कोर्ट में रूबैया सईद की 33 साल बाद गवाही, कहा- यासीन मलिक ने किया था मुझे किडनैप Read it later

 

Rubaiya Sayeed
फोटो में रूबैया सईद और यासीन मलिक। फोटोः सोशल मीडिया।

Jammu Kashmir News : जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबैया सईद (Rubaiya Sayeed) ने अपहरणकर्ता के रूप में जेकेएलएफ (JKLF) प्रमुख यासीन मलिक (Yasin Malik)  को 33 साल बाद आइडेंटिफाई किया है। दरअसल रूबैया सईद 1989 के अपहरण मामले की सुनवाई के दौरान पहली बार अदालत में पेश हुई थी। वे वर्तमान में तमिलनाडु में रहती हैं। रूबैया ने कोर्ट में बताया कि 1989 में यासीन मलिक के साथ तीन लोगों ने उनका अपहरण किया था। 

90 के दशक के इस अपहरण कांड की खबर से पूरे देश में हड़कंप मच गया था। रूबैया को छुड़ाने के लिए उस वक्त 5 खूंखार आतंकियों को बदले में छोड़ना पड़ा था। 1990 से इस मामले की जांच कर रही सीबीआई ने रूबैया को इस मामले में गवाह बनाया था। यासीन मलिक फिलहाल आतंकियों को फंडिंग के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहा है।

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क्या मामला था

जम्मू-कश्मीर में 90 के दशक में आतंकवाद अपने चरम सीमा पर था। वहीं तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबैया सईद का अपहरण कर लिया गया था। मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू-कश्मीर के बड़े नेता थे और बाद में वे मुख्यमंत्री भी  रहे। लेकिन 1989 में केंद्रीय गृह मंत्री की बेटी के अपहरण की खबर पूरे देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। 

रूबैया जब हॉस्पिटल से घर लौट रहीं थी तब हुई थीं किडनैप

रूबैया सईद के अपहरण के संबंध में 8 दिसंबर 1989 को श्रीनगर के सदर पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी की प्रति के अनुसार, वह ट्रांजिट वैन में श्रीनगर के एक अस्पताल से नौगाम स्थित अपने घर जा रही थी। वे एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद अस्पताल में इंटर्नशिप कर रही थी।

इन आतंकवादियों की रिहाई के लिए किया था रूबैया का अपहरण

जब वैन लाल चौक से गुजरते हुए चानपुरा चौक के पास पहुंची। उसमें सवार तीन लोगों ने वैन को बंदूक की नोक पर रोका और रुबिया का अपहरण कर लिया। उनकी रिहाई के बदले में, जेकेएलएफ (जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) ने 5 आतंकवादियों हामिद शेख, अल्ताफ अहमद भट्ट, नूर मोहम्मद, जावेद अहमद जरगर और शेर खान की रिहाई के लिए एक शर्त रखी थी। शर्त पूरी होने के बाद ही रुबिया को छोड़ा गया।

Rubaiya Sayeed
पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ रूबैया। ये तस्वीर उन्हें आतंकियों से छुड़ाने के बाद की है।

 दिल्ली से श्रीनगर तक चला खुफिया एजेंसियों की बैठकों का दौर

दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक पुलिस से लेकर इंटेलिजेंस तक की मीटिंग का दौर शुरू हो गया। आतंकियों ने रुबैया की रिहाई के बदले में 7 आतंकियों को रिहा करने की मांग की थी। मध्यस्थता के लिए कई माध्यम खोले गए। इस पूरी कवायद में 5 दिन बीत गए और 8 दिसंबर से 13 दिसंबर तक की तारीख आ गई। 

13 दिसंबर 1989 की सुबह दो केंद्रीय मंत्री विदेश मंत्री इंदर कुमार गुजराल और नागरिक उड्डयन मंत्री आरिफ मोहम्मद खान दिल्ली से श्रीनगर पहुंचे। उनके साथ तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायण भी थे। तीनों फारूक अब्दुल्ला से मिलने आए थे। जब अपहरण की यह घटना हुई तब फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे।

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केंद्रीय गृह मंत्री की बेटी को बचाने के लिए सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी थी। बाद में रूबैया को मुक्त कराने के लिए सरकार को मजबूरन 5 आतंकियों को छोड़ना पड़ा। केंद्र में तत्कालीन भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के पांच आतंकवादियों को रिहा किए जाने के बाद 13 दिसंबर को अपहर्ताओं ने रुबिया को मुक्त कराया था। घाटी में अलगाववाद फैलाने वाले इस पूरे घटनाक्रम का मास्टरमाइंड जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक ही था।

अपहरण के आलावा यासीन पर 1990 में वायुसेना के चार जवानों की हत्या का भी केस चल रहा

यासीन मलिक वर्तमान में आतंकियों को फंडिंग (Terror Funding) के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहा है। वहीं उसके खिलाफ एक बड़ी घटना को अंजाम देने का मामला भी चल रहा है। यह जनवरी 1990 में श्रीनगर के रावलपोरा में हुए आतंकवादी हमले से संबंधित है। इस घटना में आतंकवादियों ने वायु सेना के जवानों पर गोलियां चलाईं थी, जिसमें एक महिला सहित 40 गंभीर रूप से घायल हो गए और इसमें वायुसेना के चार जवान शहीद हो गए।

यह मामला जितना पुराना होता गया उतना ही नीचे दबता जा रहा था लेकिन 2019 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से यासीन मलिक को आतंकी फंडिंग के आरोप में पकड़े जाने के बाद ये मामला फिर से अस्तित्व में आकर ताजा हो गया। 

पिछले साल जनवरी 2021 में सीबीआई ने विशेष लोक अभियोजक मोनिका कोहली और एस. भट की मदद से मलिक सहित 10 लोगों के खिलाफ रुबिया अपहरण मामले में आरोप तय किए गए थे। जो कश्मीर घाटी के अस्थिर इतिहास में एक अहम टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। बता दें कि अपहरण की एवज में जेकेएलएफ के पांच सदस्यों की रिहाई के बाद आतंकवादी समूहों ने सिर उठाना शुरू कर दिया था।

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