पंडवानी की सबसे बड़ी आवाज खामोश, राजकीय सम्मान के साथ विदाई, मंच पर महाभारत को जीवित कर देती थीं
छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में पंडवानी पहले से थी, मगर तीजन बाई ने उसे वह चेहरा दिया जिसे देश और दुनिया पहचान सके। उन्होंने महाभारत के प्रसंगों को सिर्फ आवाज से नहीं, पूरे शरीर, पूरे अभिनय और पूरे विश्वास के साथ मंच पर उतारा। भीम का बल, द्रौपदी की पीड़ा, अर्जुन की उलझन और कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान—सब कुछ उनकी प्रस्तुति में सांस लेने लगता था।

Teejan Bai के जाने से सिर्फ एक कलाकार नहीं गईं, लोक स्मृति का एक पूरा आसमान खाली हो गया। रायपुर एम्स में 70 साल की उम्र में उनका निधन हुआ और छत्तीसगढ़ ने अपनी सबसे पहचान वाली आवाज को राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी।
आखिरी आलाप का बड़ा शून्य
रविवार की सुबह छत्तीसगढ़ के लिए सिर्फ एक दुखद खबर लेकर नहीं आई। वह अपने साथ एक ऐसा सन्नाटा लाई, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांधना मुश्किल है। पंडवानी की वह आवाज, जिसने महाभारत को गांव की चौपाल से उठाकर दुनिया के मंचों तक पहुंचाया, अब थम चुकी है। पद्म विभूषण तीजन बाई ने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। उनकी उम्र 70 साल थी। कुछ समय से वह बीमार थीं। यही खबर पूरे कला जगत में एक गहरे खालीपन की तरह फैली।
उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ किया गया। यह सम्मान सिर्फ एक कलाकार को नहीं, एक सांस्कृतिक युग को दिया गया। क्योंकि तीजन बाई ने पंडवानी को गाया नहीं, जिया था। और जब वह मंच पर होती थीं, तो कहानी केवल सुनाई नहीं देती थी, दिखाई भी देती थी। यही उनकी असली पहचान थी।
लोककला का सबसे बड़ा चेहरा
छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में पंडवानी पहले से थी, मगर तीजन बाई ने उसे वह चेहरा दिया जिसे देश और दुनिया पहचान सके। उन्होंने महाभारत के प्रसंगों को सिर्फ आवाज से नहीं, पूरे शरीर, पूरे अभिनय और पूरे विश्वास के साथ मंच पर उतारा। भीम का बल, द्रौपदी की पीड़ा, अर्जुन की उलझन और कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान—सब कुछ उनकी प्रस्तुति में सांस लेने लगता था। यह उनका हुनर नहीं, उनकी साधना थी।
यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन को कला और संस्कृति जगत की अपूरणीय क्षति कहा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी माना कि तीजन बाई ने पंडवानी के जरिए राज्य का नाम देश-विदेश में रोशन किया। यह शोक इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि वह केवल पुरस्कृत कलाकार नहीं थीं, लोक की सबसे पहचानी जाने वाली आवाज थीं।
Teejan Bai की बचपन की बड़ी शुरुआत
Teejan Bai का जन्म 1956 में दुर्ग जिले के अटारी-गनियारी अंचल में हुआ। वह ऐसे परिवार में पलीं, जहां संगीत हवा की तरह था, लेकिन जीवन आसान नहीं था। पिता बांस बजाते थे, मां लोकगीत गाती थीं। घर बड़ा था, साधन छोटे थे। गरीबी इतनी थी कि बचपन में खेत, जंगल, पत्तों की चटाई, झाड़ू और रोज की मेहनत ही जीवन का हिस्सा थे। लेकिन उसी जीवन में गीत भी थे। करमा, ददरिया, सुआ—ये गीत उनके भीतर बहुत जल्दी घर कर गए।
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तीजन बाई अक्सर कहा करती थीं कि बचपन में काम करते-करते भी वह गाती रहती थीं और हर बार जीत जाती थीं। यह बात मामूली लग सकती है, लेकिन असल में वहीं से उनकी आत्मविश्वास भरी आवाज तैयार हुई। गरीबी ने उन्हें रोका नहीं। उसने उनकी आवाज को और धार दी। यही वह मिट्टी थी, जहां से उनकी कला की जड़ें निकलीं।
