NASA का मिशन 2030: चांद पर लगेगा न्यूक्लियर रिएक्टर, चीन संग रेस तेज Read it later

NASA के इंटरिम एडमिनिस्ट्रेटर शॉन डफी ने घोषणा की है कि अमेरिका 2030 तक Moon south pole के पास एक NASA Nuclear Reactor on Moon इंस्टॉल करेगा। इसका उद्देश्य है चांद पर स्थायी lunar base बनाना, जहां पानी की बर्फ और लगातार धूप जैसी संसाधन मौजूद हों। डफी ने साफ कहा – “हम वहां पहले पहुंचकर इसे अमेरिका के लिए सुरक्षित करना चाहते हैं।”

न्यूक्लियर पावर क्यों जरूरी है?

चांद पर दो हफ्ते तक लंबी रातें होती हैं, जहां solar panels बिजली नहीं दे पाते। इस वजह से fission system से बिजली पैदा करना ज़रूरी है, जो 24×7 काम कर सके। अंतरिक्ष विशेषज्ञ रोजर मायर्स के मुताबिक – “The sun and batteries do not work, we will have to have nuclear power.”

100 किलोवॉट का पावर प्लान

NASA का प्लान है कि अगले 5 साल में 100 किलोवॉट का न्यूक्लियर रिएक्टर लगाया जाए, जो एक अमेरिकी घर की 3.5 दिन की बिजली जरूरत पूरी कर सके। यह चांद पर lunar energy का सबसे बड़ा स्रोत होगा।

US बनाम China – चांद की रेस

अमेरिका अपने Artemis program के जरिए 2030 तक चांद पर बेस बनाना चाहता है, लेकिन चीन और रूस भी मिलकर International Lunar Research Station पर काम कर रहे हैं, जिसमें न्यूक्लियर रिएक्टर शामिल होगा। चीन 2030 तक अपनी पहली manned mission करने का दावा कर रहा है।

कानूनी स्थिति – क्या यह अवैध है?

स्पेस लॉ एक्सपर्ट मिशेल हनलॉन के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय कानून चांद पर शांतिपूर्ण तरीके से nuclear power इस्तेमाल करने की इजाजत देता है। हालांकि कोई देश चांद का मालिक नहीं हो सकता, लेकिन जो पहले इंफ्रास्ट्रक्चर लगाएगा, वह भविष्य के ऑपरेशन को प्रभावित कर सकता है।

NASA के पिछले निवेश

2000 से NASA ने छोटे और हल्के space nuclear power systems पर $200 मिलियन खर्च किए हैं। 2023 में 40 किलोवॉट पावर जनरेट करने वाले प्रोजेक्ट पर $5 मिलियन के कॉन्ट्रैक्ट भी पूरे किए गए।

 अंतरिक्ष में न्यूक्लियर पावर का भविष्य

संयुक्त राष्ट्र के 1992 के नियम मानते हैं कि जब solar power पर्याप्त न हो, तब अंतरिक्ष मिशन में न्यूक्लियर पावर जरूरी हो सकती है। यही कारण है कि चांद और मंगल के लिए यह तकनीक भविष्य का रास्ता है।

नासा का लक्ष्य – 100 किलोवाट क्षमता वाला चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर

NASA का उद्देश्य 100 किलोवाट क्षमता वाला परमाणु रिएक्टर विकसित करना है, जो चंद्रमा पर भविष्य की lunar economy को गति देगा और अमेरिका की स्पेस सिक्योरिटी को मजबूत करेगा।

अंतरराष्ट्रीय स्पेस रेस में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

चिंता यह है कि अगर Russia या China जैसी स्पेस पावर पहले चंद्रमा पर रिएक्टर लगा देती हैं, तो वे वहां प्रभावी दावा कर सकती हैं। इसी कारण इस प्रोजेक्ट को हाई प्रायोरिटी दी जा रही है।

अरबों डॉलर का भारी निवेश

इस परियोजना पर अरबों डॉलर खर्च होंगे। 2022 में NASA ने तीन प्राइवेट कंपनियों को शुरुआती डिजाइन के लिए 50-50 लाख डॉलर (करीब ₹40 करोड़) दिए थे। Rolls-Royce जैसी कंपनियों का अनुभव बताता है कि न्यूक्लियर रिएक्टर के निर्माण, पावर डिस्ट्रीब्यूशन और ऑपरेशन में भारी लागत आती है। यह Artemis Mission का हिस्सा है, जिसकी अनुमानित लागत ₹8,200 अरब है।

नासा का अगला कदम

Sean Duffy के मेमो के अनुसार, NASA को 60 दिनों में प्राइवेट कंपनियों से सुझाव लेने होंगे और जल्द ही इस प्रोजेक्ट के लिए एक चीफ ऑफिसर नियुक्त करना होगा। लक्ष्य है कि 2030 तक चंद्रमा पर रिएक्टर स्थापित हो। यह तकनीक आगे Mars exploration और अन्य ग्रहों पर ऊर्जा उपलब्ध कराने में भी मददगार साबित हो सकती है।

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Image credit: ©shutterstock/AI Image Generator

 

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