Piyush Pandey Advertising Legend के नाम से मशहूर पद्मश्री एड गुरु का 23 अक्टूबर को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। राजस्थान की मिट्टी से जुड़े इस महान विज्ञापनकार ने भारतीय एड इंडस्ट्री को हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं से जोड़ा। उन्होंने विज्ञापन को सिर्फ ग्लैमर नहीं, बल्कि जनसंवाद का जरिया बनाया।
राजस्थान की मिट्टी से निकले, भारतीयता के प्रतीक बने Piyush Pandey Advertising Legend
पीयूष पांडे का जीवन भारतीय संस्कृति की गहराई से जुड़ा था। उन्होंने विज्ञापन को सिर्फ ‘ब्रांड प्रमोशन’ नहीं बल्कि ‘इमोशनल कनेक्शन’ का माध्यम बना दिया। राजस्थान की सादगी और लोक-संस्कृति उनके हर कैंपेन में झलकती थी। उनके लोकप्रिय कैंपेन Fevicol Ads, Cadbury Dairy Milk और Indian Tourism Campaigns में देसी रंग दिखता था।

अंग्रेजी से हिंदी तक का सफर: पीयूष ने बदला एडवर्टाइजिंग का चेहरा
80 के दशक में भारतीय विज्ञापन पूरी तरह अंग्रेजी पर आधारित था। पीयूष पांडे और उनके साथी कमलेश पांडे ने इसे तोड़ते हुए पहली बार हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में एड तैयार किए। यही वह मोड़ था जिसने Indian Advertising Market को आम जनता से जोड़ा।
उनका मानना था — “विज्ञापन वही जो जनता की भाषा बोले।” Fevicol और Asian Paints के कैंपेन ने यही साबित किया कि लोकभाषा में कही बात ज्यादा असर करती है।
‘जिगर’ वाला एड गुरु: क्लाइंट्स के सामने नहीं झुकते थे पीयूष
प्रह्लाद कक्कड़ के अनुसार, पीयूष पांडे की सबसे बड़ी ताकत थी — ‘ना कहना’। जब कोई क्लाइंट उनके आइडिया को बदलने की कोशिश करता, तो वे साफ कहते — “अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं करते, तो काम मत कराइए।”
उनके आत्मविश्वास की मिसाल आज भी दी जाती है। उनकी यही ईमानदारी उन्हें Creative Integrity का प्रतीक बनाती है।
‘थर्ड क्लास डिब्बे’ में मिली असली शिक्षा
राजस्थान रणजी टीम के लिए खेलते समय पीयूष पांडे अक्सर थर्ड क्लास बोगी में सफर करते थे। उन्होंने कहा था — “जिस शिक्षा ने मुझे विज्ञापनकार बनाया, वह मुझे उन बोगियों में मिली। वहाँ मैंने भारत को करीब से देखा।”
इस अनुभव ने उनके एड्स को ‘रियल इंडिया’ से जोड़ा। Fevicol के ग्रामीण फ्लेवर से लेकर Cadbury के ‘Kuch Khaas Hai’ तक, हर विज्ञापन आम आदमी की कहानी कहता था।

भारतीय विज्ञापन में क्षेत्रीय भाषाओं का नया युग
पीयूष पांडे ने न सिर्फ हिंदी, बल्कि तमिल, मराठी, बंगाली और भोजपुरी जैसी भाषाओं को भी विज्ञापन का हिस्सा बनाया। उनके विजन की वजह से आज भारत में 98% ads regional languages में बनाए जाते हैं।
उन्होंने साबित किया कि भारत की ताकत उसकी विविधता है — और जब विज्ञापन उस विविधता को अपनाता है, तो वह जन-जन तक पहुंचता है।
प्यारी यादें छोड़ गए विज्ञापन के शिल्पकार
उनकी टीम के लोग कहते हैं — “पीयूष सिर्फ एक बॉस नहीं थे, बल्कि कहानी सुनाने वाले कलाकार थे।” उनका मानना था कि हर विज्ञापन के पीछे ‘दिल’ होना चाहिए। यही वजह है कि उनके बनाए स्लोगन आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
जैसे — “Fevicol ka jod hai, tutega nahi”, “Har ghar kuch kehta hai”, “Cadbury – Kuch khaas hai zindagi mein।”
Piyush Pandey का Signature Style: 30 सेकंड में बेमिसाल Impact
Piyush Pandey Advertising Legend के तौर पर उनकी पहचान सिर्फ उनकी रचनात्मकता से नहीं, बल्कि उनके स्टाइल से भी थी। घनी मूंछें उनके राजपूती गौरव की पहचान थीं। वो खुद को कभी फिल्ममेकर नहीं मानते थे बल्कि “30 सेकंड का आदमी” कहते थे। उनकी पूरी क्रिएटिव सोच उसी समय-सीमा के भीतर impactful storytelling देने पर केंद्रित थी। यह एडवर्टाइजिंग की दुनिया में उनकी अनोखी USP थी।
Legacy of Laughs: पीयूष और प्रह्लाद की हंसी की जुगलबंदी
प्रह्लाद कक्कड़ कहते हैं कि Piyush Pandey इंडस्ट्री के इकलौते व्यक्ति थे जो उनकी हंसी का मुकाबला कर पाते थे। लेकिन ये हंसी सिर्फ जुबान तक नहीं थी, उनके विजन तक जाती थी। उनका मानना था कि जो उन्होंने सीखा है, उसे दूसरों को सिखाना चाहिए। यही वजह है कि आज की एड इंडस्ट्री में काम करने वाले 80% बड़े क्रिएटिव्स कहीं न कहीं पीयूष की गाइडेंस से निकले हैं। वह Mentor भी थे, Leader भी और हंसते-खेलते ज़िंदगी को जीने वाले इंसान भी।
Common Man को बनाया Hero: विज्ञापन में भाषा और सोच की क्रांति
Piyush Pandey Ads की एक और खासियत थी कि उन्होंने अंग्रेज़ी से हटकर हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञापन बनाने की परंपरा शुरू की। उनकी सोच थी – “जब उत्पाद गाँव में बिकते हैं, तो भाषा भी वहीं की होनी चाहिए।” ‘फेविकोल’, ‘मेरा वाला ब्लू’ जैसे कैंपेन इसी सोच की देन थे। उनके Ads में फिल्मी सितारों की बजाय common man होते थे, ताकि आम जनता खुद को उनसे जोड़ सके। उन्होंने भारतीय एड इंडस्ट्री को एक ऐसा नया रास्ता दिया जो ‘जन-जन’ से जुड़ता है।
Piyush Pandey Advertising Legend: संस्कृति से गहराई तक जुड़ा एक सच्चा भारतीय चेहरा
Piyush Pandey Advertising Legend की पहचान सिर्फ उनके विज्ञापनों से नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और जड़ों से उनके लगाव से भी थी। उनकी बहन और प्रसिद्ध गायिका इला अरुण ने बताया कि पीयूष के हर काम में उनके परिवार और माता-पिता के संस्कार झलकते थे।
चाहे Asian Paints का प्रसिद्ध स्लोगन “हर घर कुछ कहता है” हो या अन्य कैंपेन, पीयूष हमेशा मानते थे कि “घर दीवारों से नहीं, भावनाओं से बनते हैं।”
उनका यह दृष्टिकोण ही उन्हें बाकी विज्ञापन निर्माताओं से अलग करता था — उन्होंने Ads में “इमोशन” को “कम्युनिकेशन” बना दिया।
मूंछों में थी शान और आत्मविश्वास की झलक
राजस्थान की धरती से निकले इस advertising icon के लिए मूंछें सिर्फ रूप का हिस्सा नहीं थीं, बल्कि उनके आत्म-सम्मान और गौरव का प्रतीक थीं।
वह हमेशा कहते थे कि “मूंछ सिर्फ स्टाइल नहीं, पहचान है।”
उन्हें लोग प्यार से ‘Moustache Man of Rajasthan’ भी कहते थे।
पीयूष पांडे को अपनी संस्कृति, मातृभूमि और माताजी के प्रति असीम प्रेम था, और यह उनके हर विज्ञापन के किरदारों और संवादों में महसूस किया जा सकता है।

