Bank Mis-Selling: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को बैंकों को साफ संदेश दिया कि वे ग्राहकों को जबरन इंश्योरेंस और दूसरे फाइनेंशियल प्रोडक्ट बेचने की बजाय अपने मूल काम – यानी सुरक्षित और पारदर्शी बैंकिंग – पर ध्यान दें। उन्होंने चेतावनी दी कि bank mis-selling अब बर्दाश्त नहीं होगी। वित्त मंत्रालय ने भी बैंकों और बीमा कंपनियों से कहा है कि वे गलत या अनावश्यक पॉलिसी बेचकर लोगों को आर्थिक नुकसान न पहुंचाएं।
बैंकों को सीतारमण की दो-टूक: ‘मुख्य बिजनेस पर फोकस करो, बेवजह पॉलिसी मत बेचो’
RBI के सेंट्रल बोर्ड की मीटिंग के बाद मीडिया से बातचीत में निर्मला सीतारमण ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें लंबे वक्त से शिकायत रही है कि बैंक अपने कोर बिजनेस से ज्यादा समय इंश्योरेंस पॉलिसी बेचने में लगा रहे हैं।
उनके मुताबिक—
कई शाखाओं में स्टाफ का फोकस लोन, सेविंग और डिजिटल सुविधा की बजाय पॉलिसी बेचने पर ज्यादा होता है।
इससे न सिर्फ ग्राहक परेशान होते हैं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है।
सीतारमण ने कहा कि बैंकों को यह समझना होगा कि ग्राहक बैंक में FD, लोन या अकाउंट सर्विस के लिए आते हैं, न कि हर बार नई पॉलिसी खरीदने के लिए।
RBI की ड्राफ्ट गाइडलाइंस: गलत प्रोडक्ट बेचा तो पूरी रकम के साथ मुआवजा भी देना होगा
11 फरवरी को RBI ने मिस-सेलिंग पर सख्त ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी कीं। इसमें साफ कहा गया कि अगर कोई बैंक ग्राहक को गलत या भ्रामक जानकारी देकर कोई प्रोडक्ट बेचता है, तो—
ग्राहक द्वारा चुकाई गई पूरी रकम वापस करनी होगी।
साथ ही, बैंक की पॉलिसी के अनुसार ग्राहक को अतिरिक्त मुआवजा भी देना पड़ सकता है।
बैंक को यह भी साबित करना होगा कि उसने प्रोडक्ट बेचते समय पूरी जानकारी दी थी और ग्राहक ने स्वेच्छा से सहमति दी।
इन ड्राफ्ट नियमों पर आम नागरिक और स्टेकहोल्डर्स 4 मार्च तक अपने सुझाव दे सकेंगे। इसके बाद RBI अंतिम गाइडलाइंस नोटिफाई करेगा, जो बैंकिंग सेक्टर के लिए नया मानक तय करेंगी।
मिस-सेलिंग क्या है और कैसे होती है?
बैंक में FD या लोन के लिए गए, पर साथ में थमा दी गई इंश्योरेंस पॉलिसी
आम तौर पर मिस-सेलिंग तब होती है जब—
ग्राहक किसी और काम से बैंक जाता है, जैसे FD करना, होम/कार लोन लेना या अकाउंट खुलवाना।
वहां बैंक कर्मचारी उसे बताते हैं कि लोन मंजूर कराने या FD पर बेहतर ब्याज के लिए लाइफ या हेल्थ इंश्योरेंस लेना अनिवार्य है।
कई बार ग्राहकों को यह भी कहा जाता है कि “ऊपर से ऑर्डर है”, “सिस्टम में बिना पॉलिसी के लोन पास नहीं होगा” या “ये सिर्फ एक फॉर्मेलिटी है, बाद में बंद कर देंगे।”
असल में इनमें से अधिकतर दावे सच नहीं होते। RBI और IRDAI के नियमों के मुताबिक, अधिकांश लोन के लिए इंश्योरेंस लेना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। लेकिन टारगेट और कमीशन के दबाव में कर्मचारी अधूरी या गलत जानकारी देकर प्रोडक्ट ठूंस देते हैं – यही bank mis-selling है।
टारगेट और कमीशन की दौड़ ने बढ़ाई bank mis-selling
‘क्रॉस सेलिंग’ से ‘फोर्स्ड सेलिंग’ तक का सफर
