CBSE OSM ने इस बार सिर्फ रिजल्ट पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि बोर्ड परीक्षा व्यवस्था पर छात्रों और अभिभावकों का भरोसा भी हिला दिया। चेयरमैन और सचिव के ट्रांसफर, टेंडर जांच, साइबर अटैक और छात्र गवाही ने CBSE OSM विवाद को सीधे सिस्टम की जवाबदेही से जोड़ दिया।
छात्रों के भरोसे पर बड़ा असर
बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट सिर्फ नंबर नहीं होता, वह लाखों घरों की उम्मीद, चिंता और अगले कदम का आधार होता है। यही वजह है कि जब 12वीं के नतीजों के बाद नंबरों को लेकर सवाल उठे, तो मामला सामान्य शिकायत की सीमा से बाहर चला गया। इस बार विवाद का केंद्र बनी ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली ने सीधे छात्रों के भरोसे को झटका दिया। अब सरकार ने जिस तेजी से कदम उठाए हैं, उससे साफ है कि मामला केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं माना जा रहा।
CBSE OSM विवाद के बीच केंद्र सरकार ने बोर्ड के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का ट्रांसफर कर दिया है। इसके साथ ही OSM सर्विस के टेंडर और खरीद प्रक्रिया की जांच के लिए एक सदस्यीय कमेटी गठित कर दी गई है। यह कदम बताता है कि अब सवाल सिर्फ रिजल्ट पर नहीं, पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर है। और यहीं से यह विवाद छात्रों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है।
CBSE OSM में बड़ा प्रशासनिक बदलाव
सरकार ने राहुल सिंह की जगह सीनियर आईएएस अधिकारी लोखंडे प्रशांत सीताराम को CBSE का नया चेयरमैन नियुक्त किया है। वरुण भारद्वाज को नया सचिव बनाया गया है। प्रशांत लोखंडे 2001 बैच के AGMUT कैडर के अधिकारी हैं, जबकि वरुण भारद्वाज 2008 बैच के भारतीय सूचना सेवा अधिकारी हैं। नेतृत्व में यह बदलाव साधारण तबादले की तरह नहीं देखा जा रहा, क्योंकि यह सीधे OSM विवाद के बीच हुआ है।
इसका मतलब यह हुआ कि सरकार अब बोर्ड की साख बहाल करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट संदेश देना चाहती है। जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो सिर्फ तकनीकी सफाई काफी नहीं होती। नेतृत्व परिवर्तन इस बात का संकेत होता है कि सिस्टम अब जिम्मेदारी तय करने के मोड में पहुंच चुका है। CBSE OSM अब केवल परीक्षा जांच की तकनीक नहीं, बल्कि शासन और जवाबदेही का केस बन गया है।
रिजल्ट से विवाद तक पूरी टाइमलाइन
13 मई को CBSE ने 12वीं बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट जारी किया। इस बार पहली बार कॉपियां कंप्यूटर स्क्रीन पर OSM सर्विस के जरिए जांची गई थीं। रिजल्ट के बाद कई छात्रों ने नंबरों को लेकर शिकायत की। 19 मई को पोस्ट-रिजल्ट शिकायतों के समाधान के लिए पोर्टल खोला गया, लेकिन पहले ही दिन वह क्रैश हो गया। 22 मई को तीन बार एक-एक दिन के लिए आंसरशीट की फोटोकॉपी लेने की तारीख बढ़ानी पड़ी। 25 मई को पोर्टल दुरुस्त करने के लिए देश के दो आईआईटी से मदद मांगी गई। 1 जून को री-इवैल से जुड़ा पोर्टल दिनभर नहीं खुल सका। 2 जून को बोर्ड ने पोर्टल लाइव करने की घोषणा की और इसे 6 जून तक ओपन रखा।
यह केवल तकनीकी देरी की टाइमलाइन नहीं है। यह उस दबाव की टाइमलाइन है जिसमें छात्र, परिवार और बोर्ड एक साथ फंसे रहे। बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट अगर समय पर आया भी, लेकिन उसके बाद सुधार और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया डगमगा जाए, तो पूरा सिस्टम संदिग्ध लगने लगता है। यही CBSE OSM विवाद की असली गंभीरता है।
