Hindu-Marriage 2022: आखिर असुर, राक्षस, पैशाच, ब्रह्म, देव और गंधर्व विवाह क्या होते हैं? किस तरह से विवाह करने का जीवन पर क्या असर होता हैॽ

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 हमार देश पुरातन परंपराओं से विधमान है। यहां हर धर्म में विभिन्न प​रंपराओं का निर्वाह किया जाता है, चाहे वैवाहिक संस्कार (Hindu-Marriage-2022) हो या अन्य कोई धार्मिक अनुष्ठान हर धर्म के अलग-अलग रिति-रिवाजों का अनुसरण किया जाता है। इसी कड़ी में हम बताने जा रहे हैं कि ​सनातन हिंदू धर्म में कितनी तरह के वैवाहिक संस्कर होते है और किस तरह का विवाह करने से जीवन में क्या असर होता हैं।


असुर विवाह

असुर विवाह होता क्या है (Asur Vivah Kya Hota Hai?)

असुर विवाह में लड़की के परिजनों को कीमत देकर लड़की खरीदी जाती है। ये विवाह लड़की की सहमति के बिना किया जाता है। हिंदू धर्म में इस तरह से की गई शादियों को असुर विवाह कहा जाता है।

राक्षस विवाह क्या होता है

राक्षस विवाह क्या होता है ‚ राक्षस विवाह के बारे में जानकारी (Rakshas Vivah In Hindi)

किसी लड़की को बहला-फुसलाकर या अगवा करके उससे शादी करना दानव या राक्षस विवाह कहलाता है। पुराणों में, एक लड़की के अपहरण और शादी करने के बारे में कई कहानियां हैं। (Rakshasa Vivah In Hindi) हालांकि, यह अच्छा नहीं माना जाता है।

दूसरी तरह से सोचें तो किसी कन्या को बलपूर्वक, डरा-धमकाकर, बलात् जो विवाह किया जाता है, उसे राक्षस विवाह कहते हैं। सही मायनों में इस विवाह में वर पक्ष द्वारा छल, कपट, बाहुबल और अपने दबदबे का प्रयोग करते हुए एक प्रकार से कन्या का अपहरण करना भी आ जाता है।

राक्षस विवाह कैसे होता है? (Rakshas Vivah Kaise Hota Hai)

राक्षस विवाह होने के लिए सबसे पहले कन्या की सहमति होना जरूरी होता हैं वरना इसे पैशाच विवाह की श्रेणी का कहा जाता है। क्योंकि पैशाच विवाह में कन्या की अनुमति भी नहीं लेने की मान्यता है। इसलिए कन्या की सहमति के बाद उसका अपहरण करके या उसे अपने साथ भगा ले जाकर उससे विवाह कर लिया जाता है।

हालाँकि कन्या का अपहरण करने के बाद उसका भगा कर ले जाने वाले पुरुष के साथ विधि-विधान के साथ विवाह संपन्न किया जाता है। इसमें कन्या का ब्रह्मचर्य आश्रम से निकलकर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना भी जरूरी होता हैं यानीकि इस विवाह में बालिग कन्या का ही अपहरण किए जाने की मान्यता है।

राक्षस विवाह के उदाहरण (Rakshas Vivah Ke Udaharan)

 यदि आप राक्षस विवाह को उदाहरण से समझें तो भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी से विवाह कर दिया था। रुक्मिणी से विवाह करने को कृष्ण पक्ष के लोग तो तैयार थे, लेकिन रुक्मिणी के पक्ष की ओर से कोई तैयार नहीं था। ऐसे में श्रीकृष्ण ने देवी मां के मंदिर से रुक्मिणी का उनकी आज्ञा से अपहरण कर विवाह किया था जो राक्षस विवाह की श्रेणी में महलाया है।

ठीक इसी तरह श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा का अर्जुन से विवाह भी राक्षस विवाह की श्रेणी में ही आता हैं। इतिहास में कई और ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिसमे राक्षस विवाह हुआ हैं जैसे कि महाराज पृथ्वीराज चौहान का राजकुमारी संयोगिता के साथ हुआ विवाह आदि।

पैशाच विवाह

पैशाच विवाह किसे कहते हैंॽ (pishach vivah kise kahate hain?)

