Pitru Paksha 2025 की अंतिम तिथि 1 सितंबर है, जिसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। मान्यता है कि इस तिथि पर किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों को तृप्त करता है। इस दिन विशेष विधि-विधान के साथ पितरों की पूजा करने से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या कब मनाई जाती है?
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या 21 सितंबर को पितृ पक्ष की अंतिम तिथि के रूप में मनाई जाएगी। इसके अगले दिन से Navratri 2025 की शुरुआत होती है।
इस दिन पितरों के लिए कौन-कौन से कर्म किए जाते हैं?
श्राद्ध, pind daan, तर्पण और धूप-ध्यान प्रमुख कर्म हैं। गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में इन कर्मों के महत्व का वर्णन मिलता है।
अमावस्या पर श्राद्ध का क्या महत्व है?
मान्यता है कि इस दिन किए गए श्राद्ध से सभी पूर्वजों को तृप्ति मिलती है। यदि किसी की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो इस दिन किया गया श्राद्ध आत्मा को शांति प्रदान करता है।
पितरों को तृप्त करने के लिए कौन सा समय श्रेष्ठ है?
श्राद्ध और धूप-ध्यान का श्रेष्ठ समय दोपहर 12 बजे का कुतुप काल माना जाता है। इस समय किए गए कर्मों का विशेष फल मिलता है।
श्राद्ध और तर्पण करने की विधि क्या है?
जल में तिल, जौ और कुश डालकर पितरों को अर्पित करें।
हथेली से अंगूठे की ओर जल अर्पित करना चाहिए।
चावल, तिल और आटे से बने पिंड पितरों को अर्पित किए जाते हैं।
अमावस्या पर और कौन सी परंपराएं निभानी चाहिए?
प्रातः स्नान, घर की सफाई और गौमूत्र का छिड़काव करें।
घर के मंदिर में देवी-देवताओं की पूजा करें।
सात्विक भोजन बनाएं और मांस-मदिरा से परहेज करें।
जरूरतमंदों को भोजन कराएं।
इस दिन किन बातों से बचना चाहिए?
गुस्सा या कलह न करें।
घर में अशांति से पितर तृप्त नहीं होते।
हिंसा और नकारात्मक कार्यों से दूर रहें।
क्या नदी स्नान अनिवार्य है?
यदि नदी स्नान संभव न हो तो घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। इसे भी शुभ और शुद्ध माना जाता है।
श्राद्ध और तर्पण के लिए जरूरी सामग्री
श्राद्ध और तर्पण करने के लिए कुछ खास वस्तुओं की आवश्यकता होती है। इसमें तांबे का चौड़ा बर्तन, जौ, तिल, चावल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल, पानी, कुशा घास, गाय के गोबर से बना कंडा, घी, खीर-पुरी, गुड़ और तांबे का लोटा शामिल हैं।
घर पर श्राद्ध और तर्पण कैसे करें?
सुबह की तैयारी
श्राद्ध वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध और दान करने का संकल्प लें।
कुतुप काल में विधि
दोपहर लगभग 12 बजे दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठे। बाएं पैर को मोड़कर और घुटनों को जमीन पर टिकाकर आसन ग्रहण करें।
अर्पण सामग्री
तांबे के पात्र में जौ, तिल, चावल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और शुद्ध जल डालें।
तर्पण की प्रक्रिया
हाथ में कुशा घास रखें और उस जल को हाथों में भरकर दाहिने हाथ के अंगूठे से बर्तन में गिराएं। इसे 11 बार करते हुए पितरों का ध्यान करें और तर्पण करें।
कंडा और हवन सामग्री
गाय के गोबर से बने कंडे को जलाएं। जब धुआं बंद हो जाए, तब उसमें गुड़, घी और थोड़ी-थोड़ी खीर-पुरी अर्पित करें।
जल अर्पण
हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को स्मरण करते हुए भूमि पर अर्पित करें।
भोजन और दान
इसके बाद देवता, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भोजन अलग से निकालें। जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
21 सितंबर को सूर्य ग्रहण, भारत में नहीं दिखेगा
भारतीय समयानुसार 21 सितंबर की रात Solar Eclipse होगा। हालांकि, ये ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां इसका Sutak काल भी प्रभावी नहीं रहेगा। यह ग्रहण न्यूजीलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिका के आस-पास के क्षेत्रों में दिखाई देगा। भारतीय समय के अनुसार, ग्रहण रात 11 बजे शुरू होकर 3:24 बजे समाप्त होगा।
पितरों के लिए कुतुप काल में धूप-ध्यान
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन पितरों के लिए दोपहर 12 बजे धूप-ध्यान करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस समय को कुतुप काल कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से उन पितरों के लिए धूप-ध्यान और श्राद्ध कर्म करने के लिए है, जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि पर हुई हो या जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो।
पितरों की विदाई का दिन
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या को किए गए श्राद्ध कर्म से पितर तृप्त होकर प्रसन्न होते हैं और पितृ लोक लौट जाते हैं। इसीलिए इसे पितरों की विदाई का दिन भी कहा जाता है। इस दिन दान-पुण्य और श्राद्ध करने से पितर आशीर्वाद देते हैं और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
अमावस्या से जुड़ी मान्यताएं
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर पवित्र नदियों जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा और शिप्रा में स्नान करने की परंपरा है। अगर संभव न हो, तो घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी समान पुण्य देता है। इस दिन भोजन, कपड़े, अनाज, जूते-चप्पल और धन का दान करने की परंपरा है। साथ ही, गौशाला में दान और गायों को हरी घास खिलाना भी अत्यंत शुभ माना गया है।
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