Lucknow patricide case: MBBS के दबाव से तंग बेटे ने पिता को गोली मारकर टुकड़ों में काटा, 3 दिन तक बनाता रहा गुमशुदगी की कहानी Read it later

Lucknow patricide case: लखनऊ के आशियाना इलाके में पारिवारिक विवाद ने ऐसी बर्बर वारदात में बदल लिया, जिसने शहर को हिला दिया। पैथोलॉजी लैब के मालिक मानवेंद्र सिंह की हत्या किसी बाहरी हमलावर ने नहीं, बल्कि उनके 21 साल के इकलौते बेटे अक्षत प्रताप सिंह ने की। वजह थी – पिता का उसे NEET देकर MBBS कराना, जबकि बेटा होटल और रेस्टोरेंट का बिजनेस करना चाहता था।

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कैसे हुई वारदात की शुरुआत: छोटी सी बहस से खौफनाक हत्या तक

आशियाना कोतवाली क्षेत्र के सेक्टर-L में रहने वाले मानवेंद्र सिंह अपने बेटे अक्षत पर जोर दे रहे थे कि वह NEET क्वालीफाई कर MBBS करे। वे चाहते थे कि बेटा उनकी पैथोलॉजी लैब और मेडिकल बैकग्राउंड को आगे बढ़ाए।

अक्षत की सोच बिल्कुल अलग थी।

  • वह बार-बार कहता था कि पैथोलॉजी लैब बंद कर लॉन या रेस्टोरेंट खोला जाए।

  • उसे लगता था कि होटल या रेस्टोरेंट का बिजनेस ज्यादा “मॉडर्न” और प्रॉफिटेबल रहेगा।

20 फरवरी की सुबह इसी बात पर घर में तीखी बहस हुई। आरोप है कि इसी बहस के बाद अक्षत ने अपना आपा खो दिया और पिता के खिलाफ ऐसा कदम उठा लिया, जिसकी कल्पना भी डराने वाली है।

सुबह 4:30 बजे बहन के सामने पिता को गोली, बहन को दी जान से मारने की धमकी

आरोपी अक्षत के मुताबिक, 20 फरवरी की तड़के करीब 4:30 बजे उसने अपने पिता की लाइसेंसी राइफल उठाई और पास से ही उन्हें गोली मार दी। उस समय कमरे में उसकी 17 साल की बहन कृति भी मौजूद थी।

गोली चलने के बाद बहन घबरा गई और शोर मचाने की कोशिश की, लेकिन अक्षत ने उसे धमकाया—

  • कहा कि अगर उसने किसी को भी घटना के बारे में बताया, तो वह उसे भी जान से मार देगा।

  • इसके बाद बहन को कमरे से बाहर नहीं निकलने दिया गया।

शुरुआती घंटे इसी दहशत और खामोशी में बीते।

शव को ठिकाने लगाने की खौफनाक प्लानिंग: आरी और नीला ड्रम खरीदा

हत्या के तुरंत बाद अक्षत ने शव को छिपाने और ठिकाने लगाने की योजना बनाई।

उसने—

  • सबसे पहले पिता के शव को तीसरी मंजिल से नीचे ग्राउंड फ्लोर पर बने खाली कमरे में लाकर रखा।

  • फिर बाजार से एक आरी (कटर) और नीला प्लास्टिक ड्रम खरीदकर लाया।

  • योजना साफ थी – पूरे शरीर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर अलग-अलग जगहों पर फेंका जाए, ताकि पुलिस को पता ही न चले कि हत्या घर के अंदर हुई है।

इस दौरान घर के भीतर बदबू न फैले, इसके लिए वह लगातार रूम स्प्रे छिड़कता रहा और तारपिन का तेल भी लेकर आया।

