लोकसभा में वंदे मातरम् तूफ़ान: मोदी ने खोला 150 साल का विवाद, बोले – कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए! Read it later

vande mataram debate पर लोकसभा में 10 घंटे की ऐतिहासिक चर्चा शुरू हुई, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् सिर्फ राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई की आत्मा है। 150 वर्ष पूरे होने पर यह बहस राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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वंदे मातरम् पर लोकसभा में 10 घंटे की ऐतिहासिक चर्चा

लोकसभा में आज राष्ट्रगीत vande mataram के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक घंटे के संबोधन में कहा कि वंदे मातरम् अंग्रेजों के खिलाफ सबसे शक्तिशाली नारा था और आज भी भारत को एकजुट करने की ऊर्जा देता है।
उन्होंने कहा— “वंदे मातरम् का अपमान सिर्फ गीत का नहीं, राष्ट्र की आत्मा का अपमान है।”

PM ने भाषण में 121 बार वंदे मातरम् का जिक्र किया

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की खास बात यह रही कि उन्होंने:

  • vande mataram — 121 बार

  • देश — 50 बार

  • भारत — 35 बार

  • अंग्रेज — 34 बार

  • बंगाल — 17 बार

  • कांग्रेस — 13 बार

का उल्लेख किया।

उन्होंने रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी का नाम 10 बार लिया और नेहरू, गांधी, जिन्ना, मुस्लिम लीग जैसे संदर्भों से यह बताया कि राष्ट्रगीत पर विवाद कैसे खड़ा हुआ।

मोदी ने कहा: जिन्ना के दबाव में झुके नेहरू

मोदी ने अपने भाषण में 1936 की घटना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ में वंदे मातरम् के खिलाफ अभियान चलाया और जवाहरलाल नेहरू उसके दबाव में आ गए।
उन्होंने कहा—
“जिसने राष्ट्र को जोड़ा, उसके ही टुकड़े कर दिए गए। यह इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक थी।”

नेहरू ने जिन्ना के सामने झुककर वंदे मातरम् पर सवाल खड़े किए: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने 1936 में vande mataram के खिलाफ अभियान चलाया था। लेकिन उस समय कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू, मुस्लिम लीग की आपत्तियों के सामने झुक गए। उन्होंने कहा—“वंदे मातरम् की ताकत को गांधीजी समझते थे, लेकिन कांग्रेस ने उसी राष्ट्रगीत के टुकड़े कर दिए।”

मोदी ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे पवित्र मंत्र को राजनीतिक सौदेबाजी का विषय बना दिया।

पीएम मोदी बोले—वंदे मातरम् ने बंगाल विभाजन आंदोलन को ऊर्जा दी

मोदी ने 1905–06 के स्वदेशी आंदोलन का जिक्र करते हुए बताया कि vande mataram बंगाल में “गली-गली की आवाज़” बन गया था।
उन्होंने कहा—“हजारों लोग बिना भय के फांसी पर चढ़ते गए, लेकिन अंतिम सांस तक वंदे मातरम् कहते रहे। यह मंत्र, यह नारा भारत की आत्मा था, है और रहेगा।”

उन्होंने बारीसाल जुलूस का भी उल्लेख किया, जहाँ 20 मई 1906 को हिंदू-मुस्लिम सहित सभी समुदायों ने हाथों में झंडे लेकर मार्च किया था। उनके अनुसार यह इस गीत की एकता की शक्ति का उदाहरण है।

vande mataram
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प्रधानमंत्री के भाषण की 6 मुख्य बातें

1️⃣ वंदे मातरम् का स्मरण सौभाग्य

मोदी बोले— “जिस मंत्र ने स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा दी, उसका स्मरण करना सदन का सौभाग्य है।”

2️⃣ 150 वर्ष और भारत का नया युग

50 वर्ष पर भारत गुलामी में था, 100 वर्ष पर आपातकाल में…
आज 150 वर्ष पर भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।