किसी लड़की को बेहोशी की हालत में उसके साथ शादी (Paishacha Vivah In Hindi) करने के लिए मजबूर करना और जबरन उससे शादी करना पैशाच विवाह कहा जाता है।  मनुस्मृति में इस विवाह संस्कार को सबसे बुरा स्वरूप ​कहा गया है। 

दूसरे शब्दों में कहें तो अन्य सभी प्रकार के विवाह में या तो कन्या या युवती की अनुमति ली जाती है या उसके परिवारवालों की या दोनों की। (Paishacha Vivah Kya Hota Hai) कोई भी ऐसा विवाह नहीं है जिसमें दोनों में से किसी एक की भी अनुमति न ली जाती हो, लेकिन पैशाच विवाह में इनमे से दोनों की ही अनुमति नहीं ली जाती। कन्या के साथ जोर-जबरदस्ती करके या उसे बेहोश करके किया गया विवाह पैशाच विवाह की श्रेणी में आता है।

इसमें पुरुष या वर पक्ष के लोग कन्या का जबरदस्ती अपहरण कर लें या उसे बहला-फुलसाकर अपने साथ ले जाए या फिर किसी भी कारण से उसे अपने साथ मिला लें। (pishach vivah kise kahate hain?) इसके बाद यदि पुरुष उस कन्या को बेहोश करके या उसकी गहरी नींद में या उससे जोर-जबरदस्ती करके या नशीला पदार्थ खिलाकर उसके साथ अग्नि को साक्षी मानकर विवाह कर लेता है तो ऐसे विवाह को भी संपन्न माना जाता है। 

बहरहाल यहां ये बता दें कि इस तरह का विवाह आज के सभ्य समाज में मान्य नहीं है। हां! दुनिया के कुछ आदिवासी या अन्य दुर्लभ समाज हैं जहां आज भी इस तरह की परंपरा से विवाह किया जाता है।

मनुस्मृति में बताया गया है कि ‘सोई हुई, उन्मत्त, घबराई हुई, मदिरापान की हुई, राह में जाती हुई लड़की के साथ बलपूर्वक यानी जबरदस्ती दुष्कर्म करने के बाद उससे विवाह करना पिशाच विवाह कहलाता है।’

इस तरह के विवाह को सबसे निम्न कोटि का माना गया है। (Paishacha Marriage In Hindi) लेकिन लड़की का दोष न होने पर भी और उसके कौमार्य भंग होने के बाद सामाजिक बहिष्कार से बचाने और सामाजिक सम्मान देने के लिए इस तरह के विवाह को मान्यता दी गई है ।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में पिशाच विवाह को महाभ्रष्ट विवाह माना गया है ।

पैशाच विवाह का उदाहरण (Paishacha Vivah Ka Udaharan)

इसका सबसे बेहतर उदाहरण महाभारत काल के समय का मिलता हैं। उस समय भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर के राजा के अधीन रहकर ही काम करने का वचन लिया था। उसी वचन का पालन करने के लिए भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर के सम्राट के साथ विवाह कराने के लिए काशी नरेश की तीनों पुत्रियों का अपहरण कर लिया था। 

इसमें न ही काशी नरेश की अनुमति थी और न ही उन तीनों कन्याओं की, लेकिन कोई भी भीष्म पितामह की शक्ति के कारण उनका विरोध नहीं कर पाया था। फिर भी शास्त्रों के अनुसार वह विवाह पैशाच विवाह की श्रेणी के अंतर्गत ही आता है।

सर्वश्रेष्ठ है ब्रह्म विवाह संसकार

मनुस्मृति में ब्रह्म विवाह को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसमें वर और वधू दोनों के परिजन और रिश्तेदारों की सहमति के बाद लड़की का विवाह कर कन्या को दान किया जाता है। इस विवाह में सभी प्रकार के वैदिक रीति-रिवाजों और नियमों का पालन किया जाता है।

