Ek Din Sadma Similarity ने नई फिल्म ‘एक दिन’ को रिलीज से पहले ही चर्चा में ला दिया है। साई पल्लवी की याददाश्त खोने वाली कहानी और उसके बाद पैदा होने वाला भावनात्मक खालीपन, 1983 की क्लासिक फिल्म ‘सदमा’ की याद इसलिए दिला रहा है क्योंकि दोनों में प्रेम, स्मृति और बिछड़ने का दर्द बहुत गहराई से जुड़ा है।
‘Ek Din’ और ‘सदमा’ की तुलना क्यों शुरू हुई
आमिर खान की प्रोड्यूस की गई फिल्म ‘Ek Din’ रिलीज से पहले ही भावनात्मक कहानी की वजह से चर्चा में है। फिल्म में उनके बेटे जुनैद खान और साउथ एक्ट्रेस साई पल्लवी मुख्य भूमिकाओं में हैं। ट्रेलर आने के बाद दर्शकों ने इसकी इमोशनल टोन पर खास ध्यान दिया, लेकिन असली चर्चा तब तेज हुई जब फिल्म की कहानी के केंद्र में मौजूद याददाश्त खोने वाली नायिका का एंगल सामने आया। इसी बिंदु ने लोगों को 1983 की चर्चित फिल्म ‘सदमा’ की याद दिलानी शुरू कर दी।
दोनों फिल्में एक जैसी नहीं हैं, दोनों की परिस्थितियां भी अलग हैं, लेकिन भावनात्मक स्तर पर इनके बीच एक दिलचस्प समानता साफ दिखाई देती है। दोनों कहानियों में एक महिला किरदार की स्मृति छिन जाती है या बदल जाती है, एक पुरुष किरदार उसके साथ गहरा भावनात्मक रिश्ता बना लेता है, और अंत में सबसे बड़ा दुख वहीं पैदा होता है जहां प्यार तो बचा रह जाता है, लेकिन याद नहीं बचती। यही वजह है कि ‘एक दिन’ और ‘सदमा’ के बीच तुलना सिर्फ सतही नहीं, भावनात्मक भी बन रही है।
‘एक दिन’ की कहानी आखिर है क्या
‘Ek Din’ की कहानी रोहन नाम के एक ऐसे युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बेहद शांत, भीतर-ही-भीतर जीने वाला और सोशल दुनिया से लगभग कटा हुआ इंसान है। वह अपने ऑफिस में काम करता है, लेकिन उसकी पहचान उसके नाम से कम और “आईटी वाला” कहकर ज्यादा होती है। इसी ऑफिस की मार्केटिंग टीम में काम करने वाली मीरा, यानी साई पल्लवी का किरदार, उसे पसंद आने लगता है।
रोहन मीरा को मन ही मन चाहता है, लेकिन अपनी भावनाएं कह नहीं पाता। वह उसे सोशल मीडिया पर स्टॉक करता है, उसके बारे में सोचता है, लेकिन अपनी सीमाओं से बाहर नहीं निकल पाता। यहां तक कहानी एकतरफा प्रेम की लगती है, लेकिन असली मोड़ तब आता है जब कंपनी अपने कर्मचारियों को जापान ट्रिप पर लेकर जाती है।
यहीं पर कहानी में वह भावनात्मक मोड़ आता है जो इसे साधारण प्रेम कहानी से अलग बनाता है। जापान ट्रिप के दौरान मीरा का एक्सीडेंट हो जाता है और कुछ समय के लिए उसकी याददाश्त चली जाती है। सबसे खास बात यह है कि जब उसकी याददाश्त वापस आएगी, तो उसे यह एक दिन याद ही नहीं रहेगा। यही “एक दिन” फिल्म का पूरा भावनात्मक आधार बन जाता है।
मीरा की याददाश्त और रोहन का झूठ कहानी को कैसे बदलता है
मीरा की याददाश्त जाने के बाद रोहन अपने मन की गहराई में दबे प्रेम के कारण एक बड़ा झूठ बोल देता है। वह खुद को मीरा का बॉयफ्रेंड बता देता है। उसके भीतर यह इच्छा है कि वह कम से कम एक दिन के लिए ही सही, मीरा के साथ वह जीवन जी ले जिसकी उसने कल्पना की थी। मीरा भी उस पर भरोसा कर लेती है और फिर दोनों जापान में साथ समय बिताते हैं।