“30 सेकंड का आदमी” जिसने कहानी कहने की परिभाषा बदल दी
Piyush Pandey खुद को हमेशा “30 सेकंड का आदमी” कहते थे, क्योंकि उनका पूरा जीवन एक छोटे विज्ञापन को प्रभावशाली कहानी में बदलने के लिए समर्पित था।
उनके भाई Prasoon Pandey फिल्मों में सक्रिय रहे, लेकिन पीयूष ने कभी फिल्में नहीं कीं — उनका मानना था कि “एक प्रभावशाली संदेश 30 सेकंड में भी दिया जा सकता है।”
वह आउट-एंड-आउट एड मैन थे, जिनके लिए हर कैंपेन एक मिशन होता था।
उनकी सोच थी — “हर एड सिर्फ बिकने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए बनना चाहिए।”
विनम्रता और समाजसेवा: सफलता के बीच भी जमीन से जुड़े रहे
पीयूष पांडे अपने जीवन में बेहद विनम्र और लो-प्रोफाइल व्यक्ति थे।
उन्होंने Jaipur Foot जैसी संस्थाओं को गुमनाम दान दिए और हमेशा “झंडे गाड़ते चलो, लेकिन जड़ों से जुड़े रहो” का संदेश दिया।
इला अरुण ने कहा, “उनके जाने से हमारा परिवार अनाथ महसूस कर रहा है, लेकिन उनका जीवन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।”
वह केवल एक creative genius नहीं थे, बल्कि ऐसे इंसान थे जिन्होंने भारतीय विज्ञापन जगत को दिल और आत्मा दी।
FAQ Section
Q1: पीयूष पांडे कौन थे?
A: वे भारत के प्रसिद्ध एड गुरु और ओगिल्वी इंडिया के पूर्व चेयरमैन थे।
Q2: पीयूष पांडे का निधन कब हुआ?
A: 23 अक्टूबर 2025 को, 70 वर्ष की आयु में।
Q3: पीयूष पांडे को पद्मश्री कब मिला था?
A: वर्ष 2016 में।
Q4: पीयूष पांडे ने कौन-से लोकप्रिय विज्ञापन बनाए?
A: फेविकोल, कैडबरी डेयरी मिल्क, एशियन पेंट्स आदि।
Q5: पीयूष पांडे ने एडवर्टाइजिंग में क्या बदलाव लाया?
A: अंग्रेजी विज्ञापनों को हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में बदला।
Q6: प्रह्लाद कक्कड़ ने पीयूष पांडे के बारे में क्या कहा?
A: “उन्होंने एडवर्टाइजिंग को भारतीय आत्मा दी।”
Q7: पीयूष पांडे ने किन कंपनियों के लिए काम किया?
A: ओगिल्वी एंड माथर (Ogilvy & Mather) में लंबे समय तक।
Q8: पीयूष पांडे के विज्ञापनों की खासियत क्या थी?
A: भारतीय संस्कृति, सादगी और भावनात्मक जुड़ाव।
Q9: पीयूष पांडे का प्रेरणास्रोत क्या था?
A: भारत की आम जनता और उनके अनुभव।
Q10: पीयूष पांडे को क्यों याद किया जाएगा?
A: क्योंकि उन्होंने विज्ञापन को ‘दिल से बोलने’ की कला सिखाई।
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