3️⃣ 1906 का ऐतिहासिक जुलूस

उन्होंने बताया कि 1906 में 10,000 लोगों ने हिंदू–मुस्लिम एकता के साथ वंदे मातरम् जुलूस निकाला था। यह गीत उस दौर में राष्ट्रीय एकता का प्रतीक था।

4️⃣ बंगाल में गली-गली का नारा

उन्होंने कहा कि बंगाल में वंदे मातरम् वह नारा था जिसने लोगों में आज़ादी का जुनून और साहस भरा।

5️⃣ कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेके

मोदी के अनुसार, 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में vande mataram के हिस्सों में कटौती की।
उन्होंने कहा—
“इतिहास गवाह है कि तुष्टिकरण ने राष्ट्रहित को चोट पहुंचाई।”

6️⃣ INC से MNC होने का तंज

मोदी बोले—
“कांग्रेस INC से MNC बन गई है। जिनके साथ वे जुड़े हैं, वह vande mataram पर विवाद खड़ा करते हैं।”

संसद सत्र में वंदे मातरम् पर विशेष बहस क्यों?

सरकार ने इस बहस के पीछे 5 कारण बताए:

1️⃣ राष्ट्रीय एकता और भावना को मजबूत करना

देश में सांस्कृतिक गौरव बढ़ाने का प्रयास।

2️⃣ बंगाल चुनाव का राजनीतिक संकेत

गीत का इतिहास बंगाल से जुड़ा है, इसलिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया।

3️⃣ 1937 के विवाद को स्पष्ट करना

vande mataram के संशोधन को तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़कर प्रस्तुत करना।

4️⃣ बंगाल विभाजन और आज़ादी आंदोलन की याद

यह गीत बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन की धड़कन था।

5️⃣ संसद में सकारात्मक माहौल बनाना

SIR विवाद के बीच सरकार एक एकतामूलक चर्चा चाहती थी।

150 वर्ष पूरे, देशभर में कार्यक्रम जारी

भारत सरकार ने vande mataram के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्षभर चलने वाले कार्यक्रमों की घोषणा की है।
2 दिसंबर को स्पीकर ओम बिरला की बैठक में 8 और 9 दिसंबर को क्रमशः लोकसभा व राज्यसभा में चर्चा का फैसला लिया गया।

1) राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का संदेश

सरकार चाहती है कि वंदे मातरम् पर चर्चा से पूरे देश में राष्ट्रभावना और सांस्कृतिक गौरव का भाव मजबूत हो।

2) बंगाल चुनाव से पहले महत्वपूर्ण संदेश

राष्ट्रगीत का इतिहास बंगाल से जुड़ा है। आगामी चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार इसे भावनात्मक रूप से सामने ला रही है ताकि वहाँ सकारात्मक राजनीतिक माहौल बन सके।

3) 1937 के फैसले को दोबारा राष्ट्रीय विमर्श में लाना

उस समय धार्मिक तुष्टिकरण के कारण वंदे मातरम् के एक भाग को हटाया गया था। सरकार चाहती है कि वह इतिहास आज की पीढ़ी के सामने आए।

4) स्वतंत्रता आंदोलन के स्वदेशी संघर्ष की याद दिलाना

1905 के आंदोलन का “आत्मा-नारा” वंदे मातरम् था। इसे फिर से केंद्र में रखकर सरकार राष्ट्रवादी संदेश को मजबूत करना चाहती है।

5) संसद के वातावरण को सकारात्मक बनाना

SIR पर सरकार-विपक्ष टकराव बढ़ गया था। वंदे मातरम् जैसा विषय संवेदनशील और सर्वमान्य है, जिससे सदन का माहौल संतुलित होता है।

लोकसभा में किसने क्या कहा?