वे घूमते हैं, बातें करते हैं, पास आते हैं, और रोहन चाहता है कि यह एक दिन कभी खत्म न हो। लेकिन सच ज्यादा देर तक छिपता नहीं। आखिरकार रोहन मीरा को सब कुछ बता देता है। मीरा नाराज होती है, फिर उस एक दिन के भीतर उसे माफ भी कर देती है।
कहानी का सबसे दुखद हिस्सा उसके बाद आता है। मीरा की याददाश्त लौट आती है और वह रोहन के साथ बिताया हुआ यह पूरा एक दिन भूल जाती है। दोनों वापस अपनी-अपनी जिंदगी में लौट जाते हैं। वे फिर उसी जगह काम करते हैं, मीरा वापस अपने पुराने रिश्ते में चली जाती है, और रोहन उस एक दिन की याद को ही अपनी सबसे बड़ी खुशी बनाकर जीता है। यही दर्द इसे सामान्य रोमांटिक फिल्म से आगे ले जाता है।
‘सदमा’ की याद क्यों आती है
1983 की फिल्म ‘सदमा’ हिंदी सिनेमा की सबसे भावनात्मक फिल्मों में गिनी जाती है। उस फिल्म में श्रीदेवी का किरदार एक हादसे के बाद मानसिक रूप से अपने बचपन जैसी स्थिति में पहुंच जाता है। कमल हासन का किरदार उसकी देखभाल करता है, उससे जुड़ता है और धीरे-धीरे एक गहरा भावनात्मक रिश्ता बनता है।
फिल्म का सबसे बड़ा दर्द अंत में आता है, जब नायिका सामान्य हो जाती है, लेकिन उस आदमी को पहचानती नहीं जिसने उसे पूरे दिल से चाहा और संभाला था। ‘सदमा’ का अंतिम दृश्य हिंदी सिनेमा के सबसे दर्दनाक दृश्यों में गिना जाता है, क्योंकि वहां प्यार मौजूद है, लेकिन उसकी पहचान खत्म हो चुकी होती है।
‘एक दिन’ में भी यही भावनात्मक केंद्र दिखाई देता है। यहां भी एक स्त्री किरदार स्मृति खो देती है। यहां भी एक पुरुष किरदार उसके साथ वह रिश्ता जीता है जो सामान्य परिस्थिति में उसे कभी नहीं मिलता। और यहां भी सबसे बड़ा दर्द वहीं पैदा होता है जहां एक पक्ष सब कुछ याद रखता है और दूसरा कुछ भी याद नहीं रखता। यही मूल समानता दर्शकों को ‘सदमा’ की तरफ ले जाती है।
दोनों फिल्मों में सबसे बड़ी समानता: प्रेम बनाम स्मृति
अगर ‘एक दिन’ और ‘सदमा’ की तुलना का एक वाक्य में सार निकालना हो, तो कहा जा सकता है कि दोनों फिल्मों की असली ताकत प्रेम और स्मृति के टकराव में छिपी है। एक इंसान पूरे दिल से जुड़ जाता है, दूसरा उस भावनात्मक जुड़ाव को अंत में याद ही नहीं रख पाता।
यही वह स्थिति है जो दर्शक के भीतर बेचैनी पैदा करती है। आम प्रेम कहानियों में दर्द बिछड़ने से आता है, लेकिन यहां दर्द भूल जाने से आता है। यह भूलना स्वार्थी नहीं, परिस्थितिजन्य है; फिर भी उसका असर बेहद क्रूर होता है।
रोहन के पास ‘एक दिन’ की याद बचती है, लेकिन मीरा उसे भूल जाती है। ‘सदमा’ में भी पुरुष किरदार के पास भावनाएं और स्मृतियां बचती हैं, लेकिन स्त्री किरदार उस रिश्ते से बाहर निकल जाती है क्योंकि उसकी मानसिक दुनिया बदल चुकी होती है। यह असमान स्मृति ही दोनों फिल्मों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है।
