Shankaracharya Dispute प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच टकराव अब कानूनी मोड़ ले चुका है। नोटिस को असंवैधानिक बताते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने मानहानि केस की चेतावनी दी है, वहीं संत समाज के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
नोटिस पर भड़के शंकराचार्य, केस की चेतावनी
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रयागराज मेला प्रशासन को साफ चेतावनी दी है कि यदि उन्हें जारी किया गया नोटिस वापस नहीं लिया गया, तो वे प्रशासन के खिलाफ मानहानि (Defamation Case) दर्ज कराएंगे।
मंगलवार रात करीब 10 बजे उन्होंने अपने प्रतिनिधि के माध्यम से मेला प्रशासन को 8 पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा। जब कार्यालय में कोई अधिकारी नहीं मिला, तो जवाब को नोटिस की ही तरह चस्पा कर दिया गया। बाद में SDM के निर्देश पर इसे हटवा दिया गया। इसके साथ ही यह जवाब ई-मेल के जरिए भी आधिकारिक रूप से भेजा गया।
नोटिस को बताया दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक
अपने जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने नोटिस को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक बताया। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि—
सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं है, जो मुझे शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोकता हो। मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए किसी तीसरे पक्ष को हस्तक्षेप या टिप्पणी का अधिकार नहीं है।
दरअसल, मेला प्रशासन ने 14 अक्टूबर 2022 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए सवाल किया था कि उन्होंने स्वयं को शंकराचार्य कैसे घोषित किया।
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द्वारका पीठ के शंकराचार्य का तीखा बयान
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान से रोके जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने प्रशासन से माफी की मांग करते हुए कहा—
ब्राह्मणों को पुलिस ने चोटी पकड़कर घसीटा। यह शासन का अहंकार है। गंगा स्नान से रोकना गो-हत्या जैसा पाप है। सत्ता हमेशा नहीं रहती।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वे और अविमुक्तेश्वरानंद दोनों स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और उनके निधन के बाद साथ-साथ शंकराचार्य बने थे।
रामभद्राचार्य का उलटा रुख – बोले शंकराचार्य ने खुद अन्याय किया
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इस पूरे विवाद में अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद के साथ अन्याय नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने स्वयं अन्याय किया है।
गंगा स्नान के लिए पालकी से जाना कोई नियम नहीं है। हम भी पैदल ही जाते हैं। सरकार ने खुद को शंकराचार्य सिद्ध करने के लिए सही नोटिस जारी किया है।
#WATCH | Gwalior | On Swami Avimukteshwaranand, Spiritual Leader Jagadguru Rambhadracharya says,” He was not subjected to injustice, but he has done injustice. The rule is that one cannot travel to Ganga ghat using a chariot. Police had stopped him. We too go to Sangam on foot.… pic.twitter.com/Eai4nlxGs8
— ANI (@ANI) January 21, 2026
समझिए पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ
मौनी अमावस्या को अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में गंगा स्नान के लिए निकले, पुलिस ने पैदल जाने को कहा।
विरोध के दौरान समर्थकों और पुलिस में धक्का-मुक्की हुई, पालकी रोकी गई।
नाराज शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।
सोमवार रात कानूनगो अनिल कुमार नोटिस लेकर पहुंचे, शिष्यों ने रात में लेने से मना किया।
मंगलवार सुबह नोटिस गेट पर चस्पा किया गया; ज्योतिषपीठ की पदवी को लेकर मामला पहले से कोर्ट में लंबित है।
शंकराचार्य पद को लेकर पुराना विवाद
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ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और वासुदेवानंद के बीच पहले से विवाद चल रहा है। यह मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है, इसी आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन के हस्तक्षेप पर सवाल उठाए हैं।
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प्रयागराज माघ मेले से शुरू हुआ यह विवाद अब धार्मिक मर्यादा, प्रशासनिक अधिकार और कानूनी दायरे तक पहुंच चुका है। जहां एक ओर शंकराचार्य मानहानि केस की तैयारी में हैं, वहीं संत समाज के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
चंद्रशेखर का आरोप: चोटी उखाड़ना तानाशाही की निशानी
सांसद चंद्रशेखर ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों के साथ हुई कथित बदसलूकी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य समर्थकों की चोटी उखाड़ी गई, और अगर इसे सरकार की तानाशाही नीति नहीं कहा जाएगा तो फिर क्या कहा जाएगा।
चंद्रशेखर ने दावा किया कि उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आंखों में आंसू देखे हैं और उनकी पीड़ा को महसूस किया है। उन्होंने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि जब ये लोग अपने ही संतों के नहीं हुए, तो आम जनता के कैसे होंगे।
धार्मिक नेतृत्व पर सरकार का नियंत्रण चाहती है व्यवस्था: निश्चलानंद सरस्वती
पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि सरकार धार्मिक छत्र का नेतृत्व अपने पास रखना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सरकार को सुझाव देने वाले वकील नहीं हैं, लेकिन संविधान की अच्छी समझ रखते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि शंकराचार्य बनने से पहले भी उन्होंने कई लोगों को प्रशिक्षण दिया है और धर्माचार्यों की भूमिका किसी राजनीतिक नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए।
प्रशासन के नोटिस पर अविमुक्तेश्वरानंद का विस्तृत जवाब
मेला प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में उठाए गए सवालों पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने लिखित जवाब दिया है, जिसमें उन्होंने खुद को ज्योतिषपीठ का वैध उत्तराधिकारी बताया है।
सवाल: खुद को शंकराचार्य कैसे घोषित किया?
जवाब:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि पूर्व शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने 1 फरवरी 2017 की वसीयत और घोषणा पत्र के जरिए उन्हें उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
11 सितंबर 2022 को स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद, 12 सितंबर 2022 को उनका विधिवत पट्टाभिषेक किया गया।
उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका गुजरात हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2025 को खारिज कर दी थी।
सवाल: क्या शंकराचार्य पद पर बने रहने पर कोई रोक है?
जवाब:
उन्होंने कहा कि Supreme Court का कोई आदेश ऐसा नहीं है, जो उन्हें शंकराचार्य पद पर रहने से रोकता हो।
मेला प्रशासन का नोटिस कोर्ट में विचाराधीन मामले में हस्तक्षेप है, जो contempt of court के दायरे में आता है।
21 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी गई थी कि उनका पट्टाभिषेक हो चुका है, और यह तथ्य अदालत के आदेश में दर्ज है।
उन्होंने यह भी बताया कि झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ Delhi High Court में 10 करोड़ रुपये का मानहानि केस दायर किया गया है, जो अभी विचाराधीन है।
सवाल: शंकराचार्य लिखकर कोर्ट के आदेश की अवहेलना की गई?
जवाब:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि 2018 के सुप्रीम कोर्ट आदेश के अनुसार, पूर्व शंकराचार्य के निधन के बाद उनके द्वारा नामित उत्तराधिकारी ही पीठ पर बैठ सकता है।
कुछ लोगों द्वारा फर्जी दस्तावेज पेश कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई, जिसके खिलाफ Perjury (झूठी गवाही) की कार्रवाई की मांग की गई है।
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