44 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी, ममता के गढ़ में BJP की सीधी चुनौती Read it later

Bengal Election Candidates को लेकर सियासत तेज हो गई है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 144 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है, जिसमें सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम और भबानीपुर से टिकट मिला है। केरल में भी पार्टी ने 47 उम्मीदवार घोषित कर चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

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बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए BJP ने जारी की पहली Bengal Election Candidates की बड़ी सूची

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी कर दी है और इसके साथ ही राज्य की चुनावी राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। पार्टी ने पहली लिस्ट में 144 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं। इस सूची की सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि भाजपा ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी को एक नहीं, बल्कि दो बेहद अहम सीटों—नंदीग्राम और भबानीपुर—से टिकट दिया है। ये दोनों सीटें सीधे तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान और उनके प्रभाव से जुड़ी मानी जाती हैं।

भाजपा की इस सूची ने साफ संकेत दिया है कि पार्टी पश्चिम बंगाल में इस बार आक्रामक रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है। जिन सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं, उनमें कई ऐसी सीटें शामिल हैं जो प्रतीकात्मक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत अहम मानी जाती हैं। भाजपा ने उम्मीदवार चयन में उन इलाकों पर खास ध्यान दिया है जहां तृणमूल कांग्रेस का मजबूत आधार है या जहां मुकाबला हाई-प्रोफाइल बन सकता है।

सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम और भबानीपुर से टिकट, संदेश साफ

भाजपा की पहली सूची का सबसे बड़ा चेहरा सुवेंदु अधिकारी हैं। पार्टी ने उन्हें नंदीग्राम और भबानीपुर, दोनों सीटों से उम्मीदवार बनाया है। ये फैसला सामान्य राजनीतिक घोषणा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सीधा राजनीतिक संदेश समझा जा रहा है।

नंदीग्राम वही सीट है जहां 2021 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था। उस चुनाव ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी, क्योंकि नंदीग्राम का मुकाबला पूरे चुनाव का सबसे चर्चित चेहरा बन गया था। ममता बनर्जी ने उस समय अपनी पारंपरिक सीट छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया था, लेकिन उन्हें सुवेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा।

भाजपा का सुवेंदु को फिर नंदीग्राम से उतारना यह दिखाता है कि पार्टी उस जीत को सिर्फ अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि आगे की राजनीतिक लड़ाई का आधार मान रही है। वहीं भबानीपुर से टिकट देना और भी बड़ा संकेत है। भबानीपुर वही सीट है जहां नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी ने उपचुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की थी।

भबानीपुर क्यों बना सबसे चर्चित सीटों में से एक

भबानीपुर सीट को तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है। ममता बनर्जी 2011 से 2021 तक लगातार इसी सीट से विधायक रही हैं। बंगाल की राजनीति में भबानीपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की शहरी राजनीतिक पकड़ का प्रतीक भी मानी जाती है।

नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी ने भबानीपुर से उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। इस वजह से यह सीट राजनीतिक रूप से और ज्यादा संवेदनशील हो गई। भाजपा ने अब सुवेंदु अधिकारी को भबानीपुर से भी टिकट देकर मुकाबले को और तेज कर दिया है।

इस फैसले को पार्टी के उस प्रयास के रूप में देखा जा रहा है जिसमें वह ममता बनर्जी के सबसे प्रभावशाली इलाकों में सीधी चुनौती देना चाहती है। भबानीपुर पर भाजपा का फोकस यह दिखाता है कि पार्टी सिर्फ सीट जीतने के गणित तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बड़े राजनीतिक नैरेटिव को भी साधना चाहती है।

2021 के नंदीग्राम मुकाबले की याद फिर ताजा

सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी का नंदीग्राम मुकाबला 2021 के चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानियों में से एक था। सुवेंदु पहले तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता रहे थे, लेकिन बाद में भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने नंदीग्राम से ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया।