नाना से मिली कथा की चिंगारी
महाभारत उनके भीतर किताबों से नहीं, सुनने की परंपरा से उतरी। वह अपनी मां के चाचा बृजलाल पारधी को पंडवानी गाते हुए छुप-छुपकर सुनती थीं। धीरे-धीरे कथा उनके भीतर बैठने लगी। प्रसंग याद होने लगे। पात्र पहचान में आने लगे। फिर यह सुनना केवल मनोरंजन नहीं रहा। यह उनकी आंतरिक तैयारी बन गया। लोक परंपरा का असली स्कूल वही था। न मंच, न माइक, न लिखित स्क्रिप्ट। सिर्फ सुनना, याद करना और अपने भीतर उतार लेना।
यही तीजन बाई की कला की पहली असली पाठशाला थी। वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन उनकी स्मृति इतनी मजबूत थी कि महाभारत के प्रसंग उनके भीतर जीवित रहते थे। यही कारण था कि बाद में जब उन्होंने मंच पकड़ा, तो पांडुलिपि की जरूरत नहीं पड़ी। उनकी देह और उनकी आवाज ही उनकी किताब बन गई।
13 साल की उम्र का पहला मोड़
कहानी का असली मोड़ तब आया, जब तीजन बाई ने 13 साल की उम्र में पहली बार चंदखुरी गांव में सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाई। यह कोई साधारण प्रस्तुति नहीं थी। यह वह क्षण था जब एक किशोरी ने लोककला के भीतर अपनी जगह मांगने के बजाय उसे अपने दम पर हासिल करना शुरू किया। उस उम्र में जहां बहुत-सी लड़कियों का संसार घर की दहलीज से आगे नहीं बढ़ता, तीजन बाई चौपाल तक पहुंच चुकी थीं।
यहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले तीन दिन की पंडवानी, फिर सात दिन, फिर महाभारत के 18 पर्वों की तर्ज पर 18 दिन की प्रस्तुति। यह केवल कार्यक्रम नहीं थे। यह लोक में उनकी स्वीकार्यता की सार्वजनिक घोषणा थी। पंडवानी अब केवल उनका शौक नहीं रह गई थी। वह उनका जीवन बन चुकी थी।
निजी जीवन का कड़वा संघर्ष
तीजन बाई की कहानी केवल मंच की चमक नहीं है। इसमें गहरा अंधेरा भी है। उनकी शादी बहुत कम उम्र में कर दी गई थी। जिस घर में गईं, वहां पहले से दो शादियां हो चुकी थीं। झगड़े थे, असुरक्षा थी, अपमान था। कुछ ही महीनों में पति एक और महिला को घर ले आया। तीजन बाई वापस मायके लौट आईं।
बाद में उन्होंने प्रेम विवाह किया। तीन बच्चे हुए। मगर संघर्ष खत्म नहीं हुआ। गाना-बजाना जारी रहा, तो घर की कलह फिर बढ़ी। यही वह हिस्सा है जहां तीजन बाई केवल कलाकार नहीं, अपने रास्ते के लिए लड़ती स्त्री की तरह सामने आती हैं। यह वही जीवन अनुभव था जिसने उनकी आवाज में करुणा और जिद दोनों भरी।
मंच पर आया निर्णायक विस्फोट
वह घटना आज भी तीजन बाई की जीवनी का सबसे तीखा दृश्य लगती है। एक गांव में वह भीम का प्रसंग गा रही थीं। मंच पर थीं। कथा चल रही थी। तभी उनके पति मंच पर चढ़ आए और उन्हें घूंसा मार दिया। तीजन बाई बाद में मुस्कुराते हुए कहती थीं कि पहले लगा भीम ने मारा होगा, फिर गालियां सुनीं तो समझ आया कि यह उनका पति है।
यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं था। यह एक लोक कलाकार के जीवन की निर्मम सच्चाई थी। लेकिन यहीं कहानी टूटती नहीं, बदलती है। अगले ही दिन उन्होंने थोड़ा चावल-दाल लिया, बच्चों को साथ लिया और घर छोड़ दिया। वह चंदखुरी गांव के स्कूल पहुंचीं और गांव वालों के सामने गाना शुरू कर दिया।
और फिर सब बदल गया।
चंदखुरी की रात से बना इतिहास