                                 देव -विवाह

दैव विवाह के बारे में पूरी जानकारी (Dev Vivah In Hindi)

देव विवाह क्या होता है? (Dev Vivah Kya Hota Hai)

ब्रह्म विवाह के समान ही विवाह एक देव-विवाह है। इसमें वैदिक रीति-रिवाज से शादी किसी ज्ञानी और संस्कारी पुरुष से लड़की की सहमति से की जाती है।

मनुस्मृति के मुताबिक हिन्दू धर्म में आठ विवाह (Dev Vivah In Hindi) बताए गए हैं जिसमें से सबसे सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म विवाह को बताया गया है। ब्रह्म विवाह में वर-वधु की आज्ञा लेकर व दोनों परिवारों की सहमति के साथ पूरे विधि-विधान व बिना कुछ लेनदेन के विवाह को संपन्न करवाया जाता है।

जब कोई व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह करवाने में अक्षम होता था तथा उसके पास इतना धन नहीं होता था कि वह अपनी कन्या का ब्रह्म या प्रजापत्य विवाह भी करा सके।

कन्या का विवाह एक निश्चित आयु सीमा के भीतर नहीं हो पा रहा हो व उसके विवाह की उम्र निकली जा रही हो।कन्या के लिए कोई उचित वर नहीं मिल पा रहा हो या कोई और समस्या आ रही हो आदि।

उस स्थिति में कन्या का पिता अपनी कन्या का विवाह किसी सिद्ध पुरुष या ज्ञानी व्यक्ति से (Dev Vivah Kya Hai) करवा देता था अर्थात वह धार्मिक अनुष्ठान में अपनी कन्या का दान कर देता था। इसे ही देव विवाह की संज्ञा दी गई है।

देव विवाह कैसे होता हैं? (Dev Vivah Ka Kya Tatparya Hai)

इसमें कन्या का पिता व अन्य रिश्तेदार कन्या के लिए किसी यज्ञ आदि में जाते हैं और वहां किसी सिद्ध पुरुष या ज्ञानी व्यक्ति को यज्ञ आदि के रूप में अपनी कन्या का दान दे देते हैं। अर्थात वे अपनी कन्या को यज्ञ की दक्षिणा स्वरुप दान कर देते हैं।

मौजूदा समय में देव विवाह

यद्यपि धर्मशास्त्रों में देव विवाह को जहां तक हो सके ना करने को कहा गया है, लेकिन स्थिति के अनुसार इसका करना उचित समझा जाता था। वहीं समय के साथ-साथ यज्ञ-अनुष्ठान धीरे-धीरे कम हो गए व ऐसी परिस्थिति आनी भी बंद हो गई है। इसलिए इस विवाह का स्वरुप धीरे-धीरे कम हो गया। यदि अभी भी कही देव विवाह होता है तो वह बहुत ही सिमित संख्या में या नाम मात्र बनकर रह गया है।

आर्श विवाह संस्कार

 आर्ष विवाह के बारे में पूरी जानकारी (Aarsh Vivah In Hindi)

आर्श विवाह परंपरा ज्यादातर आदिवासियों के बीच निभाई जाती है। यहां वर पक्ष के लोग शादी करने के लिए लड़की के पिता को गाय का दान करते हैं। इसके बाद पिता अपनी बेटी की शादी वर के साथ करता है। इस विवाह को आर्श विवाह कहा जाता है, लड़की के पिता को वर्तमान में  अब गाय की जगह रकम दी जाती है। 

मनुस्मृति के मुताबिक सनातन धर्म में कुल 8 तरह के विवाह माने गए हैं इनमें ब्रह्म विवाह को सबसे उत्तम विवाह माना गया है। इसी श्रेणी में आर्ष या आर्श विवाह (Aarsh Vivah In Hindi) भी आता है जो करीब करीब ब्रह्म विवाह के समान हैं लेकिन इसमें गाय या बैल का भी दान किया जाता है इसलिए इसे गोदान विवाह (Godan Vivah In Hindi) भी कहा जाता है। 

