Trump global tariffs विवाद एक बार फिर दुनिया की इकोनॉमी के सिर पर मंडराता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने महज़ 24 घंटे के भीतर इंपोर्ट ड्यूटी की तस्वीर बदल दी। पहले सुप्रीम कोर्ट ने उनके पुराने टैरिफ को रद्द कर दिया, फिर ट्रम्प ने गुस्से में नया कानूनी रास्ता निकाला और पहले 10% और अब 15% ग्लोबल टैरिफ लगाने का फैसला कर लिया। यह टैरिफ 24 फरवरी से लागू होगा और कम से कम अगले 150 दिनों तक पूरी दुनिया के लिए नई ट्रेड रियलिटी तय करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने टैरिफ रद्द किए, ट्रम्प ने तुरंत पलटवार में बढ़ा दिए Trump global tariffs
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को डोनाल्ड ट्रम्प के पहले वाले ग्लोबल टैरिफ को 6-3 के बहुमत से रद्द कर दिया। कोर्ट का कहना था कि ट्रम्प ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत जो टैरिफ लगाए, उसके लिए उन्हें वह कानूनी अधिकार नहीं था जो वे दावा कर रहे थे।
कोर्ट ने साफ कहा कि IEEPA के जरिए राष्ट्रपति को इतनी व्यापक टैक्स या टैरिफ नीति लागू करने का अधिकार नहीं मिल जाता। यह अधिकार मूल रूप से अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के पास है, क्योंकि टैरिफ टैक्स की ही एक किस्म माना जाता है और टैक्सेशन पूरी तरह लेजिस्लेटिव डोमेन का विषय है।
फैसला आते ही व्हाइट हाउस की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई। माना जा रहा है कि निर्णय से ट्रम्प बेहद नाराज हुए और उसी रात प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर उन्होंने घोषणा कर दी कि वे नया रास्ता निकाल कर फिर से टैरिफ लगाएंगे।

IEEPA के बाद अब Trade Act 1974 का सेक्शन 122 बना ट्रम्प का नया हथियार
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ट्रम्प के IEEPA वाला रास्ता बंद कर दिया, लेकिन उन्होंने तुरंत ही दूसरा कानूनी रास्ता चुन लिया – Trade Act of 1974 का सेक्शन 122।
यह सेक्शन राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि अगर—
अचानक व्यापार घाटा बढ़ जाए,
भुगतान संतुलन (balance of payments) बिगड़ने लगे,
या राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव दिखे, तो वह सीमित अवधि के लिए आयात पर टैरिफ लगा सकता है।
यही वजह है कि शुक्रवार की रात ट्रम्प ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहले 10% ग्लोबल टैरिफ की घोषणा की और अगले ही दिन अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करके इसे बढ़ाकर 15% कर दिया। सेक्शन 122 के तहत अधिकतम 15% तक टैरिफ लगाने की अनुमति है, इसलिए ट्रम्प ने सीधे ऊपरी सीमा छू ली।
24 फरवरी से लागू होगा 15% ग्लोबल टैरिफ, फिलहाल 150 दिनों की सीमा
ट्रम्प ने नए आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके मुताबिक 15% Trump global tariffs 24 फरवरी से दुनियाभर के सभी ट्रेडिंग पार्टनर्स पर लागू हो जाएंगे।
हालांकि सेक्शन 122 के तहत एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि—
टैरिफ अधिकतम 150 दिनों तक ही बिना कांग्रेस की मंजूरी के लागू रह सकते हैं,
इसके आगे बढ़ाने या स्थायी बनाने के लिए अमेरिकी संसद से साफ अनुमति लेनी पड़ेगी।
यानी यह टैरिफ अभी के लिए अस्थायी है, लेकिन अगर व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच राजनीतिक समीकरण ठीक रहे या दबाव बनाया गया, तो आगे भी इसे बढ़ाने पर जोर डाला जा सकता है।
ट्रम्प की जजों पर कड़ी टिप्पणी: ‘देश के लिए कलंक, सही काम की हिम्मत नहीं’
नए टैरिफ के ऐलान के साथ ही ट्रम्प ने उन जजों पर भी सीधा हमला बोला जिन्होंने उनके पुराने IEEPA टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। उन्होंने कहा—
“मुझे कोर्ट के कुछ जजों पर शर्म आती है। वे देश के लिए कलंक हैं। उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है।”
ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे “विदेशी ताकतों के असर” का संदेह है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका टैरिफ नहीं लगाएगा, तो विदेशी देश कई स्ट्रैटेजिक इंडस्ट्रीज़ में अमेरिका से आगे निकलते रहेंगे।
