युवाओं में बढ़ा क्रॉस-लेग स्कूटी चलाने का ट्रेंड, सड़क पर ‘कूल’ दिखने की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है, समझिए पूरा मामला
स्कूटी चलाते समय दोनों पैर सिर्फ टिके नहीं होते, वे आपकी “रीयल टाइम सपोर्ट सिस्टम” का हिस्सा होते हैं। कहीं गड्ढा आया, सामने कुत्ता दौड़ा, अचानक ब्रेक लगा, सड़क पर बजरी निकली, मोड़ पर ग्रिप कम हुई—इन सब पलों में राइडर का शरीर पैरों और कमर की मदद से खुद को संतुलित करता है। क्रॉस-लेग मुद्रा इस मदद को कमजोर कर देती है।

Scooty Riding Trend अब सिर्फ एक स्टाइल नहीं, सड़क पर बढ़ता जोखिम बन चुका है। एक पैर के ऊपर दूसरा पैर रखकर स्कूटी या ई-स्कूटर चलाना देखने में भले ‘कूल’ लगे, लेकिन यह कंट्रोल, ब्रेकिंग और बैलेंस—तीनों को एक साथ कमजोर कर देता है।
नया ट्रेंड, बड़ा खतरा
सड़क पर चलते-चलते अचानक आप किसी स्कूटी सवार को देखते हैं। हैंडल एक हाथ में है, शरीर ढीला-सा है, और पैर सामान्य तरीके से फुटबोर्ड पर रखने के बजाय एक टांग दूसरी टांग पर चढ़ी हुई है। पहली नजर में यह लापरवाही कम, स्टाइल ज्यादा लगती है। लेकिन असली समस्या यहीं से शुरू होती है। जो चीज सोशल मीडिया पर “एटीट्यूड” लगती है, वही सड़क पर सेकंडों में हादसे की वजह बन सकती है।
युवाओं में स्कूटी, ई-स्कूटर और हल्के दोपहिया वाहनों को लेकर यह क्रॉस-लेग मुद्रा तेजी से दिख रही है। इसे कई लोग आरामदायक, कई लोग फैशनेबल और कई लोग “आसान” समझते हैं। लेकिन सड़क इंजीनियरिंग, वाहन नियंत्रण और मानव प्रतिक्रिया समय—तीनों की भाषा में देखें, तो यह मुद्रा सुरक्षित ड्राइविंग की बुनियादी शर्तों के खिलाफ जाती है।
यहीं से यह मामला सिर्फ ट्रेंड का नहीं, ट्रैफिक सेफ्टी का बन जाता है।
स्टाइल का असली भ्रम
यह चलन बढ़ क्यों रहा है? इसका सबसे सीधा जवाब है—दिखावा, नकल और झूठा आत्मविश्वास। स्कूटी या ई-स्कूटर को मोटरसाइकिल की तुलना में “आसान” वाहन माना जाता है। युवाओं के बीच यह धारणा भी बनी रहती है कि हल्का वाहन है, ऑटोमैटिक है, इसलिए इसे किसी भी मुद्रा में संभाला जा सकता है। यही सोच जोखिम की पहली सीढ़ी है।
दूसरी वजह दृश्य संस्कृति है। कैमरे के सामने, रील्स में, कॉलेज के बाहर, बाजारों में या धीमी रफ्तार वाले रास्तों पर कुछ युवा इस मुद्रा को “कूल बॉडी लैंग्वेज” की तरह पेश करते हैं। फिर वही मुद्रा दूसरे लोग अपनाने लगते हैं। कुछ ही समय में यह स्टाइल नहीं, आदत बनने लगती है।
लेकिन सड़क कैमरा नहीं होती। सड़क गलती को दोबारा शूट करने का मौका नहीं देती।
कंट्रोल का पहला नुकसान
दोपहिया वाहन का सबसे बड़ा सिद्धांत है—संतुलन। यह संतुलन केवल हैंडल से नहीं बनता। इसमें शरीर की मुद्रा, पैरों की स्थिति, कमर का झुकाव, वजन का वितरण और अचानक प्रतिक्रिया की क्षमता शामिल होती है। जब राइडर एक टांग दूसरी टांग पर रखकर बैठता है, तो शरीर का नैसर्गिक संतुलन बिगड़ जाता है।
सीधी भाषा में समझें तो स्कूटी चलाते समय दोनों पैर सिर्फ टिके नहीं होते, वे आपकी “रीयल टाइम सपोर्ट सिस्टम” का हिस्सा होते हैं। कहीं गड्ढा आया, सामने कुत्ता दौड़ा, अचानक ब्रेक लगा, सड़क पर बजरी निकली, मोड़ पर ग्रिप कम हुई—इन सब पलों में राइडर का शरीर पैरों और कमर की मदद से खुद को संतुलित करता है। क्रॉस-लेग मुद्रा इस मदद को कमजोर कर देती है।