फिर दोनों में फर्क क्या है
समानता के बावजूद दोनों फिल्मों को एक जैसा कहना ठीक नहीं होगा। ‘सदमा’ में नायिका की मानसिक अवस्था एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह बदल जाती है और कहानी उसकी मासूमियत, निर्भरता और पुनः सामान्य होने की त्रासदी पर खड़ी होती है। वहीं ‘एक दिन’ में मीरा की याददाश्त केवल सीमित समय के लिए जाती है और कहानी एक दिन के भावनात्मक झूठ और उसके बाद पैदा होने वाले सच पर खड़ी है।
‘सदमा’ में पुरुष किरदार देखभाल करने वाले, रक्षक और भावनात्मक सहारे की भूमिका में है। ‘एक दिन’ में रोहन खुद अपनी अपूर्ण इच्छा के बोझ से दबा हुआ इंसान है, जो एक मौके का फायदा भी उठाता है और उसी के भीतर प्रेम भी खोजता है। इसलिए ‘एक दिन’ का नैतिक द्वंद्व थोड़ा अलग है। यहां प्रेम के साथ अपराधबोध भी जुड़ा हुआ है।
यानी कह सकते हैं कि ‘सदमा’ जहां करुणा और खोई हुई पहचान की कहानी है, वहीं ‘एक दिन’ अधूरी इच्छा, एक झूठे रिश्ते और एक असंभव खुशी की कहानी लगती है।
आमिर खान ने इसे खास क्यों माना
आमिर खान ने इस फिल्म की कहानी को अपने लिए बेहद खास बताया है। इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। ‘एक दिन’ की कहानी बहुत शोर-शराबे वाली नहीं, बल्कि भीतर से टूटे और भावनाओं को दबाकर जीने वाले इंसान की कहानी है।
रोहन जैसा किरदार उस प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है जो खुलकर जीया नहीं जाता, बस चुपचाप भीतर पलता रहता है। फिर जब उसे एक दिन का झूठा लेकिन वास्तविक सा मौका मिलता है, तो वह उसे छोड़ नहीं पाता। इस तरह की कहानियां अक्सर लंबे समय तक दर्शक के भीतर रहती हैं, क्योंकि इनमें नायक जीतता नहीं, बस एक याद संभालकर रह जाता है।
यही भावनात्मक असर शायद इस कहानी को खास बनाता है। यह फिल्म बड़े संवादों से नहीं, छोटी मानवीय कमजोरियों से असर पैदा करती दिखती है।
क्या ‘Ek Din’ सिर्फ रीमेक है या नया अनुभव भी दे सकती है
यह फिल्म असल में थाई फिल्म ‘वन डे’ की हिंदी रीमेक है। उस मूल फिल्म को IMDb पर 7.7 की रेटिंग मिली हुई है, यानी कहानी पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक असर छोड़ चुकी है। लेकिन हिंदी दर्शकों के लिए इसका संदर्भ अलग है। यहां साई पल्लवी और जुनैद खान की जोड़ी, आमिर खान का प्रोडक्शन और ‘सदमा’ जैसी फिल्मों की सांस्कृतिक स्मृति इस फिल्म को नया अर्थ देती है।
रीमेक होने के बावजूद किसी कहानी का प्रभाव केवल मूल पर निर्भर नहीं करता। यह भी मायने रखता है कि नई फिल्म उसे किस टोन, किस अभिनय और किस भावनात्मक ईमानदारी के साथ पेश करती है। अगर ‘एक दिन’ अपने भावनात्मक मूल को ठीक से पकड़ लेती है, तो यह सिर्फ रीमेक भर नहीं, बल्कि हिंदी दर्शकों के लिए एक नया सिनेमाई अनुभव बन सकती है।
जुनैद खान और साई पल्लवी से क्या उम्मीद
