Jaunsar Bawar Wedding Rules उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में सामाजिक समानता और परंपराओं को मजबूत करने का बड़ा सामूहिक प्रयास बन चुके हैं। खत शैली के 25 गांवों ने तय किया है कि अब शादियाँ और शुभ आयोजन सादगी से होंगे—बिना शराब, बिना फास्ट फूड और बिना महंगे उपहारों के। यह फैसला सामाजिक एकजुटता बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
25 गांवों का अनोखा निर्णय—शादियाँ अब पूरी सादगी से होंगी
उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में सामाजिक समानता और पारंपरिक मूल्यों को बचाने के लिए एक ऐतिहासिक सामूहिक निर्णय लिया गया है। खत शैली के अंतर्गत आने वाले 25 गांवों ने तय किया है कि अब पूरे क्षेत्र में शादी, तीज-त्योहार और शुभ कार्यक्रम दिखावे और खर्चों की होड़ से मुक्त रहेंगे।
दोहा गांव में आयोजित खत सभा में स्याणा राजेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में सर्वसम्मति से यह नियम लागू किया गया कि अब से हर आयोजन में सरलता, परंपरा और सामाजिक समानता को प्राथमिकता दी जाएगी।
Jaunsar Bawar Wedding Rules: शादी में शराब, फास्ट फूड और महंगे तोहफों पर पूर्ण प्रतिबंध
खत सभा में लिए गए इस निर्णय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी शादी या शुभ कार्यक्रम में शराब—चाहे अंग्रेजी हो या देसी—का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।
साथ ही बीयर, चाऊमीन, मोमो, टिक्की, चाट और अन्य फास्ट फूड जैसे पदार्थों को भी परोसने की अनुमति नहीं होगी। क्षेत्र की सामाजिक संरचना में यह बदलाव इसलिए लाया गया क्योंकि आधुनिक खान-पान और पार्टी संस्कृति तेजी से फैल रही थी और उससे आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा था।
इसके अतिरिक्त—
चांदी के सिक्के
ड्राई फ्रूट्स
महंगे गिफ्ट
देने-लेने की परंपरा पर भी रोक लगा दी गई है।
परंपरा के अनुसार सिर्फ मामा की ओर से आटा, चावल और बकरा देना अनुमत रहेगा।
नियम तोड़ने पर 1 लाख रुपए का जुर्माना
इन नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सामाजिक दंड के रूप में 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। यह व्यवस्था खत शैली की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुसार लागू की गई है, जिसमें गांवों की सहमति सर्वोपरि होती है।
महिलाओं के गहनों पर पहले से लागू है ‘3 गहने’ का नियम
जौनसार-बावर क्षेत्र के कई गांवों में पहले से ही एक अनोखी परंपरा लागू है:
शादी या बड़े आयोजनों में महिलाएं सिर्फ 3 पारंपरिक गहने ही पहन सकती हैं।
यह निर्णय कंधाड़ और खारसी गांवों में इसलिए लिया गया था क्योंकि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों पर कर्ज लेकर सोने के भारी गहने बनवाने का दबाव बढ़ गया था।
सोने की तेजी से बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। इसीलिए यह नियम सामाजिक समानता और सरलीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
आधुनिक दिखावा, खर्च और असमानता—मुख्य कारण
खत सभा में यह बात सामने आई कि पिछले कुछ वर्षों में आयोजनों में आधुनिकता और दिखावे की होड़ बढ़ गई थी। महंगे खान-पान, उपहारों की प्रतिस्पर्धा और गहनों के दबाव के कारण समाज में असमानता गहराती जा रही थी। कई गरीब परिवार कर्ज तक उठाने लगे थे।
इन्हीं हालात को देखते हुए सामूहिक रूप से निर्णय लिया गया कि—
सादगी ही समाज की असली पहचान है
परंपरागत रीति-रिवाजों से ही सामाजिक एकता बढ़ती है
दिखावा हटेगा तो गरीबी-अमीरी का अंतर भी कम होगा
यह कदम आर्थिक बोझ कम करने के साथ सामूहिक सद्भाव को मजबूत करेगा।
क्या है ‘खत शैली’?—जौनसार-बावर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था
जौनसार-बावर क्षेत्र में प्राचीन काल से ‘खत शैली’ नाम की एक पारंपरिक सामूहिक शासन व्यवस्था प्रचलित है। इसमें 7 से 18 गांव एक समूह के रूप में जुड़े होते हैं।
इस व्यवस्था में—
महत्वपूर्ण सामाजिक फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं
प्रत्येक खत समूह का नेतृत्व ‘स्याणा’ करता है
स्याणा गांवों के बुद्धिमान और प्रतिष्ठित लोगों के साथ मिलकर सामुदायिक नियम तय करता है
कहा जाता है कि यह व्यवस्था राजा विराट के काल से चली आ रही है, और आज भी इसकी प्रभावशीलता बरकरार है।
संयुक्त परिवार—जौनसार-बावर की सामाजिक शक्ति
जौनसार-बावर की जनसंख्या लगभग 2.5 लाख है, जिसमें 20 हजार से अधिक परिवार शामिल हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां 90% परिवार आज भी संयुक्त परिवार में रहते हैं।
कई घरों में 40 से 90 सदस्य एक साथ रहते हैं—
चिल्हाड़ का 90 सदस्यों वाला बिजल्वाण परिवार
बृनाड़-बास्तील और बुल्हाड़ के 50–75 सदस्यों वाले परिवार
रंगेऊ और कुल्हा गांवों के 40–60 सदस्यों वाले बड़े परिवार
यह पारंपरिक संयुक्त व्यवस्था आज भी यहां की सांस्कृतिक ताकत है।
नया फैसला—सामुदायिक पहचान और संस्कृति को सुरक्षित रखने की दिशा में बड़ा कदम
इन नियमों को लागू कर जौनसार-बावर क्षेत्र न केवल अपनी संस्कृति को संरक्षित कर रहा है, बल्कि आर्थिक समानता, सामाजिक स्थिरता और एकता को भी मजबूत कर रहा है।
कम खर्च में शादी का आयोजन—
कम वर्गीय तनाव पैदा करता है
दिखावे की होड़ को खत्म करता है
आर्थिक संतुलन रखता है
सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखता है
यह निर्णय आने वाले वर्षों में देशभर के कई ग्रामीण समुदायों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
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