यानी हैंडल बच भी जाए, शरीर साथ नहीं देता।
ब्रेकिंग का सीधा नुकसान
स्कूटी की इमरजेंसी ब्रेकिंग सिर्फ हाथ का काम नहीं है। अचानक ब्रेक लगने पर शरीर आगे धक्का खाता है। उस समय दोनों पैरों की सही स्थिति राइडर को सीट पर स्थिर रखने, वाहन को सीधा रखने और गिरने से बचाने में मदद करती है। अगर एक पैर दूसरे पर चढ़ा है, तो ब्रेक लगते ही शरीर का वजन असमान रूप से खिसकता है।
ऐसे में तीन खतरे एक साथ पैदा होते हैं। पहला, स्कूटी डगमगा सकती है। दूसरा, राइडर का पैर फुटबोर्ड से फिसल सकता है। तीसरा, सामने से बचने के बाद भी साइड में गिरने की आशंका बढ़ जाती है। खासकर बारिश, धूल, कंकड़ या स्पीड ब्रेकर वाले रास्तों पर यह और खतरनाक हो जाता है।
खतरा यह नहीं कि आप हर बार गिरेंगे।
खतरा यह है कि जिस एक बार गिरेंगे, वह बहुत महंगा पड़ सकता है।
मोड़ पर बढ़ता ग्राउंड इम्पैक्ट
स्कूटी को मोड़ते समय राइडर का शरीर हल्का-सा झुकता है। यह झुकाव नियंत्रित होता है और वाहन की दिशा के साथ तालमेल बनाता है। क्रॉस-लेग मुद्रा में यह तालमेल बिगड़ जाता है। शरीर का निचला हिस्सा मोड़ लेने की स्वाभाविक तैयारी में नहीं होता। नतीजा यह कि तेज मोड़, यू-टर्न, कट या अचानक दिशा बदलने की स्थिति में राइडर वाहन के साथ “फ्लो” नहीं करता।
यही वजह है कि गलत मुद्रा में दोपहिया चलाना केवल सीधी सड़क पर भी जोखिम भरा है, लेकिन मोड़ों पर और ज्यादा खतरनाक हो जाता है। स्कूटी का डिजाइन आराम के लिए है, लापरवाही के लिए नहीं। फुटबोर्ड इसलिए दिया गया है कि दोनों पैर स्थिर रहें, न कि एक को दूसरे पर चढ़ाकर शरीर को असंतुलित बना दिया जाए।
पब्लिक रोड पर खतरनाक ड्राइविंग
कानूनी एंगल यहां बहुत अहम है। मोटर व्हीकल्स एक्ट की धारा 184 खतरनाक ड्राइविंग पर लागू होती है। India Code पर उपलब्ध प्रावधान के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति वाहन को ऐसी गति या ऐसे तरीके से चलाता है जो जनता के लिए खतरनाक हो, तो वह दंडनीय है। इस धारा का दायरा केवल तेज रफ्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि “मैनर ऑफ ड्राइविंग” यानी वाहन चलाने के तरीके को भी देखता है।
इसलिए क्रॉस-लेग स्कूटी चलाना भले किसी अलग नाम वाले चालान की सूची में हर राज्य में अलग से न लिखा हो, लेकिन यदि इससे वाहन पर नियंत्रण कम हो, सड़क पर खतरा पैदा हो, या दूसरों में डर और असुरक्षा का भाव बने, तो यह खतरनाक ड्राइविंग की श्रेणी में आ सकता है। यह केवल “मेरी मर्जी” वाला मामला नहीं है, क्योंकि सड़क साझा सार्वजनिक स्थान है।
यानी यह व्यक्तिगत स्टाइल नहीं, सार्वजनिक जोखिम है।
डेटा का बड़ा आईना
भारत में सड़क दुर्घटनाओं की तस्वीर खुद बता देती है कि दोपहिया पर लापरवाही कितनी महंगी पड़ती है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ‘रोड एक्सिडेंट्स इन इंडिया 2023’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए। औसतन यह 1,317 दुर्घटनाएं और 474 मौतें हर दिन के बराबर है।
यह सिर्फ बड़े हाईवे हादसों की कहानी नहीं है। यह रोजमर्रा की सड़क संस्कृति की कहानी है—जहां हेलमेट न पहनना, गलत दिशा में चलना, ओवरस्पीडिंग, लापरवाही और गलत मुद्रा में वाहन चलाना मिलकर मौत का जोखिम बढ़ाते हैं।
जब हम किसी स्कूटी पर क्रॉस-लेग बैठे राइडर को देखते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि भारत में सड़क सुरक्षा पहले से ही कमजोर स्थिति में है। यहां किसी अतिरिक्त जोखिम की कोई जगह नहीं है।
दोपहिया सबसे कमजोर कड़ी
पीआईबी की जुलाई 2025 की एक आधिकारिक प्रेस नोट में कहा गया कि भारत में कुल सड़क मौतों में दोपहिया सवारों की हिस्सेदारी 44.5% रही। इसी नोट में विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से कहा गया कि सही हेलमेट मौत के जोखिम को छह गुना से अधिक घटा सकता है और दिमागी चोट का खतरा 74% तक कम कर सकता है।
दूसरे शब्दों में, दोपहिया सवार पहले से ही सड़क पर सबसे ज्यादा असुरक्षित वर्गों में हैं। अगर कोई राइडर हेलमेट भी न पहने, शरीर की मुद्रा भी गलत रखे, और ध्यान भी सड़क से ज्यादा स्टाइल पर हो, तो वह अपने लिए जोखिम कई गुना बढ़ा देता है।
यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। यह चेतावनी है।
2024 का और कड़ा संकेत
एनसीआरबी के 2024 के आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया कि लापरवाह या गैर-जिम्मेदार ड्राइविंग के कारण सड़क पर हर दिन औसतन 495 लोगों की जान गई। उसी रिपोर्ट में कहा गया कि 2024 में कुल सड़क मौतों में दोपहिया सवारों की हिस्सेदारी 48.3% रही और 84,599 दोपहिया सवारों की मौत हुई।
इसका मतलब साफ है—सड़क पर सबसे ज्यादा खतरा उसी वर्ग पर है जो सबसे ज्यादा दिखता भी है: बाइक और स्कूटी सवार। इसलिए गलत बैठने का स्टाइल, फोन पर बात करते हुए चलाना, हेलमेट ढीला रखना, एक हाथ से चलाना, या क्रॉस-लेग ड्राइविंग—ये सब “छोटी बातें” नहीं हैं। ये वही व्यवहार हैं जो बड़े हादसे की जमीन तैयार करते हैं।
ई-स्कूटर में जोखिम और ज्यादा
कई युवाओं को लगता है कि ई-स्कूटर हल्का है, साइलेंट है, इसलिए उसमें खतरा कम है। सच इसका उल्टा हो सकता है। ई-स्कूटर की पिक-अप कई बार तेज होती है, उसका टॉर्क तुरंत आता है, और कम आवाज के कारण आसपास के लोग भी उसकी उपस्थिति देर से नोटिस करते हैं। ऐसे वाहन पर यदि राइडर की मुद्रा गलत हो, तो प्रतिक्रिया समय और भी कम पड़ सकता है।
ई-स्कूटर की चौड़ी फ्लोरबोर्ड डिजाइन आराम देती है, लेकिन उसी को कई लोग “आराम की छूट” समझ लेते हैं। यही गलती खतरनाक है। वाहन का डिजाइन सुविधा देता है, लेकिन सुरक्षा की शर्तें खत्म नहीं करता। ब्रेक, बैलेंस और प्रतिक्रिया—तीनों ई-स्कूटर में भी उतने ही अहम हैं जितने फ्यूल बेस्ड स्कूटर में।
ट्रैफिक पुलिस की मुश्किल
सड़क पर ऐसी लापरवाही का एक बड़ा असर एन्फोर्समेंट पर भी पड़ता है। ट्रैफिक पुलिस हर गलत मुद्रा पर तुरंत कार्रवाई करे, यह व्यावहारिक रूप से हमेशा संभव नहीं होता। पुलिस आमतौर पर हेलमेट, सिग्नल, नंबर प्लेट, ओवरलोडिंग, रॉन्ग साइड, मोबाइल यूज़ या स्टंट जैसे उल्लंघनों पर ज्यादा सीधी कार्रवाई करती है। मगर गलत बैठने जैसी प्रवृत्तियां अक्सर कैमरे में कैद होने के बाद या हादसे के बाद गंभीरता से देखी जाती हैं।
यही इस ट्रेंड की सबसे खतरनाक बात है।
यह धीरे-धीरे सामान्य लगने लगता है।
जब कोई गलत चीज रोज दिखने लगे, तो समाज उसे खतरा मानना बंद कर देता है। फिर वही चीज हादसे के बाद “क्यों” बनकर सामने आती है।
युवाओं में यह चलन बढ़ क्यों रहा
इस ट्रेंड की जड़ में तीन चीजें दिखती हैं। पहली, दिखने की संस्कृति। सोशल मीडिया ने सड़क को भी प्रदर्शन की जगह बना दिया है। दूसरी, वाहन को कम जोखिम वाला मानने की भूल। खासकर स्कूटी के मामले में। तीसरी, नियमों के प्रति ढीलापन। बहुत से युवाओं को लगता है कि जब तक तेज नहीं चला रहे, तब तक सब ठीक है।
लेकिन सड़क विज्ञान में “धीमी लापरवाही” भी लापरवाही ही होती है। आपको हर बार तेज चलाने की जरूरत नहीं होती। एक गलत मुद्रा, एक गलत सेकंड, और एक गलत प्रतिक्रिया—बस इतना काफी है।
युवा अक्सर अपने शरीर की फुर्ती पर भरोसा करते हैं। उन्हें लगता है कि गिरने से पहले संभल जाएंगे। यही झूठा आत्मविश्वास सड़क पर सबसे बड़ा धोखा है। सड़क पर हादसे शरीर की फुर्ती से नहीं, प्रतिक्रिया की तैयारी से टलते हैं।
छोटी गलती, बड़ा मेडिकल बिल
मान लीजिए राइडर सिर्फ 25-30 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहा है। सामने अचानक कोई पैदल यात्री आया। ब्रेक लगे। स्कूटी हल्की डगमगाई। क्रॉस-लेग बैठा राइडर समय पर पैर नीचे नहीं रख पाया। परिणाम—साधारण गिरावट। अब इसे लोग मामूली घटना समझते हैं। लेकिन सड़क पर गिरने की मामूली घटना भी कलाई, घुटने, कंधे, कॉलर बोन, चेहरे या सिर की गंभीर चोट बन सकती है।
यानी यह सिर्फ ट्रैफिक नियम का मामला नहीं है। यह घर के खर्च, अस्पताल, नौकरी, पढ़ाई और लंबे रिकवरी टाइम का मामला भी है। एक “स्टाइल” की कीमत कई बार महीनों की तकलीफ बन जाती है।
पीछे बैठे व्यक्ति पर भी असर
अगर स्कूटी पर पिलियन बैठा है, तो खतरा और बढ़ जाता है। आगे बैठा राइडर गलत मुद्रा में है, तो पीछे बैठे व्यक्ति का संतुलन भी प्रभावित होता है। अचानक ब्रेक या गड्ढे पर पीछे बैठा व्यक्ति ज्यादा जोर से झटका खाता है। कई बार वह राइडर के साथ एक तरफ खिंच जाता है। खासकर महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों के साथ यह स्थिति और खतरनाक हो सकती है।
यानी क्रॉस-लेग चलाने वाला सिर्फ अपनी जान नहीं, दूसरे की सुरक्षा भी दांव पर लगा रहा होता है।
सही मुद्रा का सीधा फायदा
सुरक्षित स्कूटी चलाने की सबसे बुनियादी मुद्रा बहुत सरल है। दोनों हाथ हैंडल पर। दोनों पैर स्थिर और खुले संतुलन में। शरीर सीधा, लेकिन अकड़ा हुआ नहीं। नजर सड़क पर। ब्रेकिंग के लिए हाथ तैयार। यह मुद्रा दिखने में साधारण है, लेकिन सड़क पर यही सबसे स्मार्ट है।
सुरक्षित मुद्रा का फायदा सिर्फ बैलेंस तक सीमित नहीं है। इससे राइडर की मांसपेशियां बेहतर प्रतिक्रिया देती हैं। घबराहट कम होती है। मोड़ साफ लिया जाता है। अचानक ब्रेक में शरीर संभलता है। पैर जमीन पर जल्दी आते हैं। यह सब मिलकर दुर्घटना का जोखिम घटाते हैं।
