US Iran nuclear talks एक बार फिर दुनिया की निगाहों के केंद्र में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ किया है कि वे ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम पर चल रही बातचीत में ‘इनडायरेक्ट’ रूप से शामिल रहेंगे। जिनेवा में आज शुरू हो रहे दूसरे दौर से पहले ओमान, होर्मुज़ और खाड़ी में सैन्य हलचल ने तनाव और बढ़ा दिया है।
जिनेवा में दूसरे दौर की बातचीत, ट्रम्प का ‘इनडायरेक्ट’ रोल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि वे अमेरिका और ईरान के बीच चल रही US Iran nuclear talks में सीधे नहीं, लेकिन ‘इनडायरेक्ट’ तरीके से शामिल रहेंगे। उनका कहना था कि ये बातचीत “बहुत महत्वपूर्ण” होने वाली है और वे हर कदम पर उस पर नज़र रखेंगे।


यह बयान ऐसे समय में आया है, जब आज (17 फरवरी 2026) स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम पर दूसरा दौर शुरू हो रहा है। बातचीत प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि मध्यस्थ के जरिए हो रही है। ट्रम्प ने इशारा किया कि उन्हें लगता है इस बार ईरान समझौते के लिए ज्यादा गंभीर है और “डील की संभावना पहले से बेहतर” नज़र आ रही है।
ओमान से जिनेवा तक: 6 फरवरी को पहली बैठक, अब दांव ज्यादा बड़ा
इससे पहले 6 फरवरी को ओमान में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल के बीच पहला दौर हुआ था, जिसमें दोनों पक्षों ने बातचीत को “अच्छी शुरुआत” बताया था। उस बैठक में भी बात परमाणु कार्यक्रम की सीमाएं तय करने और प्रतिबंधों के बदले ईरान की रियायतों पर ही केंद्रित रही।
ओमान की मध्यस्थता अब जिनेवा के मंच तक पहुंच गई है, जहां ओमानी दूतावास में दूसरी राउंड की मीटिंग हो रही है। अमेरिकी तरफ से विशेष दूत, रणनीतिक सलाहकार और सैन्य प्रतिनिधि मौजूद हैं, जबकि ईरान की तरफ से विदेश मंत्री और डिप्टी विदेश मंत्री नेतृत्व कर रहे हैं। दोनों ही पक्ष मानते हैं कि यह दौर आगे की रूपरेखा तय करने में निर्णायक हो सकता है।
ट्रम्प की चेतावनी: ‘पिछले साल की बमबारी से ईरान को अक्ल आई’
ट्रम्प ने साफ शब्दों में कहा कि वे वार्ता पर नज़र रखेंगे और उन्हें नहीं लगता कि ईरान “समझौता न करने के नतीजे भुगतना” चाहेगा। उन्होंने इशारा किया कि पिछले साल अमेरिकी और सहयोगी हमलों में ईरान के कई परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया था, जिसके बाद तेहरान को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ा।
ट्रम्प का यह बयान दोहरे संदेश के रूप में देखा जा रहा है—
एक तरफ वे डिप्लोमेसी और डील की बात कर रहे हैं,
दूसरी तरफ सैन्य दबाव और बमबारी की याद दिलाकर ईरान को चेतावनी भी दे रहे हैं कि “दूसरा रास्ता” भी खुला है।
यूरेनियम इंरिचमेंट: वार्ता का सबसे बड़ा विवाद
चल रही US Iran nuclear talks का मुख्य और सबसे संवेदनशील मुद्दा ईरान का यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) है।
अमेरिकी पक्ष की मांग है कि ईरान अपनी जमीन पर संवर्धन या तो पूरी तरह बंद करे,
या इसे बेहद सीमित स्तर (लो-एनरिचमेंट) तक सीमित रखे, ताकि हथियार बनाने की क्षमता न बचे।
वॉशिंगटन का तर्क है कि यूरेनियम संवर्धन ही वह तकनीकी सीढ़ी है, जो शांति से बिजली और रिसर्च के काम से आगे बढ़कर परमाणु हथियार तक पहुंचा सकती है। ईरान इसके उलट कहता है कि संवर्धन उसका संप्रभु अधिकार है, और वह NPT के तहत केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग कर रहा है।
संवर्धित यूरेनियम का स्टॉकपाइल: करीब 2000 किलोग्राम और 60% तक इंरिचमेंट
अमेरिका का दूसरा बड़ा आपत्ति-बिंदु ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम का बड़ा भंडार है। अनुमान है कि ईरान के पास लगभग 2000 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम है, जिसमें 3.67% से लेकर 60% तक के स्तर पर इंरिचमेंट शामिल है। 60% स्तर को हथियार-ग्रेड (90%) की ओर एक खतरनाक छलांग माना जाता है।
