Sydney Attack: बॉन्डी बीच पर आतंकी हमले में निहत्थे शख्स ने दिखाई बेमिसाल बहादुरी, ऑस्ट्रेलिया को मिला नया हीरो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में रविवार को बॉन्डी बीच पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। हनुक्का फेस्टिवल के दौरान जब जश्न का माहौल था, तभी दो आतंकियों ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में 16 लोगों की मौत हुई, जिनमें एक आतंकी भी शामिल है। दर्जनों लोग घायल हुए। इसी अफरा-तफरी और गोलियों की गूंज के बीच एक ऐसा शख्स सामने आया, जिसने निहत्थे होते हुए भी आतंक के खिलाफ खड़े होकर कई लोगों की जान बचा ली। इस शख्स का नाम है अहमद अल-अहमद, जिन्हें अब लोग “ऑस्ट्रेलिया का नया हीरो” कह रहे हैं।
हनुक्का उत्सव के दौरान मची अफरा-तफरी
रविवार को बॉन्डी बीच पर यहूदी समुदाय के लोग हनुक्का फेस्टिवल मना रहे थे। रंग-बिरंगी लाइट्स, संगीत और परिवारों की मौजूदगी के बीच माहौल पूरी तरह उत्सवमय था। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीख-पुकार, गोलियों और खून से भर जाएगी।
अहमद अल-अहमद अपने चचेरे भाई जोजाय अलकंज के साथ फेस्टिवल में शामिल होने आए थे। दोनों कॉफी लेने के लिए बाहर निकले थे, तभी अचानक गोलियों की आवाजें सुनाई दीं। शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद पटाखे फूट रहे हैं, लेकिन कुछ ही सेकंड में जब लोग चीखते हुए भागने लगे, तो सच्चाई सामने आ गई।
Ahmed Al Ahmed, the heroic civilian that tackled and disarmed one of the gunmen in Australia’s Bondi Beach shooting.
Ahmed, a 43-year-old Sydney local, owns and operates a fruit shop.
He was shot twice during the heroic act and is in the hospital receiving treatment. pic.twitter.com/xnPmJ7s418
— Muslim (@Muslim) December 14, 2025
दो आतंकियों ने की अंधाधुंध फायरिंग
हमले में शामिल आतंकियों की पहचान साजिद अकरम और उसके बेटे नवीद अकरम के रूप में हुई। दोनों ने भीड़ को निशाना बनाकर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। लोग इधर-उधर भागने लगे। कई लोग जमीन पर गिर पड़े, कुछ कारों और दुकानों के पीछे छिपने की कोशिश करने लगे।
अहमद और जोजाय भी कारों के पीछे छिप गए। जोजाय डर से कांप रहे थे। उस समय अहमद ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन खुद अहमद के भीतर कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने देखा कि अगर कोई आगे नहीं बढ़ा, तो और ज्यादा लोग मारे जाएंगे।
“अगर मुझे कुछ हो जाए, तो परिवार को बता देना…”
जब अहमद हमलावरों की ओर बढ़ने लगे, तो उनके भाई जोजाय ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह बहुत खतरनाक है, लेकिन अहमद का फैसला पक्का था। अहमद ने उस वक्त जो शब्द कहे, वे अब पूरे ऑस्ट्रेलिया में गूंज रहे हैं।
उन्होंने कहा,
“अगर मुझे कुछ हो जाए, तो परिवार को बता देना कि मैं लोगों की जान बचाते हुए मारा गया।”
निहत्थे होकर आतंकी से भिड़े अहमद
अहमद पूरी तरह निहत्थे थे। उनके पास न तो कोई हथियार था और न ही सुरक्षा उपकरण। जैसे ही उन्हें मौका मिला, उन्होंने पीछे से आतंकी साजिद अकरम पर झपट्टा मार दिया। यह पल बेहद जोखिम भरा था। एक गलत कदम उनकी जान ले सकता था।
अहमद ने साजिद की राइफल छीन ली और उसे जोर से धक्का देकर नीचे गिरा दिया। अचानक बदले इस हालात से आतंकी घबरा गया। अहमद ने बंदूक उसकी ओर तान दी। अहमद को बंदूक चलानी नहीं आती थी, लेकिन उनकी आंखों में डर नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प था।
इस एक पल ने कई लोगों की जान बचा ली। जो लोग गोलियों की वजह से फंसे हुए थे, उन्हें भागने का मौका मिल गया।
दूसरे आतंकी ने मारी गोलियां
जब साजिद डरकर पीछे हट गया, अहमद ने राइफल एक पेड़ के पास रख दी। लेकिन तभी दूसरी दिशा से उसका बेटा नवीद अकरम सामने आया। उसने अहमद पर गोलियां चला दीं। दो गोलियां अहमद के बाएं कंधे में लगीं।
अहमद मौके पर ही बेहोश होकर गिर पड़े। लेकिन तब तक वे अपना काम कर चुके थे। कई निर्दोष लोगों की जान बच चुकी थी।
अस्पताल में भर्ती, हालत स्थिर
अहमद को तुरंत सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया। उनकी सर्जरी हुई और डॉक्टरों ने बताया कि उनकी हालत स्थिर है। अस्पताल से सामने आई तस्वीरों में अहमद मुस्कुराते हुए नजर आए।
अहमद ने कहा,
“अगर फिर कभी ऐसा करना पड़े, तो मैं दोबारा वही करूंगा।”
परिवार की आंखों में आंसू, दिल में गर्व
अहमद के पिता ने कहा कि वे खुदा का शुक्रिया अदा कर रहे हैं कि उनका बेटा जिंदा है। उनकी मां जब यह सुनकर रो पड़ीं कि उनके बेटे ने अपनी जान पर खेलकर दूसरों की जान बचाई, तो पूरा परिवार भावुक हो गया।
अहमद दो छोटी बेटियों के पिता हैं, जिनकी उम्र पांच और छह साल है।
सीरिया से शरणार्थी बनकर आए थे ऑस्ट्रेलिया
अहमद मूल रूप से सीरिया के रहने वाले हैं। 2006 में गृहयुद्ध के कारण वे अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया आए थे। यहां उन्होंने कड़ी मेहनत से जिंदगी दोबारा शुरू की। उनकी एक छोटी सी तंबाकू की दुकान है।
2019 में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि पुलिस ने उन पर चोरी का सामान रखने का आरोप लगाया था। बाद में यह आरोप गलत साबित हुआ और 2022 में अहमद को नागरिकता मिल गई।
नागरिकता मिलने के बाद अहमद खुद को ऑस्ट्रेलिया का कर्जदार मानते थे। शायद यही वजह थी कि संकट की घड़ी में उन्होंने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़ने का फैसला किया।
पूरे देश से मिल रहा सम्मान
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने अहमद की बहादुरी की तारीफ करते हुए कहा कि ऐसे लोग देश की असली ताकत होते हैं। न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर क्रिस मिन्स ने कहा कि अहमद की वजह से कई जिंदगियां बचीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी अहमद की तारीफ करते हुए कहा कि उनके मन में इस बहादुर व्यक्ति के लिए बहुत सम्मान है।
क्राउडफंडिंग से ₹3.43 करोड़ जुटाए गए
लोगों ने अहमद के इलाज और परिवार के लिए क्राउडफंडिंग शुरू की। GoFundMe पर 5700 से ज्यादा लोगों ने मिलकर 570,000 डॉलर यानी करीब ₹3.43 करोड़ जुटाए। अमेरिकी अरबपति बिल एकमैन ने भी 100,000 डॉलर का दान दिया।
आतंकी साजिद अकरम की पृष्ठभूमि
ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री टोनी बर्क ने बताया कि आतंकी साजिद अकरम 1998 में छात्र वीजा पर ऑस्ट्रेलिया आया था। बाद में उसने शादी कर पार्टनर वीजा हासिल किया और रेजिडेंट रिटर्न वीजा पर रह रहा था। उसके पास ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता नहीं थी।
उसका बेटा नवीद अकरम ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुआ था और नागरिक था।
हनुक्का फेस्टिवल रद्द, देश में शोक
हमले के बाद मेलबर्न में होने वाला हनुक्का फेस्टिवल रद्द कर दिया गया। पूरे देश में शोक और गुस्से का माहौल है। लेकिन इस अंधेरे के बीच अहमद अल-अहमद की कहानी उम्मीद की एक रोशनी बनकर सामने आई है।
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