आर्ष विवाह क्या होता है? (Aarsh Vivah Kya Hai)

यह विवाह ब्रह्म विवाह का ही एक रूप माना जा सकता है, लेकिन यह प्रमुख रूप से निर्धन परिवारों की कन्याओं से किया जाने वाला विवाह है। जहां एक ओर ब्रह्म विवाह में वर-वधु पक्ष की ओर से किसी तरह का लेनदेन नहीं होता है और केवल वधु पक्ष की ओर से कन्या का दान किया जाता है तो वहीं आर्ष विवाह (Aarsh Vivah Meaning In Hindi) में वर पक्ष के लोग कन्या पक्ष को गाय का जोड़ा दान में देते हैं।

इसका अर्थ ये है कि वर पक्ष के लोग एक तरह से कन्या को अपने साथ ले जाने के लिए गाय या बैल का एक जोड़ा वधु पक्ष को मूल्य के तौर पर चुकाते हैं। इसके बाद ही आर्श विवाह को संपन्न माना जाता है।

आर्श विवाह कैसे होता है? (Aarsh Vivah Kaise Hota Hai)

इसमें पूरी प्रक्रिया ब्रह्म विवाह के समान ही है, अंतर बस ये है कि इसमें गायों या बैल का लेनदेन होता है जबकि ब्रह्म विवाह में किसी भी तरह के पैसों या वस्तु का लेनदेन पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इसमें वर पक्ष के लोग ज्यादातर ऋषि-मुनि या धनवान परिवार के लोग होते थे जो कन्या पक्ष के लोगो की सहायता करने के मकसद से उन्हें गाय या बैल का जोड़ा दान में देते थे जो उनकी खेती व आजीविका में काम आए।

बिना संतान की सहमती के प्रजापत्य विवाह


बिना संतान की सहमती के प्रजापत्य विवाह

प्रजापत्य विवाह में, माता-पिता संतान की सहमति नहीं लेते हैं। माता-पिता ही अपनी संतान के लिए जीवनसाथी चुनते हैं। परिवार की इच्छा के अनुसार दूल्हा और दुल्हन को शादी करनी होती है।

गंधर्व विवाह वर्तमान का प्रेम विवाह

गंधर्व विवाह के बारे में पूरी जानकारी (Gandharva Vivah In Hindi)

 गन्धर्व विवाह क्या होता है? (Gandharva Vivah Kya Hota Hai)

गंधर्व विवाह में, युवक और युवती अपनी मर्जी से परिवार की सहमति के बिना करते हैं। वहीं शादी में किसी तरह का धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाता है। इस शादी को गंधर्व विवाह कहा जाता है। आधुनिक युग में इस तरह के विवाह को प्रेम विवाह कहा जाने लगा है। 

हिन्दू धर्म शुरू से एक महान धर्म रहा है और उसने समाज के सभी वर्गों व भावनाओं को स्वयं में समाहित किया है तभी उसे सनातन धर्म कहा जाता है। उसी का एक उदाहरण है गन्धर्व विवाह जिसका स्वयं मनुस्मृति में भी उल्लेख है।

गन्धर्व विवाह के मुताबिक यदि एक पुरुष व कन्या एक दूसरे से प्रेम (Gandharva Vivah Kise Kahate Hain) करते हैं, फिर चाहे वे ब्रह्म विवाह के नियमों के विरुद्ध हो, तब भी उनका विवाह मान्य माना जाएगा। यानि कि एक पुरुष-कन्या के अलग वर्ण, जाति, समुदाय से होने या कुछ और कारण से मेल नहीं हो पा रहा हो, लेकिन फिर भी वे एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और परिवार की आज्ञा के बिना विवाह कर लेते हैं तो उसे गन्धर्व विवाह कहा जााएगा और धर्म के अनुसार ये विवाह मान्य होगा जिसे झुठलाया नहीं सकता।