12 बजे शुरू हुई चर्चा का नेतृत्व प्रधानमंत्री ने किया।
कांग्रेस की ओर से गौरव गोगोई ने बात रखी।
स्पीकर ओम बिरला इस वर्ष राष्ट्रगीत को लेकर वर्षभर के कार्यक्रमों का नेतृत्व करेंगे।

150 साल का सफर—गुलामी से लोकतंत्र की ओर, वंदे मातरम् का बदलता स्वरूप

मोदी ने कहा कि—

  • जब इस गीत के 50 वर्ष पूरे हुए, तब भारत गुलाम था।

  • 100 वर्ष पूरे होने पर देश आपातकाल जैसे अंधेरे दौर से गुजर रहा था।

  • आज 150 वर्ष पूरे होने पर भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

उन्होंने कहा—“vande mataram गीत केवल इतिहास नहीं, भविष्य की प्रेरणा है।”

विपक्ष और मतभेद—लेकिन वंदे मातरम् सर्वमान्य

बहस में कई सांसदों ने माना कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद वंदे मातरम् भारत की साझा धरोहर है।

मोदी ने कहा—“हमारी पीढ़ियों ने इसे संघर्ष में सुना, आज की पीढ़ी इसे प्रगति के गीत के रूप में सुन रही है।”

क्या वंदे मातरम् को फिर राष्ट्रीय गीत के रूप में पुनर्स्थापित करने की कोशिश है?

सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया, लेकिन चर्चा का माहौल इस दिशा में संभावनाओं को लेकर उत्सुकता बढ़ाता है।

vande mataram bakim-chandra

वंदे मातरम्

रचयिता — बंकिम चंद्र चटोपाध्याय

प्रकाशन — 1882, आनंदमठ उपन्यास में पहली बार शामिल

14 अगस्त 1947

संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत इसी गीत से हुई थी।

1950

वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया।

1896

रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् पहली बार गाया

गीत का मूल रूप और हिंदी भावार्थ

मूल गीत

वंदे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्
श्यामलां सरसां मातरम्।
वंदे मातरम्।

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्,
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्।
वंदे मातरम्।

कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनादकारे,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खड्गकारे।
अबला केनो मां एतो बोले
बहुबल धारिणीं नमामि तारिणीं,
रिपुदलवारिणीं मातरम्।
वंदे मातरम्।

त्वं हि विद्या, तुमि धर्म, तुमि हृदि,
त्वं हि मर्म, त्वं हि प्राणः शरीर।
त्वं हि प्रतिष्ठा, गृहे-गृहे
त्वं हि पुमान् मातरम्।
वंदे मातरम्।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदल विहारिणी।
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वां, नमामि कमलाम्।
अनलां अनुगलां सुजलां सुफलां मातरम्।
वंदे मातरम्।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं धरिणीं मातरम्।
वंदे मातरम्।

भावार्थ (सरल हिंदी)

योगी और दार्शनिक श्रीअरविंद घोष ने इस महान गीत का विस्तृत भावार्थ लिखा है। उनका कहना था—

हे मातृभूमि!
तुम सिर्फ भूमि नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति, समृद्धि और शांति का स्वरूप हो।
तुम्हारी हवा, खेतों की हरियाली और नदियों का मधुर प्रवाह हमें जीवन से जोड़ता है।

तुम्हारे वनों की हरियाली, पर्वतों की शीतल हवा और फसलों की लहलहाती पंक्तियाँ हमें हर पल तुम्हारे प्रति कृतज्ञ बनाती हैं।

जब तुम्हारे नाम पर करोड़ों कंठ एक साथ “वंदे मातरम्” का जयघोष करते हैं, तो यह केवल आवाज नहीं—एक राष्ट्रीय चेतना होती है।

तुम विद्या भी हो, तुम धर्म भी हो, तुमसे ही मनुष्य की शक्ति और प्रतिष्ठा है।
तुम दुर्गा की तरह रक्षा करती हो, कमला की तरह समृद्धि देती हो और वाणी की तरह ज्ञान प्रदान करती हो।