भारत के संदर्भ में उन्होंने साफ किया कि भारत के साथ जो ट्रेड डील पहले से है, उसमें वे कोई बदलाव नहीं करेंगे और यह भी कहा कि “पीएम मोदी मेरे अच्छे दोस्त हैं।”
ट्रम्प के शब्दों में खुद का बचाव और न्यायपालिका पर हमला
ट्रम्प की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई तीखे बयान आए, जिनका सार इस तरह है—
1. संसद की जरूरत नहीं, राष्ट्रपति के अधिकार काफी
ट्रम्प ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद वे टैरिफ लागू करने के लिए संसद पर निर्भर नहीं हैं। उनके मुताबिक, राष्ट्रपति के पास पहले से मिले अधिकारों के जरिये वे नया टैरिफ लगाने में सक्षम हैं।
2. रिफंड पर चुप्पी, कंपनियों को पैसा लौटाने का इरादा नहीं
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रिफंड पर कोई साफ लाइन नहीं है, इसलिए अमेरिकी सरकार अब तक वसूले गए टैरिफ को कंपनियों को वापस नहीं करेगी। यानी जो अरबों डॉलर वसूले गए, वे फिलहाल सरकारी खाते में ही रहेंगे।
3. ‘जजों ने घटिया फैसला दिया, सालों तक कोर्ट में रहेंगे’
ट्रम्प का कहना था कि जजों ने बहुत खराब फैसला सुनाया है, और अब यह मामला अगले दो साल तक कोर्ट में चल सकता है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “हम अगले 5 साल तक कोर्ट में ही रहेंगे।”
4. सुप्रीम कोर्ट पर विदेशी दबाव का आरोप
उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विदेशी ताकतों का असर रहा है। यदि टैरिफ नहीं लगाए गए, तो कई देशों को खुली छूट मिल जाएगी और वे अमेरिकी इंडस्ट्री को पीछे छोड़ देंगे।
5. ‘यह फैसला बहुत पहले के राष्ट्रपतियों को लेना चाहिए था’
ट्रम्प ने कहा कि टैरिफ लगाने जैसा साहसिक कदम तो दशकों पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों को उठाना चाहिए था। उनकी नजर में पिछले नेताओं ने अमेरिका को कमजोर होने दिया और अन्य देशों को अमेरिकी बाजार का फायदा उठाने की छूट दी।
किन उत्पादों को छूट? बीफ, टमाटर, संतरा और कुछ सेक्टर को राहत
हालांकि 15% Trump global tariffs को ‘ग्लोबल’ कहा जा रहा है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण उत्पादों और सेक्टरों को छूट दी गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार—
कुछ कृषि उत्पाद जैसे बीफ, टमाटर, संतरा आदि इस ग्लोबल टैरिफ से बाहर रखे गए हैं,
कुछ महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स)
आवश्यक दवाइयां (फ़ार्मास्यूटिकल्स),
कुछ हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स,
और पैसेंजर वाहन भी कुछ कैटेगरी में राहत पा सकते हैं।
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि यह टैरिफ पुराने टैरिफ स्ट्रक्चर की जगह लेगा। जहां पहले कुछ देशों पर ज्यादा और कुछ पर कम टैरिफ लगाया गया था, अब 15% के एक समान ग्लोबल रेट के कारण कई देशों पर पहले से ज्यादा, तो कई पर पहले से कम प्रभाव पड़ेगा।
स्टील और एल्युमिनियम पर टैरिफ अभी भी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से ट्रम्प के सभी टैरिफ खत्म नहीं हुए हैं। स्टील और एल्युमिनियम पर पहले से लगाए गए टैरिफ अलग कानूनों के तहत लागू किए गए थे, इसलिए वे अब भी बने हुए हैं।
यानी—
ग्लोबल ट्रेड पर नया 15% ट्रम्प global tariffs लागू होगा,
स्टील और एल्युमिनियम जैसे रणनीतिक सेक्टरों पर अतिरिक्त टैरिफ अलग से चलता रहेगा।
इसका मतलब यह है कि इन सेक्टरों में अमेरिकी बाजार में प्रवेश करना कई देशों के लिए और महंगा साबित हो सकता है।
रिसिप्रोकल और 25% फेंटेनाइल वाले टैरिफ अब अमान्य
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दो बड़े टैरिफ कैटेगरी खत्म हो गईं—
रेसिप्रोकल टैरिफ:
ट्रम्प ने अलग-अलग देशों पर अलग बेसलाइन रखते हुए टैरिफ लगाए थे।
चीन पर 34% और बाकी दुनिया के लिए 10% बेस टैरिफ तय था।
कोर्ट के फैसले के बाद यह पूरा स्ट्रक्चर अमान्य हो गया।
25% स्पेशल टैरिफ:
कनाडा, चीन और मैक्सिको से आने वाले कुछ सामान पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया था।