चंदखुरी में जब उन्होंने गाया, तो गांव के मालगुजार भूषणलाल देशमुख तक खबर पहुंची। उन्हें इनाम मिला। राशन मिला। चौपाल पर रात भर पंडवानी का कार्यक्रम तय हुआ। संगतकार उम्मेद सिंह साथ आए। ढोलक, तंबूरा, हुंकार और कथा—सब एक साथ जुड़ गए।
Teejan Bai पढ़ी-लिखी नहीं थीं, इसलिए दिन में उम्मेद सिंह उन्हें प्रसंग याद कराते। रात को वे मंच पर उन्हें जीतीं। यह साझेदारी महज संगीत सहयोग नहीं थी, यह निर्माण था। यहीं से एक असाधारण कलाकार तैयार हो रही थी। जिस स्त्री को घर ने ठुकराया, उसी को चौपाल ने अपनाया। यही वह क्षण था जब लोक ने उन्हें अपना लिया।
परंपरा तोड़ने का बड़ा साहस
उस समय महिला पंडवानी कलाकार बैठकर गाती थीं। इसे वेदमती शैली कहा जाता था। मंच पर खड़े होकर, देह को कथा का माध्यम बनाकर, संवाद, हाव-भाव और नाटकीयता से प्रस्तुति देना पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। तीजन बाई ने यही परंपरा तोड़ी।
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जब वह तंबूरे को कंधे पर गदा की तरह टिकाकर भीम का प्रसंग सुनाती थीं, तो दृश्य केवल सुना नहीं जाता था, महसूस किया जाता था। यही उनकी क्रांति थी। यही उनकी विरासत है।
पहचान का असली विस्तार
बरसों बाद भोपाल के भारत भवन में कार्यक्रम के दौरान उन्हें पहली बार बताया गया कि वह कपालिक शैली की गायिका हैं। यह भी दिलचस्प है कि उन्होंने पहले शैली नहीं चुनी, उन्होंने अभिव्यक्ति चुनी। बाद में दुनिया ने उसका नाम तय किया। यही असली कलाकार की पहचान होती है। वह पहले रचता है, फिर दुनिया उसकी परिभाषा गढ़ती है।
भोपाल से उनकी पहचान का दायरा तेज़ी से बढ़ा। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना। कार्यक्रम हुए। बड़े मंच मिले। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास तक बुलावा पहुंचा। नया थियेटर से जुड़ने की संभावना बनी, रिहर्सल भी हुई। मगर तीजन बाई ने अंततः पंडवानी को ही चुना। यह फैसला निर्णायक था।
उन्होंने मंच नहीं बदला। उन्होंने अपनी मिट्टी के मंच को ही दुनिया के लायक बना दिया।
गांव से पेरिस तक की छलांग
Teejan Bai का पेरिस जाना केवल विदेश यात्रा नहीं था। वह वह क्षण था जब छत्तीसगढ़ की लोककथा ने यूरोप के सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी जगह बनाई। भारत महोत्सव में जब उन्होंने पंडवानी प्रस्तुत की, तो भाषा सीमा नहीं बनी। श्रोताओं ने कथा का अर्थ नहीं, उसकी आत्मा सुनी।
वह खुद कहती थीं कि पहली हवाई यात्रा में उन्हें लगा कि देवलोक जा रही हैं। पेरिस पहुंचकर फिर डर लगा कि ये गोरे लोग क्या समझेंगे। मगर मंच पर जाते ही डर पिघल गया। लोगों ने खूब सुना, देखा और सराहा। यह लोककला की सार्वभौमिक शक्ति का प्रमाण था।
फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन—जहां-जहां वह गईं, वहां पंडवानी साथ गई। और हर बार छत्तीसगढ़ भी साथ गया।
सम्मान से बड़ी रही सादगी
Teejan Bai को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। यह अपने आप में दुर्लभ यात्रा है। 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण—यह क्रम बताता है कि देश ने उनके योगदान को लगातार पहचाना। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि और मानद डी.लिट जैसी उपलब्धियां भी उनके खाते में जुड़ीं।
लेकिन उनकी असली चमक पदकों में नहीं थी। उनकी सादगी में थी। वह जीवन भर लोक की बेटी बनी रहीं। मंच कितना भी बड़ा हो, पहचान कितनी भी वैश्विक हो जाए, उनके भीतर की आदिवासी स्त्री, गांव की बेटी और तंबूरे से कथा जगाने वाली कलाकार वैसी ही रही। यही कारण है कि लोग उन्हें केवल पुरस्कारों से नहीं, अपनत्व से याद करते हैं।