पिछले कुछ सालों में बैंकों की कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज से नहीं, बल्कि थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट्स – जैसे इंश्योरेंस, म्यूचुअल फंड और क्रेडिट कार्ड – बेचने से भी आने लगा है।
हेड ऑफिस से हर शाखा को इंश्योरेंस प्रीमियम, नई पॉलिसी या म्यूचुअल फंड सेल के टारगेट दिए जाते हैं।
टारगेट पूरा न होने पर शाखा और कर्मचारियों की रेटिंग प्रभावित होती है, इंसेंटिव और प्रमोशन पर भी असर पड़ता है।
नतीजा यह कि कई जगह कर्मचारी “क्रॉस सेलिंग” के नाम पर जरूरत और क्षमता देखे बिना हर ग्राहक को पॉलिसी बेचने की कोशिश करते हैं।
यानी जहां क्रॉस सेलिंग का मकसद था ग्राहक को सही प्रोडक्ट से जोड़ना, वहीं कई जगह यह फोर्स्ड सेलिंग या मिस-सेलिंग में बदल गया है।
IRDAI के आंकड़े: शिकायतों में bank mis-selling का हिस्सा 22% से ज्यादा
कुल शिकायतें कम नहीं हुईं, अनफेयर बिजनेस प्रैक्टिस के केस बढ़े
बीमा नियामक IRDAI की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ शिकायतों की संख्या अभी भी ऊंचे स्तर पर है।
FY25 में कुल 1,20,429 शिकायतें दर्ज हुईं, जो पिछले साल की 1,20,726 शिकायतों के लगभग बराबर हैं। यानी शिकायतों का स्तर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है।
Unfair Business Practice (UFBP) से जुड़ी शिकायतें – जिनमें मिस-सेलिंग भी शामिल है – 23,335 से बढ़कर 26,667 हो गईं।
कुल शिकायतों में मिस-सेलिंग जैसे मामलों की हिस्सेदारी 19.33% से बढ़कर 22.14% हो गई।
ये आंकड़े बताते हैं कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद गलत तरीके से पॉलिसी बेचने की प्रवृत्ति थमी नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ रही है।
मिस-सेलिंग के शिकार ग्राहक को क्या नुकसान होता है?
बेकार पॉलिसी, लॉक-इन पीरियड और क्लेम के समय बड़ा झटका
जब किसी ग्राहक को उसकी जरूरत और प्रोफाइल के खिलाफ पॉलिसी बेच दी जाती है, तो नुकसान कई स्तर पर होता है—
गलत प्रोडक्ट:
युवा ग्राहक को महंगा पारंपरिक प्लान,
बुजुर्ग को लंबी लॉक-इन वाली पॉलिसी,
या छोटे व्यापारी को हाई रिस्क इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट बेच दिया जाता है।
प्रीमियम का बोझ:
EMI और घर के खर्च के साथ हर साल या हर महीने अतिरिक्त प्रीमियम देना पड़ता है।
कई बार लोग 1–2 साल बाद प्रीमियम देना बंद कर देते हैं और पॉलिसी लैप्स हो जाती है, जिससे दिया गया पैसा भी डूब जाता है।
क्लेम रिजेक्शन का खतरा:
जब पॉलिसी बेचते समय हेल्थ या इनकम डिटेल सही नहीं भरी जाती, तो क्लेम के समय बीमा कंपनी इसे आधार बनाकर दावा ठुकरा सकती है।
ऐसे में परिवार को उस समय सहारा नहीं मिलता, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
यही वजह है कि वित्त मंत्री ने बैंकिंग सिस्टम से कहा कि वे ग्राहकों के भरोसे के साथ खिलवाड़ न करें।
वित्त मंत्रालय, RBI और IRDAI की संयुक्त जिम्मेदारी
‘ग्राहक हित सर्वोपरि’ का संदेश
सीतारमण की फटकार के बाद वित्त मंत्रालय ने भी बैंकों और बीमा कंपनियों दोनों को मैसेज दिया है कि—
मिस-सेलिंग के मामलों को गंभीरता से लें।
शाखा स्तर पर ही नहीं, बोर्ड स्तर पर भी प्रोडक्ट की समीक्षा और मॉनिटरिंग का सिस्टम मजबूत करें।