अमेरिका चाहता है कि—
इस उच्च संवर्धित यूरेनियम को या तो पतला (dilute) किया जाए,
या तकनीकी रूप से निष्क्रिय बनाया जाए,
या फिर किसी तीसरे देश—जैसे पहले 2015 में हुआ था—को भेज दिया जाए।
ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने संकेत दिया है कि तेहरान 60% इंरिच्ड यूरेनियम को घटाने के प्रस्ताव पर तैयार हो सकता है। उनका कहना है कि ईरान के पास 400 किलो से ज्यादा हाई-लेवल इंरिच्ड यूरेनियम है, और इसे घटाने के फॉर्मूले पर बातचीत संभव है।
2015 की तरह फिर रूस भेजा जाएगा यूरेनियम? ईरान ने कहा- अभी कहना जल्दबाज़ी होगी
2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान ने अपना अधिकांश संवर्धित यूरेनियम रूस भेज दिया था। तख्त-रवांची से जब पूछा गया कि क्या इस बार भी ऐसा होगा, तो उन्होंने कहा कि “इस पर अभी टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी,” लेकिन यह स्वीकार किया कि रूस ने दोबारा इस सामग्री को स्वीकार करने की पेशकश की है।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान अस्थायी तौर पर यूरेनियम इंरिचमेंट रोकने या घटाने की पेशकश भी कर चुका है, बशर्ते अमेरिका प्रतिबंधों पर सार्थक कदम उठाए। यह प्रस्ताव वार्ता में टेबल पर है, लेकिन किसी औपचारिक टेक्स्ट तक बात पहुंची नहीं है।
2015 की तरह फिर रूस भेजा जाएगा यूरेनियम? ईरान ने कहा- अभी कहना जल्दबाज़ी होगी
2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान ने अपना अधिकांश संवर्धित यूरेनियम रूस भेज दिया था। तख्त-रवांची से जब पूछा गया कि क्या इस बार भी ऐसा होगा, तो उन्होंने कहा कि “इस पर अभी टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी,” लेकिन यह स्वीकार किया कि रूस ने दोबारा इस सामग्री को स्वीकार करने की पेशकश की है।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान अस्थायी तौर पर यूरेनियम इंरिचमेंट रोकने या घटाने की पेशकश भी कर चुका है, बशर्ते अमेरिका प्रतिबंधों पर सार्थक कदम उठाए। यह प्रस्ताव वार्ता में टेबल पर है, लेकिन किसी औपचारिक टेक्स्ट तक बात पहुंची नहीं है।
दूसरी ओर, अमेरिकी अधिकारी लगातार दावा कर रहे हैं कि बातचीत में रुकावट की वजह ईरान की हिचकिचाहट और उसकी “रेड लाइन्स” हैं, न कि वॉशिंगटन का रवैया।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में ईरान की नौसैनिक ड्रिल, कुछ घंटों के लिए रास्ता बंद
इसी कूटनीतिक हलचल के बीच ईरान ने हाल के हफ्तों में दूसरी बार बड़े स्तर पर नौसैनिक अभ्यास शुरू कर दिया। यह ड्रिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़, पर्शियन गल्फ और गल्फ ऑफ ओमान में चल रही है। आधिकारिक बयान में इसे खुफिया और ऑपरेशनल क्षमताओं की जांच करने वाला अभ्यास बताया गया है।
समुद्री सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के मुताबिक, इस दौरान ईरान ने कुछ घंटों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के हिस्से को अस्थायी रूप से बंद भी किया, जिससे दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती थी। जहाजों को रेडियो पर चेतावनी दी गई कि उत्तरी मार्ग में लाइव-फायर ड्रिल हो सकती है। हालांकि ईरानी सरकारी टीवी ने लाइव-फायर शब्द का सीधा ज़िक्र नहीं किया।
अमेरिकी सैन्य मौजूदगी: एयरक्राफ्ट कैरियर, ड्रोन और ‘रेडीनेस’ का संदेश
