आजादी से भी पुरानी विदेश जाकर कमाने और बसने की चाह पूरी करने वाली कबूतरबाजी अब भी कायम क्यों- इसे यूं समझिए

 

human trafficking case
फोटोः PTI

दलेर मेहंदी को 19 साल पुराने कबुतरबाजी केस (human trafficking case) में कोर्ट ने 2 साल की सजा सुनई है। दरअसल ये उड़ने वाले पक्षी कबूतर से काफी अलग है। पंजाब में कबूतर उड़ाने का मतलब अवैध रूप से लोगों को विदेश भेजने के धंधे को कहा जाता है। यह धंधा पंजाब के साथ देश के अलग अलग क्षेत्रोंं में दबे पांव सालों से चल रहा है, लेकिन पंजाब में ये कबूतरबाजी का धंधा कुछ ज्यादा है। 

यहां के युवाओं को अलग-अलग तरीकों से विदेश भेजा जाता है और ये भी सत्य है कि इंडिया की तुलना में विदेश में बस कर हाई करेंसी वैल्यु में पैसे कमाने की ललक पंजाब के युवाओं में कुछ कम नहीं है। यही कारण है कि युवाओं की इसी चाह का फायदा अवैध तरीके से विदेश भेजने वाले उठाते हैं, जो अलग अलग तरह से इस नेटवर्क में काम करते हैं। 

आखिर भारत के नागरिक दूसरे देश की नागरिकता का सपना क्यों देखते हैं…

कबूतरबाजी का मतलब अवैध रूप से लोगों को विदेश भेजने का धंधा है। यह धंधा न सिर्फ पंजाब में बल्कि देश के कई हिस्सों में अलग-अलग नामों से सालों से चलता आ रहा है। यह अलग बात है कि पॉप सिंगर दलेर मेहंदी का नाम आने के कारण पंजाब के कबूतरबाजी को अच्छा खासा बेमतलब का प्रोमोशन मिल गया। रिपोर्ट्स के अनुसार पंजाब के कई और नामी लोग भी इस धंधे में शामिल हैं। 

इसी तरह के एक मामले में पंजाब के गायक सुखविंदर पांची के चचेरे भाई काला को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। पंजाब के बाहर हरियाणा, गुजरात, दिल्ली समेत अन्य राज्यों से इस धंधे की खबरें आती रही हैं। लेकिन मीडिया में मशहूर हस्तियों के नाम आने से अति महत्वपूर्ण मुद्दे को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आखिर भारत के नागरिक दूसरे देश की नागरिकता का सपना क्यों देखते हैं

सांकेतिक फोटो।

पंजाब में आजादी के पहले से ही यह सिलसिला चला आ रहा…

पंजाब में विदेश जाकर कमाने और वहां बसने या फिर अपने वतन लौटने के मामले नए नहीं हैं। दूसरे राज्यों की तरह पंजाब में आजादी के पहले से ही यह सिलसिला चला आ रहा है, लेकिन इन सब में जो बात पंजाब को अलग करती है, वो ये कि बीते कुछ सालों में इसमें तेजी देखने को मिली है। इस तेजी का कारण ये है कि कबुतरबाजों ने विदशे में बसने की चाह रखने वाले युवाओं को यकीन दिलाया कि किसी विकसित देश की नागरिकता या वहां परमानेंट सि​टजनशिप का जुगाड़ पैसों के दम पर आसानी से किया जा सकता है। 

विदेश जाने वालों की संख्या में इजाफा हुआ तो उतनी ही तेजी से इसके गुणात्मक स्तर में गिरावट आई

ऐसे में विदेश जाने वालों की तादात ही नहीं बड़ी है बल्कि ऐसे गुणात्मक स्तर में भी गिरावट आई जिसमें वाकई युवा अपनी शिक्षा की गुणवत्ता के दम पर उच्च शिक्षा के लिए या किसी विदेश कंपनी के बुलावे पर जाना चाहते हों इसे समझना जरूरी है…। 

पंजाब राज्य के एक लोकल और अनुभवी बुजुर्ग शख्स कहते हैं कि सन् पचास के करीब उनके साथ पढ़ने वाले 10 युवक विदेश गए थे। वे सभी युवा मेधावी थे…उन्हें लगता था कि विदेश में उनकी योग्यता का तरजीह दी जाएगी…।   उन्हें लगता था कि भारत में उनकी योग्यता की कद्र नहीं की जा रही और न ही उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार जिम्मेदारी हा​सिल हो पाती है। 

 पुराने समय में युवा इसलिए भी विदेश में बसने की चाह रखते थे क्योंकि उस दौरान जो वर्ग अधिकारी या सत्ता पर काबिज रहा उसने उभरते वर्ग के लिए जगह ही खाली नहीं की…

लेकिन वर्तमान में तो हर किशोर जवान होते ही विदेशी नागरिकता पाने का सपना देखने लगता है। वजह ये कि उसके सामने कोई विकल्प ही नहीं होता…। इसे ऐसे समझें कि जो निराशा का भाव योग्य लोगों को देश से पलायन के लिए उकसाता था  

वहीं भाव या सोच अब उन युवाओं में भी आ गई है जो कम पढ़े लिख है या कहें कि अयोग्य तक हैं। जो सिस्टम तीस चालीस साल पहले था उसमें योग्यता की परख व उसके इस्तेमाल की गुणवत्ता नहीं थी। 

वहीं दूसरी ओर पुराने समय में युवा इसलिए भी विदेश में बसने की चाह रखते थे क्योंकि उस दौरान जो वर्ग अधिकारी या सत्ता पर काबिज रहा उसने उभरते वर्ग के लिए जगह ही खाली नहीं की। यही कारण है कि यही सिस्टम अब भी मेहनतकश के बीच न्यायोचित रिश्ता बनाने में विफल हो रहा है। 

क्या भारत में कोई मजदूर अपने पेशे में काम करते हुए लग्जरी कार खरीदने की सोच सकता है?  विदेश में ये मुमकिन है

एक अमेरिकी महिला से शादी करने वाले भारतीय नागरिक ने नाम न बताने की शर्त में अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि वहां बेहद मुश्किल काम करने होते हैं, जोकि किसी जेल या कारागृह से कम नहीं हैं.. 

लेकिन फिर भी भारत में कोई भी मजदूर जीवनभर अपने पेशे में ही काम करते हुए एक कार खरीदने की सोच भी नहीं सकता जब​कि वहां एक हजार डॉलर के भुगतान और हर महीने दो सौ डॉलर की किश्तों के बदले वो अपने घर की चौखट पर मर्सीडीज कार खड़ी कार सकता है।  

एक बात ये भी है कि बेहतर जीवन जीने की ललक विदेश जाने वाले सभी लोगों में समान रूप से पाई जाती है, भले फिर उनका आर्थिक-सामाजिक स्तर कुछ भी हो। समय के साथ बदलाव ये आया है कि साधन संपन्न वर्ग के लोग पहले शैक्षिक योग्यता का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब  योग्यता की जगह रुपये-पैसे फैंक ​कर किसी न किसी तरह विदेश जाने की चाह रहती है। 

ये चाह इतीन तीव्र है कि युवक अपनी जमीन-जायदाद बेचकर भी विदेश जाना चाहता है, भले फिर उन्हें वहां जेल जाना पड़े या निम्न स्तर तक का काम करना पड़े। वहीं बिचौलिया युवाओं की विदेश जाने की इस तीव्र इच्छा का फायदा उठाता है। 

विदेश में बसने की चाहने सामाजिक  रिश्तों तक को गिराया‚ विदेश जाने की चाह में बहन को पत्नी के रूप में पेश करने तक के मामले सामने आए हैं…

इस तरह की विदेश बसने की चाह ने सामाजिक रिश्तों तक को गिरा दिया है। उदाहरण के तौर पर विदेश जाने के लिए अपनी बहन को पत्नी तक के रूप में पेश करने के मामले सामने आए हैं। वहीं दूसरी ओर नागरिकता की कंडिशन पूर करने के लिए कई युवा अपने से बड़ी उम्र की विदेशी लड़कियों से शादी मना लेते हैं। ऐसे में फर्जी शादियों के मामले भी कुछ कम नहीं हैं। मतलब कि मानवीय और सामाजिक भावनाओं के कई ऐसे उदाहरण है जिन्हें विदेश जाने की ललक ने कुचल डाला है। 

पहले पत्नियां विदेश में रह रहे प​ति के वियोग में दर्द भरे गीत गातीं थीं, लेकिन अब तो विदेशों से पतियों के फोन की बैल सुनना पत्नियां शान समझती हैं।  

देश से दूर होने और विदेश के प्रति आकर्षण को नेशनलिज्म के तौर पर भी देखा जा सकता है। तब उन कारणों को तलाशा जाए कि नई पीढ़ी में अपने देश के प्रति बढ़ते अलगाव और विदेशी नागरिकता हासिल करने की ललक क्यों बढ़ रह है। 

 इस पूरे मामले में दो अहम प्रश्न सामने आते हैं… पहला ये कि  क्या सिस्टम बिगड़ता देख देश को डूबती नैया समझ कर भाग खड़े होना चाहिए? जैसा कि मौजूदा हालात में श्रीलंका में देखा जा रहा है।  राष्ट्र की व्यवस्था को बनाए रखने और उसे नियमानुकुल बरकरार रखने  की प्रेरणा क्यों नहीं मिल पाती है?  

