आलवाड़ा गांव में टूटी परंपरा: 24 साल के किर्ति चौहान बने पहले दलित जिन्हें गांव की नाई की दुकान में मिला हेयरकट Read it later

गुजरात के आलवाड़ा गांव में 7 अगस्त 2025 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। इसी दिन 24 वर्षीय Kirti Chauhan, जो एक दलित खेतिहर मजदूर हैं, गांव की नाई की दुकान में जाकर बाल कटवाने वाले पहले दलित बने। यह सिर्फ एक हेयरकट नहीं बल्कि सदियों से जारी caste discrimination के खिलाफ एक बड़ी जीत थी।

दशकों से वंचित रहे थे दलित परिवार

इस गांव में करीब 6,500 लोग रहते हैं, जिनमें से 250 दलित हैं। लंबे समय तक इन दलित परिवारों को गांव के barber shops में हेयरकट की अनुमति नहीं थी। उन्हें अपने पहचान छुपाकर अन्य गांवों में जाना पड़ता था। पहली बार यह परंपरा टूटी और सभी पांच नाई की दुकानों ने अपने दरवाजे दलित समुदाय के लिए खोल दिए।

Kirti Chauhan की भावुक प्रतिक्रिया

बाल कटवाने के बाद Kirti Chauhan ने कहा, “24 साल की जिंदगी में पहली बार अपने गांव में खुद को स्वीकार किया गया। अब आज़ादी का एहसास हुआ।” यह बयान पूरे दलित समुदाय के लिए आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया।

स्थानीय आंदोलन और बदलाव की शुरुआत

इस बदलाव का श्रेय स्थानीय दलित समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ता चेतन दाभी को जाता है। उन्होंने महीनों तक ऊंची जाति के लोगों को समझाने का प्रयास किया। जब यह कोशिश असफल रही, तो police और district administration ने हस्तक्षेप किया और सभी समुदायों को समझाकर समाधान निकाला।

सरपंच और प्रशासन की अहम भूमिका

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक गांव के सरपंच सुरेश चौधरी ने स्वीकार किया कि जातिगत भेदभाव गलत था। उन्होंने कहा, “मेरे कार्यकाल में यह परंपरा खत्म होना गर्व की बात है।” वहीं, ममलतदार जनक मेहता ने बताया कि प्रशासन ने शिकायतों का समाधान कर सामाजिक सौहार्द कायम करने का प्रयास किया।

नाई समुदाय का नजरिया

21 वर्षीय नाई पिंटू नाई, जिन्होंने किर्ति को पहला हेयरकट दिया, बोले, “पहले समाज की परंपरा का पालन करना मजबूरी थी। अब बदलाव आया है और यह व्यवसाय के लिए भी अच्छा है।”

अन्य समुदायों का समर्थन

गांव के पाटीदार समुदाय के प्रकाश पटेल ने कहा, “अगर मेरी किराने की दुकान पर सभी ग्राहक आते हैं, तो नाई की दुकान पर भेदभाव क्यों?” इससे साफ है कि धीरे-धीरे समाज में सोच बदल रही है।

Dalit समुदाय की आगे की उम्मीदें

हालांकि इस जीत के बावजूद सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दलित किसान ईश्वर चौहान ने कहा, “हम अभी भी सामुदायिक भोज में अलग बैठते हैं। उम्मीद है यह परंपरा भी जल्द खत्म होगी।”

ये भी पढ़ें –

केंद्र की ‘Demography Challenges’ कमेटी पर सवाल, मोदी ने लॉन्च किया हाई पावर मिशन

 

Like and Follow us on :

Telegram | Facebook | Instagram | Twitter | Pinterest|Linkedin

Was This Article Helpful?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *