south india actor rally stampede: तमिलनाडु के करूर में शनिवार को अभिनेता विजय की रैली उस वक्त मौत का मंजर बन गई जब भीड़ पर काबू खो गया और भगदड़ मच गई। इस हादसे में 39 लोगों की जान चली गई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। अस्पतालों में 50 से ज्यादा लोग भर्ती हैं, जिनमें कई की हालत नाजुक बनी हुई है। यह हादसा केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की उस गहरी सामाजिक हकीकत को उजागर करता है जहां फिल्मी सितारों को राजनीति में आते ही लोग करिश्माई नेता और मसीहा की तरह देखने लगते हैं।
अभिनेता मसीहा कैसे बन जाते हैं?
दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में फिल्मों का मतलब केवल मनोरंजन नहीं बल्कि जीवन का अहम हिस्सा है। यहाँ सिनेमा भाषा, संस्कृति और पहचान का प्रतीक माना जाता है। लोग अपने पसंदीदा अभिनेता को पर्दे पर अन्याय और भ्रष्टाचार से लड़ते देखते हैं और उसे वास्तविक जीवन में भी ईमानदारी और साहस का प्रतीक मान लेते हैं।
यही वजह है कि जब कोई अभिनेता राजनीति में उतरता है, तो जनता उसे सामान्य नेता नहीं बल्कि उद्धारक के रूप में स्वीकार करती है। यही blind devotion rallies को अनियंत्रित बना देता है और कई बार south india actor rally stampede जैसी त्रासदी का कारण बनता है।
फिल्मों से राजनीतिक मंच तक भावनात्मक रिश्ता
फिल्मों में लंबे समय तक गरीबी, अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ने वाले किरदार निभाने वाले सितारे आम लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ जाते हैं। उनकी लोकप्रियता, संवाद शैली और करिश्माई छवि मंच पर आते ही लोगों को भरोसा दिलाती है कि यह वही नायक है जो उनकी समस्याओं को उसी जोश से हल करेगा।
यही छवि और भरोसा लाखों लोगों को आकर्षित करता है और रैलियां भीड़ के महासागर में बदल जाती हैं। लेकिन यही भीड़ जब बिना प्रबंधन और सुरक्षा इंतज़ामों के इकट्ठी होती है तो मामूली अफरातफरी भी जानलेवा stampede का रूप ले लेती है।
करूर रैली क्यों बनी हादसे की वजह?
विजय की करूर रैली के लिए प्रशासन ने केवल 10 हजार लोगों की अनुमति दी थी, लेकिन मौके पर 50 हजार से ज्यादा लोग जमा हो गए। Vijay छह घंटे की देरी से पहुंचे और इस बीच धूप और भीड़ में खड़े लोग थककर गिरने लगे। जब मंच से 9 साल की बच्ची को ढूंढने की अपील की गई तो हजारों लोग अचानक आगे बढ़े और भगदड़ मच गई।
वहां न पर्याप्त पुलिस बल मौजूद था और न ही वॉलंटियर्स की संख्या भीड़ संभालने के लिए पर्याप्त थी। प्रशासन को 30 हजार लोगों की उम्मीद थी लेकिन भीड़ दोगुनी पहुंची। नतीजा यह हुआ कि जोश और आस्था मौत और तबाही में बदल गई।
दक्षिण भारत में स्टार क्रेज की ऐतिहासिक झलकियां जो हादसे में बदली
करूर जैसी घटनाएं पहली बार नहीं हुईं। दक्षिण भारत में कई बार स्टार क्रेज जानलेवा stampede में बदल चुका है।
1969 – सी. एन. अन्नादुरै की अंत्येष्टि: करीब डेढ़ करोड़ लोग पहुंचे। गिनीज बुक ने इसे सबसे बड़ी अंतिम यात्रा माना। इस दौरान 28 लोगों की जान गई।
1987 – एम.जी. रामचंद्रन की अंतिम यात्रा: शोक में 30 लोगों ने आत्महत्या की।
2008 – चिरंजीवी का रोड शो: प्रजा राज्य पार्टी के कार्यक्रम में धर्मावरम में भगदड़, 2 मौतें और 15 घायल।
2016 – जयललिता की चुनावी रैली: विरुद्धाचलम में भगदड़, 2 लोगों की मौत और कई घायल।
1992 – कुंभकोणम हादसा: महाकुंभ जैसे आयोजन में संरचना ढहने से 48 मौतें।
2024 – अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा 2 स्क्रीनिंग: हैदराबाद में भगदड़, महिला की मौत और उसका बेटा गंभीर घायल।
2025 – आरसीबी की IPL जीत का जश्न: बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भगदड़, 11 मौतें और 50 से ज्यादा घायल।
ये सभी घटनाएं बताती हैं कि फैन कल्चर और भीड़ प्रबंधन की कमी का मेल बार-बार बड़े हादसों का कारण बन रहा है।
क्या केवल भीड़ जिम्मेदार है?
भीड़ को दोष देना आसान है, लेकिन असली समस्या crowd management और सुरक्षा व्यवस्था की है। जब लाखों की संख्या में लोग अपने पसंदीदा स्टार को देखने के लिए उमड़ते हैं, तो पुलिस और प्रशासन को उसी स्तर पर तैयारी करनी चाहिए।
South India में star rallies और फिल्मी कार्यक्रमों के लिए विशेष crowd control प्लान की जरूरत है। लेकिन बार-बार की घटनाओं से साफ है कि अभी तक जिम्मेदार संस्थाएं इस चुनौती को गंभीरता से नहीं ले पाई हैं।
सबक क्या है?
करूर रैली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि South India में स्टार-क्रेज सिर्फ जुनून नहीं बल्कि एक सामाजिक ताकत है। लेकिन जब यही जुनून कुप्रबंधन से टकराता है तो south india actor rally stampede जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
जरूरी है कि राजनीतिक पार्टियां और प्रशासन मिलकर सुरक्षा को प्राथमिकता दें। भीड़ की संख्या का सही अनुमान लगाया जाए, पर्याप्त पुलिस और मेडिकल इंतज़ाम हों और कार्यक्रमों को समय पर आयोजित किया जाए। तभी फैन डिवोशन मौत का कारण बनने के बजाय उत्सव का हिस्सा बनेगा।
करूर का हादसा सिर्फ तमिलनाडु के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। जब तक भीड़ नियंत्रण और जिम्मेदार आयोजन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक सिनेमा और राजनीति का यह खतरनाक संगम जानें लेता रहेगा।
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