तर्क यह दिया गया कि इन देशों ने अमेरिका में फेंटेनाइल की अवैध तस्करी रोकने के पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
कोर्ट के ताजा निर्णय ने इस 25% टैरिफ को भी रद्द कर दिया।
अब इनकी जगह नया एक समान 15% ग्लोबल टैरिफ आया है, जो कानूनी रूप से बिल्कुल अलग आधार—सेक्शन 122—पर टिका है।
55 साल पुराना निक्सन प्रिसीडेंट: 1971 में भी लगा था 10% ग्लोबल टैरिफ
यह पहला मौका नहीं है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पूरे विश्व पर एक समान ग्लोबल टैरिफ लगाया हो। साल 1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भी 10% ग्लोबल टैरिफ लगाया था।
कारण तब भी मिलते-जुलते थे—
अमेरिका का व्यापार और भुगतान संतुलन बिगड़ रहा था,
आयात बहुत ज्यादा और निर्यात तुलनात्मक रूप से कम था,
डॉलर पर दबाव बढ़ रहा था और गोल्ड स्टैंडर्ड टूटने की कगार पर था।
इन्हीं परिस्थितियों ने बाद में 1974 के Trade Act को जन्म दिया, जिसमें सेक्शन 122 जोड़ा गया, ताकि भविष्य में ऐसी आर्थिक आपात स्थिति में राष्ट्रपति के पास तुरंत प्रतिक्रिया देने की कानूनी ताकत हो।
अब, जब ट्रम्प ने सेक्शन 122 का इस्तेमाल किया है, तो यह 55 साल पुराने निक्सन के ग्लोबल टैरिफ की याद दिलाता है।
सेक्शन 122 का पहली बार इस्तेमाल, अदालतें इसे कैसे देखेंगी, यह भी एक बड़ा सवाल
न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, Trade Act 1974 का सेक्शन 122 पहले कभी इस स्तर पर उपयोग में नहीं लाया गया था। यानी—
यह क्षेत्र लगभग अनछुआ (Un-tested) कानूनी जमीन है,
भविष्य में अगर इस टैरिफ को अदालतों में चुनौती दी गई, तो जजों के पास कोई ठोस प्रिसीडेंट नहीं होगा जिसका सीधा सहारा लिया जा सके।
कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि—
अगर कोई देश या अमेरिकी कारोबारी समूह इस 15% ट्रम्प global tariffs को अदालत में चुनौती देता है,
तो कोर्ट को सेक्शन 122 की व्याख्या नए सिरे से करनी पड़ेगी –
कि “अचानक आर्थिक खतरा” या “इमरजेंसी ट्रेड सिचुएशन” वास्तव में मौजूद थी या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार: ‘अमेरिका हर देश से युद्ध की स्थिति में नहीं’
जब सुप्रीम कोर्ट ने IEEPA वाले टैरिफ पर अपना फैसला दिया, तो उसने ट्रम्प प्रशासन को फटकारते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ “युद्ध की स्थिति” में नहीं है, इसलिए ग्लोबल टैरिफ को युद्धकालीन शक्तियों की तरह जस्टिफाई नहीं किया जा सकता।
हालांकि 9 में से 3 जज—जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ—ने इस फैसले से असहमति जताई।
जस्टिस कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है,
लेकिन उनकी नजर में यह कानूनी रूप से वैध हो सकती थी।
उन्होंने भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए टैरिफ का भी उल्लेख किया और कहा कि ये कदम विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों के तहत उठाए गए थे।
6-3 का फैसला, फिर भी बहस जारी: रिपब्लिकन नियुक्त जज भी बंट गए दो हिस्सों में
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं—
इनमें से 6 को रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किया है,
और 3 को डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों ने।
दिलचस्प बात यह है कि फैसले के खिलाफ वोट करने वाले तीनों जज—एलिटो, थॉमस और कैवनॉ—रिपब्लिकन नियुक्त हैं। इससे यह भी संकेत मिला कि—
कोर्ट की अंदरूनी बहस केवल पार्टी लाइनों पर नहीं,
बल्कि संविधान और कार्यपालिका की शक्ति की व्याख्या पर भी बंटी हुई है।
इसके बावजूद 6-3 का बहुमत इस दिशा में एक मजबूत संदेश है कि राष्ट्रपति, भले ही वह कोई भी हो, संसद को दरकिनार करके अनलिमिटेड ग्लोबल टैरिफ नहीं लगा सकता।
200 अरब डॉलर से ज्यादा टैरिफ वसूला, अब रिफंड पर सस्पेंस
रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले साल की शुरुआत से अब तक अमेरिकी सरकार ने ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ के जरिए 200 अरब डॉलर से ज्यादा वसूले हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बड़ा सवाल यह है कि—
क्या यह रकम कंपनियों और इम्पोर्टर्स को वापस करनी होगी?