बाथरूम बना क्राइम सीन: हाथ-पैर अलग कर पन्नियों में भर दिए

आरोपी के कबूलनामे के अनुसार, उसने शव को बाथरूम में ले जाकर आरी से काटा।

  • सबसे पहले दोनों हाथ अलग किए, फिर दोनों पैर काटे।

  • इन हिस्सों को प्लास्टिक पन्नियों में पैक करके नीले ड्रम में भर दिया।

  • पानी लगातार चलाता रहा, ताकि खून के धब्बे ज़मीन या दीवारों पर स्थायी न हो जाएं।

यह सब करते समय घर की निचली मंजिलों पर मौजूद चाचा-चाची और बाकी लोग कुछ भी समझ नहीं पाए, क्योंकि ऊपरी मंजिल पर कमरों और बाथरूम का इस्तेमाल अक्षत और उसके पिता-बहन ही करते थे।

सिर काटकर कार में रखा, 21 किलोमीटर दूर जाकर फेंक आया

सबसे डराने वाला हिस्सा सामने तब आया, जब पुलिस ने पूछताछ में सिर की तलाश की।

  • अक्षत ने पुलिस को बताया कि उसने पिता का सिर अलग करके अपनी कार में रखा।

  • फिर घर से करीब 21 किलोमीटर दूर, काकोरी इलाके के सदरौना गांव की तरफ जाकर सिर फेंक आया।

  • वहां झाड़ियों और सुनसान जगह का फायदा उठाते हुए उसने यह हिस्सा छिपाने की कोशिश की।

पुलिस ने उसके बताए ठिकाने से शरीर के कई टुकड़े बरामद कर लिए, लेकिन खबर लिखे जाने तक सिर की तलाश जारी रही।

तीन दिन तक गढ़ता रहा ‘गुमशुदगी’ की कहानी, फिर खुद पहुंचा थाने

हत्या के बाद भी अक्षत ने खुद को और परिवार को “सामान्य” दिखाने की कोशिश की।

  • वारदात 20 फरवरी की सुबह हुई।

  • 21 और 22 फरवरी तक उसने मोहल्ले वालों को यही बताया कि पिता दिल्ली गए हैं।

  • जब लोग पूछते, तो कहता कि “पापा एक प्रोग्राम में शामिल होने गए हैं, दो-तीन दिन में लौट आएंगे।”

तीन दिन बाद सोमवार को वह आशियाना थाने पहुंचा और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई।
उसने पुलिस को बताया—

  • “पापा 20 फरवरी की सुबह 6 बजे दिल्ली जाने की बात कहकर घर से निकले थे।”

  • “उन्होंने कहा था कि 21 फरवरी की दोपहर तक लौट आएंगे, लेकिन अब तक नहीं आए।”

  • “उनके तीनों मोबाइल नंबर बंद आ रहे हैं।”

शुरुआती स्तर पर पुलिस ने सामान्य गुमशुदगी के केस की तरह ही जांच शुरू की, लेकिन बेटे के हावभाव ने शक पैदा कर दिया।

हावभाव से बढ़ा शक, पहले बोला – पिता ने आत्महत्या की, फिर मान लिया कत्ल

जांच के दौरान जब पुलिस ने अक्षत से बार-बार सवाल किए, तो उसके जवाब बदलते गए।

  • पहले वह गुमशुदगी की कहानी पर अड़ा रहा।

  • फिर दबाव बढ़ने पर अचानक बोल पड़ा कि “पापा ने खुद आत्महत्या कर ली थी।”

  • और जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की, तथ्य सामने रखे, तो आखिरकार उसने स्वीकार कर लिया कि उसने ही हत्या की है।

कबूलनामे के बाद पुलिस उसे लेकर घर पहुंची। वहां ग्राउंड फ्लोर के कमरे में पड़े नीले ड्रम और बाथरूम की जांच शुरू हुई, तो आधा धड़ बरामद हो गया। बाकी अंग गायब थे, जिनका खुलासा बाद में हुआ।

लाइसेंसी राइफल गद्दे के नीचे छिपाई, पुलिस ने बरामद की

हत्या में जिस हथियार का इस्तेमाल हुआ, वह पिता की खुद की लाइसेंसी राइफल थी।

  • अक्षत ने गोली मारने के बाद राइफल को साफ किया और उसे बेड के गद्दे के नीचे छिपा दिया।

  • पुलिस जब उसके साथ घर पहुंची, तो उसी की निशानदेही पर राइफल, कारतूस, उसके कपड़े (नेक्कर) और अन्य सामान जब्त किए गए।

  • पोस्टमॉर्टम के लिए भेजे गए शव के ऊपरी हिस्से से भी गोली लगने की पुष्टि हुई।

परिवार की पृष्ठभूमि: पुलिस परिवार से ताल्लुक, मां की मौत के बाद पिता ही थे सहारा

मृतक मानवेंद्र सिंह मूल रूप से जालौन जिले के रहने वाले थे।

  • उनके पिता सुरेंद्र पाल सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस से रिटायर्ड हैं।

  • छोटे भाई एसएस रजावत फिलहाल यूपी पुलिस में तैनात हैं और सचिवालय में पोस्टेड हैं।

  • कई साल पहले मानवेंद्र ने लखनऊ के आशियाना सेक्टर-L में तीन-मंजिला मकान बनवाकर बसने का फैसला किया।

करीब नौ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था।
तब से—

  • वे अपने बेटे अक्षत और बेटी कृति की अकेले परवरिश कर रहे थे।

  • बेटी कृति APS में 11वीं कक्षा में पढ़ती है, जबकि अक्षत B.Com का छात्र है।

तीन मंजिला मकान में—

  • सबसे ऊपरी मंजिल पर मानवेंद्र, अक्षत और कृति रहते थे।

  • दूसरी मंजिल पर चाचा-चाची का परिवार रहता था।

  • ग्राउंड फ्लोर पर पार्किंग और गेस्ट रूम बने हुए हैं।

पहले भी घर से भाग चुका था बेटा, छह पन्नों की चिट्ठी छोड़ गया था

पड़ोसी और पुराने दोस्त धर्मेंद्र सिंह के अनुसार, अक्षत स्वभाव से रिजर्व था।

  • वह मोहल्ले में किसी से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था।

  • कभी सामना हो जाता तो बस नमस्ते कर लेता, वरना अपने में ही रहता।

चार साल पहले एक बड़ा घटनाक्रम हुआ था—

  • अक्षत अचानक घर छोड़कर भाग गया था।

  • जाते समय वह छह पन्नों की चिट्ठी लिखकर गया, जिसमें उसने साफ लिखा था कि वह MBBS नहीं करना चाहता।

  • उसने यह भी लिखा था कि उस पर डॉक्टर बनने का दबाव न बनाया जाए और पैथोलॉजी लैब बंद कर लॉन या रेस्टोरेंट खोलने पर विचार किया जाए।

परिवार और पुलिस की कोशिश के बाद वह एक दिन में वापस घर लौट आया। उस समय मामला शांत हो गया, लेकिन अंदर की खींचतान शायद वहीं से शुरू हो चुकी थी।

‘पिता मिलनसार थे, बेटे से बिल्कुल उलट’ – पड़ोसी

धर्मेंद्र सिंह बताते हैं कि—

  • मानवेंद्र सिंह बहुत मिलनसार और खुशमिजाज व्यक्ति थे।

  • मोहल्ले में हर किसी से बातचीत करते, त्योहारों पर आयोजन करवाते।

  • पार्क में रामलीला का आयोजन करवाते थे, जिसमें अक्षत मेघनाद का रोल करता था और तब सबके साथ घुल-मिलकर रहता था।

पड़ोसियों के मुताबिक 19 फरवरी को ही आखिरी बार मानवेंद्र को मोहल्ले में देखा गया। वह किसी दावत से लौटकर आए थे। इसके बाद जब दो-तीन दिन तक दिखाई नहीं दिए, तो लोगों ने बेटे से पूछा।

  • पहले अक्षत ने कहा कि पिता दिल्ली गए हैं।

  • बाद में बोला कि वे लापता हो गए हैं और वह खुद उन्हें आसपास खोज रहा है।

किसी को अंदाजा भी नहीं था कि सच इतना खौफनाक होगा।

फूफा का दावा – ‘गलती से चली गोली, फिर वजन की वजह से काटना पड़ा शरीर’

अक्षत के फूफा एसके सिंह भदौरिया का कहना है कि पुलिस जब उसे लेकर घर आई, तो अक्षत ने परिवार के सामने एक और कहानी बताई—