यही कारण है कि 2026 के चुनाव में जब भाजपा ने सुवेंदु को फिर नंदीग्राम से टिकट दिया, तो इस फैसले को 2021 के मुकाबले की अगली कड़ी की तरह देखा गया। भाजपा की रणनीति साफ दिखाई देती है—जहां 2021 में भावनात्मक, राजनीतिक और संगठनात्मक टकराव हुआ था, वहां 2026 में भी उसी प्रतीकात्मक लड़ाई को जिंदा रखा जाए।

नंदीग्राम सीट सिर्फ चुनावी परिणाम की दृष्टि से नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की सियासत की दिशा तय करने वाली सीटों में गिनी जाती है। इसलिए यहां उम्मीदवार चयन हमेशा बड़े संदेश के साथ देखा जाता है।

डायमंड हार्बर में भी BJP का फोकस, दीपक कुमार हालदार को टिकट

भाजपा ने डायमंड हार्बर से दीपक कुमार हालदार को उम्मीदवार बनाया है। यह सीट इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि यह इलाका ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र डायमंड हार्बर में आता है। ऐसे में भाजपा का यहां उम्मीदवार उतारना सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह भी एक रणनीतिक कदम है।

अभी इस सीट से तृणमूल कांग्रेस के पन्नालाल हलदर विधायक हैं। लेकिन भाजपा ने जिस तरीके से इस क्षेत्र पर ध्यान दिया है, उससे संकेत मिलता है कि पार्टी अभिषेक बनर्जी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी चुनौती खड़ी करना चाहती है। बंगाल की राजनीति में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ़ा है, ऐसे में डायमंड हार्बर का चुनावी महत्व और बढ़ जाता है।

दीपक कुमार हालदार की उम्मीदवारी इस बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखी जा रही है, जहां भाजपा उन क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहती है जिन्हें तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है।

दिलीप घोष को खड़गपुर सदर से मैदान में उतारा

भाजपा ने बंगाल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष को खड़गपुर सदर से टिकट दिया है। दिलीप घोष लंबे समय तक बंगाल में भाजपा के प्रमुख चेहरों में रहे हैं और संगठन विस्तार में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। खड़गपुर सदर सीट पर उनकी उम्मीदवारी पार्टी के लिए संगठन और पहचान दोनों स्तर पर अहम मानी जा रही है।

खड़गपुर क्षेत्र भाजपा के लिए पहले भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में दिलीप घोष को यहां उतारना यह दिखाता है कि पार्टी अनुभवी नेताओं को उन सीटों पर लगा रही है जहां उसे मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद है। बंगाल भाजपा की पहली सूची में बड़े नामों को शामिल करना पार्टी की गंभीर तैयारी की तरफ इशारा करता है।

बंगाल से पहले केरल में भी BJP ने खोले पत्ते

पश्चिम बंगाल से पहले भाजपा ने केरल विधानसभा चुनाव के लिए भी अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी की थी। पार्टी ने 140 में से 47 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं। केरल की राजनीति में भाजपा का हर चुनावी कदम इसलिए ध्यान खींचता है क्योंकि राज्य में मुकाबला परंपरागत रूप से वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन के बीच देखा जाता रहा है।

इस बार भाजपा ने केरल में भी कुछ अहम राजनीतिक संकेत दिए हैं। पार्टी ने राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर को नेमोम सीट से मैदान में उतारा है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेमोम सीट भाजपा के लिए प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों मायनों में खास रही है।

नेमोम सीट पर राजीव चंद्रशेखर, BJP की रणनीतिक चाल

राजीव चंद्रशेखर को नेमोम सीट से उम्मीदवार बनाया जाना भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है। चंद्रशेखर 2024 के लोकसभा चुनाव में तिरुवनंतपुरम सीट से कांग्रेस सांसद शशि थरूर के खिलाफ मैदान में उतरे थे, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद अब उन्हें विधानसभा चुनाव में नेमोम से उम्मीदवार बनाना यह दर्शाता है कि पार्टी उन्हें केरल की राजनीति में प्रमुख चेहरा बनाए रखना चाहती है।

