कन्हैया-जिग्नेश के समय में ही राजनीति में रखा कदम, यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स में चमकी, लेकिन मेनस्ट्रीम पालिटिक्स में फीकी पड़ी चमक, जानिए ऐसी युवा फीमेल लीडर्स के बारे में

कन्हैया-जिग्नेश के समय में ही राजनीति में रखा कदम

जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और युवा नेता कन्हैया कुमार लंबे बाद समय इन दिनों चर्चा में हैं। वह 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही सुर्खियों से लगभग गायब थे। अब वह लेफ्ट साइड छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कन्हैया के अलावा गुजरात के युवा नेता जिग्नेश मेवाणी भी लगभग कांग्रेस में शाामिल हो चुके हैं बस औपचारिक घोषणा होना बाकि है।

ऐसे में अब कन्हैया और जिग्नेश दोनों छात्र और आंदोलनकारी राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति में चले गए हैं। उनकी छात्र राजनीति के दौरान उनके आसपास कई ऐसी लड़कियां रहीं, जिन्होंने छात्र राजनीति में कमाल नेतृत्व किया। वह कैंपस पॉलिटिक्स से सुर्खियों में बनीं। देश के युवाओं को भी उनका अंदाज बेहद पसंद आया। लेकिन ये लड़कियां राष्ट्रीय राजनीति में पीछे रह गईं। आइए हम आपको बताते हैं कि कहां हैं आजकल के ये युवा नेत्रीयां।

शेहला रशीद शोरा पर जेएनयू में विवादित राष्ट्र विरोधी नारे के आरोप लगे

शेहला रशीद शोरा पर जेएनयू में विवादित राष्ट्र विरोधी नारे के आरोप लगे

शेहला राशिद शोरा छात्र राजनीति के सबसे चर्चित नामों में से एक है। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके से आता है। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, श्रीनगर से कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है। एचसीएल में कुछ समय तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर भी काम किया। 

लेकिन वह आगे की पढ़ाई के लिए जेएनयू पहुंच गई। सोशियोलॉजी से एमए, लॉ एंड गवर्नेंस से एमफिल और फिर जेएनयू से ही पीएचडी की डिग्री। जेएनयू में पढ़ाई के दौरान वह छात्र राजनीति में काफी सक्रिय रहीं। शेहला 2010 से सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। वह कई मंचों पर कश्मीर के मुद्दों को उठाती थीं। 

वह साल 2015 में सुर्खियों में आईं, जब उन्हें जेएनयू छात्र संघ का उपाध्यक्ष चुना गया। साल 2016 में जब जेएनयू में विवादित राष्ट्र विरोधी नारे लगे थे, तब शेहला जेएनयू की उपाध्यक्ष थीं और कन्हैया कुमार अध्यक्ष थे। इस घटना के बाद दोनों देश भर में मशहूर नाम हो गए।

शेहला ने कैंपस पॉलिटिक्स के बाद अपने राज्य को मुख्य राजनीति के लिए चुना। प्रशासनिक सेवा छोड़कर शाह फैसल की पार्टी जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) पार्टी में शामिल हो गई। 

उन्होंने चुनाव भी लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। फिर पार्टी से इस्तीफा दे दिया। फिलहाल वह राजनीतिक से दूर ही हैं।

आइशी घोष 2019 में जेएनयू प्रेसीडेंट रहीं

आइशी घोष 2019 में जेएनयू प्रेसीडेंट रहीं


दीप्सिता की तरह ही आइशी भी पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखती हैं। आइशी का जन्म दुर्गापुर में हुआ था। मां शर्मिष्ठा घोष गृहिणी हैं और पिता देबाशीष मुखर्जी सरकारी कर्मचारी हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद आइशी मास्टर डिग्री के लिए जेएनयू चली गईं। 

यहां उन्होंने स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस सेंटर से पीएचडी की। साल 2019 में वह जेएनयू प्रेसीडेंट चुनी गईं। फीस वृद्धि, बिजली बिल में वृद्धि, पुस्तकालय की फंडिंग कम करने, पोशाक और समय की पाबंदी के संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किए गए परिवर्तनों के खिलाफ वह बहुत मुखर थीं। 

आइशी मौजूदा सरकार की नीतियों की बहुत बड़ी आलोचक हैं। कई मौकों पर उन्होंने सरकार की नीतियों को खुलकर ​क्रिटिसाइज किया है। जनवरी 2020 में, कुछ अज्ञात लोगों ने जेएनयू परिसर में प्रवेश किया था उस दोरान छात्रों के साथ मारपीट की गई थी। उस वक्त आइशी को भी काफी चोटें आई थीं।

