Daldal series review: Bhumi Pednekar स्टारर यह क्राइम थ्रिलर एक गहरे मनोवैज्ञानिक दलदल में उतरने का दावा करती है, लेकिन भावनात्मक असर छोड़ने के बजाय यह सीरीज़ दर्शकों को थका देती है। महिला-केंद्रित नैरेटिव और सिस्टम पर सवालों के बावजूद, कहानी सतह से आगे नहीं बढ़ पाती।
कहानी का आधार—अपराध से ज्यादा अपराध के पीछे का मनोविज्ञान
‘Daldal’ उन किरदारों की कहानी है, जो अपराध की दुनिया में नहीं बल्कि अपने भीतर के अपराधबोध, दर्द और कुंठा में फंसे हुए हैं। यह सीरीज़ यह जानने में ज्यादा रुचि दिखाती है कि अपराध क्यों हुआ, न कि किसने किया। यही इसका मूल विचार है, लेकिन यहीं से इसकी सीमाएं भी शुरू हो जाती हैं।
DCP रीटा फरेरा—एक मजबूत महिला अफसर, एक टूटा हुआ अतीत
Bhumi Pednekar ने DCP रीटा फरेरा का किरदार निभाया है—एक ऐसी महिला पुलिस अधिकारी, जो अपने अतीत के गहरे अपराधबोध और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जूझ रही है। सिस्टम उसे एक शोपीस की तरह पेश करता है, जबकि वह असल में एक समर्पित और जमीनी अफसर है।
प्रमोशन, पुरुष वर्चस्व और सीरियल किलर की दुश्मनी
जब रीटा एक बड़े चाइल्ड ट्रैफिकिंग केस को सुलझाती है, तो उसे महानगर की सबसे युवा महिला DCP के रूप में प्रमोशन मिलता है। यह प्रमोशन जहां उसके पुरुष सहकर्मियों को असहज करता है, वहीं एक सीरियल किलर को उसका दुश्मन बना देता है—जो खुद भी दर्दनाक अतीत से जूझ रहा है।
अनाथालय—जहां मासूमियत की जगह शोषण पनपता है
सीरीज़ का एक अहम हिस्सा उन अनाथालयों और शेल्टर होम्स की पड़ताल करता है, जिन्हें मासूम बच्चों की सुरक्षा का ठिकाना माना जाता है। ‘Daldal’ दिखाती है कि कैसे यही जगहें शोषण के केंद्र बन जाती हैं और वहां पलने वाले बच्चे समाज और सिस्टम के प्रति नफरत से भर जाते हैं।
जेंडर, मानसिक स्वास्थ्य और सिस्टम—मुद्दे बड़े, असर छोटा
सीरीज़ जेंडर डिस्क्रिमिनेशन, mental health और systemic decay जैसे बड़े मुद्दों को छूती जरूर है, लेकिन उन्हें गहराई से टटोलने में नाकाम रहती है। यह गंभीरता दिखाने की कोशिश में लगातार उदासी और हिंसा पर निर्भर हो जाती है, जिसे वह गहराई समझ बैठती है।
क्रिएटर्स का विज़ुअल और साउंड डिज़ाइन—माहौल तो बनता है
सीरीज़ क्रिएटर सुरेश त्रिवेणी और डायरेक्टर अमृत राज गुप्ता ने माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
हॉन्टिंग विज़ुअल्स, टेंशन भरा बैकग्राउंड स्कोर और खून से सने दृश्य—सब कुछ OTT थ्रिलर के तय फॉर्मूले पर खरा उतरता है।
लेकिन थ्रिलर देखने की आदत दर्शकों को सुन्न कर चुकी है
आज के OTT दर्शक इतने ज़्यादा थ्रिलर देख चुके हैं कि केवल गोर और हिंसा अब उन्हें झकझोर नहीं पाती। ‘Daldal’ उसी डिज़ाइनर नशे की तरह लगती है, जिसकी डोज़ बढ़ती जाती है, लेकिन असर घटता चला जाता है।
कहानी में नयापन क्यों नहीं लगता?
यह सीरीज़ Vish Dhamija के 2019 में आए बेस्टसेलर उपन्यास Bhendi Bazaar पर आधारित है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म्स पर पुलिस प्रोसीजरल और महिला लीड वाली कहानियां अब आम हो चुकी हैं।
Delhi Crime और Mardani के बाद सरप्राइज फैक्टर खत्म
अब महिला पुलिस अफसर को लीड रोल में देखना कोई चौंकाने वाली बात नहीं रही। Delhi Crime घर-घर देखी जा चुकी है और Mardani थिएटर्स में अपनी छाप छोड़ चुकी है। ऐसे में ‘Daldal’ का कॉन्सेप्ट नया महसूस नहीं होता।
गोर और इंफॉर्मेशन की होड़ में भावनाएं नकली लगती हैं
सीरीज़ कई जगह गोर सीन और चौंकाने वाले विज़ुअल्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करती है। बार-बार चेहरे पर चॉकलेट, चिकन जैसे प्रतीकों का प्रयोग भावनात्मक असर पैदा करने की बजाय एक gimmick बन जाता है।
किरदारों का मनोविज्ञान—क्लिशे का सहारा
जहां कहानी को किरदारों की मानसिक गहराई में उतरना चाहिए था, वहां यह पुराने क्लिशे पर टिक जाती है। क्राइम सॉल्विंग और आत्मविश्लेषण का तालमेल धीरे-धीरे पूरी तरह प्रिडिक्टेबल हो जाता है।
Bhumi Pednekar का परफॉर्मेंस—ईमानदार लेकिन ठंडा
Bhumi Pednekar ने Bhakshak (2024) के बाद रिपोर्टर से पुलिस अफसर का सफर तय किया है। वह stoic और grounded दिखने की कोशिश करती हैं, लेकिन उनकी गंभीरता कई बार भावनात्मक inertness में बदल जाती है।
विलेन और सपोर्टिंग कास्ट का असर
Samara Tijori का एंड्रोजिनस एंटागोनिस्ट किरदार डर और सहानुभूति दोनों पैदा करता है, लेकिन फिजिकल प्रेज़ेंस की कमी और सीमित आर्क उसे एक-आयामी बना देता है। Geeta Agrawal और Aditya Rawal की परफॉर्मेंस सीरीज़ को संभालने का काम करती है।
कुल मिलाकर—क्या देखनी चाहिए ‘Daldal’?
‘Daldal’ एक ऐसी थ्रिलर है जो महत्वाकांक्षा में बड़ी है, लेकिन प्रभाव में छोटी। यह मुद्दों को छूती है, लेकिन भीतर तक नहीं उतरती। जो दर्शक केवल डार्क और ग्रिम थ्रिलर पसंद करते हैं, उन्हें यह सीरीज़ आकर्षित कर सकती है—बाकियों के लिए यह भावनात्मक रूप से थकाने वाली हो सकती है।
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