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। हाल के दिनों में दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर और कई वॉरशिप इस इलाके में तैनात किए गए हैं। पहले से मौजूद विमानवाहक पोत, लड़ाकू विमानों और ड्रोन की तैनाती यह संदेश देती है कि अगर डिप्लोमेसी नाकाम रही तो वॉशिंगटन “अन्य विकल्पों” पर भी विचार कर सकता है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पहले ही बयान देकर साफ किया था कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय हवाई और समुद्री क्षेत्र में पेशेवर तरीके से काम करने का अधिकार है, लेकिन उसे अमेरिकी वॉरशिप या व्यापारिक जहाजों को परेशान नहीं करना चाहिए।
ईरान का रुख: ‘प्रतिबंध हटें तो हम भी आगे बढ़ेंगे’
ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने संकेत दिया कि उनकी सरकार वार्ता से पीछे नहीं हटना चाहती। उनका कहना है कि—
ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई मुद्दों पर लचीला रुख अपना सकता है,
लेकिन यह तभी संभव है जब अमेरिका वास्तव में प्रतिबंध हटाने और आर्थिक राहत देने पर तैयार हो।
ईरानी नेतृत्व बार-बार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह “शांतिपूर्ण” है और वह NPT के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहा है। साथ ही वे यह संदेश भी दे रहे हैं कि “धमकी की भाषा” में बात करने से समझौता मुश्किल होता है।
बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम: ईरान की ‘रेड लाइन’
जहां परमाणु कार्यक्रम पर कुछ हद तक बातचीत की गुंजाइश दिखती है, वहीं ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है।
ईरान साफ कह चुका है कि मिसाइल कार्यक्रम उसकी रक्षात्मक क्षमता का हिस्सा है,
और इस पर कोई समझौता या बातचीत उसकी “रेड लाइन” के खिलाफ होगा।
ईरान का तर्क है कि जून 2025 में जब इजराइल और अमेरिका ने उसके परमाणु स्थलों पर हमले किए, तब उसकी मिसाइलों ने ही जवाबी क्षमता और प्रतिरोध की भूमिका निभाई। ऐसे में इस कार्यक्रम को छोड़ना उसके लिए “खुद को कमजोर करके पेश करने” जैसा होगा।
अमेरिका इसके विपरीत चाहता है कि—
मिसाइल रेंज,
वारहेड क्षमता,
और परीक्षणों पर स्पष्ट सीमा तय हो,
ताकि भविष्य में संभावित परमाणु हथियारों के लिए डिलीवरी सिस्टम सीमित रहे।
हिजबुल्लाह और हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स पर भी अमेरिकी फोकस
अमेरिका की एक और बड़ी मांग यह है कि ईरान क्षेत्रीय प्रॉक्सी ग्रुप्स—जैसे Hezbollah, यमन के Houthi विद्रोही और इराक-सीरिया के कुछ मिलिशिया समूहों—को फंडिंग और सैन्य समर्थन देना बंद करे। वॉशिंगटन का तर्क है कि ये समूह पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ाते हैं और अमेरिकी हितों के साथ-साथ उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
तेहरान इस मुद्दे को वार्ता के एजेंडा से बाहर रखना चाहता है। ईरान का कहना है कि US Iran nuclear talks केवल परमाणु मुद्दे पर केंद्रित रहनी चाहिए, क्षेत्रीय राजनीति, मिसाइल या प्रॉक्सी ग्रुप्स पर नहीं।
‘सिर्फ परमाणु मुद्दे पर बात होगी, मिसाइल पर नहीं’
ईरानी अधिकारियों ने कई बार दोहराया है कि—
मिसाइल प्रोग्राम पर कोई बातचीत नहीं होगी,
और न ही तेहरान अपने क्षेत्रीय गठबंधनों को डील का हिस्सा बनने देगा।
उनका कहना है कि यह उसकी “रक्षात्मक व सामरिक स्वतन्त्रता” का सवाल है। ईरान का स्टैंड है कि अगर अमेरिका और सहयोगी देश सच में परमाणु चिंता कम करना चाहते हैं, तो उन्हें प्रतिबंधों, निरीक्षण तंत्र और यूरेनियम सीमाओं तक ही बात रखनी चाहिए।
क्या समझौते की कोई रूपरेखा बन पाई है?
जिनेवा में चल रही ताज़ा US Iran nuclear talks के बारे में राजनयिक सूत्रों का कहना है कि दोनों पक्ष “गाइडिंग प्रिंसिपल्स” पर एक ढीला-सा मौखिक समझ बनाते दिख रहे हैं—
ईरान 60% इंरिच्ड यूरेनियम घटाने और IAEA को व्यापक निरीक्षण की अनुमति देने पर विचार कर सकता है,
बदले में अमेरिका चरणबद्ध तरीके से कुछ आर्थिक प्रतिबंध हटाने और तेल निर्यात पर सीमित राहत देने पर सोच सकता है।
क्या समझौते की कोई रूपरेखा बन पाई है?