  • “पापा को धोखे से गोली लग गई थी, उनका इरादा मारने का नहीं था।”

  • “मैं घबरा गया, शरीर भारी था, इसलिए बाथरूम में ले जाकर टुकड़े किए ताकि नीचे ले जा सकूं।”

उसने कहा कि—

  • चार पार्ट – दो हाथ और दो पैर – वह पहले ही डिस्पोज कर चुका था।

  • बाकी आधा धड़ बचा हुआ था, जिसे ले जाने के लिए उसने कार पोर्च में लगाई थी।

  • लेकिन तभी कोई गेट पर आ गया, तो प्लान अधूरा रह गया।

  • अगर मौका मिलता, तो बचे हुए शरीर का भी “अंतिम संस्कार” कर देता।

फूफा के बयान से साफ है कि परिवार भी इस पूरे घटनाक्रम से स्तब्ध है और बेटे के व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहा है।

पुलिस के सामने अब चुनौती: सबूत मजबूत करना, बहन की सुरक्षा और मानसिक ट्रॉमा

जुर्म कबूलने के बाद भी पुलिस के लिए यह केस आसान नहीं है।

  • सबसे पहले, शरीर के सभी हिस्सों की बरामदगी और फॉरेंसिक एविडेंस को सही तरीके से डॉक्यूमेंट करना जरूरी है।

  • दूसरी बड़ी चुनौती है – बहन कृति की सुरक्षा और मानसिक स्थिति। वह वारदात की प्रत्यक्षदर्शी है, लेकिन भाई की धमकी और सदमे की वजह से कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है।

  • पुलिस को उसे काउंसलिंग और प्रोटेक्शन के साथ स्टेटमेंट दिलवाना होगा, ताकि अदालत में केस मजबूत रह सके।

कानूनी तौर पर—

  • आरोपी पर हत्या (302 IPC), साक्ष्य नष्ट करने (201 IPC), हथियार कानून और अन्य धाराओं में केस दर्ज होने की संभावना है।

  • कोर्ट में यह भी देखा जाएगा कि वारदात प्री-प्लांड थी या गुस्से में की गई, लेकिन शव काटने और ठिकाने लगाने जैसी तैयारी उसे “गंभीर और सोची-समझी साजिश” की तरफ ले जाती है।

पढ़ाई का दबाव, पीढ़ियों का कॉन्फ्लिक्ट और पैरेंटिंग पर बड़े सवाल

यह Lucknow patricide case सिर्फ एक आपराधिक खबर नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी भी है।

  • एक तरफ पिता, जो चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने, NEET की तैयारी करे और सुरक्षित करियर चुने।

  • दूसरी तरफ बेटा, जो अपनी अलग दुनिया – होटल, रेस्टोरेंट और बिजनेस – का सपना देख रहा था।

दोनों के बीच बातचीत का पुल शायद समय रहते नहीं बन पाया।
नतीजा यह हुआ कि—

  • वर्षों से जमा दबाव,

  • करियर को लेकर खटास,

  • और आपसी भरोसे की कमी मिलकर एक ऐसी चरम सीमा पर पहुंच गई, जहां बेटा अपने ही पिता का दुश्मन बन बैठा।

अकेली माता-पिता वाली फैमिली, युवाओं पर करियर का प्रेशर, सोशल मीडिया से उपजी “फास्ट सक्सेस” की चाह—ये सब फैक्टर ऐसे मामलों में कहीं न कहीं दिखते हैं।

यह केस सवाल छोड़ जाता है कि—

  • क्या हम बच्चों से संवाद पर्याप्त कर रहे हैं?

  • क्या हम उनकी पसंद-नापसंद सुने बिना उन्हें अपने अधूरे सपने पूरे करने का माध्यम बना रहे हैं?

  • और अगर कोई बच्चा पहले से ही विरोध दर्ज करा चुका हो (जैसे अक्षत की पुरानी छह पन्नों की चिट्ठी), तो क्या उस संकेत को हमने हल्के में लिया?

इन सवालों के जवाब सिर्फ इस केस की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी सुरक्षा से जुड़े हैं।

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