से में असर डालते हैं।

यह आसान काम नहीं था। तीन दर्जन के आसपास कलाकारों वाली फिल्म में स्क्रीन स्पेस का संतुलन अक्सर बिगड़ जाता है। यहां फिल्म कई बार शोर में बदलती है, लेकिन पूरी तरह हाथ से नहीं निकलती।

Welcome To The Jungle Review में निर्देशक के खाते का यह बड़ा पॉजिटिव है।

कॉमेडी कहां काम करती है

फिल्म की कॉमेडी मुख्य रूप से स्थितियों, संवादों और कलाकारों की टाइमिंग पर टिकी है। यह बहुत बारीक या बुद्धिमान कॉमेडी नहीं है। यह बड़ी, ऊंची, तेज और भीड़ वाली कॉमेडी है। इसमें स्लैपस्टिक है, शब्दों का खेल है, गलतफहमी है और किरदारों की बेवकूफी है।

कई पंच सीधे हंसाते हैं। कई जगह फिल्म सिर्फ अराजकता से हंसी निकालती है। कुछ मजाक लंबे समय तक याद रह सकते हैं, खासकर वे जिनमें अक्षय, परेश रावल और जॉनी लीवर शामिल हों।

फिल्म देखने वाले परिवार या दोस्तों के साथ बैठे दर्शकों के लिए यह फॉर्मूला काम कर सकता है। अकेले तर्क से फिल्म को परखने वाला दर्शक शायद इससे कम जुड़ पाए।

इमोशन वाला हल्का ट्रैक

फिल्म पूरी तरह बिन भाव वाली कॉमेडी नहीं है। दूसरे हिस्से में गांव और आतंकी सरगना वाली लाइन के जरिए एक हल्का भावनात्मक ट्रैक भी आता है। यह बहुत गहरा नहीं है, लेकिन फिल्म को सिर्फ मजाकों की लड़ी बनने से रोकता है।

कुछ दृश्य ऐसे हैं, जो कॉमिक ‘बजरंगी भाईजान’ की याद दिला सकते हैं। यह असर कहानी की वजह से आता है, जहां मासूम लोग, गलत पहचान और आतंक का दबाव एक साथ मौजूद हैं। हालांकि फिल्म इस ट्रैक को भी पूरी गंभीरता से नहीं लेती। उसकी प्राथमिकता अंत तक मनोरंजन ही रहती है।

यही वजह है कि भावनात्मक हिस्सा भी कॉमेडी के दायरे से बाहर नहीं जाता।

डायरेक्शन की बड़ी ताकत

निर्देशक अहमद खान की सबसे बड़ी सफलता फिल्म की ऊर्जा बनाए रखना है। 2 घंटे 44 मिनट लंबी फिल्म में गति बनाए रखना आसान नहीं होता। यहां फिल्म कई बार लंबी लगती है, लेकिन ठहरती नहीं है। हर कुछ समय बाद कोई नया किरदार, नई हरकत या नया संवाद आ जाता है।

दिवंगत नीरज वोहरा की कहानी का मूल विचार दिलचस्प है। काले धन को फ्लॉप फिल्म में खपाने का विचार अपने आप में कॉमिक व्यंग्य पैदा करता है। यही बीज फिल्म को शुरुआत में मजबूत आधार देता है।

फिल्म का निर्देशन यही समझकर किया गया है कि दर्शक को लगातार कुछ न कुछ मिलता रहना चाहिए। निर्देशक ने इसी नियम का पालन किया है।

एडिटिंग सबसे बड़ी कमी

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी एडिटिंग है। पहले हिस्से में कई दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं। कुछ दृश्य वहां खत्म हो सकते थे, जहां वे शुरू होने के कुछ मिनट बाद ही अपना असर दे चुके थे। लेकिन फिल्म उन्हें और खींचती है।

दूसरे हिस्से में भी यही समस्या दिखती है। फिल्म कई जगह टाइट हो सकती थी। अगर इसे थोड़ा और कसा जाता, तो इसका असर बढ़ता। अभी कुछ जगह दर्शक को यह महसूस होता है कि फिल्म का जोक खत्म हो चुका है, लेकिन दृश्य अभी खत्म नहीं हुआ।

सीधी बात यह है कि 15-20 मिनट की कटौती फिल्म को और बेहतर बना सकती थी।

तकनीकी पक्ष का असर

फिल्म का छायांकन कहानी के टोन के मुताबिक है। बड़े सेटअप, लोकेशन और कलाकारों की संख्या को संभालने में कैमरा ठीक काम करता है। एक्शन दृश्य भी उसी फिल्मी शैली में रखे गए हैं, जिसकी इस फिल्म से उम्मीद की जाती है।

VFX बहुत मजबूत नहीं है, लेकिन बहुत कमजोर भी नहीं है। इसे औसत कहा जा सकता है। जहां फिल्म का फोकस कॉमेडी है, वहां VFX को लेकर बहुत बड़ी उम्मीद भी नहीं बनती। इसलिए यह पक्ष फिल्म को न बहुत ऊपर ले जाता है, न बहुत नीचे गिराता है।

लोकेशन और सेटअप फिल्म के शोरगुल वाले टोन के साथ चलते हैं। यही इसका तकनीकी सार है।