हम तुम्हें नमन करते हैं—
हे भारत माता, तुम्हें बार-बार प्रणाम।

vande mataram: इतिहास, राजनीति और आधुनिक भारत में इसकी प्रासंगिकता

150 वर्ष बाद भी यह गीत भारत की सामूहिक चेतना का हिस्सा है।
मोदी ने कहा—“हमारी एकता को तोड़ने की हर कोशिश असफल हुई, लेकिन वंदे मातरम् की आवाज़ कभी धीमी नहीं हुई।”

क्या वंदे मातरम् 2024–25 के राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विषय अगले कुछ महीनों में राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों मंचों पर मुख्य भूमिका निभाएगा।

वंदे मातरम् — राष्ट्रगान के समान दर्जा, पर विवाद अभी भी जारी

15 अगस्त 1947 — आज़ादी के बाद संसद में गूंजा पहला गीत

स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक समारोह के दौरान वंदे मातरम् आज़ाद भारत की संसद में सबसे पहले गाया गया गीत बना।

24 जनवरी 1950 — वंदे मातरम् और जन गण मन को मिला आधिकारिक दर्जा

भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की कि वंदे मातरम् को जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा।
घोषणा के तुरंत बाद सभा में उपस्थित सभी सदस्यों ने दोनों गीत गाए।

राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं

सलामी, परेड या ध्वजारोहण जैसे औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगान गाना अनिवार्य होता है,
लेकिन वंदे मातरम् के लिए कोई बाध्यता नहीं है

1998 — उत्तर प्रदेश में स्कूलों में वंदे मातरम् अनिवार्य, विरोध के बाद निर्णय वापस

राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य किया।
कुछ मुस्लिम समूहों के विरोध के कारण,
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हस्तक्षेप के बाद आदेश वापस ले लिया गया।

2006 — केंद्र सरकार ने 100वीं वर्षगांठ पर गाने का आदेश जारी किया

पौने दो दशक पहले केंद्र ने घोषणा की कि वंदे मातरम् की 100वीं सालगिरह पर
इसे स्कूलों में गाया जाए।
बढ़ते विवाद को देखते हुए बाद में आदेश को वैकल्पिक बताया गया।

2006 — इस्लामिक संगठन जमीअत उलेमा-ए-हिंद का विरोध

संगठन ने स्पष्ट कहा कि
कोई सच्चा मुसलमान वंदे मातरम् नहीं गा सकता,
क्योंकि यह उनके धार्मिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाता।

2019 — दिल्ली हाईकोर्ट ने दर्जा स्पष्ट किया

हाईकोर्ट ने कहा कि
वंदे मातरम् को संविधान के अनुसार जन गण मन के बराबर सम्मान प्राप्त है।

2025 — वंदे मातरम् की 150वीं सालगिरह पर राष्ट्रीय अभियान शुरू

केंद्र सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक
“राष्ट्रीय गौरव और जनभागीदारी” अभियान चलाने का फैसला लिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय — बंगाल चुनाव की रणनीति?

विशेषज्ञों के मुताबिक,
2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव होने के कारण
सरकार वंदे मातरम् के मुद्दे को अधिक प्रासंगिक बनाना चाहती है।
क्योंकि इसके रचनाकार बंकिम चंद्र चटोपाध्याय बंगाल से थे,
इसलिए इस मुद्दे का भावनात्मक प्रभाव बड़ा माना जा रहा है।

आनंदमठ उपन्यास से प्रसिद्ध हुआ वंदे मातरम्
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की अनूठी रचना

प्रसिद्ध बंगाली लेखक और कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने एक ऐसा गीत लिखा, जिसमें धरती को माँ के रूप में स्तुति की गई। यह गीत था— वंदे मातरम्

1875 में पहली बार प्रकाशित, पर चर्चा सीमित

7 नवंबर 1875 को यह गीत साहित्य पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ।
उस समय इसे विशेष प्रसिद्धि नहीं मिली, हालांकि इसकी रचना शैली सभी के लिए नई और अनोखी थी।
गीत का पहला छंद संस्कृत में था, जबकि आगे के छंद बंगला भाषा में थे।