जिनेवा में चल रही ताज़ा US Iran nuclear talks के बारे में राजनयिक सूत्रों का कहना है कि दोनों पक्ष “गाइडिंग प्रिंसिपल्स” पर एक ढीला-सा मौखिक समझ बनाते दिख रहे हैं—
ईरान 60% इंरिच्ड यूरेनियम घटाने और IAEA को व्यापक निरीक्षण की अनुमति देने पर विचार कर सकता है,
बदले में अमेरिका चरणबद्ध तरीके से कुछ आर्थिक प्रतिबंध हटाने और तेल निर्यात पर सीमित राहत देने पर सोच सकता है।
अगर डील नहीं हुई तो? खाड़ी, तेल और युद्ध का खतरा
अगर बातचीत नाकाम रही तो सबसे पहला असर—
खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने,
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में बार-बार रुकावट,
और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल की शक्ल में सामने आ सकता है।
अमेरिका पहले ही सैन्य मौजूदगी बढ़ाकर “डिटेरेंस” का संदेश दे चुका है, जबकि ईरान ने भी यह दिखा दिया है कि वह होर्मुज़ जैसी अहम जलसंधि को अस्थायी रूप से बंद करने की क्षमता रखता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि डिप्लोमेसी फेल हुई, तो नई सैन्य झड़पें या सीमित युद्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
धमकी, प्रतिबंध और डिप्लोमेसी के बीच फंसी US Iran nuclear talks
इस समय की तस्वीर साफ है—
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सख्त सीमा के भीतर रखे, यूरेनियम स्टॉकपाइल घटाए और मिसाइल व प्रॉक्सी नेटवर्क पर लगाम लगाए,
ईरान चाहता है कि पहले आर्थिक नाकेबंदी हटे, तेल और बैंकिंग सेक्टर को राहत मिले और बातचीत केवल परमाणु मुद्दों तक सीमित रहे।
डोनाल्ड ट्रम्प का “मैं इनडायरेक्टली शामिल रहूंगा” वाला बयान इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन बातचीत को केवल तकनीकी स्तर पर नहीं, बल्कि उच्च राजनीतिक स्तर पर भी हैंडल करना चाहता है। वहीं तेहरान बार-बार अपनी “रेड लाइन्स” दोहरा रहा है, ताकि घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय साख दोनों बची रहें।
अगले कुछ हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि जिनेवा की मेज पर बैठी ये US Iran nuclear talks किसी नए समझौते का रास्ता खोलती हैं, या फिर दुनिया को एक और लंबा, खतरनाक टकराव झेलना पड़ेगा।
US Iran tensions: अस्तित्व पर खतरा हुआ तो ईरान देगा करारा जवाब
ईरान के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर मजीद तख्त-रवांची ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयानों पर कड़ी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पब्लिक स्टेटमेंट्स में ट्रम्प कभी regime change यानी सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं, तो कभी US Iran talks में दिलचस्पी दिखाते हैं, जबकि निजी संदेशों में इस तरह की भाषा नहीं होती।
रवांची ने कहा कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य तैनाती बढ़ना खतरनाक संकेत है और “दूसरा युद्ध सबके लिए बुरा होगा।” अगर ईरान को अपने existence यानी अस्तित्व पर खतरा महसूस हुआ, तो वह निश्चित तौर पर जवाब देगा। उन्होंने बताया कि ईरान ने कई क्षेत्रीय देशों से बातचीत की है और लगभग सभी युद्ध के खिलाफ हैं। ईरान को यह भी आशंका है कि इजराइल इस वार्ता को पटरी से उतारना चाहता है। जिनेवा में होने वाली अगली बैठक पर रवांची ने कहा कि ईरान “उम्मीद के साथ” वहां जाएगा, लेकिन किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को ईमानदारी और गंभीरता दिखानी होगी।
40,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की संभावित तैनाती के सवाल पर तख्त-रवांची ने साफ चेतावनी दी—“ऐसी स्थिति में गेम अलग होगा।”
Middle East में अमेरिकी पावर शो: USS Gerald R. Ford भी भेजा जाएगा
ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका लगातार Middle East में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत कर रहा है। अमेरिकी सेना अब अपना सबसे बड़ा न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R. Ford इस क्षेत्र में भेज रही है। दो अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह कदम उसी समय उठाया जा रहा है, जब US Iran tensions नई ऊंचाई पर हैं।
अधिकारियों ने बताया कि जेराल्ड आर. फोर्ड को मिडिल ईस्ट पहुंचने में करीब एक हफ्ता लगेगा। वहां पहले से एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln और कई अन्य वॉरशिप तैनात हैं। जेराल्ड आर. फोर्ड इससे पहले कैरिबियन सागर में तैनात था और इस साल वेनेजुएला से जुड़ी अमेरिकी ऑपरेशंस में शामिल रह चुका है। इसके अलावा हाल के हफ्तों में कई गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर, फाइटर जेट और सर्विलांस एयरक्राफ्ट भी खाड़ी क्षेत्र में भेजे गए हैं, जिससे साफ संदेश जा रहा है कि वॉशिंगटन हर स्थिति के लिए “मिलिट्री ऑप्शन” तैयार रखे हुए है।
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