नेमोम सीट भाजपा के लिए ऐतिहासिक महत्व भी रखती है। केरल विधानसभा के इतिहास में भाजपा ने 2016 में पहली बार इसी सीट को जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया था। इसलिए इस सीट पर उम्मीदवार चयन को सिर्फ स्थानीय समीकरण के तौर पर नहीं, बल्कि पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

पश्चिम बंगाल में 14 साल से ममता बनर्जी के सामने BJP मुख्य चुनौती

पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले 14 साल से ममता बनर्जी के नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2011 में वामपंथी शासन को समाप्त कर तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता हासिल की थी और तब से ममता बनर्जी लगातार मुख्यमंत्री बनी हुई हैं। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उन्होंने अपनी सत्ता बरकरार रखी।

अब 2026 का चुनाव उनके लिए सिर्फ एक और चुनाव नहीं, बल्कि लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है। यदि तृणमूल कांग्रेस इस बार भी जीतती है तो ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाली देश की पहली महिला होंगी।

यहीं भाजपा की चुनौती भी महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य में पिछले कुछ वर्षों में भाजपा मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में उभरी है। 2021 के चुनाव के बाद विधानसभा में भाजपा ने प्रमुख विपक्ष की भूमिका हासिल की और अब वह उसी आधार को और मजबूत करना चाहती है।

ममता बनर्जी और लगातार चौथी पारी का सवाल

2026 का बंगाल चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि यह ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत से जुड़ा हुआ है। यदि वह फिर सत्ता में लौटती हैं तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। जयललिता के नाम तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने का पांच बार का रिकॉर्ड है, लेकिन वे 1991 से 2016 तक अलग-अलग कार्यकालों में मुख्यमंत्री रहीं, लगातार नहीं।

इस संदर्भ में ममता बनर्जी की संभावित चौथी लगातार जीत उन्हें अलग राजनीतिक श्रेणी में खड़ा कर सकती है। भाजपा इसी संभावना को चुनौती देने के लिए अपनी रणनीति बना रही है और टिकट वितरण में भी उसी हिसाब से चेहरे सामने ला रही है।

केरल में लेफ्ट का गढ़ और सत्ता परिवर्तन की परंपरा

केरल की राजनीति पश्चिम बंगाल से अलग तरह की है। यह देश का इकलौता राज्य है जहां फिलहाल लेफ्ट सत्ता में है। लंबे समय तक यहां हर पांच साल में सत्ता बदलने की परंपरा रही है। कभी वाम मोर्चा, तो कभी कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार में आता रहा।

लेकिन 2021 में इस ट्रेंड को तोड़ते हुए वाम मोर्चा यानी एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। यह केरल की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ माना गया, क्योंकि लंबे समय से वहां सत्ता परिवर्तन लगभग तय माना जाता था। अब कांग्रेस गठबंधन की कोशिश रहेगी कि वह इस बार एंटी-इनकम्बेंसी को भुना सके।

इसी बीच भाजपा भी अपने लिए जगह बनाने की कोशिश में लगी है। इसलिए केरल में उम्मीदवार सूची जारी होना वहां के त्रिकोणीय राजनीतिक विमर्श को और ज्यादा दिलचस्प बनाता है।

केरल में BJP की राजनीतिक यात्रा और नए संकेत

केरल में भाजपा की विधानसभा उपस्थिति 2016 में पहली बार दर्ज हुई थी, जब पार्टी ने नेमोम सीट जीतकर इतिहास बनाया था। इसके बाद राज्य में भाजपा का वोट आधार धीरे-धीरे चर्चा में आया, हालांकि पार्टी अब तक बड़े स्तर पर विधानसभा सफलता नहीं दोहरा सकी है।