जुनैद खान के लिए यह फिल्म खास है क्योंकि इसमें उन्हें चुप, भीतर से दबे, भावनात्मक रूप से जटिल किरदार को निभाना है। यह कोई ऊंची आवाज वाला हीरो नहीं, बल्कि ऐसा शख्स है जो अपनी खुशी के लिए एक बड़ा झूठ बोलता है और बाद में उसी झूठ की कीमत अपनी यादों से चुकाता है।
दूसरी तरफ साई पल्लवी अपने सहज अभिनय और भावनात्मक उपस्थिति के लिए जानी जाती हैं। मीरा का किरदार अगर सही संतुलन के साथ पर्दे पर आता है, तो वह मासूमियत, उलझन और अनजाने लगाव के बीच बहुत असर छोड़ सकता है।
यानी फिल्म की भावनात्मक सफलता काफी हद तक इन दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री और संवेदनशील अभिनय पर टिकी होगी।
एडवांस बुकिंग और रिलीज की रणनीति क्या संकेत देती है
आमिर खान ने फिल्म की रिलीज से 39 दिन पहले एडवांस बुकिंग शुरू कर दी। यह रणनीति अपने आप में दिलचस्प है। आम तौर पर इस तरह की फिल्में कंटेंट और वर्ड ऑफ माउथ पर निर्भर मानी जाती हैं, लेकिन यहां पहले से चर्चा बनाकर दर्शकों की उत्सुकता को भुनाने की कोशिश साफ दिखती है।
रिलीज डेट 1 मई 2026 रखी गई है, यानी फिल्म को पर्याप्त समय देकर उसके चारों ओर भावनात्मक जिज्ञासा बनाई जा रही है। ट्रेलर को पसंद किया जाना और फिर कहानी को लेकर बढ़ती चर्चा यह बताती है कि फिल्म ने रिलीज से पहले ही एक भावनात्मक स्पेस बना लिया है।
क्या ‘Ek Din’ का अंत भी ‘सदमा’ जैसा दर्द देगा
यही वह सवाल है जो सबसे ज्यादा जिज्ञासा पैदा करता है। ‘सदमा’ का अंत आज भी लोगों के मन में बसा हुआ है, क्योंकि वहां दर्द बहुत सीधा और निर्मम था। ‘एक दिन’ में भी वही किस्म का खालीपन दिखाई देता है। रोहन सब कुछ याद रखेगा, मीरा सब भूल जाएगी। यह सेटअप अपने आप में भावनात्मक रूप से बहुत भारी है।
लेकिन दोनों फिल्मों के दर्द का स्वाद थोड़ा अलग हो सकता है। ‘सदमा’ में टूटन देखभाल और पहचान के खो जाने से आती है। ‘एक दिन’ में टूटन उस अस्थायी खुशी से आती है जिसे शुरू से ही टिकना नहीं था। यानी यहां दर्शक यह जानते हुए भी कहानी से जुड़ सकता है कि यह एक दिन की खुशी है, जो स्मृति में तो रहेगी, जीवन में नहीं।
‘Ek Din’ और ‘सदमा’ के बीच तुलना महज याददाश्त खोने वाले किरदार की वजह से नहीं हो रही, बल्कि इसलिए हो रही है क्योंकि दोनों फिल्मों में प्रेम का सबसे बड़ा दुख भूल जाने में छिपा है। ‘एक दिन’ की मीरा और ‘सदमा’ की नायिका अलग परिस्थितियों से गुजरती हैं, लेकिन दोनों कहानियों में पुरुष किरदार के हिस्से वही खालीपन आता है—जिसे वह जीता है, उसे दूसरा किरदार याद नहीं रखता।
आमिर खान की प्रोड्यूस की गई यह फिल्म अगर अपने भावनात्मक वादे पर खरी उतरी, तो यह सिर्फ एक रीमेक या एक प्रेम कहानी नहीं रहेगी। यह उन फिल्मों की कतार में जगह बना सकती है जो दर्शक को यह एहसास कराती हैं कि कभी-कभी सबसे बड़ा प्रेम वही होता है, जिसे केवल एक दिल ही याद रख पाता है।
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