Sanwariya Ji Temple Donation 2025 ने इस वर्ष नया इतिहास रच दिया है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ स्थित श्री सांवलियाजी सेठ मंदिर में इस बार भक्तों की आस्था ने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। 27 नवंबर 2025 तक हुई गिनती में कुल चढ़ावा 51 करोड़ रुपए पार कर गया, जो मंदिर इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा दान है।
सांवलियाजी मंदिर में 2025 का चढ़ावा बना ऐतिहासिक—51 करोड़ 27 लाख से अधिक राशि जमा
चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) का प्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलियाजी सेठ मंदिर हर वर्ष दान में बड़ी राशि प्राप्त करता है, लेकिन वर्ष 2025 भक्तों की आस्था का अभूतपूर्व प्रतीक बन गया। 27 नवंबर 2025 तक सभी राउंड की गिनती पूरी होने के बाद कुल प्राप्त राशि ₹51,27,30,112 घोषित की गई। यह पहली बार है जब मंदिर के इतिहास में चढ़ावा 51 करोड़ रुपए से ऊपर पहुंचा है।
इस बार न केवल नकद दान बढ़ा, बल्कि ऑनलाइन माध्यमों से आने वाला चढ़ावा भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। भक्तों की आस्था और मंदिर प्रबंधन की डिजिटल पारदर्शिता का यह एक अद्भुत उदाहरण है।
ऑनलाइन दान बना बड़ी ताकत—10 करोड़ से अधिक प्राप्त
पिछले वर्षों में मंदिर को ऑनलाइन दान (UPI, नेटबैंकिंग, कार्ड) से भी अच्छी राशि मिलती रही है, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा इतिहास में पहली बार ₹10,52,89,569 तक पहुंच गया।
समाज में डिजिटल भुगतान के बढ़ते ट्रेंड का असर अब धार्मिक स्थलों पर भी साफ दिखने लगा है। विशेष रूप से युवा और विदेशों में बसे भक्त बड़ी संख्या में डिजिटल माध्यमों से सांवलियाजी को दान भेज रहे हैं।
ऑनलाइन दान में लगभग 40% की वृद्धि दर्ज की गई, जो दर्शाता है कि श्रद्धालुओं का विश्वास लगातार बढ़ रहा है।
सोना और चांदी का रिकॉर्ड: कुल 207.793 किलो चांदी और 1.204 किलो सोना
27 नवंबर को नकद गिनती के साथ-साथ सोना और चांदी का भी तौल किया गया।
कुल प्राप्त धातु की मात्रा इस प्रकार रही—
चांदी कुल: 207 किलो 793 ग्राम
भंडार से: 86.200 किलो
भेंट कक्ष से: 121.593 किलो
सोना कुल: 1204 ग्राम 04 मिलीग्राम
भंडार से: 985 ग्राम
भेंट कक्ष से: 219 ग्राम 400 मिलीग्राम
यह धातुएँ मंदिर की परंपरागत भेंट प्रणाली का प्रमाण हैं, जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाओं के पूर्ण होने पर श्रद्धा से सोना–चांदी अर्पित करते हैं।
सांवलियाजी मंदिर का भंडार कब और कैसे खोला गया?