दूसरा..  ये कि क्या सचमुच विदेश इतना समृद्धशील और खुशहाल है कि जो वहां बसता है वो कुछ समय में ही मर्सीडीज का मालिक बन जाता है। या फिर कबुतरबाजों की ओर से विदेशों में सफलता के सब्जबाग दिखाए जाते हैं।  यदि ये कोरा सब्जबाग या झूठा दिलासा  है, तो ये सोच कैसे समाज में अपनी जगह बना लेती है। 

उपभोक्तावादी संस्कृति की ब्रांडिंग ने युवाओं को शुद्ध तीरके से उपभोक्तावादी ही बना दिया

दूसरी ओर टेलीविजन और दूसरे डिजिटल मीडियमों के जरिए कंज्यूमरिस्ट कल्चर या उपभोक्तावादी संस्कृति की ब्रांडिंग ने युवाओं को शुद्ध तीरके से उपभोक्तावादी ही बना दिया है। इसके असर की जड़ें इतनी गहराई तक जा चुकीं हैं कि विदेश जाने की चाह वाला युवा अपना सबकुछ दांव पर लगाकर समृद्धि के जंगलात  तक पहुंचना चाहता है।  दरअसल इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका उन एनआरआई की भी है जो देश लौटकर विदेशों में अपनी समृद्धि का ढिंढोरा पीटते रहते हैं।  

वो NRI जो कुछ दिन अपने गांव में मौज के बाद विदेश लौट जाते हैं और पीछे हजारों लालसाओं को छोड़ जाते हैं…

साेने के जेवरातों से लदे शरीर वाो जब देश के इंटरनेशनल  एयर पोर्ट पर उतरते हैं, तो अपने साथ कार में  बीयर और तरह तरह की व्हिस्की के कैरेट भर कर पंजाब के गांवों में ले जाते हैं… और सालों से  खाली रहकर खंडर पड़े अपने लाखों के मकान में 10 से 15 दिन  मौज  के बाद  फिर अपनी कमाई वाले देश की ओर उड़ जाते हैं‚  लेकिन गांव में पीछे हजारों लालसा लिए युवाओं की विदेश जाने की मचलती कामनाओं को छोड़ जाते हैं।  

जबकि हकीकत तो ये है कि विदेशों में एक जैसी सफलता हर किसी को नहीं मिलती। विदेश में बसे एक सज्जन कहते हैं… NRI को देखकर लोग ये समझने लगते हैं कि विदेशों में  पेड़ पर पैसे लगते हैं और बस आपको वहां जाकर तोड़ने होते हैं… जबकि  हकीकत यह है कि वहां का हर दिन कठिनाई से भरा होता है।  लेकिन वहां खास बात ये है कि वहां आप जोभी काम करते हैं उसमें आपके आसपास वाले को कोई मतलब नहीं होता।  


NRI को देश में भारतीय मूल का कहकर सम्मान देने की रीत ने भी बढ़ाया पलायन 

लेकिन ये बात यहीं खत्म नहीं होती दरअसल, सरकार ने जिस तरह से प्रवासियों को वरीयता देना और विदेशी मुद्रा को वैटेज देना शुरू किया है, उससे पलायन की एक अलग भूमिका को बढ़ावा मिला है। लोग समझने लगते हैं कि दो-चार साल तक ठोकरें खाने के बाद यदि उन्हें विदेशी नागरिकता मिल जाती है तो देश में भी सम्मान मिलने लगता है ऐसे में जोखिम उठाया जा सकता है। 

ये दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था की बैकबोन कहे जाने वाले किसानों की दुर्दशा अनसुनी होती है, लेकिन विदेशी नागरिकों की उनके धन-दौलत के लिए प्रशंसा की जाने लगती है कि फलां व्यक्ति भारती मूल के हैं, इन दिनों ये उदाहरण हम ​ऋषि सुनक को लेकर देख सकते हैं। 

सुनक खुद और उनके पिता का दूर दूर तक भारत से कोई वास्ता नहीं रहा, सि​वाय इसके कि ​ऋषि के दादा दादी पंजाब के थे। ये कैसा पैट्रियोटिज्म है…?  बस भारतीय मूल का कहकर तारीफ मिलने से ही पलायन का मैजिक युवाओं में पनपने लगता है।

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