सड़क पर असली स्टाइल वही है जो आपको घर वापस पहुंचाए।
हेलमेट और मुद्रा साथ-साथ
बहुत बार यह बहस केवल हेलमेट पर आकर रुक जाती है। लेकिन सच यह है कि हेलमेट और सही राइडिंग मुद्रा दोनों साथ काम करते हैं। हेलमेट सिर बचाता है, सही मुद्रा हादसा टालने में मदद करती है। अगर मुद्रा ही गलत हो, तो हेलमेट लगाकर भी खतरा पूरी तरह कम नहीं होता। और अगर हेलमेट भी न हो, तो नुकसान और बढ़ जाता है।
पीआईबी के अनुसार सही हेलमेट जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम केवल चोट कम करने पर ध्यान देंगे, या चोट होने की संभावना भी घटाएंगे? क्रॉस-लेग स्कूटी चलाने का चलन इसी दूसरे हिस्से पर चोट करता है। यह हादसे की संभावना बढ़ाता है।
परिवारों की अनदेखी चिंता
हर शहर में ऐसे घर मिल जाएंगे जहां माता-पिता अपने बच्चों से बस एक ही बात कहते हैं—धीरे चलाना, हेलमेट पहनना, संभलकर जाना। लेकिन नई पीढ़ी कई बार जोखिम को रोमांच समझ बैठती है। उन्हें लगता है कि वे वाहन के मालिक हैं, इसलिए सड़क पर मुद्रा भी उनकी निजी पसंद है। जबकि घर वाले जानते हैं कि दुर्घटना की खबर किसी भी सिद्धांत से बड़ी होती है।
यह मुद्दा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बहुत-से हादसे “खतरनाक स्टंट” वाले नहीं होते। वे “थोड़ी-सी लापरवाही” वाले होते हैं। और क्रॉस-लेग स्कूटी चलाना ठीक उसी श्रेणी का जोखिम है—जो दिखने में छोटा है, लेकिन परिणाम में बड़ा हो सकता है।
कॉलेज और शहरों की नई जिम्मेदारी
इस ट्रेंड पर केवल चालान से रोक नहीं लगेगी। स्कूल, कॉलेज, कोचिंग, डिलीवरी प्लेटफॉर्म, ई-स्कूटर रेंटल सेवाएं और परिवार—सबकी भूमिका है। जहां युवा सबसे ज्यादा दोपहिया चलाते हैं, वहीं उन्हें यह समझाने की जरूरत है कि सड़क “इमेज बिल्डिंग” की जगह नहीं है। सड़क पर शरीर की हर गलत स्थिति वाहन के व्यवहार को बदलती है।
अगर संस्थानों में हेलमेट ड्राइव की तरह “सेफ राइडिंग पोश्चर” पर भी छोटे अभियान चलें, तो असर दिख सकता है। क्योंकि हर लापरवाही कानून से पहले संस्कृति में पनपती है। और संस्कृति बदले बिना सुरक्षा पूरी नहीं होती।
आगे की राह
क्रॉस-लेग स्कूटी चलाने का ट्रेंड नया जरूर है, लेकिन इसका खतरा पुराना है—लापरवाही। कानून खतरनाक ड्राइविंग को दंडनीय मानता है। आंकड़े बताते हैं कि दोपहिया सवार सड़क पर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। और सामान्य समझ कहती है कि जिस मुद्रा में आप अचानक ब्रेक, मोड़ या गड्ढे पर खुद को संभाल नहीं सकते, वह सड़क के लिए सही मुद्रा नहीं हो सकती।
इसलिए अगली बार जब कोई युवा एक टांग दूसरी पर चढ़ाकर स्कूटी चलाता दिखे, तो उसे यह समझना चाहिए कि वह स्टाइल नहीं दिखा रहा—वह अपने कंट्रोल का एक हिस्सा छोड़ रहा है। सड़क पर असली फर्क कपड़ों, जूतों या एटीट्यूड से नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि संकट आने पर आप वाहन बचा पाएंगे या नहीं।
और सड़क पर संकट कभी बताकर नहीं आता।
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