भंडार 19 नवंबर 2025 को खोला गया था। इसके बाद लगातार सुबह से शाम तक चढ़ावे की गिनती की गई। नोटों, सिक्कों और पर्चियों की गिनती में ट्रस्ट, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्थाओं के अधिकारी मौजूद रहे।
मंदिर परिसर में पूरे समय भक्तों की भीड़ लगी रही, क्योंकि हर राउंड की गिनती भक्तों के लिए उत्साह और आस्था का केंद्र थी।
राउंड-वाइज नकद गिनती — 6 राउंड का पूरा विवरण
नीचे सभी राउंड में प्राप्त नकदी की राशि विस्तृत रूप में—
पहला राउंड — 12 करोड़ 35 लाख रुपए
19 नवंबर को भंडार खुलने के बाद पहले ही दिन की गिनती में ₹12,35,00,000 प्राप्त हुए।
इसी राउंड से संकेत मिल गया था कि इस बार का दान पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने वाला है।दूसरा राउंड — 8 करोड़ 54 लाख रुपए
20 नवंबर अमावस्या होने के कारण गिनती रोक दी गई।
21 नवंबर को दूसरे राउंड की गिनती शुरू हुई और इसमें ₹8,54,00,000 निकले।
यह भक्तों की बढ़ती आस्था का बड़ा प्रमाण था।तीसरा राउंड — 7 करोड़ 8 लाख 80 हजार रुपए
22 और 23 नवंबर को भारी भीड़ के कारण गिनती नहीं हो सकी।
24 नवंबर को तीसरे राउंड में ₹7,08,80,000 की नकदी प्राप्त हुई।चौथा राउंड — 8 करोड़ 15 लाख 80 हजार रुपए
चौथे राउंड में ₹8,15,80,000 मिले।
यहीं से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि दान इस बार 50 करोड़ को पार कर सकता है।पांचवां राउंड — 4 करोड़ 19 लाख 79 हजार रुपए
26 नवंबर को पांचवां राउंड हुआ। इसमें ₹4,19,79,000 की राशि निकली।
इसके बाद कुल चढ़ावा 40 करोड़ 33 लाख 39 हजार तक पहुँच गया।छठा और आखिरी राउंड — 41 लाख 01 हजार 543 रुपए
अंतिम राउंड में ₹41,01,543 प्राप्त हुए।
इसके साथ कुल नकद चढ़ावा 40 करोड़ से आगे और कुल मिलाकर दान की राशि 51 करोड़ से अधिक हो गई।
कुल दान का बड़ा हिसाब (संपूर्ण विवरण)
प्रकार राशि / मात्रा कुल नकद ₹40,33,39,543 कुल ऑनलाइन दान ₹10,52,89,569 कुल सोना 1204 ग्राम 04 मिलीग्राम कुल चांदी 207 किलो 793 ग्राम कुल राशि (अंतिम) ₹51,27,30,112
भक्तों की बढ़ती आस्था—इस रिकॉर्ड के पीछे असली शक्ति
मंदिर मंडल के सदस्यों का कहना है कि सांवलियाजी के प्रति लोगों की आस्था हर वर्ष बढ़ रही है। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश ही नहीं—देशभर और विदेशों से भी भक्त बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
मंदिर में—
भंडार दर्शन
भक्ति संगीत
धार्मिक आयोजन
विशेष रात्रि–भजन
सांवलियाजी के जागरण
उपरोक्त जैसे कार्यक्रमों के कारण श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2025 की अभूतपूर्व दान राशि इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
300 साल पहले मिली थीं सांवलियाजी की दिव्य मूर्तियाँ
चित्तौड़गढ़ से लगभग 36 किलोमीटर दूर भादसौड़ा के बागुंड क्षेत्र में करीब 300 वर्ष पहले भूमि खुदाई के दौरान तीन पवित्र मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं।
तीनों मूर्तियाँ एक स्वरूप की, आकार अलग-अलग
मूर्तियाँ स्वरूप में समान थीं, लेकिन तीनों का आकार अलग-अलग था, इसलिए इन्हें तीन अलग स्थानों पर विराजमान किया गया।
सबसे बड़ी 24 इंच की मूर्ति—भादसौड़ा में स्थापित
सबसे बड़ी 24 इंच की प्रतिमा वर्तमान में भादसौड़ा मंदिर में प्रतिष्ठित है, जहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त दर्शन करने आते हैं।
दूसरी मूर्ति 18 इंच—प्राकट्य स्थल बागुंड में स्थापित
18 इंच आकार वाली दूसरी प्रतिमा को उसी प्राकट्य स्थल बागुंड में स्थापित किया गया है, जहाँ मूर्तियाँ भूमि से प्रकट हुई थीं।
सबसे छोटी 16 इंच की मूर्ति—मंडफिया में प्रतिष्ठित
तीसरी और सबसे छोटी 16 इंच की प्रतिमा को मंडफिया स्थित मंदिर में विधिवत स्थापित किया गया है, जो आज सांवलियाजी मंदिर ट्रस्ट का मुख्य केंद्र माना जाता है।