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दुखों ने भी नहीं तोड़ी जिद
2018 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। इलाज हुआ। कुछ दिन बाद फिर मंच पर लौट आईं। यह जिद थी। यही वह जिद थी जिसने उन्हें दशकों तक लगातार सक्रिय रखा। मगर जीवन ने बाद के वर्षों में उन्हें बहुत कठोर चोटें दीं। एक बेटे की पहले मौत हुई। फिर 2023 में बेटे शत्रुघ्न की मौत ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया।
इसके बाद उन्हें पक्षाघात का दौरा पड़ा। स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। चलना, बोलना, मंच, यात्रा—सब धीरे-धीरे दूर होने लगा। जो आवाज कभी महाभारत के युद्ध को जगा देती थी, वही आवाज अंततः मौन में उतर गई। यह दृश्य केवल परिवार के लिए नहीं, पूरे कला जगत के लिए दुखद था।
मगर यहां भी एक मानवीय तस्वीर उभरती है। घर वाले कहते थे कि वह जैसे बचपन में लौट आई थीं। बच्चों जैसी बातें करती थीं। जीवन जैसे पूरा घेरा बनाकर वहीं पहुंच रहा था, जहां से शुरू हुआ था।
अंतिम वर्षों की चुप्पी
बीमारी के दौरान वह लंबे समय तक बिस्तर पर रहीं। सरकारी पेंशन कुछ समय बंद भी रही, फिर दोबारा शुरू हुई। इलाज के लिए डॉक्टरों की टीम भेजी गई। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल राज्योत्सव के मौके पर उनका हालचाल पूछा। उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया। कुछ सुधार के बाद वह गांव लौटीं। लेकिन स्वास्थ्य टिक नहीं सका।
यहां कहानी और भी मार्मिक हो जाती है। क्योंकि जो कलाकार जीवन भर मंच पर बोलती रही, वह अपने आखिरी समय में शब्दों से दूर होती गई। तंबूरा निःशब्द पड़ा रहा। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील मन को हिला देने वाला है।
और शायद यही लोककला का सबसे दुखद सच भी है—जिस आवाज से एक समाज अपनी स्मृति बचाता है, वही आवाज अपने अंतिम दिनों में अक्सर बहुत अकेली हो जाती है।
तीजन बाई का असली अर्थ
तीजन बाई को केवल पंडवानी गायिका कहना कम होगा। वह लोक और इतिहास के बीच पुल थीं। वह स्त्री-प्रतिरोध की जीवित मिसाल थीं। वह उस परंपरा का चेहरा थीं, जिसने दिखाया कि बिना औपचारिक शिक्षा के भी स्मृति, अभ्यास और आंतरिक प्रतिभा दुनिया जीत सकती है।
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उन्होंने यह भी साबित किया कि लोककला कोई छोटी कला नहीं होती। उसमें वह ताकत होती है जो चौपाल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकती है। और अगर कलाकार सचमुच बड़ा हो, तो भाषा बाधा नहीं बनती। कथ्य, स्वर और आत्मा मिलकर रास्ता खोल देते हैं।
यही तीजन बाई की सबसे बड़ी सीख है।
अब आगे क्या बचा रहेगा
अब मंच पर तीजन बाई नहीं होंगी। मगर पंडवानी रहेगी। उनके शिष्य रहेंगे। उनकी रिकॉर्डिंग रहेगी। उनके अंदाज की चर्चा रहेगी। और सबसे बढ़कर, यह याद रहेगी कि एक स्त्री ने खड़े होकर गाया, परंपरा बदली और लोककला को विश्वस्तरीय सम्मान दिलाया।
उनके जाने के बाद तंबूरा सचमुच थोड़ा खाली लगेगा। पर शायद हर बार जब कोई कलाकार महाभारत का प्रसंग गाएगा, भीम की गदा की मुद्रा बनाएगा, द्रौपदी की पुकार में करुणा डालेगा या कृष्ण की मुस्कान स्वर में लाएगा, तब कहीं न कहीं तीजन बाई फिर से सुनाई देंगी।
उनकी मृत्यु एक खबर है।
उनकी विरासत एक युग है।
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