या सरकार किसी कानूनी टेक्निकलिटी का सहारा लेकर इसे अपने पास रख पाएगी?
फिलहाल ट्रम्प का रुख साफ है—वे रिफंड देने के मूड में नहीं दिख रहे। लेकिन अगर अदालतें आगे चलकर यह तय करती हैं कि अवैध टैरिफ से वसूला गया पैसा वापस होना चाहिए, तो अमेरिकी सरकार और ट्रम्प प्रशासन पर बड़ी वित्तीय और राजनीतिक चोट भी लग सकती है।
12 राज्यों और छोटे कारोबारियों ने मिलकर ट्रम्प पर केस किया था
टैरिफ के खिलाफ सिर्फ विदेशी देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका के अंदर भी तीखा विरोध रहा।
एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू मेक्सिको, न्यूयॉर्क, ओरेगन और वर्मोंट—इन 12 राज्यों ने छोटे कारोबारियों के साथ मिलकर ट्रम्प सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया।
उनका आरोप था कि—
राष्ट्रपति ने अपनी संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर आयात पर नए टैरिफ लगाए,
और इससे घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ीं,
छोटे व्यवसायों की प्रतिस्पर्धा क्षमता पर सीधा असर पड़ा,
और सप्लाई चेन में अराजकता पैदा हुई।
निचली अदालतों—कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट—ने भी माना कि IEEPA ट्रम्प को इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता कि वे पूरी दुनिया पर एक साथ टैरिफ बीत सकें।
IEEPA क्या है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे टैरिफ के लिए सीमित क्यों माना?
इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA), 1977 का कानून है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति को केवल उन स्थितियों में विशेष आर्थिक शक्तियां देना है, जब—
देश पर गंभीर विदेशी खतरा हो,
युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो जाए,
या कोई असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकट खड़ा हो जाए।
इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति—
विदेशी लेनदेन पर रोक या नियंत्रण लगा सकते हैं,
कुछ संपत्तियां फ्रीज कर सकते हैं,
और आपातकालीन आर्थिक कदम उठा सकते हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
IEEPA के टेक्स्ट में ‘टैरिफ’ शब्द का कहीं उल्लेख नहीं,
और न ही इसे ग्लोबल टैक्स अथॉरिटी की तरह पढ़ा जा सकता है।
इसलिए कोर्ट की नजर में ट्रम्प ने IEEPA का इस्तेमाल उस दायरे से बाहर जाकर किया, जिसके लिए यह कानून बनाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की लंबी सुनवाई, नवंबर 2025 में ही दिख गया था शक
पिछले साल नवंबर में हुई मौखिक बहस के दौरान ही जजों ने ट्रम्प की दलीलों पर संदेह जताया था। कई जजों ने पूछा था—
क्या राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की मंजूरी के इतने बड़े स्तर पर ग्लोबल टैरिफ लगा सकता है?
क्या यह संसद के टैक्स लगाने के अधिकार में दखल नहीं है?
6-3 के बहुमत वाला ताजा फैसला उसी शक का औपचारिक रूप है। कोर्ट ने कहा कि वह यह नहीं देख रही कि टैरिफ सही आर्थिक नीति है या नहीं, उसका काम सिर्फ यह तय करना है कि यह कदम संविधान और कानून के मुताबिक था या नहीं। और उस परीक्षा में ट्रम्प की IEEPA आधारित पॉलिसी फेल हो गई।
आगे क्या: कांग्रेस, अदालतें और दुनिया के लिए Trump global tariffs का मतलब
अब आने वाले महीनों में कुछ बड़े सवालों के जवाब तय करेंगे कि यह 15% ग्लोबल टैरिफ कितने समय तक दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा—
क्या कांग्रेस सेक्शन 122 के तहत लगाए गए टैरिफ को 150 दिनों से आगे बढ़ाने देगी?
क्या अमेरिकी कंपनियां और अन्य देश इस नई पॉलिसी को अदालत में चुनौती देंगे?
अगर चुनौती गई, तो क्या कोर्ट सेक्शन 122 की भी व्याख्या सीमित तरीके से करेगा?
क्या 200 अरब डॉलर से ज्यादा वसूले गए पुराने टैरिफ का रिफंड अंततः देना पड़ेगा?
भारत जैसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स के लिए यह नई ग्लोबल टैरिफ स्ट्रक्चर कितना महंगा या कितना न्यूट्रल साबित होगा?
एक बात साफ है—Trump global tariffs सिर्फ अमेरिकी घरेलू राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए इकोनॉमिक शॉक वेव जैसा है। जिस तरह 1971 के निक्सन टैरिफ ने ग्लोबल ट्रेड सिस्टम को झकझोरा था, उसी तरह 2026 में ट्रम्प के ये कदम भी आने वाले सालों तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं।
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