1882 में आनंदमठ उपन्यास में शामिल, तब मिला बड़ा मंच

सात साल बाद, 1882 में बंकिमचंद्र ने वंदे मातरम् को अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में स्थान दिया।
यह उपन्यास तत्कालीन सन्‍यासी विद्रोह पर आधारित था और अंग्रेज़ तथा मुगल शासन की अत्याचारपूर्ण नीतियों को उजागर करता था।

वंदे मातरम्— संन्यासियों का युद्धनाद

उपन्यास में संन्यासियों का नारा था— वंदे मातरम्, यानी माँ को नमन
वे इस धरती को अपनी माँ मानते थे और संघर्ष में यही गीत उनकी प्रेरणा बन गया।
इस संदर्भ में गीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

विद्रोह का नेतृत्व और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विद्रोह का नेतृत्व पंडित भवानीचरण पाठक, देवेंद्रनाथ टैगोर, रानी भवानी और मजनू शाह जैसे पात्रों ने किया।
सन्‍यासियों ने आम जनता पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ हथियार उठाए थे।

1896— कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गूंजा वंदे मातरम्

1896 में कांग्रेस पार्टी के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया।
गीत गाने वाले थे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
तब कांग्रेस के अध्यक्ष रहमतुल्ला सियानी थे।

वंदे मातरम्— गाने पर अंग्रेजों ने लगाया था प्रतिबंध

1905: बंगाल का विभाजन और आंदोलन की शुरुआत

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया—

  • पश्चिम बंगाल (हिंदू बहुल, राजधानी कलकत्ता)

  • पूर्वी बंगाल (मुस्लिम बहुल, राजधानी ढाका)

इस फैसले ने पूरे बंगाल में नाराजगी पैदा कर दी और स्वदेशी आंदोलन की ज्वाला भड़क उठी। इसी समय आनंदमठ से निकला नारा वंदे मातरम् आंदोलन का प्रतीक बन गया।

रवींद्रनाथ टैगोर भी जुलूसों में वंदे मातरम् गाते थे

स्वदेशी आंदोलन के दौरान जगह-जगह वंदे मातरम् गाते हुए जुलूस निकाले जाते थे।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर स्वयं इन पदयात्राओं में शामिल होते थे और गीत गाते हुए आगे बढ़ते थे।

अंग्रेज डरे— पूर्वी बंगाल के स्कूलों में वंदे मातरम् पर रोक

इस गीत की बढ़ती ताकत और आंदोलन पर इसके असर से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार ने पूर्वी बंगाल के स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम् गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

रंगपुर के एक स्कूल में वंदे मातरम् गाने के कारण 200 छात्रों पर 5 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
अंततः 1906 में सभी सार्वजनिक स्थानों पर वंदे मातरम् गाने पर अंग्रेजों ने औपचारिक रूप से बैन घोषित कर दिया

गीत की आवाज़ बंगाल से मुंबई, अमृतसर और लाहौर तक फैली

बंगाल में शुरू हुआ गीत बहुत जल्द सीमाओं से बाहर निकलकर—
मुंबई, अमृतसर, रावलपिंडी और लाहौर तक आजादी का संदेश बनकर फैल गया।
यह राष्ट्रवादी संघर्ष का प्रेरक स्वर बन गया।

1920 तक वंदे मातरम् कई भाषाओं में पहुँच चुका था

इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य अपनी किताब बायोग्राफी ऑफ़ अ सॉन्ग में लिखते हैं—
1920 तक वंदे मातरम् के अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुके थे और यह गीत राष्ट्रगान की हैसियत तक पहुँच गया था।

वंदे मातरम् को मुस्लिम लीग ने क्यों बताया ‘ग़ैर-इस्लामिक’