म्यूजिक का सीमित असर

फिल्म का संगीत कहानी के साथ चलता है, लेकिन ऐसा कोई गीत नहीं है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद लंबे समय तक याद रहे। यह इस फिल्म की साफ कमजोरी है। इतने बड़े स्टारकास्ट वाली मसाला कॉमेडी में एक-दो यादगार गीत फिल्म के पक्ष में जा सकते थे।

बैकग्राउंड स्कोर कॉमेडी के माहौल को संभालता है। कई जगह वही दृश्य को ज्यादा मजेदार बनाता है। लेकिन गानों के स्तर पर फिल्म औसत रहती है।

यानी ऑडियो एल्बम इस फिल्म का selling point नहीं है।

परिवार के साथ देखी जाए या नहीं

यह फिल्म उसी दर्शक के लिए बनी है, जो थिएटर में बैठकर खुलकर हंसना चाहता है। दोस्तों या परिवार के साथ देखने पर इसका असर ज्यादा हो सकता है। इसकी कॉमेडी सामूहिक देखने में ज्यादा काम करती है।

अगर कोई दर्शक कहानी, यथार्थ और नियंत्रित पटकथा चाहता है, तो फिल्म उसे अधूरी लग सकती है। अगर कोई दर्शक पुरानी बॉलीवुड स्टाइल की भीड़भाड़ वाली कॉमेडी चाहता है, तो यह फिल्म उसे मनोरंजन दे सकती है।

Welcome To The Jungle Review का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि फिल्म की सफलता आपके मूड पर निर्भर करेगी। आप इसे जितनी गंभीरता से कम लेंगे, यह उतनी ज्यादा काम करेगी।

फाइनल फैसला

‘वेलकम टू द जंगल’ परफेक्ट फिल्म नहीं है। यह लंबी है। कई जगह बिखरती है। एडिटिंग ढीली है। कहानी तर्क से कई बार दूर चली जाती है। लेकिन इसके बावजूद फिल्म में हंसाने की ताकत है। अक्षय कुमार का कॉमिक अंदाज काम करता है। रवीना टंडन के साथ उनकी जोड़ी दिल जीतती है। सपोर्टिंग कलाकार लगातार ऊर्जा बनाए रखते हैं।

अगर आप थिएटर में बैठकर सिर्फ मजा लेना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको खाली हाथ नहीं छोड़ेगी। अगर आप हर दृश्य में तर्क तलाशेंगे, तो फिल्म आपको थका सकती है। अगला कदम सीधा है। यह फिल्म मूड देखकर देखें। कॉमेडी के लिए जाएं, कहानी के लिए नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: ‘वेलकम टू द जंगल’ की स्टारकास्ट में कौन-कौन हैं?
उत्तर: फिल्म में अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, परेश रावल, जैकी श्रॉफ, रवीना टंडन और जैकलीन फर्नांडिस प्रमुख भूमिकाओं में हैं।

प्रश्न 2: फिल्म के निर्देशक कौन हैं?
उत्तर: फिल्म का निर्देशन अहमद खान ने किया है।

प्रश्न 3: फिल्म की अवधि कितनी है?
उत्तर: फिल्म की कुल अवधि 2 घंटे 44 मिनट है।

प्रश्न 4: फिल्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
उत्तर: फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अक्षय कुमार की कॉमिक टाइमिंग और पूरी स्टारकास्ट की मस्ती है।

प्रश्न 5: क्या रवीना टंडन का रोल बड़ा है?
उत्तर: रवीना का स्क्रीन टाइम कम है, लेकिन उनकी मौजूदगी असरदार है और अक्षय के साथ उनकी केमिस्ट्री याद रह जाती है।

प्रश्न 6: फिल्म की कहानी किस बारे में है?
उत्तर: कहानी एक कारोबारी, काले धन, फिल्म बनाने की जुगाड़ और बाद में गांव को आतंकी सरगना से बचाने वाली कॉमिक स्थिति पर आधारित है।

प्रश्न 7: क्या फिल्म फैमिली के साथ देखी जा सकती है?
उत्तर: हां, यह फिल्म परिवार या दोस्तों के साथ बैठकर हंसने वाले दर्शकों के लिए बनाई गई है।

प्रश्न 8: फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
उत्तर: फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबाई और ढीली एडिटिंग है।

प्रश्न 9: क्या फिल्म का म्यूजिक याद रह जाता है?
उत्तर: नहीं, फिल्म का कोई गाना खास तौर पर लंबे समय तक याद नहीं रहता। बैकग्राउंड संगीत बेहतर काम करता है।

प्रश्न 10: क्या फिल्म देखनी चाहिए?
उत्तर: अगर आप लॉजिक छोड़कर हल्की-फुल्की कॉमेडी देखना चाहते हैं, तो फिल्म देखी जा सकती है

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सांवरिया सेठ सिंह

थम्सअप भारत न्यूज पोर्टल शासन, सामाजिक, विकासात्मक और जनता की मूलभूत समस्याओं और उनकी चिंताओं के मुद्दों पर चौबीसों घंटे निष्पक्ष और विस्तृत समाचार कवरेज प्रदान करता है।

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