कर्मचारियों के इंसेंटिव स्ट्रक्चर को ऐसा बनाएं कि उन्हें सिर्फ बेचने पर नहीं, बल्कि सही सलाह देने पर भी प्रोत्साहन मिले।
RBI की ड्राफ्ट गाइडलाइंस और IRDAI के अलग-अलग सर्कुलर मिलकर एक ऐसा फ्रेमवर्क बना सकते हैं, जिसमें ग्राहक को गलत सलाह देकर प्रोडक्ट बेचना बैंकों के लिए महंगा सौदा साबित हो।
बैंकों के लिए नया संकेत: क्रॉस-सेलिंग चलेगी, लेकिन पारदर्शी और ज़रूरत के हिसाब से
‘हर ग्राहक को पॉलिसी मत थमाओ’ – यही है मूल संदेश
सरकार और रेगुलेटर्स यह नहीं कह रहे कि बैंक इंश्योरेंस या म्यूचुअल फंड न बेचें। आज के दौर में बैंक-एश्योरेंस और थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट्स, बैंकों और ग्राहकों दोनों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं – बशर्ते कि—
ग्राहक की उम्र, आय, जोखिम क्षमता और फैमिली जरूरतों के हिसाब से सही प्रोडक्ट चुना जाए।
फॉर्म भरते समय सभी शर्तें स्पष्ट रूप से समझाई जाएं।
पॉलिसी ‘लोन पाने की मजबूरी’ या ‘FD पर अच्छा रिटर्न’ की शर्त बनकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र फाइनेंशियल फैसले के रूप में बेची जाए।
यानी cross selling ठीक है, लेकिन bank mis-selling नहीं चलेगी।
मिस-सेलिंग पकड़ी गई तो बैंकों पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
रिफंड, पेनल्टी, ऑडिट और ब्रांच स्तर पर जिम्मेदारी तय
नए ड्राफ्ट नियमों और मौजूदा कानून के तहत—
गलत तरीके से बेचा गया प्रोडक्ट रद्द किया जा सकता है।
ग्राहक को पूरी रकम और उचित मुआवजा लौटाया जा सकता है।
RBI और IRDAI, दोनों बैंक और बीमा कंपनी पर मौद्रिक जुर्माना (monetary penalty) लगा सकते हैं।
शाखा स्तर पर जिम्मेदार अफसरों पर डिसिप्लिनरी एक्शन, इंक्रीमेंट रोकने, ट्रांसफर या सस्पेंशन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
बार-बार शिकायत मिलने पर बैंक की कॉरपोरेट गवर्नेंस पर भी सवाल उठेंगे और उसे सख्त सुपरविजन में रखा जा सकता है।
यानी आने वाले समय में मिस-सेलिंग सिर्फ ग्राहक के लिए नहीं, खुद बैंकों के लिए भी भारी जोखिम बनती जा रही है।
ग्राहकों के लिए चेकलिस्ट: बैंक जाएं तो किन बातों का ध्यान रखें
‘ना’ कहना सीखना भी फाइनेंशियल प्लानिंग का हिस्सा है
जहां जरूरत न हो, साफ मना करें
अगर बैंक कर्मचारी लोन या FD के साथ पॉलिसी लेने का दबाव बना रहे हों, तो पूछें – “क्या यह कानूनी रूप से अनिवार्य है?” अगर वह लिखित में देने को तैयार न हो, तो बेझिझक मना कर दें।डॉक्युमेंट्स ध्यान से पढ़ें
प्रस्ताव फॉर्म (proposal form) पर हस्ताक्षर करने से पहले सभी कॉलम पढ़ें। मेडिकल हिस्ट्री, इनकम, नॉमिनी आदि से जुड़े सवाल सही-सही भरें।फ्री-लुक पीरियड का फायदा उठाएं
पॉलिसी मिलने के बाद 15–30 दिन (कंपनी के हिसाब से) का फ्री-लुक पीरियड होता है। अगर लगे कि प्रोडक्ट आपकी जरूरत के अनुकूल नहीं है, तो इस अवधि में पॉलिसी वापस की जा सकती है।सबूत संभालकर रखें
बैंक से हुई बातचीत के ईमेल, SMS, व्हाट्सऐप चैट या ब्रॉशर की कॉपी हमेशा अपने पास रखें। बाद में विवाद होने पर यही सबूत काम आते हैं।
शिकायत दर्ज करने से लेकर मुआवजा पाने तक के स्टेप