तीनों मूर्तियों का स्वरूप समान, अंतर केवल आकार में
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सांवलियाजी की तीनों प्रतिमाएँ मूल रूप से एक ही स्वरूप की हैं। इनके बीच सिर्फ आकार का अंतर है, बाकि स्वरूप, भाव और प्रतीक समान हैं।
चतुर्भुज स्वरूप—चार भुजाओं वाली दिव्य प्रतिमाएँ
तीनों मूर्तियाँ चतुर्भुज रूप में हैं। इनमें भगवान के चार हाथ दर्शाए गए हैं, जो वैष्णव परंपरा के प्रमुख लक्षणों में से एक हैं।
ऊपर की ओर दो हाथ, नीचे की ओर दो हाथ
प्रत्येक प्रतिमा में दो हाथ ऊपर की दिशा में और दो हाथ नीचे की ओर स्थित हैं, जिससे स्वरूप एकरूप दिखाई देता है।
शंख, चक्र, गदा, कमल—विष्णु स्वरूप के प्रतीक
भगवान के हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल हैं। ये चारों आयुध भगवान विष्णु के दिव्य रूप का संकेत देते हैं और इनकी उपस्थिति प्रतिमाओं को विष्णु अवतार से जोड़ती है।
वैजयंती माला और कमरबंध—प्राकृतिक वैष्णव चिन्ह
तीनों मूर्तियों पर वैजयंती माला, कमरबंध और अन्य प्राकृतिक चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं। यह अलंकरण वैष्णव परंपरा और कृष्ण भक्ति के स्वरूप को दर्शाता है।
प्रतिमाएँ सांवलिया सेठ स्वरूप में—कपड़ों और वैभव से सजी
तीनों मूर्तियाँ पारंपरिक “सांवलिया सेठ” के रूप में सजाई जाती हैं। इनके हाथों में धारण किए गए आयुध और परिधान सांवलियाजी के शृंगार का अभिन्न अंग हैं।
श्रृंगार कृष्ण रूप से प्रेरित
प्रतिदिन तीनों प्रतिमाओं का शृंगार श्रीकृष्ण के रूप में किया जाता है। वस्त्र, मुकुट, फूल-मालाएँ और अलंकरण कृष्ण भक्ति परंपरा के अनुसार सजाए जाते हैं।
40 साल तक चबूतरे पर होती रहीं मूर्तियों की पूजा
भादसौड़ा के पास स्थित बागुंड प्राकट्य स्थल पर करीब 40 वर्षों तक सांवलियाजी की तीनों दिव्य मूर्तियों की पूजा एक चबूतरे पर की जाती रही। बाद में ग्रामवासियों ने इनमें से एक प्रतिमा को अपने गांव भादसौड़ा लाकर एक केलुपोश मकान में प्रतिष्ठित किया। दूसरी मूर्ति मंडफिया लाई गई, जबकि तीसरी बागुंड में ही स्थापित रही।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन मूर्तियों में से एक के सीने पर एक Foot Mark (चरण चिह्न) दिखाई देता है, जिसे ऋषि भृगु के पैर का निशान माना जाता है।
भृगु ऋषि से जुड़ी प्राचीन मान्यता
प्रतिमा पर पाए गए चरण चिह्न को लेकर एक प्राचीन कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, एक बार सभी ऋषियों ने एक विशाल यज्ञ संपन्न किया और यह निर्णय लिया कि यज्ञ का सर्वोच्च फल ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से किसे दिया जाए। निर्णय हेतु भृगु ऋषि को तीनों देवताओं के पास भेजा गया।
विष्णु भगवान के पास पहुंचे भृगु ऋषि
कथा के अनुसार, भृगु ऋषि सबसे पहले भगवान विष्णु के धाम पहुंचे। उस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही थीं। ऋषि को लगा कि भगवान उन्हें देखकर भी सोने का अभिनय कर रहे हैं, जिससे वे क्रोधित हो उठे।
क्रोध में ऋषि ने सीने पर प्रहार किया, विष्णु ने क्षमा मांगी
क्रोधावेश में भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु के Chest (सीने) पर लात मार दी। किंतु भगवान तुरंत उठे और विनम्रता से ऋषि के चरण पकड़ लिए। वे बोले—
“हे मुनिवर, मेरा शरीर कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं आई?”
भगवान की यह विनम्रता, क्षमाशीलता और धैर्य देखकर भृगु ऋषि भावविभोर हो गए और उन्होंने त्रिदेवों में भगवान विष्णु को ही सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। यज्ञ का फल भी उन्हें ही समर्पित किया गया।
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