फिर 2024 में सुरेश गोपी केरल से चुने जाने वाले भाजपा के पहले सांसद बने। यह उपलब्धि भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों रूप से बड़ी थी। इसके अलावा दिसंबर 2025 में भाजपा ने पहली बार त्रिवेंद्रम यानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम का चुनाव भी जीता। इन घटनाओं ने राज्य में पार्टी के आत्मविश्वास को बढ़ाया है।

इसी पृष्ठभूमि में राजीव चंद्रशेखर को नेमोम से उम्मीदवार बनाना और 47 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करना भाजपा के विस्तार प्रयासों का हिस्सा माना जा रहा है।

चुनाव आयोग की निगरानी, 100 मिनट में कार्रवाई का दावा

चुनावी राज्यों में सिर्फ राजनीतिक गतिविधि ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक तैयारी भी तेज हो चुकी है। चुनाव आयोग ने सोमवार को बताया कि चुनावी राज्यों में 5,173 से ज्यादा फ्लाइंग स्क्वॉड तैनात किए गए हैं। इन स्क्वॉड का उद्देश्य चुनाव से जुड़ी शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करना है। आयोग ने कहा है कि शिकायतों पर 100 मिनट के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी।

इसके अलावा 5,200 से ज्यादा स्टैटिक सर्विलांस टीमें यानी SST भी तैनात की गई हैं। इन टीमों का काम चुनाव के दौरान निगरानी, चेकिंग और संवेदनशील गतिविधियों पर नजर रखना होता है। यह व्यवस्था चुनावी निष्पक्षता को मजबूत करने के लिए बेहद अहम मानी जाती है।

चुनाव आयोग की यह तैयारी बताती है कि इस बार चुनाव सिर्फ राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि प्रशासनिक पैमाने पर भी बेहद व्यापक ढंग से संचालित किए जा रहे हैं।

पांच राज्यों और पुडुचेरी में वोटिंग की पूरी तस्वीर

चुनावी कार्यक्रम के तहत पश्चिम बंगाल में मतदान दो चरणों में कराया जाएगा। यहां 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। राज्य के पिछले चुनावी अनुभव और सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए यह चरणबद्ध मतदान अहम माना जा रहा है।

केरल और असम में मतदान एक ही चरण में 9 अप्रैल को होगा। पुडुचेरी में भी वोटिंग 9 अप्रैल को ही होगी। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान कराया जाएगा। इन तारीखों ने पूरे दक्षिण और पूर्व भारत की राजनीति को चुनावी मोड में ला दिया है।

चारों राज्यों और पुडुचेरी में मतगणना 4 मई को होगी। यानी उसी दिन यह साफ हो जाएगा कि किन राज्यों में कौन सी पार्टी या गठबंधन सत्ता के सबसे करीब पहुंचा है।

छह राज्यों की सीटों पर उपचुनाव भी साथ में

इन विधानसभा चुनावों के साथ-साथ छह राज्यों की कुछ सीटों पर उपचुनाव भी कराए जा रहे हैं। गोवा, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नागालैंड और त्रिपुरा की कुल छह सीटों पर वोटिंग होगी। इससे चुनावी माहौल और व्यापक हो गया है।

उपचुनावों का असर भले राज्य सरकारों की सत्ता पर सीधे न पड़े, लेकिन ये चुनाव स्थानीय राजनीतिक संदेश, संगठन की ताकत और मतदाताओं के मूड को समझने के लिहाज से बहुत अहम होते हैं। इसलिए राजनीतिक दल विधानसभा चुनावों के साथ-साथ इन सीटों पर भी पूरी सक्रियता दिखा रहे हैं।

BJP की पहली सूची से क्या संदेश निकलता है

भाजपा की पहली सूची को अगर व्यापक नजरिये से देखा जाए तो इसमें तीन बड़े राजनीतिक संदेश साफ दिखाई देते हैं। पहला, पार्टी पश्चिम बंगाल में प्रतीकात्मक और हाई-प्रोफाइल सीटों पर सीधी टक्कर चाहती है। दूसरा, वह ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुकाबले को धार देना चाहती है। तीसरा, पार्टी अनुभवी और पहचान वाले चेहरों को रणनीतिक सीटों पर उतार रही है।

सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, दीपक कुमार हालदार जैसे नामों का चयन यही संकेत देता है कि भाजपा सिर्फ संख्या के हिसाब से सूची जारी नहीं कर रही, बल्कि हर सीट के पीछे राजनीतिक संदेश भी जोड़ रही है। केरल में राजीव चंद्रशेखर को उतारना भी इसी श्रेणी में आता है।

TMC, Left, Congress और BJP के बीच अलग-अलग राज्यों में अलग समीकरण

इन चुनावों की खास बात यह है कि हर राज्य में मुकाबले की प्रकृति अलग है। पश्चिम बंगाल में मुख्य लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्रित दिखती है। केरल में पारंपरिक रूप से वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन मुख्य खिलाड़ी हैं, जबकि भाजपा तीसरी ताकत के रूप में अपनी जगह बनाना चाहती है।

असम में सत्ता और विपक्ष का संघर्ष अलग समीकरण बनाता है। तमिलनाडु और पुडुचेरी में स्थानीय गठबंधनों और क्षेत्रीय दलों की भूमिका प्रमुख रहती है। इसलिए भले चुनाव कार्यक्रम एक साथ घोषित हुए हों, लेकिन हर राज्य की राजनीतिक जमीन अलग रंग और अलग तापमान लिए हुए है।

भाजपा की उम्मीदवार सूची इस बात का उदाहरण है कि पार्टी हर राज्य में स्थानीय और प्रतीकात्मक दोनों तरह के तत्वों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही है।

बंगाल की पहली सूची ने चुनावी बहस को क्यों बदल दिया

पश्चिम बंगाल में भाजपा की पहली सूची ने चुनावी बहस का केंद्र बदल दिया है। अब चर्चा सिर्फ इस बात की नहीं है कि किस सीट पर कौन जीतेगा, बल्कि इस बात की भी है कि किन सीटों को पार्टी ने राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया है। नंदीग्राम, भबानीपुर, डायमंड हार्बर और खड़गपुर सदर जैसी सीटों पर उम्मीदवार चयन ने चुनाव को स्थानीय मुद्दों से ऊपर उठाकर बड़े राजनीतिक फ्रेम में ला खड़ा किया है।

भाजपा यह दिखाना चाहती है कि वह बंगाल में मुकाबले को सीधे शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव वाले क्षेत्रों तक ले जाने को तैयार है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के लिए यह अपने गढ़ों की रक्षा और अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करने की चुनौती होगी।

आगे क्या होगा, नजरें अगली सूचियों और प्रचार पर

पहली सूची जारी होने के बाद अब नजरें इस बात पर रहेंगी कि बाकी सीटों पर भाजपा किन चेहरों को मौका देती है और अन्य दल अपनी रणनीति कैसे तय करते हैं। यह भी देखा जाएगा कि तृणमूल कांग्रेस अपने गढ़ों को बचाने के लिए किस तरह प्रत्याशी चयन और प्रचार रणनीति बनाती है।

केरल में भी भाजपा की पहली सूची के बाद बाकी दलों की तैयारी पर ध्यान बढ़ेगा। खासतौर पर नेमोम जैसी सीटों पर मुकाबला किस दिशा में जाता है, यह चुनावी विश्लेषण का अहम विषय रहेगा।

चुनाव कार्यक्रम, प्रशासनिक निगरानी, उम्मीदवारों की पहली सूची और हाई-प्रोफाइल सीटों पर मुकाबले की संभावनाओं ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले हफ्तों में बंगाल और केरल दोनों जगह सियासी तापमान तेजी से बढ़ने वाला है। भाजपा ने अपनी पहली सूची से शुरुआती चाल चल दी है, अब जवाबी रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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