छात्र गवाही का ऐतिहासिक मोड़
इस पूरे मामले का सबसे असाधारण पहलू यह रहा कि 12वीं के छात्र सार्थक सिद्धांत को संसद की स्थायी समिति के सामने पेश होने के लिए बुलाया गया। ऐसा पहली बार हुआ कि किसी मामले में एक छात्र को अपनी बात रखने के लिए संसदीय समिति के सामने बुलाया गया। सार्थक ने OSM प्रणाली में 15 खामियों की बात रखी और टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए। यह घटना अपने आप में बहुत बड़ी है।
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आमतौर पर छात्र शिकायत दर्ज करते हैं, अभिभावक आवाज उठाते हैं, और संस्थान जवाब देते हैं। लेकिन यहां एक छात्र ने प्रणाली की खामियों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया। इससे CBSE OSM विवाद केवल रिजल्ट विवाद नहीं रहा, बल्कि यह छात्र-नेतृत्व वाली सिस्टम जांच में बदल गया। यही इस पूरे मामले का सबसे अलग और सबसे असरदार मोड़ है।
वेदांत और सार्थक का ग्राउंड इम्पैक्ट
दिल्ली के वेदांत श्रीवास्तव ने भी 12वीं की परीक्षा दी थी। फिजिक्स में 65 नंबर मिलने के बाद उन्होंने सवाल उठाए। री-इवैल्यूएशन में कॉपी मिलने पर गड़बड़ी सामने आई। पहले उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, यहां तक कि देशद्रोही तक कहा गया। बाद में बोर्ड ने गलती मानी और माफी भी मांगी। दूसरी तरफ रांची के 17 साल के सार्थक सिद्धांत ने सिर्फ अपनी कॉपी का मामला नहीं उठाया, बल्कि CBSE द्वारा जारी 576 दस्तावेजों का अध्ययन और तुलना कर टेंडर में गड़बड़ी की बात सामने रखी।
इन दोनों छात्रों की भूमिका यह दिखाती है कि आज का बोर्ड छात्र केवल नंबर पाने वाला उम्मीदवार नहीं, बल्कि सिस्टम को चुनौती देने वाला सजग नागरिक भी हो सकता है। CBSE OSM विवाद में यही सबसे बड़ा सबक है। एक छात्र ने जवाब मांगा, दूसरे ने दस्तावेज पढ़े, और दोनों ने मिलकर उस ढांचे को कठघरे में खड़ा कर दिया जिसे अक्सर अंतिम सत्य माना जाता था।
टेंडर प्रक्रिया पर गहराता शक
सार्थक सिद्धांत की शिकायतों के बाद शिक्षा मंत्रालय ने CBSE से COEMPT को टेंडर देने को लेकर रिपोर्ट मांगी। OSM सर्विस के टेंडर और खरीद प्रक्रिया की जांच के लिए एक सदस्यीय कमेटी गठित कर दी गई है। इससे साफ है कि अब फोकस केवल मार्किंग त्रुटियों पर नहीं, बल्कि उस कंपनी और प्रणाली पर भी है जिसे यह जिम्मेदारी दी गई।
COEMPT एडुटेक हैदराबाद की कंपनी है और तेलंगाना, कर्नाटक तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में डिजिटल इवैल्यूएशन का काम कर चुकी है। 2019 में, जब इसका नाम ग्लोबरेना टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड था, तेलंगाना में 12वीं बोर्ड परीक्षा के डेटा प्रोसेसिंग में गड़बड़ी के आरोप सामने आए थे। उस साल 9.74 लाख में से 3 लाख से ज्यादा छात्र फेल हुए थे। यह पुराना रिकॉर्ड अब फिर चर्चा में है, और यही CBSE OSM जांच का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया है।
री-इवैल्यूएशन पोर्टल पर साइबर अटैक
उधर, CBSE के री-इवैल्यूएशन पोर्टल पर साइबर अटैक की भी सूचना सामने आई। बोर्ड के अनुसार, 2 मिनट में 15 लाख एक्सेस अटेंप्ट हुए, जबकि एक लाख से ज्यादा बार सिस्टम की फाइलों तक बिना अनुमति पहुंचने की कोशिश की गई। इसके बावजूद पोर्टल काम करता रहा और दोपहर 3 बजे तक 16 हजार से ज्यादा छात्रों ने आवेदन कर दिया।
