Rajasthan Election:पायलट के विरोध के बाद भी धारीवाल को टिकट कैसे मिल गया, समझिए Read it later

Rajasthan Election: काफी दिनों तक कांग्रेस के आलाकमान ने माथापच्‍ची के बाद आखिरकार घूम फ‍िर के शांति धारीवाल को टिकट दे ही दिया। प्रदेश कांग्रेस के अंदरखाने की खबर से कयास लगाए जा रहे है कि पार्टी को उनका विकल्‍प नहीं मिल पाया।

बता दें कि कांग्रेस नेता शांति धारीवाल को पार्टी ने कोटा (उत्तर) से फ‍िर टिकट दिया है। जबकि दूसरी ओर सचिन पायलट 2 साल पहले सीएलपी बैठक में नहीं आने के कारण धारीवाल पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर रहे थे। पायलट का अप्रत्‍यक्ष तौर पर संदेश था कि शांति धारीवाल को टिकट न दिया जाए। आलाकमान भी सचिन पायलट से सहमत था, लेकिन अंतिम समय में धारीवाल बाजी मार गए।

अब धारीवाल का टिकट फाइनल होने के बाद प्रदेश कांग्रेस के भीतर यह कानाफूसी चल रही है कि कुछ भी हो गहलोत ने प्रदेश की राजनीति में अपना रास्‍ता बना लिया है। यही कारण है कि अब गहलोत अपने वादे को निभाने के लिए गारंटी के तौर पर ब्रांडिंग में जुट गए हैं।

गहलोत राजनीति के खेले खिलाए खिलाड़ी

Rajasthan Election: सतही तौर पर यह बात फैलती दिख रही है कि टिकट बंटवारे में सीएम का ही पूरी तरह नियंत्रण नहीं रहा। लेकिन प्रदेश राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि गहलोत राजनीति के खेले खिलाए खिलाड़ी है वे जानते है कि आलाकमान की कौनसी नस दबानी है। आखिर गहलोत को यूं ही जादूगर नहीं कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर टिकट बंटवारे में गहलोत के दखल की खबर को गलत साबित करने के लिए महेश जोशी का टिकट काटना पड़ा, जोशी भी गहलोत के करीबी होने के चलते चुप रहे शायद इस आस में कि अंतिम समय में ट‍िकट मिल जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

टिकट बंटवारे पर नियंत्रण न होकर भी गहलोत का रहा प्रभाव

अब जोशी का टिकट कटने के बाद माना जा रहा है कि कांग्रेस के हितेशी यह साबित करने में कामयाब रहे कि टिकट बंटवार में गहलोत नियंत्रण नहीं था, इसका उदाहरण वे इस बात से दे रहे हैं कि यदि गहलोत का नियंत्रण टिकट बंटवारे पर होता तो धारीवाल की तरह जोशी को भी टिकट मिल जाता। (Rajasthan Election) लेकिन गहलोत को करीब से जानने वाले बखूबी मानते हैं कि गहलोत के मशविरे के बिना आलाकमान की ओर से टिकट बंटवारा संभव ही नहींं था, क्‍योंकि जादूगर ने पहले से ही गोटियां अपने तरीके से जमा रखीं थीं।

बता दें कि जोशी ने सीएलपी के विरुद्ध विद्रोह किया था वे सीएम गहलोत के करीबी भी बताए जाते हैं। (Rajasthan Election) उन्हें इस बार टिकट से मेहरूम कर दिया गया है। ऐसे में पार्टी नेताओं के भीतर भी गहलोत को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। गहलोत और पायलट में जोर आजमाइश की झलक साफ दिख रही है।

आलाकमान की नजर में गहलोत ही प्रदेश में कांग्रेस के बेहतर विकल्प

न्यूज 18 की रिपोर्ट की मानें तो राजस्थान में (Rajasthan Election) कांग्रेस की स्‍ट्रेटेजी में इस बार बदलाव दिखा है। कांग्रेस आलाकमान भी यह जानता है कि बदलाव की हवा में तेजी है, ऐसे में कांग्रेस भी बीजेपी की तरह किसी मुख्यमंत्री पद के चेहरे का नाम बताने या पेश करने से बच रही है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस आलाकमान जानता है कि गहलोत से बेहतर विकल्‍प प्रदेश में अभी कोई नहीं है, फ‍िर भी सीएम का चेहरा घोषित किए बिना ही आलाकमान गहलोत को ऐसी इमेज के तौर पर जनता के बीच प्रस्‍तुत कर रहा है जो अपने दम पर पार्टी को साथ लेकर चलने का मादा रखता है।

क्‍या सत्ता परिवर्तन के चलन को रोक पाएंगे गहलोत ? (Rajasthan Election)

कुल मिलाकर राजस्‍थान में कांग्रेस विधायकों की खींचतान के बीच यहां की विधानसभा चुनाव की जंग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए करो या मरो की जंग बन चुका है। क्‍योंकि काफी लंबे समय से राजस्‍थान में हर 5 साल में सत्ता परिवर्तन का चलन रहा है। गहलोत इसी परीपाटी को बदलने का प्रयास कर रहे हैं और यूपी की योगी सरकारी तर्ज पर सरकार रिपीट करना चाहते हैं। लेकिन इस रहा तें गहलोत के लिए मुश्किलें कुछ कम नहीं है बल्कि और बढ़ाने वाली है। इसकी वजह के लिए आपको पांच साल पीछे जाना होगा।

गहलोत तुमसे बैर नहीं, विधायकों तुम्हारी खैर नहीं का नारा

दरअसल राजस्थान में 2018 के इलेक्शन (Rajasthan Election) के दौरान एक नारा खूब चर्चित हुआ था- ‘मोदी तुमसे बैर नहीं, वसुंधरा तुम्हारी खैर नहीं।’ अब यही नारा कांग्रेस की गहलोत सरकार पर नए तरीके से लागू किया जा रहा है कि फर्क इतना है कि इस नारे में वसुंधरा की जगह कांग्रेस के विधायक है। ये नया नारा है – ‘गहलोत तुमसे बैर नहीं, विधायकों तुम्हारी खैर नहीं।’ सीधे शब्दों में माना जा सकता है कि यह नारा कांग्रेस आलाकमान को संदेश है।

क्‍या जनता के बीच चल पााएगी जादूगर की जादूगरी

जनता के बीच सीएम की तुलना में मौजूदा मंत्रियों और विधायकों को लेकर ज्‍यादा विद्रोह दिख रहा है। कमाल की बात तो यह है कि हाइकमान ने टिकट बंटवारे में गहलोत के दखल के बगैर भी गहलोत के चहेतों को फि‍र से टिकट दे दिया। अब देखने वाली बात ये होगी कि गहलोत जनता के बीच अपनी गारंटी योजनाओं की जादूगरी चलाकर सीएम की कुर्सी को बचा पाएंगे।

 

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