आज (8 नवंबर) Margashirsha Month का तीसरा दिन है, जिसे “अघ निकाय” या “अगहन मास” भी कहा जाता है। यह माह 4 दिसंबर तक रहेगा। इस समय धर्म-कर्म के साथ ही सेहत‑विज्ञान भी महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन जल्दी उठना, ध्यान‑योग‑प्राणायाम करना, स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पित करना और “कृं कृष्णाय नम:” मंत्र का जप करना विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है।
मार्गशीर्ष (अघ निकाय) मास का धार्मिक महत्व
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, मार्गशीर्ष मास स्वयं श्रीकृष्ण का स्वरूप है। श्रीकृष्ण ने भगवद् गीता में कहा है — “मैं महीनों में मार्गशीर्ष हूँ।” इस मास में की गई पूजा‑अर्चना, योग‑ध्यान और भक्तिमय कर्म धर्मात्मक लाभ के साथ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी द्वार खोलते हैं।
मौसम‑परिवर्तन और स्वास्थ्य देखभाल
मार्गशीर्ष मास से शीत ऋतु का प्रभाव बढ़ने लगता है। ठंडी हवाएँ चलती हैं और मौसम साफ‑शुष्क होता है। इस माह में सुबह जल्दी उठकर प्रातः भ्रमण (morning walk) करना और सूर्य की किरणों में बैठना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है — विटामिन D मिलता है, रोग‑प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। साथ ही, सर्दी के मौसम में नियमित तेल मालिश की परंपरा से त्वचा रूखी नहीं होती और नमी संतुलित रहती है।
अगहन मास में शंख‑पूजा की विशेष परंपरा
इस माह में विशेष रूप से शंख पूजा का महत्व है। श्रीकृष्ण के पंचजन्य शंख को प्रतीक माना जाता है।
घर के मंदिर में बालगोपाल, गौमाता और शंख‑प्रतिमा रखें।
इन्हें जल‑पंचामृत (दूध‑दही‑घी‑मिश्री‑शहद) से अभिषेक करें।
चंदन‑कुमार‑कुमकुम से तिलक करें, भोग लगाएं, धूप‑दीप जलाएं।
पूजा के दौरान “कृं कृष्णाय नमः” मंत्र जपें, उसके बाद शंख मंत्र —
त्वं पुरा सागरोत्पन्न विष्णुना विधृतः…
नामोऽस्तुते पाञ्चजन्य नमोऽस्तुते।
अगहन मास में करें ये कार्य
प्रातः जल्दी उठें, ध्यान‑प्राणायाम करें।
स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं।
शंख‑पूजा, श्रीकृष्ण‑पूजा, मंत्र‑जप करें।
सुबह की धूप में बैठकर विटामिन D प्राप्त करें।
सर्दियों में नियमित तेल मालिश करें।
प्रवचन, भजन‑कीर्तन, दान‑पुण्य करें — इस मास को भक्तिमय बनाएं।
मार्गशीर्ष मास में क्यों जरूरी है मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन?
मार्गशीर्ष मास न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन के लिए भी श्रेष्ठ माना गया है। इस माह में वातावरण शांत और स्वच्छ रहता है, जिससे ध्यान और साधना में मन सहजता से लग जाता है। इस मौसम में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, मार्गशीर्ष मास में की गई ध्यान साधना, जप, तप और भक्ति का फल कई गुना अधिक मिलता है। खासकर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर की गई प्रार्थना और योग शरीर और मन दोनों को संतुलित करते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है— “ध्यान मूलं गुरु मूर्ति, पूजामूलं गुरु पदम्।” मार्गशीर्ष का समय गुरु और ज्ञान के प्रति श्रद्धा बढ़ाने का भी होता है।
इस माह में सात्विक भोजन, संयमित जीवनशैली और धार्मिक अनुष्ठानों से चित्त को स्थिर किया जा सकता है। साथ ही, यह महीना आत्मनिरीक्षण और आभार प्रकट करने के लिए उपयुक्त है।
यदि प्रतिदिन कुछ समय भगवत चिंतन, श्रीकृष्ण मंत्र का जप या गीता पाठ के लिए निकाला जाए, तो व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक स्थिर और आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो सकता है।
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