यह आंकड़ा सिर्फ तकनीकी हमले की खबर नहीं है। इसका मतलब यह है कि जिस समय छात्र अपने नंबरों को लेकर पहले से असमंजस में थे, उसी समय री-इवैल्यूएशन का डिजिटल दरवाजा भी हमले का निशाना बना। यानी छात्रों के लिए चिंता दोहरी हो गई—पहले नंबरों पर सवाल, फिर सुधार की प्रक्रिया पर दबाव। CBSE OSM विवाद में यह साइबर अटैक एक और परत जोड़ता है: तकनीक पर निर्भरता तब तक भरोसा नहीं देती, जब तक उसका ढांचा मजबूत न हो।
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संसदीय समिति की सख्त निगरानी
संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ने कहा कि सार्थक ने समिति के सामने अपनी बात रखी है और अब समिति उनके उठाए गए मुद्दों तथा CBSE के जवाबों पर विचार करेगी। इस समिति में लोकसभा और राज्यसभा के कुल 31 सांसद शामिल हैं। यह समिति शिक्षा से जुड़े मुद्दों की समीक्षा करती है और अधिकारियों, संस्थानों तथा संबंधित पक्षों को बुलाकर जवाब मांग सकती है।
यह वही समिति है जो NTA और NEET-UG परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी चर्चा में रही है। दिसंबर 2025 की अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा था कि NTA का प्रदर्शन भरोसा नहीं जगा पाया है। उसने परीक्षा संचालन में सुधार, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और निजी एजेंसियों पर निर्भरता कम करने की सिफारिश की थी। ऐसे में CBSE OSM का मामला अब एक बड़े परीक्षा-सुधार विमर्श से जुड़ गया है। यानी सवाल सिर्फ एक बोर्ड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे मूल्यांकन ढांचे की दिशा पर हैं।
छात्रों को सीधा फायदा
इस पूरे विवाद से छात्रों के लिए सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि अब बोर्ड प्रक्रियाओं पर निगरानी पहले जैसी नहीं रहेगी। अगर एक छात्र की शिकायत पर चेयरमैन-सचिव बदलते हैं, टेंडर जांच शुरू होती है, समिति सुनवाई करती है और बोर्ड को सफाई देनी पड़ती है, तो इसका असर आगे की परीक्षा प्रणालियों पर जरूर पड़ेगा। यही वह बिंदु है जहां CBSE OSM संकट से सुधार की संभावना निकलती है।
एक जरूरी बात यहां समझनी चाहिए। तकनीक अपने आप में गलत नहीं होती, लेकिन बिना पारदर्शिता, बिना मजबूत परीक्षण और बिना जवाबदेही के तकनीक छात्रों के खिलाफ काम करने लगती है। इस विवाद ने यह बात बहुत स्पष्ट कर दी है।
आगे की क्या तैयारी
अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि CBSE केवल चेहरों का बदलाव न दिखाए, बल्कि प्रक्रिया का भी भरोसा लौटाए। री-इवैल्यूएशन पोर्टल की स्थिरता, OSM प्रणाली की समीक्षा, टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और छात्रों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई—इन चार मोर्चों पर बोर्ड को परिणाम दिखाने होंगे। वरना यह विवाद कुछ समय के लिए शांत होकर भी परीक्षा व्यवस्था पर गहरा अविश्वास छोड़ जाएगा।
CBSE OSM का यह पूरा मामला एक सीधा संदेश देता है: अब बोर्ड परीक्षा का दौर केवल “रिजल्ट आ गया” पर खत्म नहीं होता। छात्र दस्तावेज पढ़ रहे हैं, सिस्टम समझ रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और जवाब मांग रहे हैं। यही बदलाव सबसे बड़ा है। शायद आने वाले वर्षों में बोर्ड परीक्षा की असली परिभाषा नंबरों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से तय होगी।
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