Bhabiji Ghar Par Hain Movie Review छोटे पर्दे की लोकप्रियता को बड़े पर्दे पर भुनाने की एक और कोशिश है, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ता नजर आता है। टीवी पर हल्की-फुल्की हंसी देने वाले किरदार फिल्म के लंबे फॉर्मेट में शोर, फूहड़ता और कमजोर कहानी में उलझ जाते हैं।
टीवी की सफलता को सिनेमा में भुनाने का असफल प्रयोग
छोटे पर्दे पर लोकप्रिय रहे सिटकॉम को बड़े पर्दे पर लाना हमेशा जोखिम भरा रहा है, और यह फिल्म उसी जोखिम का उदाहरण बनकर सामने आती है। जो किरदार टीवी पर 20–25 मिनट में हल्की मुस्कान दे जाते थे, वही Bhabiji Ghar Par Hain की दो घंटे की फिल्म में खिंचे हुए और थकाऊ लगते हैं। कहानी के नाम पर शोर है, संवादों के नाम पर फूहड़ता और मनोरंजन के नाम पर लगातार चलती भागदौड़। यही वजह है कि फिल्म शुरुआत से ही दर्शक को बांधने में असफल रहती है।
Bhabiji Ghar Par Hain फिल्म कहानी: पड़ोसी प्रतिद्वंद्विता और जबरन ठूंसा गया हंगामा
Bhabiji Ghar Par Hain फिल्म की कहानी मनमोहन तिवारी और विभूति मिश्रा की जानी-पहचानी पड़ोसी प्रतिद्वंद्विता के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें दो गुंडा भाई—शांति और क्रांति—की एंट्री होती है, जिन्हें अंगूरी और अनीता से प्रेम हो जाता है। यहीं से शुरू होती है घटनाओं की एक लंबी और जबरन खींची गई श्रृंखला। कहानी आगे बढ़ने के बजाय बार-बार चुटकुलों और शोरगुल के सहारे टिकती है, जिससे कथा में कोई वास्तविक प्रगति महसूस नहीं होती।
हास्य नहीं, फूहड़ता का बोलबाला
फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष इसका हास्य है। पाद से जुड़े संवाद, दोअर्थी टिप्पणियां और देह केंद्रित मजाक इतनी अधिक मात्रा में हैं कि कहानी का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। कई दृश्य असहज करते हैं, कई सीधे उबाऊ लगते हैं। जिस कॉमेडी से हंसी आनी चाहिए, वह अक्सर झेंप या झुंझलाहट पैदा करती है। अंत तक आते-आते दर्शक का धैर्य जवाब देने लगता है।
अभिनय: कलाकार सहज, पर पटकथा ने बांध दिया
आसिफ शेख और रोहिताश्व गौर अपने परिचित किरदारों में सहज नजर आते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा उन्हें कुछ नया करने का मौका नहीं देती। शुभांगी अत्रे कुछ दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं, पर उनके हिस्से भी दोहराव ही आता है। विदिशा श्रीवास्तव के पास करने को बहुत कम है, जिससे उनका किरदार उभर ही नहीं पाता।
रवि किशन फिल्म में ऊर्जा लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ढीला लेखन उनकी मौजूदगी का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। सहायक कलाकारों की भीड़ जरूर है, पर उनका उपयोग कहानी को मजबूत करने के बजाय शोर बढ़ाने तक सीमित रह जाता है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष: टीवी एपिसोड का लंबा संस्करण
निर्देशक ने टीवी की दुनिया को ज्यों का त्यों बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश की है, लेकिन सिनेमा की जरूरतों के अनुसार विस्तार और गहराई नहीं दी। पटकथा में कसावट की भारी कमी है, संपादन ढीला है और कई दृश्य अनावश्यक रूप से खिंचते हैं।
दृश्य संयोजन साधारण है और पृष्ठभूमि संगीत भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ता। पूरी फिल्म एक ऐसे एक्सटेंडेड टीवी एपिसोड जैसी लगती है, जिसे बिना ठोस कारण के लंबा कर दिया गया हो।
दर्शकों की उम्मीदें
यह फिल्म आज रिलीज हो चुकी है और इसे दैनिक भास्कर ने 5 में से 1 स्टार की रेटिंग दी है। यह रेटिंग साफ तौर पर दर्शाती है कि फिल्म अपने कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। जो दर्शक टीवी शो के पुराने स्वाद की उम्मीद लेकर आएंगे, उन्हें यहां वही स्वाद बासी और बनावटी लग सकता है।
फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?
‘भाभीजी घर पर हैं’ फिल्म अपने प्रशंसकों को पुराने किरदारों की झलक देने की कोशिश जरूर करती है, लेकिन सिनेमाई अनुभव के तौर पर यह निराश करती है। यदि आप सिनेमा से कुछ नया, सधा हुआ और संतुलित हास्य चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको मायूस करेगी।
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