समर्थन में बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण भी आईं थीं

इस घटना के बाद आइशी को पूरे देश का समर्थन मिला। उनके समर्थन में बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण भी जेएनयू पहुंची । केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी उनसे मुलाकात की। हालांकि इस पूरे विवाद में दिल्ली पुलिस ने आइशी को आरोपी बनाया था, जिसके लिए दिल्ली पुलिस की भी काफी आलोचना हुई थी। 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में, सीपीएम ने जमुरिया विधानसभा की अपनी पारंपरिक सीट से आइशी को मैदान में उतारा। उनके कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने अपने मौजूदा विधायक का टिकट काटकर जेएनयू अध्यक्ष को उतारा था। 

हालांकि, आइशी छात्र राजनीति के जादू को बरकरार नहीं रख पाईं और टीएमसी उम्मीदवार हरेराम सिंह से 46,000 वोटों से चुनाव हार गईं। इसके बाद से वह राजनीतिक मंच पर नहीं आई हैं।

दीप्सिता धार

दीप्सिता धार


दीप्सिता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले की रहने वाली हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्हें राजनीति विरासत में मिली है। दीप्सिता के दादा पदम निधि धार दोमजुर विधानसभा सीट से विधायक थे। पिता पीयूष धार और मां दीपिका ठाकुर चक्रवर्ती दोनों ही परिवहन विभाग में कार्यरत हैं। वहीं उनकी मां भी राजनीति में सक्रिय हैं। 

वह सीपीएम की क्षेत्रीय समिति की सदस्य हैं। दीप्सिता ने आशुतोष कॉलेज से भूगोल में ग्रेजुएशन किया। आगे की पढ़ाई के लिए वे देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय गईं। यहीं से उन्होंने भूगोल से एमफिल और पीएचडी की। 

वह अपने स्नातक दिनों के दौरान स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़ी थीं। एसएफआई के लिए कई जिम्मेदारियां निभाईं। देश के विभिन्न क्षेत्रों के छात्र आंदोलन और सामाजिक हड़तालों में बहुत सक्रिय रहीं।

वर्ष 2018 में शिमला में आयोजित स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सम्मेलन में दीप्सिता को अखिल भारतीय संयुक्त सचिव बनाया गया था। उसी साल पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने बल्ली विधानसभा से दीप्सिता को अपना उम्मीदवार बनाया था। 

यहां दीप्सिता के सामने बीजेपी ने आईसीसी के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली डालमिया और टीएमसी ने डॉ राणा चटर्जी को मैदान में उतारा है। हालाकि दीप्सिता यहां से चुनाव हार गईं। लेकिन दिप्सिता के भाषण और उम्मीदवारी दोनों ने खूब सुर्खियां बटोरी। हालांकि इसके बाद वह सुर्खियों में नहीं आ सकीं।

ऋचा सिंह इलाहबाद यूनिवर्सिटी की पहली महिला अध्यक्ष बन आईं थीं सुर्खियों में, योगी आदित्यनाथ कैंपस में नहीं घुसने दिया था

ऋचा सिंह इलाहबाद यूनिवर्सिटी की पहली महिला अध्यक्ष बन आईं थीं सुर्खियों में


साल 2015 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहली महिला अध्यक्ष बनकर सुर्खियों में आईं। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी महिला को विश्वविद्यालय का अध्यक्ष चुना गया। ऋचा की पहचान उनके काम करने का स्टाइल भी रही है। 

परिसर में एबीवीपी की मजबूत पकड़ के बावजूद, उन्होंने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यूनिवर्सिटी में इतिहास बदलने के बाद ऋचा देशभर के लोगों की नजरों में उस वक्त आईं जब उन्होंने योगी आदित्यनाथ को कैंपस में घुसने नहीं दिया। उस समय एक भवन के उद्घाटन के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में योगी आदित्यनाथ कैंपस पहुंचे थे।

पढ़ाई की बात करें तो अलीगढ़ की ऋचा ने पढ़ाई के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को चुना। यहीं से उन्होंने सेंटर फॉर ग्लोबल एंड डेवलपमेंट स्टडीज से पीएचडी की। वह एमफिल में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं। 

राजनीतिक करियर की बात करें तो कैंपस पॉलिटिक्स के बाद वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। उन्होंने प्रयागराज जिले के सिटी वेस्ट विधानसभा क्षेत्र से पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। फिलहाल वह पार्टी की प्रवक्ता हैं, लेकिन वे सुर्खियों में नहीं हैं।

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