सबसे पहले बैंक शाखा में लिखित शिकायत दें
ब्रांच मैनेजर को लिखित रूप से बताएं कि पॉलिसी या प्रोडक्ट आपको जोर-जबरदस्ती से बेचा गया।
रिसीविंग पर दिनांक और स्टाफ के हस्ताक्षर जरूर लें।
बैंक की इंटरनल ग्रिवांस सेल तक मामला पहुंचाएं
निर्धारित समय (आमतौर पर 30 दिन) में जवाब न मिले तो बैंक के नोडल ऑफिसर या हेड ऑफिस की शिकायत सेल को मेल/पत्र भेजें।
बीमा कंपनी और IRDAI पोर्टल पर कंप्लेंट दर्ज करें
अगर मामला इंश्योरेंस प्रोडक्ट से जुड़ा है, तो बीमा कंपनी के ग्रिवांस पोर्टल और IRDAI के इंटीग्रेटेड पोर्टल पर शिकायत दर्ज की जा सकती है।
RBI के बैंकिंग लोकपाल या इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के पास जाएं
बैंक की तरफ से संतोषजनक समाधान न मिले तो आप RBI के बैंकिंग लोकपाल या इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के सामने केस रख सकते हैं।
यहां बिना कोर्ट गए, कम खर्च में विवाद सुलझाया जा सकता है।
ज़रूरत पड़े तो कंज्यूमर कोर्ट का रास्ता खुला है
अंतिम विकल्प के रूप में उपभोक्ता आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) में भी मिस-सेलिंग के खिलाफ केस किया जा सकता है।
डिजिटल युग में bank mis-selling के नए तरीके
फोन कॉल, UPI और मोबाइल ऐप के जरिए भी धड़ल्ले से प्रोडक्ट बेचे जा रहे
आज मिस-सेलिंग सिर्फ शाखा तक सीमित नहीं है।
रोजाना आने वाले फोन कॉल – “सर, आपके अकाउंट पर फ्री इंश्योरेंस ऑफर है, बस OTP बताइए” – भी mis-selling की कड़ी हो सकते हैं।
मोबाइल बैंकिंग ऐप में “एक क्लिक में इंश्योरेंस” या “इंस्टेंट इंवेस्टमेंट” जैसे पॉप-अप ग्राहक को बिना जानकारी के प्रोडक्ट से जोड़ देते हैं।
कई बार ग्राहक समझ ही नहीं पाते कि उन्होंने किस राशि की और कितने समय की पॉलिसी सक्रिय कर दी है।
RBI और वित्त मंत्रालय अब इन डिजिटल चैनलों पर भी सख्त नजर रखना चाहते हैं, ताकि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सुविधा के लिए हो, धोखे के लिए नहीं।
आगे का रास्ता: पारदर्शिता और भरोसे पर टिकी होगी बैंकों की अगली ग्रोथ
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का संदेश साफ है –
भारत की बैंकिंग प्रणाली आज दुनिया की सबसे मजबूत और तेजी से बढ़ती सिस्टम में है।
अगर बैंक जिम्मेदारी से काम करें, तो वे करोड़ों लोगों के लिए फाइनेंशियल सिक्योरिटी और वेल्थ क्रिएशन का जरिया बन सकते हैं।
लेकिन अगर bank mis-selling जैसे व्यवहार जारी रहे, तो यही सिस्टम लोगों के लिए चिंता और अविश्वास की वजह भी बन सकता है।
RBI की नई गाइडलाइंस, IRDAI की सख्ती और वित्त मंत्रालय की स्पष्ट चेतावनी के बाद उम्मीद की जा रही है कि—
बैंकों के बिजनेस मॉडल में ग्राहक-केंद्रित सोच और मजबूत होगी,
प्रोडक्ट बेचने से पहले ‘फिट फॉर कस्टमर’ टेस्ट को और गंभीरता से लिया जाएगा,
और आम नागरिक भी अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा जागरूक होकर गलत प्रोडक्ट लेने से बच सकेंगे।
भरोसे की इस लड़ाई में जीत तभी होगी, जब बैंक, बीमा कंपनियां, रेगुलेटर्स और ग्राहक – सभी मिलकर समझें कि पारदर्शिता ही वित्तीय दुनिया की सबसे बड़ी गारंटी है।
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