गंधर्व विवाह कैसे होता है? (Gandharva Vivah Kaise Hota Hai)

विवाह के कुल आठ प्रकारों में गन्धर्व विवाह पांचवे नंबर पर आता हैं, उससे ऊपर ब्रह्म, प्रजापत्य, दैव व आर्ष विवाह आते हैं जिसमें वर व वधु के परिवारों की सहमति अनिवार्य मानी गई है। लेकिन गन्धर्व विवाह में ऐसा कुछ भी अनिवार्य नहीं है और न ही कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है।

उपरोक्त सभी विवाह या तो समानान्तर वर्ण (Gandharva Vivah Ka Matlab) में होते थे या किसी सिद्ध पुरुष या ज्ञानी व्यक्ति के साथ, लेकिन गन्धर्व विवाह इन सभी बंधनों को तोड़ता है। गन्धर्व विवाह में वर वधु की जाति, वर्ण, कुल, रंग, रूप, पद, प्रतिष्ठा, धन, परिवार, कुंडली, राशि आदि कुछ भी नहीं देखा जाता है, इसमें केवल कन्या व पुरुष का आपसी प्रेम व भावनाओं का मिलन ही जरूरी होता है।

हालांकि गन्धर्व विवाह (Gandharva Vivah Rituals In Hindi) के भी कुछ नियम हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • कन्या व पुरुष दोनों अपने ब्रह्मचर्य आश्रम की आयु से निकलकर गृहस्थ आश्रम की आयु में प्रवेश कर चुके हो यानि कि दोनों का बालिग होना अनिवार्य है। 
  • इसमें दोनों की पूरी सहमति होना भी जरूरी है और किसी प्रकार का सौदा, पैसों का लेनदेन, जोर-जबरदस्ती न की गई हो।
  • अग्नि को साक्षी मानकर ही विवाह किया गया हो व किसी तरह का धोखा न किया गया हो।
  • दोनों ने एक-दूसरे को अपना असली परिचय दिया हो व ऐसी कोई बात ना छिपाई हो जो विवाह के बाद के जीवन पर प्रभाव डालती हो।

यदि इन सभी नियमों का पालन करते हुए कन्या व पुरुष यह चाहते हैं कि वे आपस में विवाह कर लें। लेकिन उनके घरवाले इसके लिए तैयार न हों तो वे गन्धर्व विवाह कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी मंदिर या धार्मिक स्थल पर जाकर अग्नि को साक्षी मानकर विवाह करना होता है।

इसमें वे अग्नि के फेरे लेते हैं व विवाह को संपन्न करवा लेते हैं। उसके बाद वे धर्म के अनुसार पति-पत्नी बन जाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म में अग्नि को साक्षी मानकर किया गया विवाह मान्य होता है।

गन्धर्व विवाह के बाद वर-वधु की स्थिति (Gandharva Vivah Ke Baad)

जब कन्या व पुरुष गंधर्व विवाह कर लेते हैं तब वे अपने परिवार के सामने आ सकते हैं व उन्हें अपने विवाह की सूचना दे सकते हैं। समाज में कोई भी चाहे वह उनका रिश्तेदार हो, मित्र हो या उनका करीबी जानने वाला हो, कोई भी उनके विवाह को झुठला नहीं सकता है क्योंकि धर्म इस विवाह को मान्यता प्रदान करता है।

गंधर्व विवाह का उदाहरण (Gandharva Vivah Ka Udaharan)

इतिहास को उठा कर देखें तो कई गन्धर्व विवाह हुए हैं जिसमे सबसे बड़ा उदाहरण महाराज दुष्यंत का शकुंतला से हुआ विवाह है। दोनों का विवाह गन्धर्व विवाह की श्रेणी में ही आता है। इसमें दोनों के परिवारों की विवाह को सहमति नहीं थी। फिर भी दोनों ने प्रेम कर एक-दूसरे से विवाह किया। इसके बाद उनसे भरत नामक पुत्र हुआ जो आगे चलकर शक्तिशाली सम्राट बना।

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