1908: मुस्लिम लीग के अधिवेशन में उठी आपत्ति

सर सैयद अली इमाम ने 1908 में मुस्लिम लीग के मंच से कहा—
“जब मैं देखता हूँ कि भारत का सबसे उन्नत प्रांत वंदे मातरम् जैसे सांप्रदायिक नारे को राष्ट्रीय स्वरूप देता है, तो मन निराश हो जाता है। इससे लगता है कि राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।”

1920: पत्रिकाओं ने गीत को मूर्ति-पूजा से जोड़ा

1920 में इस्लाम दर्शन पत्रिका ने वंदे मातरम् को मूर्तिपूजा की परंपरा से जोड़कर आपत्ति जताई।
इसी तरह शरीयत-ए-इस्लाम मैगज़ीन ने भी वंदे मातरम् बोलने को “गैर-इस्लामिक” करार दिया।

1923: कांग्रेस अधिवेशन में बड़ा विवाद

1923 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता मोहम्मद अली जौहर कर रहे थे।
जैसे ही कार्यक्रम में वंदे मातरम् गाए जाने की घोषणा हुई, उन्होंने विरोध दर्ज करते हुए मंच छोड़ दिया।
गायन शुरू होते ही वे अपनी अध्यक्षीय कुर्सी से उठकर बाहर चले गए।

विवाद के बीच विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने गीत जारी रखा

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध गायक विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने विरोध के बावजूद वंदे मातरम् गाना जारी रखा।
स्थिति संभालने के लिए सभा में अल्लामा इक़बाल द्वारा रचित गीत “सारे जहाँ से अच्छा” भी प्रस्तुत किया गया।

कांग्रेस कमेटी ने वंदे मातरम् के 4 छंद क्यों हटाए

मुस्लिम लीग की आपत्तियों से विवाद गहरा

मुस्लिम लीग लगातार आरोप लगा रही थी कि कांग्रेस, मुसलमानों पर देवी-देवताओं की पूजा थोप रही है, जबकि उनके लिए मूर्तिपूजा मान्य नहीं। इसी वजह से वंदे मातरम् को लेकर विवाद बढ़ता गया।

1937: कांग्रेस का वंदे मातरम् पर पहला बड़ा निर्णय

1937 में वंदे मातरम् के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित किया गया।
विवाद सुलझाने के लिए कांग्रेस ने एक विशेष समिति बनाई, जिसमें रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आज़ाद और जवाहरलाल नेहरू शामिल थे।

इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य का उल्लेख

इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य अपनी किताब में लिखते हैं कि इस समिति की चर्चाएँ काफी संवेदनशील थीं।
विवाद की जड़ समझने के लिए नेहरू ने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ना शुरू किया और महसूस किया कि गीत की पृष्ठभूमि मुस्लिम समाज में असहजता पैदा कर रही है।

नेहरू की टैगोर को चिट्ठी

नेहरू ने रवींद्रनाथ टैगोर को एक पत्र में लिखा—
“वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि समझने के लिए मैं आनंदमठ पढ़ रहा हूँ। मुझे स्पष्ट लगता है कि इसी वजह से मुस्लिम समुदाय असहज महसूस कर रहा है।”

टैगोर की सलाह और अंतिम फैसला

टैगोर ने नेहरू को सुझाव दिया कि वंदे मातरम् के पहले दो छंद इतने प्रभावशाली और स्वीकार्य हैं कि इन्हें बिना विवाद के गाया जा सकता है।
बाकी छंद, जो धार्मिक प्रतीकों से जुड़े थे, उन्हें राष्ट्रीय कार्यक्रमों में छोड़ दिया जाए।

अंततः निर्णय हुआ कि आधिकारिक अवसरों पर केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे

वंदे मातरम्: क्या वाकई इस्लाम विरोधी है?

1938 में जिन्ना का आरोप

1938 में मुस्लिम लीग के सेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि सरकारी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों से ज़बरदस्ती वंदे मातरम् गवाया जा रहा है। उनका दावा था कि मुसलमान इस गीत के बदले हुए रूप को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते।

मुस्लिम लीग की दो बड़ी आपत्तियां
  • पहली वजह: गीत में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिसे मूर्ति-पूजा को बढ़ावा माना गया। इस्लाम में यह स्वीकार्य नहीं है।

  • दूसरी वजह: आनंदमठ उपन्यास की पृष्ठभूमि में मुसलमानों को देश के दुश्मन के रूप में दिखाया गया, जिससे असहमति और बढ़ी।

विद्वानों का नजरिया

इस्लामिक स्कॉलर मौलाना रेजा अपनी पुस्तक बंकिम चंद्र और मुस्लिम समाज में लिखते हैं कि वंदे मातरम् का उद्देश्य धार्मिक श्रेष्ठता या मूर्ति पूजा का प्रचार नहीं है, बल्कि देश को ‘मां’ कहने की काव्यात्मक परंपरा है।

इतिहासकार आर.सी. मजूमदार की राय

मज़ूमदार लिखते हैं कि आनंदमठ में बंकिमचंद्र ने देवी काली के जिस रूप का वर्णन किया है, उससे स्पष्ट है कि उनका राष्ट्रवाद हिंदू था, भारतीय नहीं।

आज़ादी के बाद की बहस

लेखक राज खन्ना अपनी किताब आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद में लिखते हैं कि अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार बढ़ाने की कोशिश की, और वंदे मातरम् को लेकर विवाद उनमें से एक था।

इतिहासकार राम पुनियानी का तर्क

राम पुनियानी बताते हैं कि मुसलमानों की परेशानी गीत के 4 छंदों से है, जिनमें देवी-देवताओं का ज़िक्र है। इसके अलावा आनंदमठ में मुस्लिम सत्ता के प्रति नकारात्मक भाव भी दर्ज हैं, जो विवाद की बड़ी वजह है।

आनंदमठ में मुस्लिम विरोधी क्या-क्या लिखा है?

आनंदमठ, भाग–3: मुस्लिम सत्ता पर सवाल

उपन्यास में एक संन्यासी योद्धा कहता है—
“हमारे देश का मुसलमान राजा क्या हमारी रक्षा कर रहा है? इन अंग्रेज दानवों को भगाए बिना हिंदू कैसे रह पाएंगे?”

इसके बाद वह वंदे मातरम् का तीसरा छंद गाता है, जो अत्याचार और संघर्ष के दौर को दर्शाता है।

संघर्ष और शक्ति का संदेश

इस छंद में बताया गया है कि जब करोड़ों लोग अत्याचार से उठ खड़े होंगे, तब शक्ति ही निर्णायक होगी—
“हे मां, तू शक्ति है! तेरे आशीर्वाद से ही विजय संभव है।”

आनंदमठ, भाग–4: मुस्लिम सत्ता के प्रति रोष

उपन्यास में दिखाया गया है कि संन्यासियों को मुसलमान सैनिक पकड़कर ले जाते हैं। इससे उनके भीतर क्रोध बढ़ता है और वे अपने गुरु को छुड़ाने के लिए मुसलमान अधिकारियों के घर में आग लगा देते हैं।

आनंदमठ, भाग–7: प्रतिशोध की चरम सीमा

बंकिमचंद्र लिखते हैं कि संन्यासी किसी मुस्लिम बस्ती में पहुंचकर घरों को जला देते हैं और लूटे गए सामान को हिंदू देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं।

अंत में मुस्लिम राज्य का पतन

उपन्यास में दिखाया गया है कि संन्यासी मुस्लिम शासन को समाप्त कर देते हैं, लेकिन अंग्रेजों से हार जाते हैं।
मुख्य पात्र सत्यांनंद निराश होता है, तब चिकित्सक कहता है—
“तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ। मुस्लिम राज्य नष्ट हो गया। अब हिंदू राज्य नहीं बनेगा, अब अंग्रेज राज करेंगे।”

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